भारत में लगभग हर तीसरा बच्चा विटामिन-D की कमी से जूझ रहा है। The Lancet और AIIMS के अध्ययनों के अनुसार, शहरी जीवनशैली, स्क्रीन-टाइम और बंद कमरों की संस्कृति ने 'धूप के देश' के बच्चों को धूप से दूर कर दिया है — नतीजा: रिकेट्स, कमज़ोर इम्यूनिटी और सुस्त विकास।

एक अजीब विडंबना है — भारत, जहाँ साल के 300 दिन सूरज बेरहमी से चमकता है, वहाँ के बच्चों की हड्डियाँ ऐसे टूट रही हैं जैसे वे किसी स्कैंडिनेवियाई देश में पले-बढ़े हों जहाँ महीनों सूरज नहीं दिखता। यह कोई मज़ाक नहीं, बल्कि The Lancet Regional Health — Southeast Asia में प्रकाशित एक व्यापक मेटा-एनालिसिस का निष्कर्ष है: भारत में हर तीसरे बच्चे के ख़ून में विटामिन-D का स्तर 20 ng/mL से नीचे है, यानी चिकित्सकीय भाषा में 'डेफ़िशिएंसी'।

ज़रा रुककर सोचिए — 20 ng/mL। इसका मतलब है कि इन बच्चों की हड्डियाँ कैल्शियम को ठीक से सोख ही नहीं पा रहीं। AIIMS दिल्ली के पीडियाट्रिक एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के अध्ययनों में दिल्ली-NCR के स्कूली बच्चों में यह आँकड़ा और भी ऊँचा — 40% तक — पाया गया। दिल्ली, जहाँ गर्मियों में 45 डिग्री तापमान सड़कें पिघलाता है, वहाँ के बच्चों को विटामिन-D नहीं मिल रहा। यह सूरज की नहीं, सिस्टम की विफलता है।

तो आख़िर दोषी कौन? सबसे पहला और सबसे बड़ा — सीमेंट का जंगल और स्क्रीन की चमक। Indian Journal of Pediatrics में प्रकाशित शोध बताते हैं कि भारतीय शहरी बच्चे औसतन दिन में 4-6 घंटे स्क्रीन के सामने बिताते हैं लेकिन बाहर धूप में 30 मिनट भी नहीं। कोविड लॉकडाउन ने जो आदतें बनाईं — ऑनलाइन क्लास, टैबलेट पर गेम, बंद कमरे में होमवर्क — वे लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद भी जस की तस बनी हुई हैं।

दूसरा कारण है फ़्लैट-कल्चर। पहले के मकानों में आँगन होता था, छत पर धूप आती थी। आज की 15वीं-20वीं मंज़िल के फ़्लैट में बच्चा सुबह उठकर सीधे AC कमरे से AC गाड़ी में और फिर AC स्कूल में पहुँचता है। UVB किरणें, जो विटामिन-D बनाती हैं, काँच से होकर नहीं गुज़रतीं। तो वह बच्चा दिनभर 'रोशनी' में रहता है, लेकिन धूप उसकी त्वचा को छूती ही नहीं।

तीसरा पहलू है खानपान। विटामिन-D के प्राकृतिक आहार स्रोत सीमित हैं — अंडे की ज़र्दी, फ़ैटी मछली (सैल्मन, सार्डिन), कॉड लिवर ऑयल, फ़ोर्टिफ़ाइड दूध। ICMR के आँकड़ों के अनुसार भारत में बड़ी आबादी शाकाहारी है और शाकाहारी भोजन में विटामिन-D के स्रोत बेहद कम हैं। मशरूम एकमात्र शाकाहारी विकल्प है जिसमें कुछ विटामिन-D मिलता है, लेकिन वह भी भारतीय थाली का रोज़ाना हिस्सा नहीं।

नतीजा? Indian Academy of Pediatrics (IAP) की गाइडलाइन्स चेतावनी देती हैं कि विटामिन-D की लंबे समय तक कमी बच्चों में रिकेट्स (हड्डियों का टेढ़ापन), बार-बार इन्फ़ेक्शन, थकान, माँसपेशियों में दर्द और यहाँ तक कि मूड-डिसऑर्डर का कारण बन सकती है। WHO ने भी 2023 में जारी अपनी ग्लोबल रिपोर्ट में भारत को उन देशों में शामिल किया जहाँ 'विटामिन-D पैराडॉक्स' — यानी पर्याप्त धूप के बावजूद कमी — सबसे गंभीर है।

लेकिन इस तस्वीर का सबसे परेशान करने वाला हिस्सा कोई और है। सरकारी स्कूल हेल्थ प्रोग्राम, जिसमें RBSK (राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम) शामिल है, बच्चों की विटामिन-D स्क्रीनिंग को अभी तक अनिवार्य जाँच में शामिल नहीं करता। आँखों की जाँच, दाँतों की जाँच, BMI — सब है, लेकिन एक सस्ता-सा 25-hydroxy vitamin D ब्लड टेस्ट जो ₹400-600 में हो जाता है? वह अधिकांश सरकारी स्कूल स्क्रीनिंग में ग़ायब है।

जो कोण बाकी मीडिया से छूट रहा है, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है: यह महज़ एक पोषण की कमी का मामला नहीं है — यह एक शहरी डिज़ाइन और शिक्षा नीति की विफलता है। जब तक स्कूल टाइमटेबल में 'अनिवार्य आउटडोर पीरियड' नहीं होगा, जब तक शहरी नियोजन में बच्चों के लिए खुले मैदान नहीं बचेंगे, और जब तक माता-पिता स्क्रीन-टाइम को 'पढ़ाई' का पर्याय मानते रहेंगे — तब तक यह आँकड़ा बढ़ता ही जाएगा। FSSAI ने दूध और तेल में विटामिन-D फ़ोर्टिफ़िकेशन की पहल शुरू की है, लेकिन अभी इसकी पहुँच शहरी मध्यवर्ग तक सीमित है।

तो अभिभावक क्या करें? IAP और AIIMS की सिफ़ारिशों के अनुसार: बच्चे को रोज़ सुबह 10 से दोपहर 2 बजे के बीच कम-से-कम 20-30 मिनट बिना सनस्क्रीन, बिना पूरे कपड़ों के (बाँहें और पैर खुले रहें) सीधी धूप में रखें। डॉक्टर से विटामिन-D सप्लीमेंट की डोज़ निर्धारित करवाएँ — आमतौर पर 400-1000 IU प्रतिदिन, उम्र और कमी के स्तर के अनुसार। फ़ोर्टिफ़ाइड दूध, अंडे और मशरूम को आहार में नियमित शामिल करें। और हाँ — साल में एक बार 25-hydroxy vitamin D टेस्ट ज़रूर करवाएँ।

आख़िर में एक सवाल जो हर माता-पिता से है: आपका बच्चा आज कितनी देर धूप में था? अगर जवाब 'शून्य मिनट' है, तो जान लीजिए — आप अकेले नहीं हैं, लेकिन यही वह रोज़मर्रा की लापरवाही है जो आँकड़ों में बदल रही है। धूप मुफ़्त है, हड्डियाँ नहीं।

यह रिपोर्ट पत्रकारिता है, चिकित्सा सलाह नहीं; किसी भी सप्लीमेंट या उपचार से पहले योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

मुख्य बातें

  • The Lancet और AIIMS के अनुसार भारत में 30-40% बच्चों में विटामिन-D की कमी — यह 300 दिन धूप वाले देश का 'सनशाइन पैराडॉक्स' है।
  • स्क्रीन-टाइम, फ़्लैट-कल्चर और AC जीवनशैली ने बच्चों को UVB किरणों से लगभग पूरी तरह काट दिया है।
  • सरकारी स्कूल स्क्रीनिंग (RBSK) में विटामिन-D टेस्ट अभी तक अनिवार्य नहीं — यह नीतिगत ख़ामी है।
  • IAP की सिफ़ारिश: 20-30 मिनट सीधी धूप (सुबह 10 से दोपहर 2 बजे), फ़ोर्टिफ़ाइड आहार, और डॉक्टर की सलाह पर 400-1000 IU सप्लीमेंट।
  • FSSAI की फ़ोर्टिफ़िकेशन पहल अभी शहरी मध्यवर्ग तक सीमित — ग्रामीण और निम्न-आय वर्ग तक पहुँच अगली बड़ी चुनौती।

आँकड़ों में

  • भारत में हर 3 में 1 बच्चे का विटामिन-D स्तर 20 ng/mL से नीचे — The Lancet Regional Health मेटा-एनालिसिस
  • दिल्ली-NCR के स्कूली बच्चों में यह कमी 40% तक — AIIMS पीडियाट्रिक एंडोक्राइनोलॉजी विभाग
  • शहरी बच्चे दिन में 4-6 घंटे स्क्रीन पर, 30 मिनट भी धूप में नहीं — Indian Journal of Pediatrics
  • 25-hydroxy vitamin D ब्लड टेस्ट की लागत ₹400-600 — लेकिन सरकारी स्कूल स्क्रीनिंग में शामिल नहीं

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