NEP 2020 को जुलाई 2025 में पाँच साल पूरे हुए। मल्टी-डिसिप्लिनरी ढाँचा, मातृभाषा में पढ़ाई और 5+3+3+4 स्ट्रक्चर जैसे बड़े वादे कागज़ पर आगे बढ़े हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त — शिक्षकों की कमी, फ़ंडिंग गैप और ग्रामीण-शहरी खाई — अब भी वहीं खड़ी है जहाँ थी।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय, राज्य सरकारें, NCERT, UGC, और देशभर के क़रीब 15 लाख स्कूल व 1,100+ विश्वविद्यालय
- क्या: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के पाँच साल पूरे होने पर इसके ज़मीनी प्रभाव और अधूरे वादों का मूल्यांकन
- कब: NEP 29 जुलाई 2020 को मंज़ूर हुई; जुलाई 2025 में पाँच साल पूरे; 2026 में कई राज्य अभी भी पूर्ण क्रियान्वयन की प्रक्रिया में
- कहाँ: पूरे भारत में — विशेषकर UP, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित हिंदी बेल्ट के ग्रामीण ज़िलों में असर सबसे ज़्यादा दिखना चाहिए था
- क्यों: 34 साल पुरानी 1986 की शिक्षा नीति को बदलकर भारत को 21वीं सदी की ज्ञान अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करना मक़सद था
- कैसे: 5+3+3+4 स्कूल ढाँचा, मातृभाषा में शुरुआती शिक्षा, मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट, अकादमिक बैंक ऑफ़ क्रेडिट्स और नई NCERT पाठ्यपुस्तकों के ज़रिये लागू किया जा रहा है
एक सरकारी प्राइमरी स्कूल, ज़िला सीतापुर, उत्तर प्रदेश। दीवार पर NEP 2020 का रंग-बिरंगा पोस्टर चिपका है — '5+3+3+4' लिखा है, 'फ़ाउंडेशनल लिटरेसी' लिखा है। कमरे में बैठे 47 बच्चों को एक अकेली टीचर पढ़ा रही हैं — जो एक साथ कक्षा 1 और कक्षा 3 सँभाल रही हैं। पोस्टर की भाषा 2020 की है, क्लासरूम की हक़ीक़त 2010 की।
यही वह तस्वीर है जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के पाँच साल पूरे होने पर सबसे ज़्यादा बेचैन करती है। NEP कागज़ पर भारतीय शिक्षा के इतिहास का सबसे महत्वाकांक्षी दस्तावेज़ है — 34 साल पुरानी नीति की जगह, 21वीं सदी का विज़न। लेकिन पाँच साल बाद सवाल यह है कि विज़न डॉक्यूमेंट से ज़मीन तक कितनी दूरी तय हुई, और कितनी बाक़ी है।
कागज़ पर जो बदला — बड़ी तस्वीर
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, देश के 25 से ज़्यादा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने NEP के मुताबिक़ अपने करिकुलम फ़्रेमवर्क में बदलाव शुरू किए। NCERT ने नया नेशनल करिकुलम फ़्रेमवर्क (NCF) 2023 में जारी किया, जिसके आधार पर फ़ाउंडेशनल स्टेज (कक्षा 1-2) की नई पाठ्यपुस्तकें 2024-25 सत्र से कई राज्यों में पहुँचीं। UGC ने मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट सिस्टम और अकादमिक बैंक ऑफ़ क्रेडिट्स (ABC) को लागू किया — द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2025 तक 1,500 से ज़्यादा संस्थानों ने ABC पर रजिस्ट्रेशन करा लिया था।
मातृभाषा में शिक्षा का वादा भी आगे बढ़ा। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, कम-से-कम 14 राज्यों ने कक्षा 5 तक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई को अनिवार्य या प्राथमिक माध्यम बनाने की दिशा में नोटिफ़िकेशन जारी किए।
पर ज़मीन पर जो नहीं बदला — और यही असली कहानी है
ASER (Annual Status of Education Report) 2024 की रिपोर्ट एक ठंडा तमाचा है। ग्रामीण भारत में कक्षा 3 के क़रीब 35% बच्चे अभी भी कक्षा 1 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते। फ़ाउंडेशनल लिटरेसी मिशन — जो NEP का सबसे ज़रूरी पहला क़दम माना गया था — यहाँ सबसे ज़्यादा लड़खड़ाया है।
शिक्षक पद रिक्तियों की तस्वीर और भी गंभीर है। UDISE+ डेटा के मुताबिक़ भारत में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर क़रीब 10 लाख शिक्षकों के पद ख़ाली हैं — और यह आँकड़ा 2020 से बहुत कम नहीं बदला। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे हिंदी बेल्ट के राज्य इस कमी से सबसे ज़्यादा जूझ रहे हैं। एक टीचर जो 60 बच्चों को पढ़ा रहा हो, उसे आप कोई भी करिकुलम दे दें — क्लासरूम का अनुभव वही रहेगा।
फ़ंडिंग का सवाल तो NEP की रीढ़ की हड्डी का सवाल है। नीति ख़ुद कहती है कि शिक्षा पर GDP का 6% ख़र्च होना चाहिए। हक़ीक़त? केंद्र और राज्यों का मिला-जुलाकर शिक्षा ख़र्च GDP के क़रीब 4.5% पर अटका हुआ है, इकॉनमिक सर्वे 2024-25 के अनुसार। यानी जो इंजन नई नीति को चलाना था, उसमें ईंधन पुराने हिसाब से ही डाला जा रहा है।
इनसाइड टॉक
शिक्षा मंत्रालय के गलियारों में एक बात खुलकर नहीं कही जाती पर सब जानते हैं — NEP का सबसे बड़ा चैलेंज टेक्निकल नहीं, पॉलिटिकल है। कई राज्य सरकारें, ख़ासकर विपक्ष-शासित, इसे 'केंद्र की नीति' मानकर धीमी चाल चल रही हैं। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल ने जानबूझकर कुछ प्रावधानों को टालने की रणनीति अपनाई है — हालाँकि आधिकारिक तौर पर कोई राज्य खुलकर विरोध नहीं करता। इंडस्ट्री की बात यह भी है कि प्राइवेट स्कूल चेन — जो भारत के 45% बच्चों को पढ़ाती हैं — NEP को एक 'मार्केटिंग टूल' की तरह इस्तेमाल कर रही हैं, बिना कोई बुनियादी बदलाव किए। फ़ीस बढ़ाने के लिए 'NEP-अलाइंड करिकुलम' का टैग लगा दिया जाता है। अभिभावक ख़ुश, स्कूल ख़ुश — बच्चे का क्या बदला, यह कोई नहीं पूछता।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
हायर एजुकेशन — मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट का प्रयोग
NEP का सबसे चर्चित प्रावधान — मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट और चार-वर्षीय अंडरग्रैजुएट डिग्री — कॉलेजों में मिला-जुला प्रभाव दिखा रहा है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, ABC पर रजिस्टर्ड संस्थानों में से बड़ी संख्या में ऐसे हैं जहाँ सिस्टम सिर्फ़ तकनीकी तौर पर 'लाइव' है — असल में बहुत कम छात्रों ने मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट का इस्तेमाल किया। कारण साफ़ है: नौकरियों में अभी भी तीन-वर्षीय डिग्री ही मान्यता की डिफ़ॉल्ट है, और कोई एक साल बाद सर्टिफ़िकेट लेकर निकले तो उसे रोज़गार बाज़ार में कोई पूछता नहीं।
यही वह जगह है जहाँ NEP का सबसे बड़ा स्ट्रक्चरल विरोधाभास सामने आता है — और इंडिया हेराल्ड का पॉलिसी रीड यही है: नीति शिक्षा को 'फ़्लेक्सिबल' बना रही है, लेकिन जिस रोज़गार बाज़ार के लिए यह शिक्षा तैयार करती है, वह बाज़ार अभी भी 'रिजिड' है। जब तक नियोक्ता — सरकारी और निजी दोनों — NEP के नए क्रेडेंशियल्स को मान्यता नहीं देते, तब तक मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट एक सुंदर सिद्धांत बना रहेगा जिसका प्रयोग कोई नहीं करता।
आगे क्या — अगले दो साल तय करेंगे NEP की किस्मत
2026-27 कई मायनों में निर्णायक साल है। नई NCERT पाठ्यपुस्तकें कक्षा 6-8 तक पहुँचनी हैं। राष्ट्रीय परीक्षा सुधार एजेंसी (NTA) की पुनर्संरचना के बाद CUET का नया रूप आना है। और सबसे अहम — 2027 तक फ़ाउंडेशनल लिटरेसी के लक्ष्य पूरे होने हैं, जो NIPUN भारत मिशन के तहत तय किए गए थे।
अगर 2027 तक ASER की रिपोर्ट में फ़ाउंडेशनल लिटरेसी के आँकड़ों में साफ़ सुधार नहीं दिखता, तो NEP का सबसे बुनियादी वादा — कि हर बच्चा कक्षा 3 तक पढ़-लिख सकेगा — खोखला साबित होगा। वहीं अगर राज्य चुनावी गणित से ऊपर उठकर शिक्षक भर्ती और बजट आवंटन में गंभीरता दिखाते हैं, तो अगले पाँच साल पहले पाँच से बिलकुल अलग हो सकते हैं।
शिक्षा नीति बदलना एक क़ानूनी फ़ैसला है। शिक्षा बदलना एक सांस्कृतिक क्रांति। भारत ने फ़ैसला ले लिया है, क्रांति अभी बाक़ी है। और जब तक सीतापुर के उस स्कूल की दीवार पर चिपके पोस्टर की भाषा और उस कमरे में बैठे बच्चे की हक़ीक़त एक नहीं होती — तब तक NEP एक अधूरा ख़्वाब ही रहेगा, चाहे कितने ही नोटिफ़िकेशन जारी हो जाएँ।
आँकड़ों में
- ASER 2024: ग्रामीण भारत में कक्षा 3 के ~35% बच्चे कक्षा 1 स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते
- UDISE+ डेटा: प्राथमिक-माध्यमिक स्तर पर ~10 लाख शिक्षक पद रिक्त
- इकॉनमिक सर्वे 2024-25: शिक्षा ख़र्च GDP का ~4.5%, लक्ष्य 6% से काफ़ी कम
- UGC/द हिंदू: 1,500+ संस्थानों ने अकादमिक बैंक ऑफ़ क्रेडिट्स पर रजिस्ट्रेशन कराया
मुख्य बातें
- NEP 2020 के पाँच साल में 25+ राज्यों ने करिकुलम बदलाव शुरू किए, पर ASER 2024 के अनुसार ग्रामीण भारत में कक्षा 3 के 35% बच्चे अभी भी ठीक से पढ़ नहीं पाते
- भारत में प्राथमिक-माध्यमिक स्तर पर क़रीब 10 लाख शिक्षक पद ख़ाली हैं — बिना शिक्षक, कोई भी नीति क्लासरूम नहीं बदल सकती
- शिक्षा ख़र्च GDP के 6% के वादे के मुक़ाबले 4.5% पर अटका है — ईंधन कम, इंजन बड़ा
- मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट सिस्टम तकनीकी रूप से लाइव है पर रोज़गार बाज़ार ने इसे अभी स्वीकारा नहीं — जब तक नौकरियाँ नए क्रेडेंशियल्स नहीं मानतीं, सिस्टम कागज़ी रहेगा
- 2027 तक NIPUN भारत मिशन के फ़ाउंडेशनल लिटरेसी लक्ष्य पूरे होने हैं — अगले दो साल NEP की असली परीक्षा हैं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
NEP 2020 के तहत 5+3+3+4 स्कूल ढाँचा क्या है?
यह पुराने 10+2 सिस्टम की जगह नया स्ट्रक्चर है: फ़ाउंडेशनल स्टेज (3-8 साल, 5 वर्ष), प्रिपेरेटरी स्टेज (8-11 साल, 3 वर्ष), मिडल स्टेज (11-14 साल, 3 वर्ष) और सेकेंडरी स्टेज (14-18 साल, 4 वर्ष)। इसमें प्री-स्कूल को भी औपचारिक शिक्षा में शामिल किया गया है।
मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट सिस्टम का मतलब क्या है और इसका फ़ायदा किसे?
इस सिस्टम में छात्र ग्रेजुएशन के बीच में पढ़ाई छोड़कर सर्टिफ़िकेट/डिप्लोमा ले सकते हैं और बाद में वापस आकर आगे की पढ़ाई जारी रख सकते हैं। UGC के अकादमिक बैंक ऑफ़ क्रेडिट्स (ABC) में उनके क्रेडिट्स सुरक्षित रहते हैं। हालाँकि व्यवहार में इसका इस्तेमाल अभी बहुत सीमित है क्योंकि नौकरी बाज़ार ने अभी इन नए क्रेडेंशियल्स को पूरी तरह नहीं अपनाया।
भारत शिक्षा पर GDP का कितना ख़र्च करता है?
NEP 2020 ने GDP का 6% शिक्षा पर ख़र्च करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन इकॉनमिक सर्वे 2024-25 के अनुसार केंद्र और राज्यों का मिला-जुलाकर शिक्षा ख़र्च GDP के क़रीब 4.5% ही है।
NEP 2020 कब तक पूरी तरह लागू होगी?
केंद्र सरकार का लक्ष्य 2035 तक NEP का पूर्ण क्रियान्वयन है। हालाँकि कई प्रावधान चरणबद्ध तरीके से लागू हो रहे हैं — फ़ाउंडेशनल लिटरेसी का लक्ष्य 2027, नई पाठ्यपुस्तकें 2026-27 तक कक्षा 8 तक, और हायर एजुकेशन सुधार 2030 तक पूरे होने की उम्मीद है।



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