'खेत बचाओ अभियान' के तहत कृषि विशेषज्ञ गांव-गांव जाकर किसानों को कीट प्रबंधन, मिट्टी स्वास्थ्य और जल संरक्षण पर सीधी मदद दे रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह अभियान फ़सल बर्बादी और गिरते जलस्तर की गंभीर स्थिति से निपटने के लिए शुरू किया गया है, जिसके पीछे बढ़ता कृषि संकट है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के विशेषज्ञ, कृषि विभाग के अधिकारी और किसान
  • क्या: 'खेत बचाओ अभियान' — एक गांव-स्तरीय मुहिम जिसमें कृषि वैज्ञानिक सीधे खेतों में जाकर किसानों को कीट प्रबंधन, मिट्टी परीक्षण और जल संरक्षण का प्रशिक्षण दे रहे हैं
  • कब: 2025-26 के रबी-खरीफ़ सीज़न के दौरान, इंडियन एक्सप्रेस की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार अभियान वर्तमान में सक्रिय
  • कहाँ: भारत के कई कृषि-प्रधान राज्यों के गांवों में, विशेषकर उत्तर भारत और मध्य भारत के ज़िलों में
  • क्यों: लगातार गिरता जलस्तर, कीट हमलों से फ़सल बर्बादी, घटती उत्पादकता और किसानों में बढ़ता असंतोष — इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार ये सब मिलकर इस अभियान की ज़रूरत पैदा कर रहे हैं
  • कैसे: कृषि विशेषज्ञ गांव-गांव जाकर किसान चौपालों, खेत प्रदर्शनों और सीधे प्रशिक्षण सत्रों के ज़रिए किसानों को वैज्ञानिक खेती, कीटनाशक के सही उपयोग और पानी बचाने की तकनीक सिखा रहे हैं

जब कोई सरकार अपने वैज्ञानिकों को लैब से उठाकर गांव की पगडंडियों पर भेजती है, तो समझ लीजिए कि बात सिर्फ़ 'जागरूकता' की नहीं रही — बात आग बुझाने की है। 'खेत बचाओ अभियान' ठीक यही कहानी है। इंडियन एक्सप्रेस की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक कृषि विशेषज्ञ इन दिनों गांव-गांव पहुँच रहे हैं — किसानों के खेतों में बैठकर मिट्टी जाँच रहे हैं, कीटों की पहचान करा रहे हैं, और पानी बचाने के तरीक़े समझा रहे हैं। सुनने में यह एक रूटीन सरकारी योजना लगती है। लेकिन इसके नीचे जो हक़ीक़त दबी है, वो कहीं ज़्यादा बेचैन करने वाली है।

असल सवाल यह है: अचानक ऐसी हड़बड़ी क्यों? जवाब खेतों में दिखता है — सूखती नहरें, ज़मीन के नीचे गिरता पानी, और फ़सलों पर कीटों का ऐसा हमला जिसने पिछले कुछ सीज़न में किसानों की कमर तोड़ दी। केंद्रीय भूजल बोर्ड के आँकड़ों के अनुसार भारत के कई कृषि-प्रधान ज़िलों में भूजल स्तर ख़तरनाक रफ़्तार से गिर रहा है — कुछ इलाक़ों में तो पिछले एक दशक में 10-15 फ़ीट तक की गिरावट दर्ज हुई है। जब कुआँ सूखता है तो किसान सबसे पहले बोरवेल खोदता है; जब बोरवेल भी जवाब दे जाए, तो वो खेत छोड़कर शहर की तरफ़ देखता है — या फिर अपना ग़ुस्सा वोट में उतारता है।

कीट हमले और फ़सल बर्बादी — जो तस्वीर प्रेस रिलीज़ नहीं दिखाती

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि इस अभियान की एक बड़ी वजह हाल के सीज़न में कीट हमलों की बढ़ती तीव्रता है। पिंक बॉलवर्म ने कपास की फ़सल को तबाह किया, फ़ॉल आर्मीवर्म ने मक्का के खेत उजाड़े, और दलहन में फली छेदक ने उपज आधी कर दी। किसान कीटनाशक डालता रहा — लेकिन ग़लत दवा, ग़लत समय, ग़लत मात्रा। नतीजा: लागत दोगुनी, उपज आधी, और कर्ज़ का बोझ तीन गुना।

यही वो जगह है जहाँ 'खेत बचाओ अभियान' की ज़रूरत समझ आती है। कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के वैज्ञानिक अब सीधे खेतों में जाकर इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) सिखा रहे हैं — यानी हर कीट के लिए अलग रणनीति, जैविक और रासायनिक दोनों तरीक़ों का संतुलन, और फ़ेरोमोन ट्रैप जैसे सस्ते उपाय। साथ ही मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर खाद की सही मात्रा तय की जा रही है। सुनने में तकनीकी लगता है, लेकिन जिस किसान की आधी फ़सल कीड़े खा गए हों, उसके लिए यह बातें ज़िंदगी-मौत का फ़र्क़ करती हैं।

पॉलिटिकल पल्स — वो गणित जो दिल्ली की नींद उड़ा सकता है

अब बात करें उस कोने की जो प्रेस रिलीज़ में कभी नहीं आती। सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि 'खेत बचाओ अभियान' जैसी मुहिमें सिर्फ़ कृषि मंत्रालय की पहल नहीं हैं — इनके पीछे ग्रामीण इलाक़ों से आ रही बेचैनी का वो सिग्नल है जो सत्ता में बैठे लोगों की चुनावी एंटीना ने पकड़ा है। जब किसान नाराज़ होता है तो वो सड़क पर नहीं आता — वो चुपचाप वोट बदल देता है। और भारत की चुनावी सीटों का बड़ा हिस्सा आज भी ग्रामीण है।

हाल के वर्षों में राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों ने यह साबित किया है कि कृषि संकट सीधे सत्ता-परिवर्तन की वजह बनता है। 2018 में राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीजेपी की हार के पीछे विश्लेषकों ने कृषि असंतोष को प्रमुख कारण माना था। अब जब 2027 के कई राज्यों के चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, तो कोई भी सत्ताधारी पार्टी यह जोख़िम नहीं ले सकती कि गांव का मूड उसके ख़िलाफ़ पलट जाए।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि 'खेत बचाओ अभियान' जैसी ज़मीनी मुहिमें असल में दोहरा मक़सद पूरा करती हैं — एक तरफ़ किसानों को तत्काल राहत देने की कोशिश, दूसरी तरफ़ सरकार का यह संदेश कि "हम आपके खेत तक पहुँचे हैं।" यह राजनीतिक कम्युनिकेशन का सबसे पुराना और सबसे कारगर तरीक़ा है — दिखाओ कि तुम्हें परवाह है, इससे पहले कि विपक्ष "किसान विरोधी" का नैरेटिव सेट कर दे।

जलस्तर का गणित — वो संख्या जो सबसे ज़्यादा डराती है

केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट्स के अनुसार भारत के लगभग 256 ज़िलों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कई ब्लॉक 'डार्क ज़ोन' में आ चुके हैं — जहाँ निकासी, रिचार्ज से कहीं ज़्यादा है। नीति आयोग की 2018 की कम्पोज़िट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स रिपोर्ट ने चेतावनी दी थी कि 2030 तक भारत की 40% आबादी को पीने के पानी की गंभीर किल्लत होगी — और खेती के लिए पानी इससे भी पहले ख़त्म हो सकता है।

जब विशेषज्ञ गांव-गांव जाकर माइक्रो-इरिगेशन, ड्रिप सिंचाई और बारिश के पानी को ज़मीन में उतारने की बात करते हैं, तो वे दरअसल इस टाइम बम को डिफ़्यूज़ करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है: क्या गांव-स्तर पर कुछ हफ़्तों की ट्रेनिंग उस समस्या का जवाब बन सकती है जो दशकों की नीतिगत अनदेखी से पैदा हुई है?

विपक्ष का दांव और ज़मीनी हक़ीक़त

विपक्षी दल इस अभियान को 'चुनावी जुमला' बताने में देर नहीं लगाएंगे — और उनके पास तर्क भी है। अगर सरकारें सच में कृषि संकट को लेकर गंभीर होतीं, तो MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की गारंटी, सिंचाई इन्फ़्रास्ट्रक्चर में स्थायी निवेश और कृषि-शोध बजट में बढ़ोतरी जैसे संरचनात्मक सुधार होते। एक अभियान — चाहे कितना भी सद्भावनापूर्ण हो — संरचनात्मक समस्या का संरचनात्मक जवाब नहीं है। यह मरहम है, ऑपरेशन नहीं।

दूसरी तरफ़, ज़मीनी हक़ीक़त यह भी है कि जो किसान अब तक किसी वैज्ञानिक से बात भी नहीं कर पाया था, उसके खेत में अगर कोई आकर कीट पहचानना सिखाता है और सही दवा बताता है, तो उस किसान के लिए वो एक सीज़न बचा सकता है। और चुनावी राजनीति में एक सीज़न बहुत मायने रखता है।

आगे क्या? — वो तीन बातें जिन पर नज़र रखें

पहला, देखना यह है कि 'खेत बचाओ अभियान' कितने राज्यों तक फैलता है और क्या केंद्र सरकार इसे एक राष्ट्रीय मुहिम के रूप में अपनाती है — अगर ऐसा होता है, तो समझिए कि दिल्ली ने कृषि असंतोष को आधिकारिक रूप से चुनावी ख़तरा मान लिया है।

दूसरा, अगर अगले रबी सीज़न में भी कीट हमले बेक़ाबू रहे या मानसून कमज़ोर आया, तो यह अभियान एक बैंड-एड साबित होगा और किसानों का ग़ुस्सा अभियान चलाने वालों पर ही पलट सकता है।

तीसरा, विपक्ष — विशेषकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और किसान संगठन — इस अभियान को कैसे फ़्रेम करते हैं, यह तय करेगा कि यह मुहिम सरकार की ताक़त बनती है या कमज़ोरी। अगर विपक्ष "अभियान नहीं, MSP गारंटी दो" का नैरेटिव सफलतापूर्वक सेट कर लेता है, तो सत्ता पक्ष के लिए यह अभियान बूमरैंग बन सकता है।

एक बात साफ़ है: जब वैज्ञानिक लैब छोड़कर खेत में खड़े हों, तो समझिए कि बीमारी सिर्फ़ फ़सल की नहीं — व्यवस्था की है। और व्यवस्था की बीमारी का इलाज चुनाव से होता है। अगला सवाल यह है कि किसान का गुस्सा किसकी बैलट बॉक्स में गिरेगा — और उस जवाब पर कई-कई सरकारों की नींद टिकी है।

आँकड़ों में

  • भारत के 256 से अधिक ज़िलों में भूजल का अत्यधिक दोहन — केंद्रीय भूजल बोर्ड
  • नीति आयोग की रिपोर्ट: 2030 तक भारत की 40% आबादी को गंभीर जल संकट का ख़तरा
  • कई कृषि ज़िलों में पिछले एक दशक में भूजल स्तर 10-15 फ़ीट तक गिरा

मुख्य बातें

  • इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार 'खेत बचाओ अभियान' के तहत कृषि विशेषज्ञ गांव-गांव जाकर कीट प्रबंधन, मिट्टी जाँच और जल संरक्षण का प्रशिक्षण दे रहे हैं
  • केंद्रीय भूजल बोर्ड के आँकड़ों के अनुसार भारत के 256 से अधिक ज़िलों में भूजल का अत्यधिक दोहन — कई ब्लॉक 'डार्क ज़ोन' में
  • पिंक बॉलवर्म, फ़ॉल आर्मीवर्म जैसे कीटों ने हाल के सीज़न में कपास, मक्का और दलहन की फ़सलें बड़े पैमाने पर बर्बाद कीं
  • चुनावी इतिहास बताता है कि कृषि असंतोष सीधे सत्ता-परिवर्तन की वजह बनता है — 2018 में राजस्थान-मध्य प्रदेश इसका उदाहरण
  • यह अभियान ज़मीनी राहत के साथ-साथ राजनीतिक सिग्नलिंग भी है — 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले ग्रामीण नैरेटिव पर नियंत्रण की कोशिश

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

खेत बचाओ अभियान क्या है और इसमें क्या होता है?

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह एक कृषि मुहिम है जिसमें कृषि विशेषज्ञ और KVK वैज्ञानिक गांव-गांव जाकर किसानों को कीट प्रबंधन, मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड आधारित खाद प्रयोग, ड्रिप सिंचाई और जल संरक्षण की तकनीक सिखाते हैं।

कृषि विशेषज्ञ अचानक गांवों में क्यों जा रहे हैं?

हाल के सीज़न में पिंक बॉलवर्म, फ़ॉल आर्मीवर्म जैसे कीटों के बढ़ते हमले, गिरता भूजल स्तर और किसानों में बढ़ता असंतोष — इन सबने इस अभियान की तत्काल ज़रूरत पैदा की।

खेत बचाओ अभियान का राजनीतिक असर क्या हो सकता है?

विश्लेषकों का मानना है कि ग्रामीण कृषि संकट सीधे चुनावी नतीजे प्रभावित करता है। 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले यह अभियान किसान असंतोष को शांत करने और सत्ता पक्ष की छवि सुधारने का एक रणनीतिक क़दम भी माना जा रहा है।

भारत में भूजल संकट कितना गंभीर है?

केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार 256 से अधिक ज़िलों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। नीति आयोग ने चेतावनी दी है कि 2030 तक 40% आबादी को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।

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