सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल पाँचवें दिन ख़तरनाक मोड़ पर पहुँच गई है — ब्लड प्रेशर गिर रहा है, शरीर कमज़ोर हो रहा है। CJP की तीस्ता सेतलवाड़ और मुज़हीर अब्बास दीपके ने पुलिस द्वारा मारपीट और रोक-टोक का आरोप लगाया है। दिल्ली में बैठी मोदी सरकार की चुप्पी लद्दाख के UT दर्जे के असली इरादे पर सवाल खड़ा करती है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, CJP संगठन (तीस्ता सेतलवाड़, मुज़हीर अब्बास दीपके), दिल्ली पुलिस, केंद्र सरकार
  • क्या: वांगचुक की भूख हड़ताल पाँचवें दिन पहुँची, तबीयत बिगड़ी; CJP ने पुलिस द्वारा शारीरिक हमले और प्रदर्शन पर अंकुश का आरोप लगाया — द प्रिंट और तेलंगाना टुडे की रिपोर्ट के अनुसार
  • कब: 2026, भूख हड़ताल का पाँचवाँ दिन
  • कहाँ: दिल्ली — जहाँ वांगचुक लद्दाख की माँगों को लेकर अनशन पर बैठे हैं
  • क्यों: लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल करने और स्थानीय शासन की माँग — जो 2019 में UT बनने के बाद से अधर में है
  • कैसे: वांगचुक ने अनशन शुरू किया; CJP ने उनके समर्थन में पहुँचकर पुलिस की रोक-टोक और कथित मारपीट को सार्वजनिक किया — तेलंगाना टुडे के अनुसार पुलिस ने समर्थकों और कार्यकर्ताओं पर अंकुश लगाया

एक आदमी जिसने लद्दाख की बर्फ़ीली चोटियों पर सोलर हीटर बनाए, बच्चों के लिए बर्फ़ के स्तूप खड़े किए, और लाखों को जलवायु संकट का मतलब समझाया — वह आज दिल्ली की सड़क पर भूखा पड़ा है, और उसकी सरकार चुप है। सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का पाँचवाँ दिन सिर्फ़ एक कार्यकर्ता की ज़िद की कहानी नहीं है — यह उस वादे की पोस्टमार्टम रिपोर्ट है जो 2019 में लद्दाख को 'यूनियन टेरिटरी' बनाते वक़्त किया गया था।

द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, वांगचुक का ब्लड प्रेशर ख़तरनाक स्तर तक गिर चुका है और उनके शरीर ने कमज़ोरी के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। डॉक्टरों ने चिंता जताई है। लेकिन असली झटका तब लगा जब सिटीज़न्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के राष्ट्रीय सचिव मुज़हीर अब्बास दीपके ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस ने उन पर शारीरिक हमला किया और प्रदर्शन स्थल पर पहुँचने वाले समर्थकों को जबरन रोका गया। तेलंगाना टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, CJP की अध्यक्ष तीस्ता सेतलवाड़ ने भी पुलिस की ज़बरदस्ती पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे 'लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घोंटना' बताया।

UT का तमग़ा, लेकिन आवाज़ किसकी?

2019 में जब अनुच्छेद 370 हटा और लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग करके UT बनाया गया, तो सरकार ने इसे 'विकास की नई सुबह' बताया था। लेकिन छह साल बाद, लद्दाख के लोग उसी सुबह के अँधेरे पक्ष में खड़े हैं — न विधानसभा, न स्थानीय शासन, न छठी अनुसूची की सुरक्षा। लद्दाख अब भारत का इकलौता ऐसा क्षेत्र है जिसकी 2.7 लाख आबादी के पास न तो निर्वाचित विधायिका है और न ही जनजातीय अधिकारों का संवैधानिक कवच।

वांगचुक की माँग साफ़ है — लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल किया जाए ताकि ज़मीन, नौकरी और संस्कृति पर स्थानीय लोगों का अधिकार सुरक्षित रहे, और पूर्ण राज्य का दर्जा मिले। लेकिन दिल्ली इस माँग को उसी तरह टाल रही है जैसे कोई अफ़सर फ़ाइल को 'अंडर कंसीडरेशन' लिखकर दराज़ में रख देता है। तेलंगाना टुडे के अनुसार, सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

पॉलिटिकल पल्स — वह कोण जो कोई बाहर नहीं कहता

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि मोदी सरकार लद्दाख को UT इसलिए रखना चाहती है क्योंकि चीन सीमा पर सेना की तैनाती और रणनीतिक फ़ैसलों में राज्य सरकार का 'हस्तक्षेप' नहीं चाहिए। LAC पर गलवान के बाद जो सुरक्षा ढाँचा खड़ा हुआ, उसमें केंद्र का सीधा नियंत्रण ज़रूरी माना गया। लेकिन यही तर्क एक ख़तरनाक मिसाल बनाता है — क्या सुरक्षा के नाम पर नागरिक अधिकार अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जा सकते हैं?

ट्रेड हलकों और विश्लेषकों में चर्चा यह भी है कि विपक्ष इस मुद्दे को 2027 के आम चुनावों तक 'धीमी आँच पर पकाने' की रणनीति बना रहा है। कांग्रेस और AAP ने पिछले साल भी वांगचुक की दिल्ली मार्च का समर्थन किया था, और अब CJP जैसे नागरिक समाज संगठनों का खुलकर मैदान में उतरना इस आंदोलन को 'किसान आंदोलन 2.0' की शक्ल दे सकता है। पंजाब कनेक्शन भी अहम है — वांगचुक की पिछली यात्राओं में पंजाब के किसान संगठनों ने खुला समर्थन दिया था, और यह गठजोड़ BJP के लिए उत्तर भारत में एक नई परेशानी बन सकता है।

(यह खंड इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

दीपके का आरोप — सिर्फ़ लाठी नहीं, संदेश है

CJP के मुज़हीर अब्बास दीपके पर कथित पुलिस हमला सिर्फ़ एक व्यक्ति पर ज़्यादती नहीं है — यह उस भाषा का हिस्सा है जिसमें सत्ता विरोध से बात करती है। द प्रिंट के अनुसार, दीपके ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें धक्का देकर गिराया और प्रदर्शन स्थल तक पहुँच रोकी। तेलंगाना टुडे के अनुसार, CJP ने इसकी औपचारिक शिकायत दर्ज कराने की बात कही है।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि दिल्ली पुलिस की यह कार्रवाई स्थानीय नहीं, संस्थागत है — यह वही पैटर्न है जो पिछले साल वांगचुक की दिल्ली मार्च के दौरान भी दिखा था जब सैकड़ों लद्दाखी समर्थकों को सिंघु बॉर्डर पर रोका गया था। सरकार का कैलकुलेशन सीधा है: आंदोलन को ऑक्सीजन मत दो, मीडिया कवरेज सीमित रखो, और समय बीतने दो। लेकिन यह रणनीति 2020 में किसान आंदोलन में विफल हो चुकी है।

असली सवाल — 2.7 लाख लोगों का लोकतंत्र कहाँ है?

संख्याओं की भाषा में बात करें तो लद्दाख भारत का सबसे बड़ा UT है — क्षेत्रफल में 59,146 वर्ग किलोमीटर — लेकिन आबादी के हिसाब से सबसे छोटा। इन 2.7 लाख लोगों के पास कोई निर्वाचित विधायिका नहीं है। ज़मीन की बिक्री पर कोई स्थानीय नियंत्रण नहीं। और अब, जब वे शांतिपूर्ण तरीक़े से अपनी बात कहने दिल्ली आते हैं, तो उनके नेता भूख से तड़प रहा है और उनके समर्थकों पर लाठी चल रही है।

दिल्ली की चुप्पी का एक और पहलू है जो कोई नहीं कह रहा — लद्दाख में कोई चुनावी वैल्यू नहीं है। एक लोकसभा सीट। कोई विधानसभा नहीं। कोई वोट बैंक नहीं जो किसी पार्टी को डरा सके। यही कारण है कि लद्दाख की चीख़ उन गलियारों में गूँजती नहीं जहाँ फ़ैसले होते हैं। मणिपुर में हिंसा हो या लद्दाख में अनशन — बिना चुनावी दबाव वाले क्षेत्रों की नियति दिल्ली के कैलेंडर पर 'बाद में' लिखी रहती है।

आगे क्या? — वॉच लिस्ट

अगर वांगचुक की तबीयत और बिगड़ती है, तो यह मुद्दा राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल बन सकता है — ठीक वैसे जैसे अन्ना हज़ारे और इरोम शर्मिला के अनशन ने एक बिंदु पर सरकारों को बातचीत की मेज़ पर आने को मजबूर किया। विपक्ष के लिए यह तैयार 'नैरेटिव बम' है — एक शांतिपूर्ण, गांधीवादी कार्यकर्ता जो राष्ट्रीय हीरो है, भूखा मर रहा है और सरकार देख रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट में कोई जनहित याचिका दायर होती है — जिसकी संभावना बढ़ रही है — तो सरकार को जवाब देना होगा कि लद्दाख को UT बनाने का वादा पूरा क्यों नहीं हुआ।

देखने वाली बात यह होगी कि क्या CJP का यह दख़ल इस आंदोलन को व्यापक नागरिक अधिकार आंदोलन में बदल देता है, या फिर दिल्ली की पुरानी रणनीति — 'थका दो, भुला दो' — एक बार फिर कामयाब होती है।

लद्दाख 21,000 फ़ीट की ऊँचाई पर बसा है। लेकिन दिल्ली के सत्ता गलियारों में उसकी आवाज़ ज़मीन से भी नीचे दबी है। सवाल यह नहीं कि वांगचुक कब तक भूखे रहेंगे — सवाल यह है कि जिस लोकतंत्र के नाम पर 370 हटाया गया, वह लोकतंत्र लद्दाख को कब मिलेगा?

आँकड़ों में

  • वांगचुक की भूख हड़ताल का 5वाँ दिन — ब्लड प्रेशर ख़तरनाक स्तर तक गिरा (द प्रिंट)
  • लद्दाख: 59,146 वर्ग किमी क्षेत्रफल, 2.7 लाख आबादी — भारत का सबसे बड़ा UT बिना विधानसभा
  • लद्दाख की लोकसभा सीटें: सिर्फ़ 1 — किसी भी पार्टी के लिए शून्य चुनावी दबाव

मुख्य बातें

  • सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल पाँचवें दिन ख़तरनाक मोड़ पर — ब्लड प्रेशर गिरा, शरीर कमज़ोर — द प्रिंट और तेलंगाना टुडे के अनुसार
  • CJP के मुज़हीर अब्बास दीपके ने दिल्ली पुलिस पर शारीरिक हमले और प्रदर्शन रोकने का आरोप लगाया — तीस्ता सेतलवाड़ ने इसे 'लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घोंटना' बताया
  • लद्दाख भारत का सबसे बड़ा UT (59,146 वर्ग किमी) लेकिन 2.7 लाख आबादी के पास न विधानसभा, न छठी अनुसूची की सुरक्षा — एकमात्र लोकसभा सीट का मतलब शून्य चुनावी दबाव
  • दिल्ली का कैलकुलेशन: LAC पर चीन सीमा पर केंद्रीय नियंत्रण बनाए रखना — लेकिन सुरक्षा के नाम पर नागरिक अधिकार कब तक स्थगित?
  • विपक्ष और CJP जैसे संगठनों का प्रवेश इसे 'किसान आंदोलन 2.0' की शक्ल दे सकता है — 2027 चुनावों तक यह नैरेटिव बम बन सकता है

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल क्यों हो रही है?

वांगचुक लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने, पूर्ण राज्य का दर्जा देने और स्थानीय शासन की माँग को लेकर अनशन पर हैं। 2019 में UT बनने के बाद से लद्दाख के पास न विधानसभा है, न ज़मीन-नौकरी पर संवैधानिक सुरक्षा।

CJP के दीपके पर पुलिस हमले का आरोप क्या है?

CJP के राष्ट्रीय सचिव मुज़हीर अब्बास दीपके ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस ने उन्हें धक्का देकर गिराया और प्रदर्शन स्थल तक पहुँच रोकी। CJP अध्यक्ष तीस्ता सेतलवाड़ ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन बताया — तेलंगाना टुडे के अनुसार।

लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने का मतलब क्या है?

छठी अनुसूची जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त ज़िला परिषदें देती है जो ज़मीन, जंगल और स्थानीय रोज़गार पर क़ानून बना सकती हैं। लद्दाख को इसमें शामिल करने से स्थानीय लोगों की ज़मीन और सांस्कृतिक अधिकार संवैधानिक रूप से सुरक्षित होंगे।

मोदी सरकार लद्दाख की माँगें क्यों नहीं मान रही?

विश्लेषकों का मानना है कि चीन सीमा (LAC) पर सैन्य तैनाती में केंद्रीय नियंत्रण बनाए रखने की रणनीतिक ज़रूरत और लद्दाख की न्यूनतम चुनावी वैल्यू (सिर्फ़ 1 लोकसभा सीट) — ये दो कारण सरकार को बातचीत से दूर रख रहे हैं।

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