2026 की पहली छमाही में अदाणी ग्रुप के शेयरों में सबसे ज़्यादा उछाल आया और गुजरात-आधारित कंपनियों ने मिलकर बाज़ार के बेंचमार्क इंडेक्स को पछाड़ दिया। Vibes Of India की रिपोर्ट के अनुसार यह रिटर्न इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च, पॉलिसी सपोर्ट और हिंडनबर्ग संकट से कमबैक के मिले-जुले नतीजे हैं।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: अदाणी ग्रुप और गुजरात-आधारित अन्य प्रमुख कंपनियाँ — जिनमें अदाणी पोर्ट्स, अदाणी एंटरप्राइज़ेज़, अदाणी ग्रीन एनर्जी शामिल हैं।
- क्या: 2026 की पहली छमाही (जनवरी-जून) में इन कंपनियों के शेयरों ने बंपर रिटर्न दिया, अदाणी शेयरों में सबसे ज़्यादा उछाल दर्ज हुआ।
- कब: जनवरी 2026 से जून 2026 की अवधि में।
- कहाँ: भारतीय शेयर बाज़ार — BSE और NSE।
- क्यों: केंद्र सरकार के इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च में गुजरात का बड़ा हिस्सा, हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद वैल्यूएशन रिकवरी, और ग्रीन एनर्जी-पोर्ट्स सेक्टर में पॉलिसी पुश।
- कैसे: सरकारी इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स में अदाणी ग्रुप को बड़े ठेके, FII रिटर्न और रिटेल FOMO से बढ़ी डिमांड ने शेयर कीमतों को तेज़ी से ऊपर धकेला।
छह महीने पहले तक, अदाणी ग्रुप के शेयर अभी भी हिंडनबर्ग की छाया में थे — बाज़ार में हर दूसरा विश्लेषक कह रहा था कि 'यह स्टॉक अब पहले जैसा कभी नहीं होगा।' आज, जून 2026 के आख़िर में, वही शेयर लगभग दोगुने हो चुके हैं और गुजरात-आधारित कंपनियों का एक पूरा बास्केट बेंचमार्क इंडेक्स को शर्मिंदा कर रहा है। सवाल यह नहीं कि ऐसा कैसे हुआ — सवाल यह है कि क्या यह टिकेगा, और इस दौड़ में जो रिटेल निवेशक अभी कूदा, उसका क्या होगा।
Vibes Of India की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में गुजरात स्थित कंपनियों ने शेयर बाज़ार में सबसे ज़्यादा रिटर्न दिया है। इनमें अदाणी ग्रुप की कंपनियाँ — अदाणी पोर्ट्स, अदाणी एंटरप्राइज़ेज़, अदाणी ग्रीन एनर्जी — सिरमौर रहीं। अदाणी के शेयरों में सबसे अधिक उछाल दर्ज हुआ, कुछ काउंटरों ने 80-100% तक का रिटर्न दिया।
सिर्फ़ फंडामेंटल्स नहीं — पॉलिसी का इंजन
अगर यह तेज़ी सिर्फ़ कंपनियों की कमाई पर टिकी होती, तो बात सीधी थी। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त ज़्यादा पेचीदा है। पिछले एक साल में केंद्र सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जो भारी-भरकम ख़र्च किया है — बंदरगाह, हवाई अड्डे, ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट, सोलर पार्क — उसमें गुजरात का हिस्सा अनुपात से कहीं ज़्यादा रहा है। IANS की पिछले क्वार्टर की रिपोर्ट बताती है कि गुजरात में इन्फ्रास्ट्रक्चर कैपेक्स आवंटन में 2024 की तुलना में 30% से अधिक की वृद्धि हुई है।
इसे समझना मुश्किल नहीं है: जब सड़कें, पोर्ट, एयरपोर्ट और एनर्जी प्लांट एक ही राज्य में एक साथ बन रहे हों, तो उस राज्य की कंपनियों को ठेके, ज़मीन और लॉजिस्टिक एडवांटेज सबसे पहले मिलता है। अदाणी ग्रुप के पोर्ट्स और एनर्जी डिवीज़न इस साइकिल के सबसे बड़े लाभार्थी रहे हैं। PTI के अनुसार, अदाणी ग्रुप को 2025-26 में गुजरात और ओडिशा में मिलाकर कम से कम पाँच बड़े इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स अलॉट हुए।
हिंडनबर्ग से कमबैक — 'वैल्यू ट्रैप' या 'वैल्यू अनलॉक'?
जनवरी 2023 में जब हिंडनबर्ग रिसर्च ने अदाणी ग्रुप पर शॉर्ट-सेलिंग रिपोर्ट जारी की थी, तब ग्रुप की मार्केट कैप से लगभग ₹10 लाख करोड़ से अधिक का क्षरण हुआ था। तीन साल बाद, 2026 में, उस गिरावट का बड़ा हिस्सा रिकवर हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति ने कोई बड़ी 'रेगुलेटरी एक्शन' नहीं सुझाई, SEBI ने जाँच पूरी की और फ़ाइल बंद-सी कर दी — रॉयटर्स की मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, रेगुलेटर ने अदाणी मामले में कोई नया चार्जशीट या एन्फोर्समेंट एक्शन दर्ज नहीं किया।
इस 'क्लीन चिट नहीं-क्लीन चिट' की स्थिति ने बाज़ार को एक अजीब सिग्नल दिया: जोखिम कम हुआ, लेकिन पूरा ख़त्म नहीं हुआ। नतीजा? विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) जो 2023-24 में अदाणी से भागे थे, वे धीरे-धीरे लौटे, और डिस्काउंटेड वैल्यूएशन पर एंट्री ली। Economic Times के जून 2026 के आँकड़ों के अनुसार, अदाणी ग्रुप की कंपनियों में FII होल्डिंग पिछले छह महीनों में 2-4% बढ़ी है।
इनसाइड टॉक
ट्रेड हलकों में एक दिलचस्प चर्चा ज़ोरों पर है — जिसे बाज़ार के लोग 'गुजरात प्रीमियम' कह रहे हैं। इसका मतलब सीधा है: गुजरात-आधारित किसी भी बड़ी कंपनी को बाज़ार अतिरिक्त वैल्यूएशन दे रहा है, सिर्फ़ इसलिए कि उसका भूगोल सत्ता के भूगोल से मिलता है। क्या यह सच है? पक्का कहना मुश्किल है, लेकिन म्यूचुअल फ़ंड सर्कल में फुसफुसाहट यह है कि कई फ़ंड मैनेजर अपने पोर्टफ़ोलियो में 'गुजरात ओवरवेट' रख रहे हैं — न इसलिए कि फंडामेंटल्स इतने ज़बरदस्त हैं, बल्कि इसलिए कि 'पॉलिसी टेलविंड' का दाँव लगाना आसान है। एक सीनियर फ़ंड मैनेजर ने हाल ही में एक प्राइवेट इवेंट में कहा — "अदाणी पर बेट लगाना अब बिज़नेस कॉल नहीं, पॉलिटिकल कॉल है।" (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
रिटेल निवेशक के लिए असली ख़तरा कहाँ है?
और यही वह बिंदु है जहाँ इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण दूसरों से अलग होता है। जब कोई शेयर छह महीने में दोगुना होता है, तो सबसे बड़ा जोखिम यह नहीं होता कि कंपनी ख़राब है — जोखिम यह होता है कि रिटेल निवेशक सबसे आख़िर में आता है और सबसे ऊपर फँसता है। भारतीय शेयर बाज़ार में एक पुराना पैटर्न है: संस्थागत खिलाड़ी पहले आते हैं, फिर HNI, फिर म्यूचुअल फ़ंड, और सबसे अंत में — जब टीवी पर 'मल्टीबैगर' चिल्लाया जा चुका होता है — तब रिटेल इन्वेस्टर अपनी जमापूँजी लगाता है।
SEBI के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, 2026 की पहली छमाही में रिटेल निवेशकों ने इक्विटी मार्केट में रिकॉर्ड ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक का निवेश किया — और इसमें अदाणी ग्रुप सहित इन्फ्रा-हैवी शेयरों का बड़ा हिस्सा शामिल है। अगर पॉलिसी साइकिल पलटता है — चुनावी नतीजे, गठबंधन बदलाव, या कोई नया रेगुलेटरी झटका — तो सबसे पहले इसी रिटेल पैसे की कुर्बानी होगी।
'गुजरात बास्केट' में और कौन?
अदाणी के अलावा, गुजरात की कई मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों ने भी इस दौर में शानदार प्रदर्शन किया — केमिकल, फ़ार्मा, और टेक्सटाइल सेक्टर की कंपनियाँ इसमें शामिल हैं। Vibes Of India की रिपोर्ट में बताया गया है कि गुजरात-आधारित कंपनियों ने समग्र रूप से बाज़ार के औसत रिटर्न से कम से कम 15-20% अधिक रिटर्न दिया। गुजरात की GIFT City में IFSC का विस्तार, PM गति शक्ति के तहत कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट, और राज्य सरकार की उद्योग-अनुकूल नीतियाँ — यह सब मिलाकर एक ऐसा माहौल बना है जिसमें इन कंपनियों को ऑर्डर बुक भरने में दिक्कत नहीं हो रही।
लेकिन यहाँ एक बारीकी है: इनमें से कई मिड-कैप कंपनियों की लिक्विडिटी बेहद कम है। इसका मतलब यह है कि जब तेज़ी है तो ये रॉकेट की तरह भागती हैं, लेकिन जब बिकवाली आती है तो बायर ही नहीं मिलता — और रिटेल निवेशक का पैसा फँस जाता है।
आगे क्या — यह साइकिल कब तक चलेगी?
दो बड़े ट्रिगर हैं जिन पर नज़र रखनी चाहिए। पहला: 2026 के दूसरे हाफ़ में राज्य चुनाव — अगर किसी बड़े राज्य में सत्ता-विरोधी लहर आती है, तो 'पॉलिसी प्रीमियम' का पूरा नैरेटिव हिल सकता है। दूसरा: अमेरिका में DoJ (डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस) की अदाणी ग्रुप से जुड़ी जाँच — जो अभी भी खुली है और जिसका कोई भी अपडेट बाज़ार में भूचाल ला सकता है। Reuters की जून 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों ने इस मामले में अभी तक कोई अंतिम फ़ैसला नहीं सुनाया है।
अगर यह दोनों जोखिम शांत रहे, तो इन्फ्रा साइकिल कम से कम 2027 के मध्य तक चल सकता है — क्योंकि केंद्र सरकार ने बजट में कैपेक्स का जो रास्ता चुना है, वह अगले लोकसभा चुनाव तक बदलने की संभावना कम है। लेकिन अगर इनमें से कोई एक धागा खिंचा, तो जो शेयर छह महीने में दोगुना हुआ, वह तीन महीने में आधा भी हो सकता है।
तो जब अगली बार कोई व्हाट्सऐप ग्रुप में 'अदाणी में पैसा लगाओ, सरकार पीछे है' वाला मैसेज आए — तो एक पल रुककर ख़ुद से पूछें: क्या मैं फंडामेंटल्स पर दाँव लगा रहा हूँ, या किसी और के पॉलिटिकल कैलकुलेशन पर? क्योंकि बाज़ार में जब हवा पलटती है, तो पॉलिसी वाले पहले निकलते हैं — और बिल हमेशा वह भरता है जो सबसे आख़िर में आया।
आँकड़ों में
- अदाणी ग्रुप के कुछ शेयरों में H1 2026 में 80-100% तक रिटर्न — Vibes Of India
- गुजरात-आधारित कंपनियों ने बाज़ार औसत से 15-20% अधिक रिटर्न दिया — Vibes Of India
- रिटेल निवेशकों ने H1 2026 में इक्विटी में ₹1.5 लाख करोड़+ निवेश किया — SEBI डेटा
- अदाणी ग्रुप की कंपनियों में FII होल्डिंग छह महीने में 2-4% बढ़ी — Economic Times
- गुजरात में इन्फ्रा कैपेक्स आवंटन में 2024 की तुलना में 30%+ वृद्धि — IANS
मुख्य बातें
- 2026 की पहली छमाही में अदाणी ग्रुप के शेयरों ने 80-100% तक रिटर्न दिया, गुजरात-आधारित कंपनियों ने बाज़ार औसत से 15-20% ज़्यादा रिटर्न दिया।
- यह तेज़ी सिर्फ़ फंडामेंटल्स पर नहीं टिकी — केंद्र सरकार के इन्फ्रा कैपेक्स में गुजरात का अनुपात से अधिक हिस्सा और हिंडनबर्ग संकट से वैल्यूएशन रिकवरी इसके दो बड़े इंजन हैं।
- रिटेल निवेशकों ने H1 2026 में रिकॉर्ड ₹1.5 लाख करोड़+ इक्विटी में लगाया — यही वर्ग सबसे ज़्यादा जोखिम में है अगर पॉलिसी साइकिल पलटता है।
- अमेरिका का DoJ केस और आगामी राज्य चुनाव — ये दो ट्रिगर इस रैली को उलट सकते हैं।
- 'गुजरात प्रीमियम' का असली मतलब: बाज़ार बिज़नेस फंडामेंटल्स से ज़्यादा पॉलिटिकल प्रॉक्सिमिटी को वैल्यू कर रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
2026 में अदाणी के शेयरों में इतनी तेज़ी क्यों आई?
इसके तीन बड़े कारण हैं: हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद डिस्काउंटेड वैल्यूएशन से रिकवरी, केंद्र सरकार के इन्फ्रा कैपेक्स में गुजरात को अनुपात से ज़्यादा हिस्सा मिलना, और SEBI/सुप्रीम कोर्ट की जाँच के बाद रेगुलेटरी रिस्क में कमी आना। FII भी धीरे-धीरे लौटे हैं।
क्या अभी अदाणी के शेयरों में निवेश करना सही है?
इंडिया हेराल्ड निवेश सलाह नहीं देता, लेकिन विश्लेषण यह बताता है कि छह महीने में दोगुना होने के बाद वैल्यूएशन ऊँचा है, और इस तेज़ी का एक बड़ा हिस्सा पॉलिसी सपोर्ट पर टिका है — जो किसी भी राजनीतिक बदलाव या DoJ एक्शन से हिल सकता है। रिटेल निवेशकों को जोखिम समझकर ही फ़ैसला लेना चाहिए।
'गुजरात प्रीमियम' का शेयर बाज़ार में क्या मतलब है?
ट्रेड सर्कल में 'गुजरात प्रीमियम' उस अतिरिक्त वैल्यूएशन को कहा जा रहा है जो बाज़ार गुजरात-आधारित कंपनियों को दे रहा है — सिर्फ़ इसलिए कि उनका भूगोल सत्ता के केंद्र से मेल खाता है और उन्हें पॉलिसी टेलविंड मिलने की संभावना ज़्यादा मानी जाती है।
अदाणी शेयरों में आगे क्या जोखिम हैं?
दो बड़े जोखिम हैं: पहला — अमेरिका के DoJ की जाँच अभी खुली है और कोई भी प्रतिकूल अपडेट बाज़ार में भूचाल ला सकता है। दूसरा — 2026 के दूसरे हाफ़ में राज्य चुनाव — अगर सत्ता-विरोधी लहर आती है, तो 'पॉलिसी प्रीमियम' का पूरा नैरेटिव कमज़ोर हो सकता है।


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