एक देश-एक चुनाव के लिए कम से कम पाँच संवैधानिक संशोधनों की ज़रूरत होगी। JPC अध्यक्ष पीपी चौधरी ने पुष्टि की कि 2029 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की तैयारी तेज़ है, लेकिन इसके लिए 12 से अधिक राज्यों का कार्यकाल घटाना या बढ़ाना पड़ेगा — जिस पर विपक्ष इसे संघीय ढांचे पर हमला बता रहा है।

पाँच संवैधानिक संशोधन, दर्जन भर राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल कटने या बढ़ने का ख़तरा, और एक ऐसी राजनीतिक चाल जिसके दांव 2029 की हर सीट तक फैले हैं — 'एक देश-एक चुनाव' अब सिर्फ़ सेमिनार का विषय नहीं रहा, यह जीती-जागती संसदीय तैयारी बन चुकी है।

JPC के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय क़ानून राज्यमंत्री पीपी चौधरी ने TV9 भारतवर्ष को दिए इंटरव्यू में साफ़ कहा कि 2029 में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की दिशा में संवैधानिक-कानूनी बदलावों पर काम तेज़ हो चुका है। उनके शब्दों का वज़न समझिए — यह सिर्फ़ बयानबाज़ी नहीं, JPC की रिपोर्ट अब अंतिम चरण में है।

पाँच संशोधन — और हर एक अपने आप में संसदीय युद्ध

इस योजना को ज़मीन पर उतारने के लिए कम से कम पाँच संवैधानिक संशोधनों की ज़रूरत है। अनुच्छेद 83 (लोकसभा का कार्यकाल), अनुच्छेद 172 (राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल), अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन के प्रावधान) — इन सबमें बदलाव करने होंगे। इसके अलावा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में भी व्यापक संशोधन लाज़मी हैं। TV9 भारतवर्ष की रिपोर्ट के मुताबिक़, पीपी चौधरी ने माना कि यह प्रक्रिया जटिल है लेकिन 'असंभव नहीं'।

असली पेच यहाँ है: इन संशोधनों के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए — और उसके बाद कम से कम आधे यानी 14 राज्य विधानमंडलों की मंज़ूरी भी। लोकसभा में NDA की स्थिति मज़बूत है, लेकिन राज्यसभा का गणित 2026 में भी पूरी तरह NDA के पक्ष में नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने 2024 में अपनी सिफ़ारिशें दी थीं, लेकिन विपक्ष ने तब भी इसे ख़ारिज किया था।

12 राज्यों का कार्यकाल दांव पर — यही असली आग है

अगर 2029 में एक साथ चुनाव कराने हैं, तो उन सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 'एडजस्ट' करना होगा जिनके चुनाव 2029 से पहले या बाद में होते हैं। मोटे अनुमान से 12 से अधिक राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल या तो कटेगा या कृत्रिम रूप से बढ़ाया जाएगा। सोचिए — किसी राज्य की जनता ने पाँच साल के लिए सरकार चुनी और उसे बीच में ही कह दिया जाए कि 'सिंक्रोनाइज़ेशन' के लिए आपका कार्यकाल ख़त्म। या फिर किसी अलोकप्रिय सरकार को अतिरिक्त महीने दे दिए जाएँ ताकि तारीख़ मिल सके।

यही वह बिंदु है जहाँ विपक्षी दल — कांग्रेस, TMC, DMK, AAP — एकजुट होकर इसे 'संघीय ढांचे पर हमला' बता रहे हैं। उनका तर्क सीधा है: भारत का संघीय ढांचा राज्यों को अपने चुनावी चक्र का अधिकार देता है, और केंद्र सरकार यह तय नहीं कर सकती कि राज्य विधानसभा कब भंग हो।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में जो बात खुलकर कोई नहीं कहता, वह यह है: 'एक देश-एक चुनाव' का असली फ़ायदा किसे? जब राज्य विधानसभा और लोकसभा का चुनाव एक साथ होता है, तो राष्ट्रीय मुद्दे और PM फेस का प्रभाव स्थानीय मुद्दों पर भारी पड़ता है — यह बात हर चुनाव विश्लेषक जानता है। 2014 और 2019 में जहाँ-जहाँ लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ हुए — आंध्र प्रदेश, ओडिशा — वहाँ मोदी लहर ने स्थानीय समीकरण तोड़ दिए।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

NDA की रणनीति स्पष्ट है — अगर 2029 में सब एक साथ हो, तो विपक्षी दलों की 'लोकल स्ट्रेंथ' — चाहे वह बंगाल में TMC हो, तमिलनाडु में DMK हो या दिल्ली में AAP — को PM के राष्ट्रीय चेहरे की लहर से बेअसर किया जा सकता है। दूसरी तरफ़, विपक्ष का डर भी वाजिब है: क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व ही इस बात पर टिका है कि वे राज्य चुनावों में राष्ट्रीय दलों से अलग पहचान बना सकें।

राज्यसभा का गणित — NDA का सबसे बड़ा रोड़ा

इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यह है कि 2029 तक यह योजना लागू करना NDA के लिए आसान नहीं होगा। राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत जुटाना सबसे कठिन चुनौती है। 2026 की स्थिति में NDA के पास राज्यसभा में क़रीब 112-115 सीटें हैं, जबकि दो-तिहाई के लिए 164 चाहिए। यानी क़रीब 50 सीटों का अंतर। क्या BJD, YSRCP, या TDP जैसे 'फ़्रेंडली ऑपोज़िशन' दल इस पर साथ देंगे? यह अभी एक खुला सवाल है।

पीपी चौधरी ने TV9 भारतवर्ष से बातचीत में कहा कि JPC सभी दलों से बात कर रही है और 'आम सहमति' बनाने की कोशिश जारी है। लेकिन राजनीतिक हक़ीक़त यह है कि विपक्ष का कोई भी बड़ा दल इसे खुलकर समर्थन नहीं दे रहा — और देने की वजह भी नहीं, क्योंकि इस फ़ॉर्मूले में उनके अपने अस्तित्व का सवाल छिपा है।

अगर यह पास हो गया तो?

मान लीजिए NDA किसी तरह यह विधेयक पारित करा लेती है। तब भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती तय है — संघीय ढांचे के 'बेसिक स्ट्रक्चर' का सवाल उठेगा। केशवानंद भारती केस (1973) के बाद से सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि संघीय ढांचा संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। अगर राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल केंद्र की मर्ज़ी से तय होने लगे, तो यह सीधे उस सिद्धांत से टकराता है।

और एक व्यावहारिक सवाल: अगर किसी राज्य में बीच कार्यकाल सरकार गिर जाए तो क्या होगा? क्या उस राज्य में अकेले चुनाव होगा या अगले 'सिंक्रोनाइज़्ड' चक्र तक राष्ट्रपति शासन रहेगा? यह सवाल रामनाथ कोविंद समिति की रिपोर्ट में भी अधूरा छोड़ा गया था।

2029 का असली दांव

आख़िर में, यह पूरा खेल 2029 के लिए है। नरेंद्र मोदी का तीसरा कार्यकाल 2029 में ख़त्म होता है। अगर तब तक 'एक देश-एक चुनाव' लागू हो जाए, तो BJP को वह सबसे बड़ा हथियार मिल जाएगा जो विपक्ष की क्षेत्रीय ताक़त को बेअसर कर सकता है — PM फेस की राष्ट्रीय लहर। बंगाल, तमिलनाडु, केरल जैसे राज्यों में जहाँ BJP अभी भी ज़मीनी स्तर पर कमज़ोर है, वहाँ राष्ट्रीय लहर ही एकमात्र उम्मीद है।

लेकिन सवाल यह भी है: क्या लोकतंत्र की क़ीमत पर 'दक्षता' का तर्क टिकता है? बार-बार चुनाव महंगे ज़रूर हैं — एक अनुमान के मुताबिक़ 2024 के आम चुनाव में क़रीब ₹1.35 लाख करोड़ ख़र्च हुए — लेकिन क्या पैसे बचाने के लिए राज्यों की लोकतांत्रिक स्वायत्तता की बलि दी जा सकती है?

यह कहानी अभी शुरू हुई है। JPC की रिपोर्ट जब संसद में आएगी, तब असली महाभारत शुरू होगी। लेकिन जो बात आज ही साफ़ है वह यह: 'एक देश-एक चुनाव' सिर्फ़ चुनावी सुधार नहीं — यह भारतीय राजनीति की शक्ति संरचना को जड़ से बदलने की कोशिश है। और जो भी पक्ष इसे सिर्फ़ 'प्रशासनिक सुधार' या सिर्फ़ 'तानाशाही' कहकर ख़ारिज करता है — वह या तो आपको बेवकूफ़ बना रहा है, या ख़ुद को।

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मुख्य बातें

  • एक देश-एक चुनाव के लिए कम से कम 5 संवैधानिक संशोधन ज़रूरी — अनुच्छेद 83, 172, 356 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में बदलाव शामिल: TV9 भारतवर्ष।
  • 12 से अधिक राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल कटेगा या बढ़ेगा — राज्यों की लोकतांत्रिक स्वायत्तता सीधे दांव पर।
  • राज्यसभा में NDA के पास दो-तिहाई बहुमत से क़रीब 50 सीटें कम — यह सबसे बड़ी बाधा है।
  • विपक्ष इसे 'संघीय ढांचे पर हमला' बता रहा है; क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व का सवाल जुड़ा है।
  • अगर पास भी हो जाए तो सुप्रीम कोर्ट में 'बेसिक स्ट्रक्चर' चुनौती तय — केशवानंद भारती सिद्धांत सामने आएगा।
  • असली राजनीतिक गणित: एक साथ चुनाव से PM फेस की राष्ट्रीय लहर क्षेत्रीय दलों की 'लोकल' ताक़त को बेअसर कर सकती है।

आँकड़ों में

  • कम से कम 5 संवैधानिक संशोधन ज़रूरी — अनुच्छेद 83, 172, 356 सहित: TV9 भारतवर्ष रिपोर्ट
  • 12 से अधिक राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल प्रभावित होगा
  • राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत (164 सीटें) के लिए NDA को क़रीब 50 अतिरिक्त सीटें चाहिए
  • 2024 आम चुनाव में अनुमानित ख़र्च: ₹1.35 लाख करोड़
  • 14 राज्य विधानमंडलों की मंज़ूरी भी संशोधन के लिए अनिवार्य

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: JPC अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री पीपी चौधरी ने यह ऐलान किया; NDA सरकार इसकी मुख्य संचालक है — TV9 भारतवर्ष के अनुसार।
  • क्या: 2029 में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए संवैधानिक-कानूनी बदलावों की तैयारी तेज़ की गई है — TV9 भारतवर्ष की रिपोर्ट के मुताबिक़।
  • कब: 2026 में JPC की रिपोर्ट तैयार होने की उम्मीद, लक्ष्य 2029 आम चुनाव तक लागू करना — TV9 भारतवर्ष के अनुसार।
  • कहाँ: नई दिल्ली — संसद और JPC स्तर पर कार्यवाही जारी।
  • क्यों: बार-बार चुनावों से विकास कार्य रुकते हैं और सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ पड़ता है — यह सरकार का आधिकारिक तर्क; विपक्ष इसे राज्यों की स्वायत्तता पर हमला मानता है — TV9 भारतवर्ष।
  • कैसे: कम से कम पाँच संवैधानिक संशोधन विधेयक संसद में लाने होंगे, जिनमें अनुच्छेद 83, 172, 356 सहित कई प्रावधानों में बदलाव शामिल हैं; इसके लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और कम से कम आधे राज्य विधानमंडलों की मंज़ूरी चाहिए — TV9 भारतवर्ष।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

एक देश-एक चुनाव के लिए कितने संवैधानिक संशोधन ज़रूरी हैं?

कम से कम पाँच संवैधानिक संशोधन ज़रूरी हैं — अनुच्छेद 83 (लोकसभा कार्यकाल), अनुच्छेद 172 (विधानसभा कार्यकाल), अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) सहित जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में बदलाव — TV9 भारतवर्ष की रिपोर्ट के अनुसार।

क्या NDA के पास राज्यसभा में एक देश-एक चुनाव पास करने के लिए पर्याप्त नंबर हैं?

2026 की स्थिति में NDA के पास राज्यसभा में लगभग 112-115 सीटें हैं, जबकि दो-तिहाई बहुमत (164 सीटें) के लिए क़रीब 50 अतिरिक्त सीटों की ज़रूरत है — यह सबसे बड़ी बाधा मानी जा रही है।

एक देश-एक चुनाव लागू होने पर कितने राज्यों का कार्यकाल प्रभावित होगा?

12 से अधिक राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल कटेगा या बढ़ेगा ताकि सभी चुनाव 2029 में लोकसभा के साथ हो सकें।

विपक्ष एक देश-एक चुनाव का विरोध क्यों कर रहा है?

विपक्षी दल — कांग्रेस, TMC, DMK, AAP — इसे 'संघीय ढांचे पर हमला' मानते हैं क्योंकि इससे राज्यों का अपने चुनावी चक्र का अधिकार छिनता है और राष्ट्रीय लहर से क्षेत्रीय दलों की स्थानीय ताक़त कमज़ोर पड़ सकती है।

क्या एक देश-एक चुनाव को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?

हाँ, संघीय ढांचे को संविधान की मूल संरचना (बेसिक स्ट्रक्चर) का हिस्सा माना जाता है — केशवानंद भारती केस (1973) के सिद्धांत के तहत सुप्रीम कोर्ट में चुनौती लगभग तय मानी जा रही है।

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