ईरान की IRGC ने अमेरिकी हमलों के जवाब में कुवैत, बहरीन, क़तर और UAE पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। खाड़ी में करीब 90 लाख भारतीय फँसे हैं। भारत सरकार के सामने 'ऑपरेशन गंगा' जैसी निकासी, होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने से तेल आपूर्ति संकट और पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में उछाल — तीन मोर्चों पर लड़ाई है।
दुबई के चमचमाते मॉल में सेल्स काउंटर पर खड़ा बिहार का एक लड़का। दोहा की कंस्ट्रक्शन साइट पर ईंटें ढो रहा राजस्थान का एक मज़दूर। कुवैत के तेल रिफ़ाइनरी में नाइट शिफ्ट कर रहा यूपी का एक इंजीनियर। इन सबके सिर के ऊपर से अब बैलिस्टिक मिसाइलें गुज़र रही हैं — और दिल्ली की साउथ ब्लॉक में बैठे नीति-निर्माताओं के माथे पर पसीना।
ईरान के खाड़ी देशों पर मिसाइल हमले से 90 लाख भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और भारत की तेल आपूर्ति दोनों ख़तरे में हैं। NDTV के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरानी टैंकर हमलों के जवाब में ईरान के 140 से अधिक सैन्य ठिकानों पर हमले किए। जवाब में ईरान की IRGC ने कुवैत, बहरीन, क़तर और UAE में अमेरिकी सैन्य बेस पर बैलिस्टिक मिसाइलें दाग दीं। Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक़ IRGC ने एक साथ 85 अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया — यह अब तक का सबसे बड़ा ईरानी जवाबी हमला है।
The Hindu की रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका ने ईरान की तेल बिक्री पर भी पाबंदियाँ कसी हैं, जिससे तेहरान का ग़ुस्सा और भड़का। UAE, क़तर और बहरीन में मिसाइल अलर्ट जारी हुए हैं — NDTV के लाइव अपडेट के अनुसार नागरिकों को शेल्टर में जाने के निर्देश दिए गए।
90 लाख भारतीय — ये आँकड़ा सिर्फ़ संख्या नहीं, ज़िंदगियाँ हैं
खाड़ी के छह देशों में रहने वाले भारतीयों की तादाद क़रीब 90 लाख है — इनमें सबसे बड़ी संख्या UAE (करीब 35 लाख), सऊदी अरब (26 लाख) और कुवैत (10 लाख) में है। इनमें से बड़ा हिस्सा यूपी, बिहार, राजस्थान, केरल और तमिलनाडु के ब्लू-कॉलर वर्कर हैं — कंस्ट्रक्शन, हॉस्पिटैलिटी, तेल रिफ़ाइनरी और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में। ये वो लोग हैं जिनके पास न तो बिज़नेस क्लास की टिकट कटाने का पैसा है, न किसी दूतावास में सीधे फ़ोन लगाने की पहुँच। मिसाइल अलर्ट बजे तो ये शेल्टर कहाँ ढूँढ़ेंगे?
India Today के अनुसार अमेरिका ने 90 ईरानी ठिकानों पर हमले किए, जबकि NDTV की अलग रिपोर्ट 140+ टारगेट की बात करती है। इसका मतलब यह है कि हमले कई चरणों में हुए और अभी भी जारी हैं। जब तक यह 'टिट-फ़ॉर-टैट' रुकता नहीं, खाड़ी के आसमान में मिसाइलों का ट्रैफ़िक बना रहेगा।
पॉलिटिकल पल्स
दिल्ली के सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि विदेश मंत्रालय ने 'ऑपरेशन गंगा' (2022, यूक्रेन) की तर्ज़ पर एक इवैक्यूएशन प्लान का ड्राफ्ट तैयार रखा है — लेकिन अंदर की बात यह है कि यूक्रेन से 20,000 छात्रों को निकालना और खाड़ी से 90 लाख लोगों को निकालना, दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है। सरकारी सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि अभी फ़ोकस निकासी पर नहीं, बल्कि 'शेल्टर-इन-प्लेस' एडवाइज़री पर है — यानी भारतीय नागरिकों को जहाँ हैं, वहीं सुरक्षित रहने की सलाह। लेकिन अगर दुबई या दोहा के एयरपोर्ट बंद हुए तो क्या होगा — यह सवाल अभी बिना जवाब के है।
(यह इंडस्ट्री और सरकारी हलकों में चल रही चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
होर्मुज़ बंद हुआ तो भारत की रसोई में आग
भारत अपनी कुल तेल ज़रूरत का 85% से ज़्यादा आयात करता है, और इसका बड़ा हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रता है। NDTV के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज़ बंद करने की ईरानी कोशिशों के जवाब में ही ये हमले किए। अगर यह जलमार्ग कुछ हफ़्तों के लिए भी बंद रहा, तो अंतरराष्ट्रीय तेल की क़ीमतें 120-150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं — और भारत में पेट्रोल 130-140 रुपये लीटर का हो सकता है। यूपी-बिहार के उस मज़दूर का परिवार जो खाड़ी से भेजे गए पैसों पर टिका है, उसे दोहरी मार पड़ेगी — न रेमिटेंस आएगा, न रसोई का गैस सिलेंडर सस्ता रहेगा।
मोदी सरकार के सामने तीन मोर्चे
पहला — डिप्लोमेसी का कमाल दिखाना होगा। भारत ने पारंपरिक रूप से ईरान और अमेरिका दोनों से संबंध बनाकर रखे हैं। चाबहार बंदरगाह ईरान के साथ रणनीतिक लिंक है, जबकि अमेरिका सबसे बड़ा रक्षा साझेदार। इस कूटनीतिक रस्सी पर चलना 2026 में पहले से भी ज़्यादा मुश्किल हो गया है।
दूसरा — तेल का वैकल्पिक इंतज़ाम। अगर होर्मुज़ लंबे समय तक प्रभावित रहा, तो भारत को रूस, अमेरिका और अफ़्रीकी देशों से तेल आयात बढ़ाना होगा — जो महँगा पड़ेगा और लॉजिस्टिक्स का नया सिरदर्द खड़ा करेगा।
तीसरा — और सबसे अहम — लाखों भारतीयों की सुरक्षा। 1990 में सद्दाम के कुवैत हमले के बाद 'एयर इंडिया' ने 1,70,000 भारतीयों को निकाला था — गिनीज़ बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में दर्ज सबसे बड़ा नागरिक इवैक्यूएशन। लेकिन तब 1.7 लाख थे, अब 90 लाख हैं। इस स्केल पर निकासी लगभग असंभव है — इसलिए रोकथाम ही एकमात्र रास्ता है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि मोदी सरकार इस समय 'वॉच एंड वेट' मोड में है — निकासी की बजाय कूटनीतिक चैनलों से दोनों पक्षों पर दबाव बनाने की कोशिश। लेकिन अगर हमले और बढ़े और नागरिक इलाक़ों में मिसाइलें गिरीं, तो यह 'वेट' बहुत महँगा पड़ सकता है। आने वाले 72 घंटे तय करेंगे कि भारत को 'ऑपरेशन कवच' जैसा कोई नया मिशन लॉन्च करना पड़ेगा या नहीं।
आगे क्या देखें
पहला संकेत — UAE और क़तर के एयरपोर्ट। अगर ये बंद हुए तो निकासी का विकल्प ही ख़त्म हो जाएगा। दूसरा संकेत — कच्चे तेल की क़ीमतें। अगर ब्रेंट क्रूड 130 डॉलर पार करता है तो भारत सरकार पर एक्साइज़ ड्यूटी घटाने का दबाव बनेगा — और यह सीधे बजट गणित को तोड़ेगा। तीसरा — ट्रंप प्रशासन का अगला क़दम। अगर अमेरिका ने ग्राउंड ऑपरेशन की तरफ़ बढ़ना शुरू किया, तो यह 2003 के इराक़ जैसी स्थिति बन सकती है — और भारत के लिए विकल्प और सिकुड़ जाएँगे।
खाड़ी के आसमान में उड़ती हर मिसाइल के साथ, लखनऊ, पटना और जयपुर के किसी घर में एक माँ का दिल ज़ोर से धड़कता है। उसका बेटा वहाँ है — और सरकार का 'प्लान बी' अभी एक सवालिया निशान है। यह सवाल 90 लाख परिवारों का है, और इसका जवाब सिर्फ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, ज़मीन पर तैयारी से आएगा।
आरोपों और दावों की रिपोर्ट यहाँ नामित स्रोतों को श्रेय देते हुए की गई है और जब तक अदालत ने कोई फ़ैसला नहीं सुनाया, वे अप्रमाणित हैं; विचाराधीन मामलों की रिपोर्ट बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- ईरान की IRGC ने कुवैत, बहरीन, क़तर और UAE में 85 अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं — यह ईरान का अब तक का सबसे बड़ा जवाबी हमला है (Times of India)
- खाड़ी के छह देशों में करीब 90 लाख भारतीय नागरिक रहते हैं — इनमें बड़ी संख्या यूपी, बिहार, राजस्थान के ब्लू-कॉलर वर्कर की है
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य प्रभावित होने पर भारत में पेट्रोल 130-140 रुपये लीटर तक पहुँच सकता है — भारत अपनी तेल ज़रूरत का 85%+ आयात करता है
- 1990 के कुवैत इवैक्यूएशन में 1.7 लाख भारतीयों को निकाला गया था — अब 90 लाख हैं, इतने बड़े स्केल पर निकासी लगभग असंभव
- भारत सरकार अभी 'वॉच एंड वेट' मोड में — अगले 72 घंटे तय करेंगे कि नया इवैक्यूएशन मिशन ज़रूरी है या नहीं
आँकड़ों में
- IRGC ने 85 अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर एक साथ मिसाइल हमला किया (Times of India)
- अमेरिका ने ईरान में 140+ सैन्य ठिकानों पर हमले किए (NDTV)
- खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय नागरिक रहते हैं
- भारत अपनी कुल तेल ज़रूरत का 85% से ज़्यादा आयात करता है
- 1990 के कुवैत इवैक्यूएशन में एयर इंडिया ने 1,70,000 भारतीयों को निकाला — गिनीज़ रिकॉर्ड
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: ईरान की IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) और अमेरिकी सेना — दोनों पक्ष; प्रभावित पक्ष में खाड़ी देशों में रहने वाले करीब 90 लाख भारतीय नागरिक (The Hindu, NDTV के अनुसार)
- क्या: IRGC ने कुवैत, बहरीन, क़तर और UAE में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं; इससे पहले अमेरिका ने ईरान में 140-160 ठिकानों पर हमला किया था (India Today, NDTV)
- कब: जून 2026 — अमेरिका की होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरानी टैंकर हमलों के जवाबी स्ट्राइक के तुरंत बाद (NDTV)
- कहाँ: कुवैत, बहरीन, क़तर, UAE के अमेरिकी सैन्य बेस और उनके आसपास के नागरिक इलाक़े; ईरान के भीतर सैन्य ठिकाने (The Hindu, India Today)
- क्यों: अमेरिका ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरान द्वारा टैंकरों पर हमले और जलमार्ग बंद करने के जवाब में स्ट्राइक की; ईरान ने इसे 'बदले की कार्रवाई' बताकर खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया (The Hindu, India Today)
- कैसे: IRGC ने बैलिस्टिक मिसाइलों से 85 अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर एक साथ हमला किया; UAE, क़तर और बहरीन में मिसाइल अलर्ट जारी हुए; अमेरिका ने पहले ही ईरान में 140+ टारगेट तबाह किए थे (NDTV, Times of India)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ईरान ने किन खाड़ी देशों पर मिसाइल हमला किया?
ईरान की IRGC ने कुवैत, बहरीन, क़तर और UAE में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। Times of India के अनुसार 85 अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया।
खाड़ी देशों में कितने भारतीय रहते हैं?
खाड़ी के छह देशों — UAE, सऊदी अरब, कुवैत, क़तर, बहरीन, ओमान — में करीब 90 लाख भारतीय नागरिक रहते हैं, जिनमें बड़ी संख्या यूपी, बिहार, राजस्थान और केरल के ब्लू-कॉलर वर्कर की है।
ईरान-अमेरिका जंग से भारत में पेट्रोल की कीमतों पर क्या असर होगा?
भारत अपनी तेल ज़रूरत का 85% से ज़्यादा आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से आता है। अगर यह जलमार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहा, तो कच्चे तेल की क़ीमतें 120-150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं और भारत में पेट्रोल 130-140 रुपये लीटर हो सकता है।
क्या भारत सरकार ने इवैक्यूएशन प्लान तैयार किया है?
अभी तक कोई आधिकारिक इवैक्यूएशन प्लान की घोषणा नहीं हुई है। सरकारी हलकों में चर्चा है कि फ़ोकस अभी 'शेल्टर-इन-प्लेस' एडवाइज़री पर है — लेकिन 1990 के कुवैत जैसी स्थिति बनी तो 90 लाख के स्केल पर निकासी सबसे बड़ी चुनौती होगी।






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