बांग्लादेश-पाकिस्तान की बढ़ती नज़दीकी — सैन्य सहयोग, ISI की सक्रियता और कूटनीतिक गर्मजोशी — भारत के लिए पूर्वी सीमा पर गंभीर सुरक्षा चिंता है। ज़ी न्यूज़ के अनुसार यूनुस सरकार के दौर में पाकिस्तान ने ढाका में अपना रणनीतिक पैर फिर से जमा लिया है, जो भारत की 'चिकन नेक' कॉरिडोर की सुरक्षा को सीधे प्रभावित करता है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: बांग्लादेश की मुहम्मद यूनुस सरकार, पाकिस्तान की सेना और ISI, तथा भारत सरकार — तीनों इस समीकरण के मुख्य खिलाड़ी हैं।
- क्या: शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सैन्य, कूटनीतिक और इंटेलिजेंस स्तर पर नज़दीकियाँ तेज़ी से बढ़ी हैं, जो भारत की पूर्वी सीमा सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।
- कब: शेख हसीना के 2024 में तख्तापलट के बाद से यह प्रक्रिया तेज़ हुई और 2025-2026 में यह नज़दीकी स्पष्ट रूप से सामने आई है।
- कहाँ: ढाका (बांग्लादेश), इस्लामाबाद-रावलपिंडी (पाकिस्तान), और भारत का पूर्वी बॉर्डर — विशेषकर 'चिकन नेक' कॉरिडोर।
- क्यों: यूनुस सरकार ने हसीना-काल की भारत-केंद्रित विदेश नीति से दूरी बनाई और पाकिस्तान को रणनीतिक काउंटरवेट के रूप में अपनाया; पाकिस्तान के लिए यह भारत को 'दो मोर्चों' पर उलझाने का मौका है।
- कैसे: हथियारों की खरीद पर बातचीत, ISI के ऑपरेटिव्स की ढाका में बढ़ी सक्रियता, उच्चस्तरीय कूटनीतिक दौरे, और बांग्लादेशी सेना में पाकिस्तानी प्रशिक्षण कार्यक्रमों के ज़रिए यह नज़दीकी बढ़ रही है — ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार।
एक तारीख याद रखिए — अगस्त 2024। जिस दिन शेख हसीना का जहाज़ ढाका से उड़ा, उसी दिन इस्लामाबाद के एक दफ़्तर में शायद शैम्पेन की बोतल नहीं खुली, लेकिन रणनीतिक कैलकुलेशन का एक नया स्प्रेडशीट ज़रूर खुल गया। पचास साल से बांग्लादेश की ज़मीन पर जिस ISI का नाम लेना भी ख़तरनाक माना जाता था, वह अब ढाका की गलियों में फिर से अपनी पुरानी भाषा बोल रही है।
ज़ी न्यूज़ की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नज़दीकी अब किसी एक राजनयिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं रही — यह हथियारों की डील, सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों, और इंटेलिजेंस-शेयरिंग तक पहुँच चुकी है। और यही बात इसे भारत के लिए महज़ एक 'कूटनीतिक चुनौती' से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक बनाती है।
हसीना के जाने के बाद बदला ढाका का GPS
शेख हसीना का शासन भारत के लिए पूर्वी सीमा पर एक 'इंश्योरेंस पॉलिसी' की तरह काम करता था। उनके दौर में बांग्लादेश ने पाकिस्तान से सचेतन दूरी रखी — 1971 के युद्ध अपराधों का मुक़दमा, जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध, और ISI की किसी भी गतिविधि पर सख़्त निगरानी। लेकिन जैसे ही यूनुस सरकार सत्ता में आई, यह पूरा ढांचा हिलने लगा।
ज़ी न्यूज़ के मुताबिक, यूनुस सरकार ने न सिर्फ़ पाकिस्तान से कूटनीतिक रिश्ते 'सामान्य' किए, बल्कि रक्षा सहयोग पर भी बातचीत शुरू कर दी। पाकिस्तानी सैन्य प्रतिनिधिमंडल ढाका के दौरे पर आए, और रिपोर्ट्स बताती हैं कि हथियारों की आपूर्ति और संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर चर्चा हुई है। यह वही बांग्लादेश है जिसने दशकों तक पाकिस्तान को 1971 के नरसंहार के लिए माफ़ नहीं किया था।
ISI की ढाका वापसी — 'स्लीपर सेल' से 'एक्टिव मोड' तक
रिपोर्ट्स के अनुसार, ISI की ढाका में सक्रियता अब खुले तौर पर दिखने लगी है। हसीना सरकार ने जिन जमात-ए-इस्लामी और अन्य कट्टरपंथी संगठनों पर शिकंजा कसा था, उनमें से कई अब फिर से सक्रिय हो रहे हैं। इंटेलिजेंस विश्लेषकों का मानना है कि ISI इन संगठनों के ज़रिए न सिर्फ़ बांग्लादेश में अपना नेटवर्क मज़बूत कर रही है, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में भी अपनी पहुँच बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
यह वह कोण है जो बाक़ी मीडिया से छूट जाता है — ISI की दिलचस्पी सिर्फ़ ढाका में नहीं, बल्कि ढाका को एक 'लॉन्चपैड' की तरह इस्तेमाल करने में है। भारत का 'चिकन नेक' कॉरिडोर — सिलीगुड़ी का वह तंग गलियारा जो पूर्वोत्तर के सात राज्यों को बाक़ी भारत से जोड़ता है — इस पूरे खेल का असली निशाना है। ज़ी न्यूज़ के विश्लेषण के अनुसार, यह कॉरिडोर अगर किसी भी तरह की अस्थिरता की चपेट में आता है, तो पूर्वोत्तर भारत रणनीतिक रूप से कटा हुआ हो सकता है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि नई दिल्ली इस पूरे बदलाव को लेकर 'साइलेंट बट अलर्ट' मोड में है। सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि भारतीय खुफ़िया एजेंसियों ने ढाका में अपने ऑपरेशनल ढांचे को पहले ही रीस्ट्रक्चर कर लिया है। RAW ने कथित तौर पर बांग्लादेश डेस्क को 'प्रायोरिटी वन' पर शिफ्ट किया है — कुछ वैसा ही जैसा 1990 के दशक में पाकिस्तान बॉर्डर पर किया गया था।
इंडस्ट्री की बात यह है कि भारत सरकार के भीतर दो विचारधाराएँ हैं — एक धड़ा मानता है कि यूनुस सरकार अस्थायी है और इसलिए 'वेट एंड वॉच' सही रणनीति है; दूसरा धड़ा कहता है कि हर गुज़रता दिन पाकिस्तान को ढाका में और गहरी जड़ें जमाने का मौका देता है, इसलिए भारत को अभी सक्रिय क़दम उठाने चाहिए। (यह सियासी चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
भारत की 'काउंटर-स्ट्रैटेजी' — मौन जो बहुत कुछ कहता है
इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यह है कि नई दिल्ली का मौन एक रणनीतिक चुनाव है, कमज़ोरी नहीं। भारत ने पिछले कुछ महीनों में कई ऐसे क़दम उठाए हैं जो सीधे तौर पर बांग्लादेश-पाकिस्तान नज़दीकी का जवाब लगते हैं — पूर्वी सीमा पर सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर का अपग्रेड, म्यांमार और श्रीलंका के साथ नौसैनिक अभ्यासों में बढ़ोतरी, और — सबसे अहम — बांग्लादेश को जाने वाले पानी और व्यापार के मुद्दों पर एक 'कैलिब्रेटेड प्रेशर'।
ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट इस ओर इशारा करती है कि भारत ने बांग्लादेश पर आर्थिक दबाव का 'सॉफ्ट लीवर' इस्तेमाल करना शुरू किया है। बांग्लादेश का गारमेंट एक्सपोर्ट भारतीय बंदरगाहों और ट्रांज़िट रूट्स पर काफ़ी हद तक निर्भर है — और यह निर्भरता भारत के लिए एक शक्तिशाली बार्गेनिंग चिप है।
'टू-फ्रंट थ्रेट' — पाकिस्तान का असली खेल
पाकिस्तान की रणनीति को समझने के लिए एक पुरानी कहावत काफ़ी है — 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।' इस्लामाबाद का ढाका प्रेम न तो भावनात्मक है, न ही ऐतिहासिक। यह ठंडी गणना है — भारत को 'दो मोर्चों' पर उलझाना। पश्चिमी सीमा पर आतंकवाद का दबाव बनाए रखते हुए पूर्वी सीमा पर एक नया 'प्रेशर पॉइंट' तैयार करना — यही ISI का क्लासिक प्लेबुक है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने बांग्लादेश को JF-17 लड़ाकू विमान और अन्य सैन्य उपकरण बेचने का प्रस्ताव भी रखा है। अगर यह डील पूरी होती है, तो यह 1971 के बाद पहली बार होगा जब पाकिस्तानी हथियार बांग्लादेशी सेना के शस्त्रागार में होंगे — और यह प्रतीकात्मक रूप से इतना बड़ा बदलाव है कि इसका असर दशकों तक महसूस होगा।
आगे क्या देखें — रडार पर रखें ये तीन बातें
पहला, बांग्लादेश में अगला चुनाव कब होता है और क्या अवामी लीग या कोई भारत-समर्थक गठबंधन वापसी कर पाता है — अगर यूनुस सरकार लंबी चलती है, तो पाकिस्तान की जड़ें और गहरी होंगी। दूसरा, ISI की पूर्वोत्तर भारत में किसी बड़ी कार्रवाई की ख़बर — यह 'रेड लाइन' होगी जिसके बाद भारत को खुले तौर पर प्रतिक्रिया देनी पड़ सकती है। तीसरा, JF-17 डील की प्रगति — अगर बांग्लादेश पाकिस्तानी लड़ाकू विमान ख़रीदता है, तो यह भारत के लिए सिर्फ़ सुरक्षा चिंता नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई शक्ति-संतुलन में एक भूकम्पीय बदलाव होगा।
एक बात और — जो सबसे ज़्यादा चिंता की है। 1971 में बांग्लादेश भारत का 'बनाया हुआ' देश था, इस भाव ने दशकों तक ढाका-दिल्ली रिश्ते की ज़मीन तैयार की। लेकिन अगर नई पीढ़ी का बांग्लादेश इस इतिहास को 'बोझ' मानने लगे और पाकिस्तान को 'विकल्प' — तो यह सिर्फ़ भू-राजनीतिक नहीं, एक भावनात्मक भूकंप भी होगा।
असली सवाल यह नहीं है कि पाकिस्तान ढाका में क्या कर रहा है — वह तो वही कर रहा है जो उसका स्वभाव है। असली सवाल यह है कि भारत कब तक अपनी चुप्पी को 'रणनीति' कहता रहेगा और कब यह चुप्पी 'लापरवाही' में बदल जाएगी?
आँकड़ों में
- पाकिस्तान का JF-17 लड़ाकू विमान प्रस्ताव: 1971 के बाद पहली बार बांग्लादेशी सेना को पाकिस्तानी हथियारों की आपूर्ति की संभावना — ज़ी न्यूज़
- सिलीगुड़ी कॉरिडोर ('चिकन नेक'): भारत के 7 पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला 22 किमी चौड़ा गलियारा — रणनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील
मुख्य बातें
- शेख हसीना के तख्तापलट के बाद पाकिस्तान ने बांग्लादेश में सैन्य, कूटनीतिक और इंटेलिजेंस स्तर पर तेज़ी से पैर जमाए हैं — ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार
- ISI की ढाका में सक्रियता पूर्वोत्तर भारत के 'चिकन नेक' कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है
- पाकिस्तान ने बांग्लादेश को JF-17 लड़ाकू विमान बेचने का प्रस्ताव रखा है — 1971 के बाद पहली बार पाकिस्तानी हथियार बांग्लादेशी शस्त्रागार में हो सकते हैं
- भारत ने आर्थिक दबाव और पूर्वी सीमा पर सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड के ज़रिए 'साइलेंट काउंटर-स्ट्रैटेजी' शुरू की है
- यूनुस सरकार के भविष्य, JF-17 डील की प्रगति, और ISI की पूर्वोत्तर भारत में गतिविधियाँ — ये तीन बातें आने वाले महीनों में निर्णायक होंगी
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बांग्लादेश-पाकिस्तान नज़दीकी भारत के लिए कितना बड़ा ख़तरा है?
यह भारत के लिए गंभीर सुरक्षा चिंता है। ISI की ढाका में बढ़ी सक्रियता, हथियारों की डील की चर्चा, और कूटनीतिक गर्मजोशी — तीनों मिलकर भारत के पूर्वी बॉर्डर और विशेषकर सिलीगुड़ी 'चिकन नेक' कॉरिडोर की सुरक्षा पर सीधा प्रभाव डालते हैं।
ISI ढाका में क्या कर रही है?
ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, ISI ने हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में अपने नेटवर्क को फिर से सक्रिय किया है। कट्टरपंथी संगठनों के ज़रिए अपना बेस मज़बूत करना और पूर्वोत्तर भारत में पहुँच बढ़ाना उनकी कथित रणनीति मानी जा रही है।
भारत बांग्लादेश-पाकिस्तान नज़दीकी पर क्या कर रहा है?
भारत ने पूर्वी सीमा पर सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड किया है, म्यांमार-श्रीलंका के साथ नौसैनिक अभ्यास बढ़ाए हैं, और बांग्लादेश पर आर्थिक दबाव की 'कैलिब्रेटेड' रणनीति अपनाई है।
JF-17 डील क्यों अहम है?
अगर बांग्लादेश पाकिस्तानी JF-17 लड़ाकू विमान ख़रीदता है, तो यह 1971 के बाद पहली बार होगा जब पाकिस्तानी हथियार बांग्लादेशी सेना में शामिल होंगे — यह दक्षिण एशिया के शक्ति-संतुलन में बड़ा बदलाव होगा।



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