पुणे की एक अदालत ने नसरापुर में 3 साल की बच्ची से बलात्कार और हत्या के दोषी 65 वर्षीय भीमराव कांबले को 'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' मानते हुए मौत की सज़ा सुनाई है। इंडिया टुडे और हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, अपराध से लेकर फ़ैसले तक महज़ 60 दिन लगे — जो भारतीय न्यायिक इतिहास में दुर्लभ गति है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: 65 वर्षीय दोषी भीमराव कांबले; पीड़िता 3 साल की बच्ची (इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स)।
  • क्या: पुणे की अदालत ने बलात्कार और हत्या के मामले में कांबले को 'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' श्रेणी में मृत्युदंड सुनाया (इंडिया टुडे)।
  • कब: अपराध से फ़ैसले तक कुल 60 दिन का समय लगा; सज़ा 2025 में सुनाई गई (इंडिया टुडे, टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • कहाँ: पुणे ज़िले का नसरापुर क्षेत्र, महाराष्ट्र (हिंदुस्तान टाइम्स)।
  • क्यों: कोर्ट ने इसे 'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' माना — पीड़िता की उम्र और अपराध की बर्बरता को देखते हुए कड़ी से कड़ी सज़ा ज़रूरी मानी गई (इंडियन एक्सप्रेस)।
  • कैसे: पुलिस ने तेज़ी से FIR दर्ज कर फ़ॉरेंसिक सबूत जुटाए, फ़ास्ट-ट्रैक अदालत ने रोज़ाना सुनवाई कर 60 दिनों में फ़ैसला सुनाया (इंडिया टुडे, ज़ी न्यूज़)।

साठ दिन। किसी भी भारतीय अदालत में यह वक़्त अक्सर पहली तारीख़ मिलने में लग जाता है। लेकिन पुणे के नसरापुर में एक 3 साल की बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या का केस FIR से लेकर फांसी की सज़ा तक इन्हीं 60 दिनों में पूरा हो गया। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, पुणे की अदालत ने 65 वर्षीय भीमराव कांबले को 'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' श्रेणी में मृत्युदंड सुनाया है — एक ऐसे देश में जहाँ हज़ारों POCSO मुक़दमे सालों से लंबित पड़े हैं, यह रफ़्तार किसी चमत्कार से कम नहीं लगती।

लेकिन असली सवाल यही है — क्या यह सिस्टम की ताक़त है, या अपवाद?

केस फ़ाइल: वह 60 दिन जिन्होंने नसरापुर को बदल दिया

हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, नसरापुर पुलिस ने वारदात के तुरंत बाद FIR दर्ज की और आरोपी भीमराव कांबले को गिरफ़्तार किया। पुलिस सूत्रों के हवाले से बताया गया कि फ़ॉरेंसिक टीम को तत्काल मौक़े पर बुलाया गया और सबूत इकट्ठा किए गए। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, चार्जशीट तेज़ी से दाख़िल की गई और अदालत ने इसे फ़ास्ट-ट्रैक मोड में लेते हुए लगभग रोज़ाना सुनवाई की।

ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट बताती है कि अदालत ने दोषी को 'जब तक मृत्यु न हो जाए, तब तक फांसी पर लटकाए रखने' की सज़ा सुनाई। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जज ने अपने फ़ैसले में इस मामले को 'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' क़रार दिया — यानी वह श्रेणी जो सुप्रीम कोर्ट ने बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) में तय की थी और जिसमें मृत्युदंड तभी दिया जाता है जब जीवन कारावास 'अपर्याप्त' साबित हो।

यहाँ ग़ौरतलब है कि आरोपी की उम्र 65 वर्ष थी और पीड़िता महज़ 3 साल की — इस उम्र के अंतर और अपराध की बर्बरता ने कोर्ट को इस नतीजे तक पहुँचाया कि 'कोई कम सज़ा न्यायोचित नहीं होगी।'

केस फाइल

(यह खंड इंडस्ट्री चर्चा, क़ानूनी विश्लेषण और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

क़ानूनी हलकों में चर्चा है कि इस केस की रफ़्तार के पीछे कई कारक एक साथ काम कर गए। पहला — निर्भया केस के बाद बने POCSO अधिनियम और 2019 के संशोधन ने 12 साल से कम उम्र के बच्चों से बलात्कार के मामलों में मृत्युदंड का प्रावधान जोड़ा। दूसरा — महाराष्ट्र सरकार ने ऐसे मामलों के लिए फ़ास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) स्थापित किए हैं, जहाँ सुनवाई में देरी का बहाना नहीं चलता। तीसरा — और यह सबसे अहम है — स्थानीय पुलिस और अभियोजन पक्ष के बीच 'ज़ीरो-गैप कॉर्डिनेशन' रहा, जिसमें चार्जशीट में कोई तकनीकी ख़ामी नहीं छोड़ी गई।

विश्लेषकों का कहना है कि अगर पुलिस FIR के बाद 48-72 घंटों में मज़बूत फ़ॉरेंसिक सबूत जमा कर ले और अभियोजन पक्ष चार्जशीट में कोई झोल न छोड़े, तो फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट वाक़ई 60-90 दिनों में फ़ैसला दे सकती है। लेकिन ट्रेड हलकों में यह भी फ़ुसफ़ुसाहट है कि जनता के दबाव और मीडिया की सुर्ख़ियों ने भी इस केस की प्राथमिकता तय करने में भूमिका निभाई — एक ऐसा सच जो सिस्टम खुलकर नहीं स्वीकारता।

60 दिन बनाम 60 महीने: भारत का POCSO रिपोर्ट कार्ड

नसरापुर का यह फ़ैसला तब आया है जब नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के हालिया आंकड़ों के अनुसार देशभर में POCSO के लाखों मुक़दमे लंबित हैं। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक़, अधिकांश POCSO मामलों में फ़ैसला आने में 3-5 साल या उससे अधिक लग जाते हैं। कई मामलों में पीड़ित बच्चे बड़े हो जाते हैं, गवाह पलट जाते हैं, और सबूत कमज़ोर पड़ जाते हैं।

तो पुणे में वह क्या अलग हुआ? इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण यह है कि 60 दिन का यह चमत्कार दरअसल तीन चीज़ों का संयोग है — एक, लोकल पुलिस की तेज़ कार्रवाई; दो, अभियोजन पक्ष की 'वॉटरटाइट' चार्जशीट; और तीन, एक फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट जिसने तारीख़ पर तारीख़ के खेल को नकार दिया। यही तीनों कड़ियाँ जब किसी और राज्य में टूटती हैं — और वे अक्सर टूटती हैं — तो 60 दिन 60 महीने बन जाते हैं।

यूपी, दिल्ली और बिहार जैसे राज्यों में POCSO कोर्ट्स की संख्या ज़रूरत के मुक़ाबले कम है। कई ज़िलों में एक ही जज दर्जनों केस एक साथ सुन रहा है। ऐसे में 'रोज़ाना सुनवाई' एक सपना बनकर रह जाती है।

'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' — फांसी के बाद भी लंबा रास्ता

यह फ़ैसला भले ही 60 दिन में आ गया, लेकिन क़ानूनी प्रक्रिया यहाँ ख़त्म नहीं होती। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मृत्युदंड की पुष्टि हाई कोर्ट से होनी ज़रूरी है। दोषी के पास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील का अधिकार है, और अंतिम विकल्प के तौर पर राष्ट्रपति से दया याचिका भी दाख़िल हो सकती है। निर्भया केस में फ़ैसला 2013 में आया था, लेकिन दोषियों को फांसी 2020 में हुई — सात साल बाद।

नसरापुर मामले में भी क़ानूनी विशेषज्ञों का अनुमान है कि अपीलीय प्रक्रिया में कई साल लग सकते हैं। यानी ट्रायल कोर्ट की 60 दिन की रफ़्तार और ऊपरी अदालतों की सालों लंबी प्रक्रिया — यह विरोधाभास भारतीय न्याय व्यवस्था का सबसे बेचैन करने वाला सच है।

आगे क्या देखें: मॉडल बनेगा या अपवाद रह जाएगा?

अब नज़र इस बात पर होगी कि क्या महाराष्ट्र सरकार नसरापुर मॉडल को संस्थागत बनाती है — यानी हर POCSO फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट में इसी तरह की रोज़ाना सुनवाई और टाइम-बाउंड चार्जशीट को अनिवार्य किया जाता है, या यह केस सिर्फ़ एक 'शो-केस जजमेंट' बनकर रह जाता है जिसे प्रेस कॉन्फ़्रेंस में दिखाया जाए और बाक़ी केस सड़ते रहें।

केंद्र सरकार ने FTSC योजना के तहत 1,023 फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित करने का लक्ष्य रखा था — लेकिन ज़मीन पर कितने वाक़ई चालू हैं और कितने सिर्फ़ काग़ज़ पर, यह सवाल बना हुआ है।

सबसे बड़ा सबक़ शायद यह है: नसरापुर ने साबित किया कि भारतीय सिस्टम के पास गति देने की ताक़त है — पुलिस, अभियोजन और न्यायपालिका तीनों के पास। कमी संसाधनों की उतनी नहीं जितनी इरादे और तालमेल की है। और जब तक 60 दिन का न्याय अपवाद रहेगा, नियम नहीं बनेगा — तब तक हर ऐसा फ़ैसला उत्सव कम, सवाल ज़्यादा खड़ा करेगा।

तो अगली बार जब कोई POCSO केस सुर्ख़ियों में आए, तो पहला सवाल यह न हो कि सज़ा कितनी सख़्त मिली — बल्कि यह हो कि FIR से फ़ैसले तक कितने दिन लगे। क्योंकि असली न्याय सज़ा की मात्रा में नहीं, उसकी रफ़्तार में छिपा है। [EMBED-SUGGESTION:tweet]

आँकड़ों में

  • 60 दिन — FIR से लेकर मृत्युदंड की सज़ा तक का समय, पुणे नसरापुर केस (इंडिया टुडे)
  • 65 वर्ष — दोषी भीमराव कांबले की उम्र; पीड़िता की उम्र 3 वर्ष (हिंदुस्तान टाइम्स)
  • 1,023 — केंद्र सरकार द्वारा FTSC योजना के तहत प्रस्तावित फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट्स की संख्या
  • 7 साल — निर्भया केस में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले (2013) से दोषियों की फांसी (2020) तक का समय

मुख्य बातें

  • पुणे नसरापुर में 3 साल की बच्ची से बलात्कार और हत्या के दोषी 65 वर्षीय भीमराव कांबले को 'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' श्रेणी में मृत्युदंड सुनाया गया (इंडिया टुडे, इंडियन एक्सप्रेस)।
  • FIR से लेकर फांसी की सज़ा तक महज़ 60 दिन लगे — जबकि अधिकांश POCSO मामलों में फ़ैसला आने में 3-5 साल या उससे अधिक लगते हैं (इंडिया टुडे)।
  • मृत्युदंड की पुष्टि हाई कोर्ट से ज़रूरी है; दोषी को अपील और दया याचिका का अधिकार है — निर्भया केस में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से फांसी तक 7 साल लगे थे (इंडियन एक्सप्रेस)।
  • POCSO 2019 संशोधन ने 12 साल से कम उम्र के बच्चों से बलात्कार में मृत्युदंड का प्रावधान जोड़ा — यह कड़ी इस केस में निर्णायक रही।
  • केंद्र की FTSC योजना में 1,023 फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट का लक्ष्य रखा गया था — ज़मीनी हक़ीक़त पर सवाल बने हुए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पुणे नसरापुर केस में 60 दिन में फांसी की सज़ा कैसे आई?

इंडिया टुडे के अनुसार, पुलिस ने तेज़ी से FIR दर्ज कर फ़ॉरेंसिक सबूत जुटाए, अभियोजन ने मज़बूत चार्जशीट दाख़िल की, और फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट ने लगभग रोज़ाना सुनवाई कर 60 दिनों में फ़ैसला सुनाया।

भीमराव कांबले को कौन सी सज़ा मिली?

हिंदुस्तान टाइम्स और ज़ी न्यूज़ के अनुसार, पुणे की अदालत ने 65 वर्षीय भीमराव कांबले को 'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' श्रेणी में मृत्युदंड (फांसी) की सज़ा सुनाई।

'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' का मतलब क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) में यह सिद्धांत तय किया — मृत्युदंड तभी दिया जाए जब अपराध इतना गंभीर हो कि आजीवन कारावास अपर्याप्त हो। इस केस में पीड़िता की कम उम्र और अपराध की बर्बरता इस श्रेणी में रखी गई।

क्या इस फ़ैसले के बाद भी अपील हो सकती है?

हाँ। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मृत्युदंड की पुष्टि हाई कोर्ट से ज़रूरी है। दोषी हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है और राष्ट्रपति को दया याचिका भी दे सकता है।

POCSO मामलों में आमतौर पर फ़ैसला आने में कितना समय लगता है?

NCRB के आंकड़ों और इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकांश POCSO मामलों में फ़ैसला आने में 3 से 5 साल या उससे अधिक लगते हैं। नसरापुर के 60 दिन इसलिए असाधारण माने जा रहे हैं।

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