बागेश्वर जिले की 405 ग्राम पंचायतों में उपप्रधान चुनाव हुए — 403 में कोई प्रतिद्वंद्वी ही नहीं मिला, दो पद रिक्त रहे। दैनिक भास्कर के अनुसार यह 'शांतिपूर्ण चुनाव' था, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या पहाड़ के गांवों में चुनाव लड़ने लायक आबादी ही बची है।
99.5 प्रतिशत। यह किसी तानाशाही का चुनावी आँकड़ा नहीं है — यह बागेश्वर जिले का ताज़ा पंचायती नतीजा है। 405 ग्राम पंचायतों में से 403 में उपप्रधान बिना किसी मुकाबले के चुन लिए गए, और दो सीटों पर तो कोई खड़ा ही नहीं हुआ। दैनिक भास्कर के अनुसार 15 जुलाई 2026 को बागेश्वर के 11 विकासखंडों में नामांकन, मतदान और मतगणना एक ही दिन में पूरी हुई — जैसे कोई औपचारिकता निपटा दी गई हो।
सरकारी भाषा में इसे 'शांतिपूर्ण चुनाव' कहा गया। प्रशासन ने पीठ थपथपाई कि कहीं कोई विवाद नहीं हुआ। लेकिन ज़रा ठहरिए — जहाँ मुकाबला ही न हो, विवाद कैसा? यह शांति नहीं, यह सन्नाटा है। और इस सन्नाटे के पीछे उत्तराखंड के पहाड़ों की वह बीमारी है जिसे हर सरकार जानती है, हर नेता भाषणों में रोता है, लेकिन कोई इलाज नहीं करता — पलायन।
बागेश्वर अकेला नहीं है। लाइव हिंदुस्तान के अनुसार रुद्रपुर (ऊधम सिंह नगर) की 370 ग्राम पंचायतों में भी उपप्रधान चुनाव 'शांतिपूर्ण' संपन्न हुए। खटीमा में 59 पंचायतों में चुनाव हुए — 31 में निर्विरोध, 28 में मतदान हुआ, यानी वहाँ भी आधे से ज़्यादा सीटों पर एक ही उम्मीदवार था। दैनिक भास्कर ने बताया कि पूरे उत्तराखंड में 1163 ग्राम पंचायतों में यह प्रक्रिया एक ही दिन चलाई गई। सवाल सिर्फ बागेश्वर का नहीं है — पूरे पहाड़ी उत्तराखंड का है।
पलायन की खौफनाक तस्वीर — गाँव बचे, लोग नहीं
उत्तराखंड की अपनी सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि राज्य के पहाड़ी जिलों में 1700 से ज़्यादा गाँव पूरी तरह खाली हो चुके हैं — इन्हें 'भूतिया गाँव' या 'घोस्ट विलेज' कहा जाता है। हज़ारों और गाँव ऐसे हैं जहाँ मुट्ठी भर बुज़ुर्ग बचे हैं। नौजवान देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली, या मैदानी शहरों में रोज़गार की तलाश में जा चुके हैं। जब गाँव में 20-30 लोग बचे हों, तो उपप्रधान का चुनाव लड़ने वाला दूसरा उम्मीदवार आएगा कहाँ से?
यही वह बिंदु है जिसे इंडिया हेराल्ड का राजनीतिक विश्लेषण रेखांकित करता है: 403 का निर्विरोध होना 'ग्रामीण एकता' का सबूत नहीं, बल्कि पंचायती राज के खोखले हो जाने का सबूत है। लोकतंत्र के सबसे निचले ढाँचे में प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई है — इसलिए नहीं कि सब सहमत हैं, बल्कि इसलिए कि असहमत होने वाले शहर जा चुके हैं। जो बचा है, उसे प्रधान बना दो — न कोई पूछने वाला, न कोई जवाबदेही।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि उत्तराखंड की सत्तारूढ़ भाजपा सरकार इन आँकड़ों को 'सकारात्मक' बताकर पेश करेगी — 'देखिए, कितनी शांति से चुनाव हुए।' विपक्षी कांग्रेस अब तक पलायन को मुद्दा बनाती रही है, लेकिन उसके अपने शासनकाल में भी गाँव खाली होते रहे। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि असली बात यह है कि पहाड़ी सीटों पर वोटर बेस इतना सिकुड़ चुका है कि कोई भी दल गंभीरता से ग्रामीण नेतृत्व विकसित करने में दिलचस्पी नहीं रखता — जीत तो शहरी सीटों से तय होती है। पंचायती राज मंत्रालय की रिपोर्टों में उत्तराखंड लगातार 'कम प्रतिस्पर्धा' वाले राज्यों में गिना जाता है, लेकिन इसे संकट मानने की बजाय 'शांतिपूर्ण' का तमगा दे दिया जाता है।
(यह राजनीतिक गलियारों की चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट आधिकारिक बयान नहीं।)
दो रिक्त पद — वह आख़िरी चेतावनी जो कोई नहीं सुन रहा
403 निर्विरोध से भी ज़्यादा चिंताजनक वे दो पद हैं जो रिक्त रह गए। दैनिक भास्कर के अनुसार इन दो ग्राम पंचायतों में कोई एक भी व्यक्ति उपप्रधान बनने को तैयार नहीं हुआ। इसका मतलब समझिए — एक गाँव, जहाँ कोई ज़िम्मेदारी उठाने वाला नहीं। न सड़क के लिए आवाज़ उठाने वाला, न पानी के लिए, न राशन के लिए। यह लोकतंत्र का अंतिम संस्कार है — बिना शोक, बिना शोर।
तुलना कीजिए: खटीमा (तराई क्षेत्र) में 59 पंचायतों में कम से कम 28 में मतदान हुआ — यानी लगभग 47 प्रतिशत सीटों पर मुकाबला था। तराई में आबादी है, रोज़गार है, लोग हैं। पहाड़ में? बागेश्वर में 0.5 प्रतिशत सीटों पर मुकाबला — यह फ़र्क़ भूगोल का नहीं, अर्थव्यवस्था का है। जहाँ रोज़गार नहीं, वहाँ लोग नहीं; जहाँ लोग नहीं, वहाँ लोकतंत्र नहीं।
आगे क्या — पहाड़ का लोकतंत्र बचेगा या संग्रहालय में जाएगा?
आने वाले दिनों में देखना यह है कि उत्तराखंड सरकार इन आँकड़ों पर कोई नीतिगत प्रतिक्रिया देती है या इन्हें 'सफल चुनाव' की फ़ाइल में दबा दिया जाता है। 2027 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव हैं — क्या कोई दल पलायन को चुनावी एजेंडा बनाने की हिम्मत करेगा, जबकि पलायन करने वाले वोटर अब शहरी सीटों पर वोट डालते हैं? पंचायती राज संस्थाओं को मज़बूत करने की बात हर मंच से होती है, लेकिन जब पंचायत में उम्मीदवार ही न हो, तो मज़बूती किसकी?
यह सिर्फ उत्तराखंड का संकट नहीं है। हिमाचल, झारखंड, छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में भी पंचायती चुनावों में निर्विरोध का रुझान बढ़ रहा है। लेकिन बागेश्वर का 99.5 प्रतिशत निर्विरोध — यह आँकड़ा अब तक के सबसे भयावह संकेतों में से एक है।
चुनाव हुए, हाँ। शांतिपूर्ण रहे, हाँ। लेकिन जिस लोकतंत्र में लड़ने वाला कोई न बचे, वह लोकतंत्र है या अंतिम साँस?
आरोप और अपुष्ट दावे यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत हैं और जब तक न्यायालय निर्णय न दे, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामले बिना पूर्वाग्रह रिपोर्ट किए गए हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- बागेश्वर की 405 में से 403 ग्राम पंचायतों में उपप्रधान निर्विरोध चुने गए — 99.5% सीटों पर कोई मुकाबला नहीं हुआ (दैनिक भास्कर)
- दो पंचायतों में तो कोई एक भी उम्मीदवार नहीं मिला, पद रिक्त रहे — यह पंचायती राज के ध्वस्त होने का सबसे स्पष्ट संकेत है
- तराई के खटीमा में 47% सीटों पर मुकाबला हुआ बनाम बागेश्वर (पहाड़) में 0.5% — फ़र्क़ पलायन का है, भूगोल का नहीं
- उत्तराखंड में 1700+ गाँव पूरी तरह खाली हो चुके हैं — 'भूतिया गाँव' बनाम 'शांतिपूर्ण चुनाव' एक ही सिक्के के दो पहलू हैं
- 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पलायन को नीतिगत एजेंडा बनाया जाएगा या नहीं — यह असली राजनीतिक परीक्षा है
आँकड़ों में
- बागेश्वर: 405 में से 403 उपप्रधान निर्विरोध (99.5%), 2 पद रिक्त — दैनिक भास्कर
- खटीमा: 59 पंचायतों में 31 निर्विरोध, 28 में मतदान — दैनिक भास्कर
- उत्तराखंड में कुल 1163 ग्राम पंचायतों में एक ही दिन उपप्रधान चुनाव — दैनिक भास्कर
- रुद्रपुर: 370 ग्राम पंचायतों में उपप्रधान चुनाव शांतिपूर्ण संपन्न — लाइव हिंदुस्तान
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: बागेश्वर जिले की 405 ग्राम पंचायतों के उपप्रधान पद के उम्मीदवार — दैनिक भास्कर के अनुसार
- क्या: 403 उपप्रधान निर्विरोध निर्वाचित हुए, दो पद रिक्त रहे — दैनिक भास्कर
- कब: 15 जुलाई 2026 को एक ही दिन नामांकन, मतदान और मतगणना हुई — दैनिक भास्कर
- कहाँ: उत्तराखंड का बागेश्वर जिला, 11 विकासखंडों की ग्राम पंचायतें — दैनिक भास्कर
- क्यों: पहाड़ी क्षेत्रों से भारी पलायन के कारण गांवों में पंचायती राज के लिए सक्रिय आबादी और इच्छुक उम्मीदवार बचे ही नहीं — विश्लेषण
- कैसे: एक ही दिन की प्रक्रिया में नामांकन से मतगणना तक सब हुआ, लेकिन अधिकांश सीटों पर एक ही नाम आया — दैनिक भास्कर
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बागेश्वर में कितने उपप्रधान निर्विरोध चुने गए?
दैनिक भास्कर के अनुसार बागेश्वर जिले की 405 ग्राम पंचायतों में से 403 में उपप्रधान निर्विरोध निर्वाचित हुए और दो पद रिक्त रहे।
बागेश्वर में निर्विरोध चुनाव का पलायन से क्या संबंध है?
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों से बड़े पैमाने पर युवा आबादी शहरों में पलायन कर चुकी है। गांवों में इतने कम लोग बचे हैं कि उपप्रधान पद के लिए एक से अधिक उम्मीदवार मिलना मुश्किल हो गया है।
उत्तराखंड में भूतिया गाँव (Ghost Villages) कितने हैं?
उत्तराखंड की सरकारी रिपोर्टों के अनुसार राज्य में 1700 से अधिक गाँव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, जिन्हें 'भूतिया गाँव' कहा जाता है।
क्या पूरे उत्तराखंड में ऐसी स्थिति है?
तराई क्षेत्र (जैसे खटीमा) में 47% सीटों पर मुकाबला हुआ, जबकि पहाड़ी बागेश्वर में 0.5% पर। दैनिक भास्कर के अनुसार 1163 ग्राम पंचायतों में एक साथ चुनाव हुए — पहाड़ी इलाकों में निर्विरोध का रुझान कहीं अधिक है।


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