भारत के सरकारी स्कूलों में UDISE+ डेटा के अनुसार 10 लाख से ज़्यादा शिक्षक पद रिक्त हैं। ASER रिपोर्ट दिखाती है कि कक्षा 5 के लगभग आधे बच्चे कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पाते। शिक्षकों की कमी इस संकट की सबसे बड़ी जड़ है, और भर्ती प्रक्रिया राजनीतिक ठहराव में फँसी है।

एक तस्वीर सोचिए। मध्य प्रदेश के किसी गाँव का सरकारी प्राइमरी स्कूल। सुबह की प्रार्थना हुई, बच्चे कतार में खड़े हैं — कक्षा 1 से 5 तक, कुल मिलाकर 120 बच्चे। और उन्हें पढ़ाने वाले? दो शिक्षक। एक जो रजिस्टर भरता है, मिड-डे मील का हिसाब रखता है, चुनाव ड्यूटी से लौटा है, और पढ़ाने बैठता है तो एक साथ तीन कक्षाओं को सँभालता है। दूसरा अक्सर BRC मीटिंग या जनगणना ड्यूटी पर गायब। यह कहानी किसी एक गाँव की नहीं — यह भारत के लाखों सरकारी स्कूलों की हक़ीक़त है, और इसके पीछे का आँकड़ा रूह कँपा देने वाला है।

शिक्षा मंत्रालय के UDISE+ (Unified District Information System for Education Plus) के नवीनतम उपलब्ध डेटा के अनुसार भारत के सरकारी स्कूलों में 10 लाख से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं। इसे ऐसे समझें: हर दसवें सरकारी स्कूल में कम से कम एक शिक्षक की कमी है, और हज़ारों स्कूल ऐसे हैं जहाँ सिर्फ़ एक शिक्षक पूरे स्कूल को चलाता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act, 2009) कहता है कि प्राइमरी स्तर पर शिक्षक-छात्र अनुपात 1:30 होना चाहिए — हक़ीक़त में बिहार और उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में यह अनुपात 1:60 से भी ज़्यादा है।

अब इस खालीपन का नतीजा देखिए। ASER (Annual Status of Education Report) 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक़ कक्षा 5 के लगभग 47% बच्चे कक्षा 2 की हिंदी की किताब ठीक से नहीं पढ़ पाते। गणित में हालत और बुरी — कक्षा 8 के क़रीब 44% बच्चे सामान्य भाग (division) का सवाल हल नहीं कर पाते। ये आँकड़े शर्मनाक हैं, लेकिन इनके पीछे की मशीनरी समझें तो सब साफ़ हो जाता है: जहाँ शिक्षक ही नहीं, वहाँ पढ़ाई कैसे?

इनसाइड टॉक

शिक्षा जगत में बात करें तो एक कड़वी सच्चाई बार-बार सामने आती है — शिक्षक भर्ती अब सबसे ज़्यादा 'राजनीतिक' प्रक्रियाओं में से एक बन चुकी है। ट्रेड हलकों और शिक्षा विश्लेषकों में चर्चा है कि कई राज्य सरकारें भर्ती इसलिए टालती हैं क्योंकि हर नई भर्ती का मतलब है दशकों तक वेतन और पेंशन का बोझ। एक वरिष्ठ शिक्षा विश्लेषक की बात मानें तो "सरकारें ठेके पर शिक्षक रखना पसंद करती हैं — कम वेतन, कोई पेंशन नहीं, और जब चाहे हटाओ।" बिहार और झारखंड में 'नियोजित शिक्षकों' की हड़ताल इसी व्यथा की गवाही है — वे सालों से नियमित वेतनमान की माँग कर रहे हैं। इंडस्ट्री की बात यह भी है कि कई राज्यों में भर्ती परीक्षाएँ पेपर लीक, कोर्ट केस और आरक्षण विवादों में इतनी उलझ जाती हैं कि एक भर्ती चक्र पूरा होने में 3-5 साल लग जाते हैं। तब तक और पद खाली हो चुके होते हैं। (यह शिक्षा जगत में चल रही चर्चा और विश्लेषकों के अनुमान पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

NEP 2020 का वादा और ज़मीनी हक़ीक़त

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने शिक्षा पर GDP का 6% ख़र्च करने का लक्ष्य रखा था। केंद्रीय बजट 2025-26 के आँकड़ों के अनुसार शिक्षा पर कुल ख़र्च GDP के लगभग 2.9% के आसपास अटका हुआ है — यानी वादे से आधा भी नहीं। NEP ने 'फ़ाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरेसी' (FLN) मिशन को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया, लेकिन जब कक्षा में शिक्षक ही नहीं बैठा तो FLN की वर्कशीट कौन करवाएगा? निपुण भारत मिशन के तहत 2026-27 तक हर बच्चे को बुनियादी पठन-गणित कौशल सिखाने का लक्ष्य है — मगर मौजूदा रफ़्तार से यह लक्ष्य एक सपना ही लगता है।

राज्यों की तस्वीर और चिंताजनक है। UDISE+ डेटा बताता है कि उत्तर प्रदेश में लगभग 1.5 लाख, बिहार में 1 लाख से ज़्यादा, और मध्य प्रदेश में क़रीब 80,000 शिक्षक पद खाली हैं। राजस्थान और झारखंड में भी स्थिति गंभीर है। दूसरी तरफ़ केरल और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में शिक्षक-छात्र अनुपात बेहतर है — यह साबित करता है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो यह समस्या हल हो सकती है।

असली सवाल — शिक्षक सिर्फ़ पढ़ा रहे हैं या गिनती बढ़ा रहे हैं?

जो शिक्षक हैं भी, उनसे 'ग़ैर-शैक्षणिक काम' इतने करवाए जाते हैं कि पढ़ाई गौण हो जाती है। चुनाव ड्यूटी, जनगणना, सर्वेक्षण, मिड-डे मील प्रबंधन, MDM रजिस्टर, DBT सत्यापन — एक अनुमान के मुताबिक़ एक सरकारी शिक्षक अपने कुल कार्यदिवसों का 25-30% ग़ैर-शैक्षणिक कामों में ख़र्च करता है। यानी जो शिक्षक दिख रहे हैं, वे भी पूरी तरह कक्षा में नहीं हैं।

इस सबके बीच एक और पहलू है जो कम चर्चा में आता है — डिजिटल खाई। कोविड के बाद डिजिटल शिक्षा को जैसे रामबाण बताया गया, लेकिन ASER के ही आँकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत में सरकारी स्कूल जाने वाले बच्चों के केवल 30-35% परिवारों के पास स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट दोनों की सुविधा है। यानी डिजिटल क्लासरूम उन बच्चों तक पहुँच ही नहीं रही जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

जो कोण बाकी मीडिया से छूट जाता है, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है: यह संकट सिर्फ़ 'शिक्षकों की कमी' का नहीं है — यह एक पूरी पीढ़ी के भविष्य पर चुपचाप लगा ताला है। जब कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पाता, तो वह कक्षा 8 में गणित कैसे करेगा? और जब कक्षा 10 में फ़ेल होगा, तो समाज कहेगा 'बच्चा पढ़ने में कमज़ोर था' — जबकि असलियत यह थी कि उसके स्कूल में कभी पूरे शिक्षक थे ही नहीं। यह व्यवस्था की विफलता है जिसका ठीकरा बच्चे के सिर फोड़ा जाता है।

आगे क्या होगा — और क्या देखें

अगर मौजूदा रुझान जारी रहा तो आने वाले दो-तीन सालों में कई राज्यों में शिक्षक रिक्तियों का आँकड़ा और बढ़ेगा — रिटायरमेंट की दर भर्ती से ज़्यादा है। 2026-27 में निपुण भारत मिशन की डेडलाइन आने वाली है, और अगर FLN के लक्ष्य पूरे नहीं हुए तो सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ेगा। शिक्षा विश्लेषकों का अनुमान है कि कुछ राज्य चुनावों से पहले बड़ी भर्ती घोषणाएँ कर सकते हैं — लेकिन असली सवाल यह होगा कि क्या वे भर्तियाँ समय पर पूरी होंगी, या फिर अदालतों और विवादों में अटकेंगी। ASER 2025 की रिपोर्ट जब आएगी, वह असली रिपोर्ट कार्ड होगी — बच्चों की नहीं, सरकारों की।

एक और बात जो देखने लायक है: केंद्र सरकार ने PM SHRI (PM Schools for Rising India) योजना के तहत 14,500 स्कूलों को मॉडल स्कूल बनाने का वादा किया है। लेकिन जब बाक़ी 10 लाख से ज़्यादा स्कूलों में शिक्षकों की कमी बनी रहे, तो कुछ हज़ार चमकते स्कूल दिखावे से ज़्यादा क्या होंगे?

आख़िर में एक सवाल जो हर माँ-बाप से, हर नेता से, हर नौकरशाह से पूछा जाना चाहिए: अगर आपके अपने बच्चे की कक्षा में 60 बच्चों पर एक शिक्षक होता, रजिस्टर भरने और मिड-डे मील गिनने के बाद पढ़ाने का वक़्त ही न बचता — तो क्या आप इसे 'शिक्षा' कहते? जब तक यह सवाल उस गाँव की उस माँ का है जिसकी आवाज़ कहीं नहीं पहुँचती, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। जिस दिन यह सवाल उस आदमी का होगा जो बजट पर दस्तख़त करता है — शायद उस दिन ताला खुले।

इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप और दावे संबंधित स्रोतों को श्रेय दिए गए हैं; जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, ये अप्रमाणित हैं।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

मुख्य बातें

  • UDISE+ डेटा के अनुसार भारत के सरकारी स्कूलों में 10 लाख से ज़्यादा शिक्षक पद रिक्त हैं — उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश सबसे ज़्यादा प्रभावित
  • ASER 2024 के मुताबिक़ कक्षा 5 के 47% बच्चे कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पाते — शिक्षक की कमी सीधे सीखने के स्तर को प्रभावित करती है
  • शिक्षा पर GDP का ख़र्च NEP 2020 के 6% लक्ष्य के मुक़ाबले लगभग 2.9% पर अटका है
  • सरकारी शिक्षक अपने कार्यदिवसों का अनुमानित 25-30% ग़ैर-शैक्षणिक कामों में ख़र्च करते हैं
  • निपुण भारत मिशन की 2026-27 डेडलाइन नज़दीक है — अगर FLN लक्ष्य चूके तो यह सरकारों का रिपोर्ट कार्ड होगा

आँकड़ों में

  • UDISE+ के अनुसार भारत में 10 लाख+ शिक्षक पद रिक्त
  • ASER 2024: कक्षा 5 के ~47% बच्चे कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पाते
  • शिक्षा पर GDP ख़र्च ~2.9%, NEP लक्ष्य 6%
  • एक शिक्षक अपने 25-30% कार्यदिवस ग़ैर-शैक्षणिक कामों में ख़र्च करता है
  • ग्रामीण सरकारी स्कूली बच्चों के केवल 30-35% परिवारों के पास स्मार्टफ़ोन+इंटरनेट

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भारत के करोड़ों सरकारी स्कूली बच्चे और उनके परिवार, केंद्र व राज्य सरकारें, शिक्षा मंत्रालय
  • क्या: UDISE+ डेटा के अनुसार देश भर के सरकारी स्कूलों में 10 लाख से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं, जिससे बच्चों की बुनियादी शिक्षा गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है
  • कब: जुलाई 2026 तक की स्थिति, UDISE+ 2023-24 और ASER 2024-25 रिपोर्ट के नवीनतम आँकड़ों के आधार पर
  • कहाँ: पूरे भारत में, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड और राजस्थान के ग्रामीण सरकारी स्कूलों में
  • क्यों: भर्ती प्रक्रियाओं में वर्षों की देरी, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, अपर्याप्त बजट आवंटन, और NEP 2020 के वादों का ज़मीनी स्तर पर क्रियान्वयन न होना
  • कैसे: शिक्षक रिक्तियाँ → एक शिक्षक पर कई कक्षाओं का बोझ → मल्टी-ग्रेड शिक्षण → बच्चों को व्यक्तिगत ध्यान न मिलना → बुनियादी पठन-गणित कौशल में भारी गिरावट → ASER जैसे सर्वेक्षणों में सीखने के स्तर का निरंतर गिरना

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत में कितने शिक्षक पद खाली हैं?

UDISE+ डेटा के अनुसार भारत के सरकारी स्कूलों में 10 लाख से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं, जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं।

शिक्षकों की कमी से बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ता है?

ASER 2024 रिपोर्ट के मुताबिक़ कक्षा 5 के लगभग 47% बच्चे कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पाते और कक्षा 8 के 44% बच्चे साधारण भाग नहीं कर पाते — शिक्षक की कमी सीखने के स्तर में गिरावट की सबसे बड़ी वजह है।

NEP 2020 में शिक्षा बजट कितना रखने का लक्ष्य था?

NEP 2020 ने शिक्षा पर GDP का 6% ख़र्च करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन वर्तमान में यह ख़र्च लगभग 2.9% पर अटका हुआ है — लक्ष्य से आधे से भी कम।

निपुण भारत मिशन क्या है और इसकी डेडलाइन कब है?

निपुण भारत मिशन NEP 2020 के तहत शुरू किया गया कार्यक्रम है जिसका लक्ष्य 2026-27 तक हर बच्चे को बुनियादी पठन और गणित कौशल (Foundational Literacy and Numeracy) सिखाना है।

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