मुंबई में मॉनसून के दौरान खुले मैनहोल में गिरकर फिर एक व्यक्ति की मौत हो गई। कांग्रेस और मिलिंद देवड़ा ने इसे 'मर्डर' बताते हुए BMC को कटघरे में खड़ा किया, लेकिन असली त्रासदी यह है कि ₹50,000 करोड़ सालाना बजट वाली इस नगरपालिका ने दशकों से यह समस्या हल नहीं की — और जान हमेशा प्रवासी मज़दूर की जाती है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: मुंबई में एक व्यक्ति जो खुले मैनहोल में गिरकर मारा गया; कांग्रेस नेताओं और मिलिंद देवड़ा ने BMC पर हमला बोला — News18 के अनुसार
  • क्या: मॉनसून में खुले मैनहोल में गिरने से मौत; कांग्रेस ने इसे 'मर्डर' कहा और BMC की जवाबदेही माँगी — News18 के अनुसार
  • कब: जून-जुलाई 2026, मॉनसून सीज़न के दौरान — News18 रिपोर्ट
  • कहाँ: मुंबई, महाराष्ट्र — BMC के अधिकार क्षेत्र में — News18 के अनुसार
  • क्यों: खुले या टूटे मैनहोल कवर, बारिश में सड़कों पर भरा पानी जिससे मैनहोल दिखते नहीं, और BMC की दशकों पुरानी उपेक्षा — News18 रिपोर्ट के अनुसार
  • कैसे: भारी बारिश में सड़कों पर जलभराव होता है, खुले मैनहोल पानी में छिप जाते हैं, राहगीर — अक्सर पैदल चलने वाले प्रवासी मज़दूर — गिर जाते हैं; BMC की ऑडिट और मरम्मत प्रणाली विफल रहती है — News18 के अनुसार

एक शहर। सालाना बजट ₹50,000 करोड़ से ज़्यादा — भारत की सबसे अमीर नगरपालिका। और हर मॉनसून में उसकी सड़कों पर एक-एक करके लोग ग़ायब होते जाते हैं — ज़मीन के नीचे, खुले मैनहोल में। इस बार फिर मुंबई ने एक और ज़िंदगी निगल ली। News18 की रिपोर्ट के अनुसार, मॉनसून की बारिश के बीच एक व्यक्ति खुले मैनहोल में गिरकर मारा गया, और कांग्रेस ने इसे साफ़ शब्दों में 'मर्डर' करार दिया।

मिलिंद देवड़ा ने BMC पर सीधा निशाना साधा। कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाया कि जब बजट इतना बड़ा है तो मैनहोल पर ढक्कन क्यों नहीं? News18 के अनुसार, देवड़ा ने कहा कि यह कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि सीधा 'मर्डर' है — सिस्टम द्वारा किया गया, फ़ाइलों में दबाया गया, बारिश रुकते ही भुला दिया गया।

लेकिन यहाँ वह बात जो कोई ज़ोर से नहीं कहता: यह सिर्फ़ BMC की नाकामी नहीं है — यह एक राजनीतिक अपराध है जिसमें हर पार्टी सहअपराधी है।

₹50,000 करोड़ का बजट — ढक्कन कहाँ गया?

BMC का सालाना बजट ₹50,000 करोड़ से ऊपर है — यह रक़म कई राज्यों के पूरे बजट से ज़्यादा है। मुंबई की सड़कों पर अनुमानतः लाखों मैनहोल और ड्रेनेज पॉइंट हैं। एक कास्ट-आयरन मैनहोल कवर की क़ीमत ₹2,000 से ₹5,000 के बीच होती है। अगर शहर के हर मैनहोल पर नया ढक्कन भी लगाना हो, तो कुल ख़र्च बजट के एक प्रतिशत का भी अंश होगा। फिर पैसा जाता कहाँ है? हर साल इन्फ़्रास्ट्रक्चर के नाम पर हज़ारों करोड़ आवंटित होते हैं, कॉन्ट्रैक्ट बँटते हैं, टेंडर निकलते हैं — लेकिन बारिश का पहला झोंका आते ही सड़कें तालाब बन जाती हैं और मैनहोल मौत के कुएँ।

यह पैसे की कमी नहीं है — यह प्राथमिकता का सवाल है। BMC का बजट फ़्लाइओवर, कोस्टल रोड, और बड़े 'विज़िबल' प्रोजेक्ट्स पर ख़र्च होता है जिनका उद्घाटन होता है, रिबन कटती है, फ़ोटो खिंचती है। मैनहोल कवर बदलने का कोई उद्घाटन नहीं होता — इसलिए कोई नेता इसमें दिलचस्पी नहीं लेता।

कांग्रेस-BJP: दोनों के हाथ ख़ून से रंगे

कांग्रेस का ग़ुस्सा समझ में आता है, लेकिन इतिहास उनकी तरफ़ नहीं है। BMC पर दशकों तक कांग्रेस का राज रहा। शिवसेना ने लंबे समय तक कब्ज़ा रखा। BJP ने सत्ता में आकर वही ढर्रा जारी रखा। 2017 के बाद से BJP-शिवसेना गठबंधन और फिर बदलते समीकरणों में BMC की कमान बदलती रही, लेकिन मैनहोल का ढक्कन कभी किसी के एजेंडे पर नहीं आया।

News18 के अनुसार, कांग्रेस नेताओं ने वर्तमान प्रशासन को निशाने पर लिया, लेकिन यह सवाल बेमानी नहीं है: जब कांग्रेस ख़ुद BMC चला रही थी, तब मैनहोल से मौतें नहीं होती थीं क्या? मुंबई हाई कोर्ट ने अतीत में कई बार BMC को फटकार लगाई है, लेकिन हर बार फटकार के बाद कुछ हफ़्ते की हलचल होती है, फिर सन्नाटा।

प्रवासी मज़दूर — सबसे सस्ती जान

इस त्रासदी का सबसे क्रूर पहलू यह है कि मैनहोल में गिरने वाले अक्सर कौन होते हैं — वे प्रवासी मज़दूर जो UP, बिहार, झारखंड, ओडिशा से मुंबई की गलियों में रोज़ी कमाने आते हैं। उनके पास न गाड़ी है, न ऑटो का पैसा — वे पैदल चलते हैं, बारिश में भीगते हुए, पानी से भरी सड़कों पर, जहाँ नीचे कोई खुला मैनहोल उनका इंतज़ार कर रहा होता है।

जब किसी प्रवासी मज़दूर की मौत होती है, तो न कोई बड़ा विरोध होता है, न मीडिया ट्रायल, न राजनीतिक दबाव। परिवार को मुआवज़े के नाम पर कुछ लाख मिलते हैं — अगर मिलते हैं — और शहर अगले दिन भूल जाता है। यही वह 'सिस्टमिक' ढाँचा है जिसमें कुछ ज़िंदगियाँ दूसरों से कम क़ीमती मानी जाती हैं। मुंबई जिन हाथों से बनती है, उन्हीं हाथों के मालिकों को वह सबसे पहले निगलती है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि मैनहोल मौतों का मुद्दा इसलिए कभी गंभीरता से नहीं उठता क्योंकि इसमें कोई वोट बैंक नहीं दिखता। प्रवासी मज़दूर मुंबई में वोट नहीं डालते — उनका वोटर कार्ड UP-बिहार का है। मतलब, मुंबई का कोई कॉर्पोरेटर उनकी मौत पर राजनीतिक क़ीमत नहीं चुकाता। ट्रेड सर्किल में चर्चा है कि BMC के इन्फ़्रास्ट्रक्चर कॉन्ट्रैक्ट्स में 'मेंटेनेंस' का हिस्सा अक्सर काग़ज़ों पर ख़र्च हो जाता है — ज़मीन पर काम होता कम है, बिल पास होते ज़्यादा हैं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यह है कि इस बार का आक्रोश पिछली बार से ज़्यादा तीखा है — मिलिंद देवड़ा जैसे नेता जो आमतौर पर मापी हुई भाषा बोलते हैं, उनका 'मर्डर' शब्द इस्तेमाल करना बताता है कि कांग्रेस इसे 2027 के BMC चुनावों के लिए एक नैरेटिव के रूप में तैयार कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह ग़ुस्सा अक्टूबर तक टिकेगा, या बारिश रुकते ही यह भी ड्रेन में बह जाएगा।

क्या सुप्रीम कोर्ट को दख़ल देना होगा?

अतीत में मुंबई हाई कोर्ट ने BMC को बार-बार निर्देश दिए हैं — मैनहोल कवर लगाओ, ऑडिट करो, ज़िम्मेदारी तय करो। लेकिन हर बार आदेश काग़ज़ पर रह जाता है। अब सवाल यह उठता है: क्या इसे एक संवैधानिक मुद्दे के रूप में — जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के तहत — सुप्रीम कोर्ट के सामने ले जाना ज़रूरी है? जब कोई नगरपालिका बार-बार नागरिकों की जान बचाने में विफल रहती है, तो क्या यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं?

जनहित याचिका (PIL) का रास्ता खुला है। अगर कोई संगठन या व्यक्ति इसे सुप्रीम कोर्ट तक ले जाता है और कोर्ट BMC को टाइम-बाउंड निर्देश देता है — हर मैनहोल का GPS-टैग्ड ऑडिट, हर कवर की RFID ट्रैकिंग, ज़िम्मेदार अधिकारी पर FIR — तो शायद बदलाव आए। बिना न्यायिक हस्तक्षेप के, यह सालाना रस्म बनी रहेगी: बारिश, मौत, ग़ुस्सा, भूल।

आगे क्या — देखने लायक़ तीन बातें

पहला: क्या कांग्रेस या कोई अन्य पार्टी इस मुद्दे पर PIL दायर करती है — अगर नहीं, तो 'मर्डर' का आरोप सिर्फ़ ट्वीट तक सीमित रहेगा। दूसरा: BMC प्रशासक (फ़िलहाल चुना हुआ निकाय नहीं है) कोई ठोस क़दम उठाते हैं या सिर्फ़ 'जाँच के आदेश' देकर मामला ठंडा करते हैं। तीसरा: अगले कुछ हफ़्तों में और मौतें होती हैं या नहीं — क्योंकि मॉनसून अभी शुरू हुआ है, और मुंबई की सड़कों पर अभी लाखों खुले मैनहोल बाक़ी हैं।

मुंबई दुनिया के सबसे महंगे शहरों में गिना जाता है। यहाँ एक फ़्लैट करोड़ों में बिकता है। लेकिन एक मैनहोल का ढक्कन — जो कुछ हज़ार रुपये का है — वह नहीं लग पाता। यह बजट की समस्या नहीं है। यह नीयत की समस्या है। और जब तक नीयत नहीं बदलती, मुंबई की सड़कें हर जुलाई में क़ब्रिस्तान बनती रहेंगी — और मरने वाला हमेशा वह होगा जिसकी मौत का कोई राजनीतिक हिसाब नहीं माँगता।

आँकड़ों में

  • BMC का सालाना बजट ₹50,000 करोड़ से अधिक — भारत की सबसे अमीर नगरपालिका
  • एक कास्ट-आयरन मैनहोल कवर की क़ीमत लगभग ₹2,000-₹5,000 — पूरे शहर के कवर बदलने का ख़र्च बजट के एक प्रतिशत के अंश से भी कम
  • प्रवासी मज़दूर मुंबई में वोटर नहीं — उनकी मौत का कोई चुनावी हिसाब नहीं माँगा जाता

मुख्य बातें

  • BMC का सालाना बजट ₹50,000 करोड़ से अधिक है, लेकिन मैनहोल कवर जैसी बुनियादी सुरक्षा पर ख़र्च नगण्य है — News18 रिपोर्ट के अनुसार फिर एक मैनहोल मौत हुई
  • कांग्रेस और मिलिंद देवड़ा ने इसे 'मर्डर' कहा, लेकिन कांग्रेस-BJP-शिवसेना सबने बारी-बारी BMC चलाई है — कोई भी इस समस्या से मुक्त नहीं
  • मैनहोल में गिरने वाले अक्सर प्रवासी मज़दूर होते हैं जो पैदल चलते हैं — उनका वोटर कार्ड मुंबई का नहीं होता, इसलिए उनकी मौत पर कोई राजनीतिक क़ीमत नहीं चुकाता
  • अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर कर BMC को टाइम-बाउंड ऑडिट और FIR का निर्देश दिलवाना एकमात्र ठोस रास्ता दिखता है
  • 2027 के संभावित BMC चुनावों से पहले कांग्रेस इस मुद्दे को नैरेटिव बना सकती है — लेकिन बारिश रुकने के बाद भी इसे ज़िंदा रखना असली चुनौती होगी

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मुंबई में मैनहोल से हर साल मौतें क्यों होती हैं?

मॉनसून में भारी बारिश से सड़कों पर जलभराव होता है जिससे खुले या टूटे मैनहोल दिखाई नहीं देते। BMC की मरम्मत और ऑडिट व्यवस्था दशकों से विफल है — News18 के अनुसार, ताज़ा मौत पर कांग्रेस ने इसे 'सिस्टमिक मर्डर' बताया।

BMC का बजट कितना है और मैनहोल पर कितना ख़र्च होता है?

BMC का सालाना बजट ₹50,000 करोड़ से अधिक है — भारत की सबसे अमीर नगरपालिका। लेकिन मैनहोल कवर जैसी बुनियादी सुरक्षा पर आवंटन नगण्य है, जबकि एक कवर की क़ीमत मात्र ₹2,000-₹5,000 है।

क्या मैनहोल मौतों के लिए कोर्ट में केस हो सकता है?

हाँ — अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की जा सकती है। अतीत में मुंबई हाई कोर्ट ने BMC को फटकार लगाई है, लेकिन टाइम-बाउंड और FIR-आधारित निर्देश अभी तक नहीं मिले हैं।

मुंबई मैनहोल में गिरने वाले ज़्यादातर लोग कौन होते हैं?

अक्सर प्रवासी मज़दूर जो UP, बिहार, झारखंड, ओडिशा से आते हैं। वे पैदल चलते हैं, उनके पास वाहन नहीं होता, और बारिश में भरी सड़कों पर खुले मैनहोल का शिकार हो जाते हैं।

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