जाति जनगणना भारत में आरक्षण का पूरा गणित पलट सकती है। द हिंदू के अनुसार कार्यप्रणाली और वर्गीकरण के सवाल अभी सबसे बड़ी चुनौती हैं। बिहार का अनुभव बताता है कि डेटा आते ही सियासी बिसात बदलती है — और 2027 की जनगणना में यह सवाल केंद्र के लिए सबसे संवेदनशील फैसला बन चुका है।

एक आँकड़ा है जो भारतीय राजनीति की नींव हिला सकता है — और वह आँकड़ा किसी के पास नहीं है। 1931 के बाद से भारत में किसी राष्ट्रीय जनगणना ने जाति की गिनती नहीं की। लगभग 95 साल का अँधेरा। इस अँधेरे में ही आरक्षण की सीमाएँ तय हुईं, मंडल आयोग ने अनुमान लगाए, और पार्टियों ने वोट बैंक बनाए। अब 2027 की दशकीय जनगणना दस्तक दे रही है — और सवाल यह नहीं कि जाति गिनी जाए या नहीं, सवाल यह है: गिनती के बाद जो सच सामने आएगा, उसे सहने की हिम्मत किसमें है?

द हिंदू के एक विस्तृत एक्सप्लेनर के अनुसार, जाति जनगणना की सबसे बड़ी चुनौती कार्यप्रणाली ('methodology') है। भारत में जातियों की संख्या का कोई एक स्वीकृत रजिस्टर नहीं है। राज्यों की OBC सूचियाँ अलग-अलग हैं — बिहार में जो जाति OBC है, वह कर्नाटक में नहीं भी हो सकती। सवाल उठता है: क्या केंद्र एक राष्ट्रीय जाति-वर्गीकरण तैयार करेगा? अगर हाँ, तो किसके मानदंड पर? मंडल आयोग ने 3,743 जातियों को OBC माना था — आज यह संख्या कहीं ज़्यादा बड़ी हो सकती है।

दूसरी चुनौती तकनीकी है। जनगणना फ़ॉर्म में जाति का कॉलम जोड़ना सुनने में आसान है, लेकिन ज़मीन पर गणनाकर्ता ('एन्यूमरेटर') को लोगों से जाति पूछनी होगी — और बहुत-से लोग अपनी जाति या तो नहीं बताना चाहेंगे, या ग़लत बताएँगे। 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) का अनुभव इसी बात की चेतावनी है। उस डेटा में इतनी अशुद्धियाँ निकलीं कि उसे कभी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया — द हिंदू की रिपोर्ट इस बात को रेखांकित करती है।

बिहार मॉडल: सबक़ और सीमाएँ

बिहार ने 2022-23 में अपनी जातीय गणना कराई और नतीजे चौंकाने वाले थे। ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) की आबादी 36% से ज़्यादा निकली, जबकि अगड़ी जातियाँ कुल आबादी का मात्र 15.5% थीं। इन आँकड़ों ने नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव दोनों को राजनीतिक ज़मीन दी — "देखिए, बहुसंख्यक पिछड़े हैं, उन्हें उनका हक़ मिलना चाहिए।" लेकिन इसी डेटा ने बिहार की अगड़ी जातियों में असुरक्षा भी पैदा की और बीजेपी ने उस असुरक्षा को भुनाने की कोशिश की। यानी डेटा अस्त्र भी है और बूमरैंग भी — यह बिहार ने साबित कर दिया।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि PMO में जाति जनगणना को लेकर दो धड़े बन चुके हैं। एक धड़ा मानता है कि अगर बीजेपी ने ख़ुद इसे नहीं किया तो कांग्रेस 2029 के आम चुनावों में "जनगणना इनकार" को मुद्दा बनाएगी — ठीक वैसे ही जैसे 2024 में राहुल गांधी ने "जितनी आबादी, उतना हक़" का नारा दिया था। दूसरा धड़ा चिंतित है कि अगर OBC की आबादी 50% से ऊपर निकली — जो बहुत संभव है — तो सुप्रीम कोर्ट के 50% आरक्षण सीमा वाले फ़ैसले (इंदिरा साहनी, 1992) पर दोबारा बहस खुलेगी, और यह पेंडोरा बॉक्स बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग को तहस-नहस कर सकता है।

हिंदी बेल्ट के OBC नेताओं के लिए तो यह जीवन-मरण का सवाल है। अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में इसे 2027 विधानसभा चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं। ममता बनर्जी बंगाल में अपनी OBC पहचान को और मज़बूत करने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकती हैं। लेकिन इसमें ख़तरा भी है — अगर डेटा से किसी जाति-समूह की आबादी "उम्मीद से कम" निकली, तो उसकी राजनीतिक सौदेबाज़ी की ताक़त रातोरात घट जाएगी। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमानों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

2027 जनगणना: असली अड़चन कहाँ है?

द हिंदू के अनुसार 2027 की जनगणना की प्री-टेस्टिंग प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, और फ़ॉर्म में कौन-से सवाल शामिल होंगे — यह फ़ैसला ही सबसे बड़ी लड़ाई है। जाति का कॉलम जोड़ा जाए या अलग सर्वे कराया जाए — इस पर अभी तक कोई आधिकारिक फ़ैसला सार्वजनिक नहीं हुआ है। सूत्रों के अनुसार गृह मंत्रालय और रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय के बीच इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श जारी है।

इसमें एक और पेच है जो कम चर्चा में है। अगर जाति जनगणना होती है और डेटा सार्वजनिक होता है, तो राज्यों की माँग होगी कि आरक्षण सीमा 50% से बढ़ाई जाए — तमिलनाडु पहले से 69% आरक्षण दे रहा है (नौवीं अनुसूची की सुरक्षा में)। यह सवाल अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचेगा, और तब संविधान की बुनियादी संरचना ('बेसिक स्ट्रक्चर') बनाम सामाजिक न्याय की बहस एक बार फिर ज़िंदा हो जाएगी।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि बीजेपी के लिए जाति जनगणना एक ऐसा फ़ैसला है जहाँ "हाँ" भी ख़तरनाक है और "ना" भी। अगर कराई, तो OBC समेकन ('consolidation') विपक्ष के हाथ लगेगा। अगर नहीं कराई, तो "अगड़ों की पार्टी" का ठप्पा और गहरा होगा। सबसे संभावित रास्ता यह है कि सरकार जनगणना में एक सीमित जाति कॉलम जोड़े, लेकिन डेटा को "विश्लेषण के लिए" वर्षों तक लटकाए रखे — ठीक वैसे ही जैसे 2011 की SECC का डेटा आज तक अधूरा पड़ा है।

आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ यह होगा कि संसद के मानसून सत्र में कांग्रेस इस पर प्राइवेट मेंबर बिल लाती है या नहीं, और बीजेपी के OBC चेहरे — ख़ासकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में — पार्टी लाइन से अलग कोई सुर निकालते हैं या नहीं। 2029 का आम चुनाव अभी तीन साल दूर है, लेकिन जाति जनगणना का फ़ैसला उसकी ज़मीन अभी तय कर रहा है।

असली सवाल यह नहीं है कि जाति गिनी जाएगी या नहीं — किसी न किसी रूप में गिनी जाएगी, इसमें अब ज़्यादा शक नहीं। असली सवाल यह है: जब आँकड़े सामने आएँगे, तो क्या कोई पार्टी उन्हें वैसे ही स्वीकार करेगी जैसे वे हैं — या हर कोई सिर्फ़ वही पन्ना पढ़ेगा जो उसके काम का है?

आरक्षण से शुरुआत — ज़ुबान से हम सभी देशवासियों कहें, जगह से हम जाति गिनें। जब तक नंबर अँधेरे में हैं, हर पार्टी अपनी टॉर्च अपनी दिशा में चमकाएगी। रोशनी सबके लिए बराबर हो — यह माँगना आसान है। सवाल है: रोशनी में जो दिखेगा, उसे सहने की तैयारी किसने की है?

आरोप और दावे संबंधित सूत्रों और रिपोर्टों के हवाले से हैं और जब तक न्यायालय द्वारा सिद्ध न हों, अप्रमाणित हैं; उप-न्यायिक मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • 1931 के बाद से भारत में कोई राष्ट्रीय जाति जनगणना नहीं हुई — लगभग 95 साल से आरक्षण नीति अनुमानों पर टिकी है (द हिंदू)
  • बिहार की 2022-23 जातीय गणना में EBC आबादी 36%+ और अगड़ी जातियाँ सिर्फ़ 15.5% निकलीं — इसने राजनीतिक समीकरण बदल दिए
  • 2011 SECC का डेटा अशुद्धियों के कारण कभी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हुआ — कार्यप्रणाली आज भी सबसे बड़ी चुनौती (द हिंदू)
  • अगर OBC आबादी 50% से ऊपर निकली तो सुप्रीम कोर्ट की 50% आरक्षण सीमा (इंदिरा साहनी, 1992) पर नई संवैधानिक बहस अनिवार्य
  • बीजेपी के लिए यह 'दोधारी तलवार' — कराएँ तो OBC समेकन विपक्ष को मिले, न कराएँ तो 'अगड़ों की पार्टी' का ठप्पा गहरा हो

आँकड़ों में

  • 1931 — भारत में आख़िरी बार जाति-आधारित जनगणना हुई (द हिंदू)
  • 3,743 — मंडल आयोग द्वारा चिह्नित OBC जातियों की संख्या
  • 36%+ — बिहार जातीय गणना 2022-23 में EBC (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) का आबादी अनुपात
  • 15.5% — बिहार में अगड़ी जातियों का कुल आबादी में हिस्सा
  • 69% — तमिलनाडु का मौजूदा आरक्षण प्रतिशत, नौवीं अनुसूची की सुरक्षा में

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: केंद्र सरकार, कांग्रेस, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव और अन्य OBC नेता — द हिंदू के अनुसार
  • क्या: राष्ट्रीय स्तर पर जाति आधारित जनगणना की माँग और उसकी कार्यप्रणाली पर बहस तेज़ — द हिंदू के विश्लेषण के अनुसार
  • कब: 2026 में बहस तेज़, 2027 की अगली दशकीय जनगणना से पहले फ़ैसले की उम्मीद — रिपोर्ट्स के अनुसार
  • कहाँ: भारत — विशेषकर हिंदी बेल्ट (बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश) और दिल्ली में PMO स्तर पर
  • क्यों: OBC-SC-ST आबादी का सटीक डेटा न होने से आरक्षण नीति की वैधता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर सवाल — द हिंदू के अनुसार
  • कैसे: सरकार को तय करना है कि जनगणना फ़ॉर्म में जाति का कॉलम जोड़ा जाए या अलग सर्वे हो, वर्गीकरण मानदंड क्या हों — द हिंदू के एक्सप्लेनर के अनुसार

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जाति जनगणना क्या होती है और आख़िरी बार कब हुई?

जाति जनगणना में देश की हर जाति की आबादी की गिनती की जाती है। भारत में आख़िरी बार 1931 में ब्रिटिश शासन के दौरान जाति-आधारित जनगणना हुई थी। 2011 में SECC (सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना) हुई लेकिन उसका डेटा अशुद्धियों के कारण पूरी तरह प्रकाशित नहीं किया गया — द हिंदू के अनुसार।

बिहार जातीय गणना से क्या राजनीतिक असर हुआ?

बिहार की 2022-23 गणना में EBC 36%+ और अगड़ी जातियाँ 15.5% निकलीं। इससे नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को 'बहुसंख्यक पिछड़े' का राजनीतिक हथियार मिला, लेकिन अगड़ी जातियों में असुरक्षा भी बढ़ी।

क्या 2027 की जनगणना में जाति का कॉलम होगा?

अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। द हिंदू के अनुसार प्री-टेस्टिंग शुरू हो चुकी है और फ़ॉर्म के सवालों पर गृह मंत्रालय और रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय में विचार-विमर्श जारी है।

जाति जनगणना से आरक्षण सीमा पर क्या असर पड़ेगा?

अगर OBC आबादी 50% से ऊपर निकली तो सुप्रीम कोर्ट की 50% आरक्षण सीमा (इंदिरा साहनी, 1992) पर नई संवैधानिक बहस खुल सकती है। तमिलनाडु पहले से 69% आरक्षण दे रहा है।

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