हुर्रियत कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने PoK में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 9 नागरिकों की मौत पर चिंता जताते हुए इस्लामाबाद से संवाद और संयम की अपील की है। द हिंदू के अनुसार, यह पहली बार है जब हुर्रियत ने इतने खुले तौर पर पाकिस्तान की आंतरिक कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।
नौ लाशें। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की सड़कों पर बिखरी, अपने ही 'मुहाफ़िज़' देश की गोलियों से छलनी। और श्रीनगर में बैठा वह शख़्स जो दशकों तक दिल्ली के ख़िलाफ़ 'ज़ुल्म' और 'आज़ादी' का नारा बुलंद करता रहा — मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ — आज इस्लामाबाद को 'संयम' बरतने की नसीहत दे रहा है। इस एक शब्द — 'संयम' — में 1947 के बाद कश्मीर की भू-राजनीति का सबसे बड़ा भूचाल छिपा है।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज़ ने PoK में नागरिकों की मौत पर गहरी चिंता जताते हुए पाकिस्तान से कहा कि वह 'बातचीत और संयम को प्राथमिकता' दे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार PoK में जारी अशांति में कम से कम 9 लोगों की जान जा चुकी है — और ये मौतें भारतीय सेना की गोलियों से नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के हाथों हुई हैं। यह विडंबना इतनी गहरी है कि इसे दोबारा पढ़ना पड़ता है।
ज़रा याद कीजिए: यही मीरवाइज़ वह शख़्स हैं जिनकी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने कश्मीर घाटी में दशकों तक हड़ताल बुलवाई, पत्थरबाज़ी के दौर में 'अवाम की आवाज़' बनने का दावा किया, और भारत सरकार पर 'कब्ज़े' और 'दमन' का आरोप लगाया। पाकिस्तान की ISI से इस संगठन के तार कितने गहरे रहे, यह भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों के अनेक दस्तावेज़ों में दर्ज है। और अब वही ज़ुबान जो कभी 'आज़ादी' चिल्लाती थी, आज रावलपिंडी से कह रही है — 'रुको, बात करो, गोली मत चलाओ।'
सवाल यह नहीं कि मीरवाइज़ ने यह क्यों कहा। सवाल यह है कि वे यह कह पाए कैसे। 2019 में अनुच्छेद 370 हटने और 2024 में जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने के बाद हुर्रियत की राजनीतिक ज़मीन घाटी में तेज़ी से खिसकी। उनका 'थर्ड ऑप्शन' — न भारत, न पाकिस्तान, बल्कि 'आज़ाद कश्मीर' — का नारा अब सड़कों पर गूँजता नहीं। मीरवाइज़ खुद 2024 के बाद से अपने बयानों में ध्यान से 'दिल्ली-विरोध' की धार कम करते आ रहे हैं। और अब PoK की 9 लाशों ने उन्हें वह मौक़ा दिया जो शायद वे तलाश रहे थे — पाकिस्तान से खुलेआम दूरी बनाने का।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि मीरवाइज़ का यह बयान उनकी अपनी 'सर्वाइवल पॉलिटिक्स' है। घाटी में अब चुने हुए विधायक हैं, मुख्यमंत्री हैं — हुर्रियत की 'समानांतर सरकार' की ज़रूरत किसी को नहीं। ऐसे में मीरवाइज़ के पास दो रास्ते थे: या तो अप्रासंगिक होकर इतिहास के कूड़ेदान में जाओ, या फिर अपनी भाषा बदलो और दिल्ली के साथ बातचीत की एक नई खिड़की खोलो। PoK की त्रासदी ने दूसरा रास्ता चौड़ा कर दिया। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
दूसरी तरफ़ रावलपिंडी में बेचैनी का अंदाज़ा इससे लगाइए: PoK में विरोध प्रदर्शन बिजली-पानी और महँगाई जैसे बुनियादी मुद्दों पर शुरू हुए थे — लेकिन अब नारे बदल रहे हैं। लोग खुलेआम पाकिस्तानी फ़ौज के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं। 9 मौतें उस आग में घी हैं जिसे पाकिस्तान 'कंट्रोल्ड बर्न' समझ रहा था। और जब PoK का अपना जनता ही 'आज़ादी' माँगने लगे — पाकिस्तान से आज़ादी — तो ISI का वह पूरा नैरेटिव ध्वस्त होता है जो कश्मीर को 'भारतीय कब्ज़े' से मुक्त कराने के नाम पर गढ़ा गया था।
और दिल्ली? मोदी सरकार का रुख़ 'वेट एंड वॉच' है — और यह चुप्पी बेहद कैलकुलेटेड है। गृह मंत्री अमित शाह ने पहले ही संसद में कहा था कि PoK भारत का हिस्सा है और 'बिना गोली चलाए' वापस लिया जाएगा। आज PoK की सड़कों पर जो हो रहा है, वह उस दावे को एक नई ज़मीन दे रहा है: अगर PoK की जनता ख़ुद पाकिस्तान को ख़ारिज कर रही है, तो भारत को सैन्य कार्रवाई की ज़रूरत ही कहाँ? यह 'सॉफ्ट रीक्लेम' की थ्योरी है — और मीरवाइज़ का बयान इसमें एक और ईंट जोड़ता है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि मीरवाइज़ का 'संयम' सिर्फ़ मानवीय चिंता नहीं, बल्कि एक कैलकुलेटेड पोज़िशन शिफ्ट है जो हुर्रियत की पूरी राजनीतिक दिशा बदल सकता है। अगर हुर्रियत — जो दशकों तक पाकिस्तान का 'कश्मीरी चेहरा' रही — खुद पाकिस्तान की आलोचना करती है, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामाबाद का 'कश्मीर कॉज़' और कमज़ोर होगा। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान जब अगली बार कश्मीर उठाएगा, तो भारत के पास मीरवाइज़ का यह बयान एक डिप्लोमैटिक हथियार होगा।
लेकिन ख़तरा भी उतना ही बड़ा है। ISI का इतिहास बताता है कि जब कोई 'एसेट' हाथ से निकलने लगता है, तो रावलपिंडी उसे 'अप्रासंगिक' बनाने के लिए नए चेहरे खड़े करती है — या पुराने को ख़ामोश करती है। मीरवाइज़ के पिता मौलवी मोहम्मद फ़ारूक़ की 1990 में हत्या हुई थी — उन्हें भी 'बहुत नरम' माना गया था। इतिहास अपने आप को दोहराता है, ख़ासकर कश्मीर में।
आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ यह होगा: क्या मीरवाइज़ दिल्ली से किसी औपचारिक चैनल में बातचीत शुरू करते हैं? क्या PoK में विरोध प्रदर्शन और तीखे होते हैं या पाकिस्तानी फ़ौज उन्हें कुचल देती है? और सबसे अहम — क्या रावलपिंडी मीरवाइज़ को 'ग़द्दार' घोषित करती है, या चुपचाप उन्हें अनदेखा करती है? हर जवाब कश्मीर के अगले दशक की दिशा तय करेगा।
1947 से पाकिस्तान PoK को 'आज़ाद कश्मीर' कहता रहा — एक ऐसा नाम जो वहाँ के लोगों को आज विडंबना का चरम लगता है। अब जब उसी PoK की सड़कों पर लाशें गिर रही हैं और श्रीनगर में बैठा हुर्रियत का सरग़ना पाकिस्तान से 'संयम' माँग रहा है — तो असली सवाल यह नहीं कि मीरवाइज़ बदल गए हैं या नहीं। असली सवाल यह है: क्या कश्मीर की वह पटकथा ही बदल गई है जिसमें पाकिस्तान ने खुद को हीरो लिख रखा था — और अब उसे ख़ुद अपनी ही कहानी का खलनायक बनते देखना पड़ रहा है?
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मुख्य बातें
- मीरवाइज़ ने पहली बार खुलेआम PoK में पाकिस्तानी बल प्रयोग की आलोचना कर पाकिस्तान से संवाद और संयम की माँग की — द हिंदू के अनुसार
- PoK अशांति में कम से कम 9 नागरिकों की मौत हुई — पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के हाथों — टाइम्स ऑफ़ इंडिया
- हुर्रियत की भाषा में यह बदलाव 370 हटने और J&K चुनावों के बाद उसकी सिकुड़ती राजनीतिक ज़मीन का सीधा नतीजा है
- मीरवाइज़ का बयान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के लिए डिप्लोमैटिक एसेट बन सकता है — पाकिस्तान के कश्मीर नैरेटिव को कमज़ोर करते हुए
- ISI का इतिहास बताता है कि 'नरम' पड़ने वाले एसेट को रावलपिंडी अक्सर अप्रासंगिक बनाती है — मीरवाइज़ पर दबाव बढ़ सकता है
आँकड़ों में
- PoK अशांति में कम से कम 9 नागरिकों की मौत — पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की कार्रवाई में (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
- मीरवाइज़ के पिता मौलवी मोहम्मद फ़ारूक़ की 1990 में हत्या हुई थी — उन्हें भी 'बहुत नरम' माना गया था
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: हुर्रियत कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़, PoK के विरोध प्रदर्शनकारी और पाकिस्तानी सुरक्षा बल (द हिंदू के अनुसार)
- क्या: मीरवाइज़ ने PoK में नागरिक मौतों पर पाकिस्तान से संयम और संवाद को प्राथमिकता देने की अपील की (द हिंदू के अनुसार)
- कब: जून 2026 — PoK में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान (टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार)
- कहाँ: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) — मुज़फ़्फ़राबाद और आसपास के इलाक़ों में (द हिंदू के अनुसार)
- क्यों: PoK में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 9 नागरिकों की मौत के बाद बढ़ते जनाक्रोश और मानवीय संकट पर (टाइम्स ऑफ़ इंडिया/द हिंदू)
- कैसे: मीरवाइज़ ने सार्वजनिक बयान जारी कर पाकिस्तान से बातचीत को प्राथमिकता देने और बल प्रयोग रोकने की माँग की (द हिंदू के अनुसार)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मीरवाइज़ ने PoK हिंसा पर क्या कहा?
द हिंदू के अनुसार, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने PoK में नागरिक मौतों पर चिंता जताते हुए पाकिस्तान से कहा कि वह बातचीत और संयम को प्राथमिकता दे। यह पहली बार है जब हुर्रियत ने इतने खुले तौर पर पाकिस्तान की आंतरिक कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।
PoK में कितने लोगों की मौत हुई?
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार PoK में जारी अशांति और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कम से कम 9 नागरिकों की मौत हो चुकी है।
मीरवाइज़ के बयान का भारत के लिए क्या मतलब है?
यह बयान भारत की डिप्लोमैटिक स्थिति मज़बूत करता है — अगर हुर्रियत ख़ुद पाकिस्तान की आलोचना करे, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामाबाद का कश्मीर नैरेटिव और कमज़ोर होगा। साथ ही यह मोदी सरकार की 'सॉफ्ट रीक्लेम' रणनीति को बल देता है।
क्या मीरवाइज़ पर ISI का दबाव बढ़ सकता है?
ISI का इतिहास बताता है कि जब कोई एसेट 'नरम' पड़ता है, तो रावलपिंडी उसे अप्रासंगिक बनाने या ख़ामोश करने का प्रयास करती है। मीरवाइज़ के पिता की 1990 में इसी तरह हत्या हुई थी।



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