ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार खुफिया एजेंसियों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI द्वारा संचालित एक सक्रिय तटीय तस्करी नेटवर्क की पहचान की है, जिसके ज़रिए हथियार और विस्फोटक भारत की समुद्री सीमाओं से अंदर लाए जा रहे हैं — यह 26/11 जैसे हमले की भयावह आहट है।

7,516 किलोमीटर। इतनी लंबी है भारत की समुद्री तटरेखा — और ISI के तस्करी नेटवर्क को इसमें सिर्फ़ एक अँधेरी रात और एक बिना रडार वाली मछली पकड़ने की नाव चाहिए। ज़ी न्यूज़ की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय खुफिया एजेंसियों ने पाकिस्तानी ISI द्वारा संचालित एक सक्रिय तटीय तस्करी नेटवर्क की शिनाख़्त की है जो हथियार, विस्फोटक और संदिग्ध ऑपरेटिव सीधे भारत की 'सॉफ्ट कोस्टल बेली' से अंदर भेज रहा है। यह कोई नई कहानी नहीं — लेकिन जो बात इसे 2026 में ख़ौफ़नाक बनाती है, वह है पहलगाम हमले के बाद NIA की चार्जशीट में सामने आए सबूत और तटीय सुरक्षा में वही पुरानी दरारें।

सवाल सीधा है: क्या भारत ने 26/11 के बाद अपनी समुद्री सुरक्षा वाक़ई दुरुस्त की, या सिर्फ़ काग़ज़ी किलेबंदी हुई?

ISI का 'कोस्टल प्लेबुक' — पुरानी चाल, नया अवतार

मुंबई हमलों में अजमल कसाब और उसके साथी समुद्र से आए थे — कराची से एक मछली पकड़ने वाली नाव में। अठारह साल बाद खुफिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ISI ने उसी प्लेबुक को और पॉलिश किया है। रिपोर्ट के अनुसार गुजरात के कच्छ तट, महाराष्ट्र का कोंकण इलाक़ा और केरल के कुछ तटीय हिस्से प्रमुख 'एंट्री पॉइंट्स' के रूप में चिह्नित किए गए हैं। तस्करी का तरीक़ा वही क्लासिक है — छोटी मछुआरा नावें जिनकी AIS (ऑटोमैटिक आइडेंटिफ़िकेशन सिस्टम) ट्रांसपॉन्डर या तो बंद रहती हैं या हैं ही नहीं।

ये नावें अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा (IMBL) के पास 'मदर शिप' से माल लेती हैं और रात के अँधेरे में भारतीय तट पर उतार देती हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का अनुमान है कि स्थानीय तटीय गाँवों में ISI के 'ग्राउंड कॉन्टैक्ट्स' — जो अक्सर ड्रग या सोने की तस्करी के पुराने नेटवर्क के ही लोग हैं — इस माल को ज़मीनी रास्ते से अंदरूनी शहरों तक पहुँचाते हैं।

तटीय सुरक्षा — काग़ज़ पर मज़बूत, ज़मीन पर?

26/11 के बाद भारत ने कोस्टल सिक्योरिटी स्कीम (CSS) के तहत 204 तटीय पुलिस थाने, 97 जेट्टी और सैकड़ों इंटरसेप्टर बोट्स की स्वीकृति दी थी। लेकिन CAG की रिपोर्ट्स बार-बार बताती रही हैं कि इनमें से कई थाने या तो स्टाफ़ की कमी झेल रहे हैं या उनकी बोट्स रखरखाव के अभाव में बेकार पड़ी हैं। गुजरात में 1,600 किलोमीटर तटरेखा की निगरानी के लिए पर्याप्त रात्रि-गश्ती का बंदोबस्त आज भी सवालों में है।

इंडियन कोस्ट गार्ड और नौसेना के बीच 'सी विजिल' जैसे अभ्यास ज़रूर होते हैं, लेकिन सुरक्षा विश्लेषकों के मुताबिक असली कमज़ोरी 'लास्ट माइल' में है — वह आख़िरी 10-15 किलोमीटर का तटीय पानी जहाँ छोटी नावों की आवाजाही को ट्रैक करना लगभग असंभव है। मछुआरों की लाखों बिना रजिस्टर्ड नावें इस समस्या को और विकराल बनाती हैं।

पॉलिटिकल पल्स — गलियारों में फुसफुसाहट

सियासी गलियारों में चर्चा है कि NIA की हालिया चार्जशीट्स में जो तटीय तस्करी लिंक सामने आए हैं, उन्होंने गृह मंत्रालय को भीतर से हिलाया है। सुरक्षा तंत्र से जुड़े सूत्रों के हवाले से बात यह चल रही है कि पहलगाम हमले के बाद जो सर्विलांस ऑपरेशन तेज़ हुए, उनमें कम-से-कम तीन अलग-अलग तटीय 'रिसीविंग पॉइंट्स' की पहचान हुई है — दो गुजरात में, एक महाराष्ट्र में। ट्रेड हलकों में अटकलें ज़ोरों पर हैं कि ये नेटवर्क सिर्फ़ हथियारों तक सीमित नहीं, बल्कि काउंटरफ़ीट करेंसी और ड्रग्स का भी यही रास्ता है।

(यह खुफिया हलकों और सुरक्षा विश्लेषकों की चर्चा पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

विपक्ष ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई बड़ा बयान नहीं दिया है, लेकिन सत्ता पक्ष के भीतर भी सवाल उठ रहे हैं कि अगर 26/11 के बाद करोड़ों ख़र्च हुए तो ये रास्ते अब भी खुले कैसे हैं। पाकिस्तान की ओर से इन रिपोर्ट्स पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

26/11 की छाया — स्लीपर सेल या लॉजिस्टिक्स नेटवर्क?

यहीं पर इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड सबसे ज़रूरी हो जाता है। हथियारों की तस्करी अपने आप में ख़तरनाक है, लेकिन असली सवाल यह है: क्या ये हथियार किसी 'स्लीपर सेल' को सक्रिय करने के लिए भेजे जा रहे हैं, या यह ISI का एक लंबे समय तक चलने वाला 'लॉजिस्टिक्स इन्फ़्रास्ट्रक्चर' है जो ज़रूरत पड़ने पर किसी भी बड़े ऑपरेशन को सपोर्ट कर सके? NIA की चार्जशीट्स और सर्विलांस रिपोर्ट्स दोनों तस्वीरें दिखाती हैं।

26/11 में समुद्री रास्ते से आए दस आतंकियों ने मुंबई को तबाह किया था — उस ऑपरेशन में भी ISI ने पहले लॉजिस्टिक्स बनाई, फिर अटैकर्स भेजे। आज अगर हथियार पहुँच रहे हैं तो अगला चरण ऑपरेटिव्स का आना हो सकता है — यह कोई हवाई बात नहीं, यह 26/11 का प्रूवन पैटर्न है।

आगे क्या — भारत के पास विकल्प क्या हैं?

आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ कई बातें हैं। पहली — गृह मंत्रालय तटीय सुरक्षा स्कीम के तीसरे चरण पर कितनी तेज़ी दिखाता है। दूसरी — क्या नौसेना और कोस्ट गार्ड को AI-आधारित सर्विलांस और ड्रोन पैट्रोलिंग के लिए अतिरिक्त बजट मिलता है, जिसकी माँग लंबे समय से हो रही है। तीसरी बात राजनीतिक है — पहलगाम के बाद से 'पाकिस्तान से ख़तरा' का नैरेटिव सत्ता पक्ष के लिए चुनावी ईंधन रहा है, लेकिन अगर तटीय सुरक्षा में चूक साबित होती है तो यही नैरेटिव बूमरैंग बन सकता है।

मछुआरों को बायोमेट्रिक ID कार्ड देने और हर नाव में ट्रांसपॉन्डर लगाने की योजना अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हुई है — सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक जब तक यह नहीं होता, 'लास्ट माइल' का अँधेरा बना रहेगा।

7,516 किलोमीटर तटरेखा को सील करना असंभव है — लेकिन उसे अंधा छोड़ना आत्मघाती। सवाल यह नहीं कि ISI कोशिश करेगा या नहीं — वह तो करता ही रहेगा। सवाल यह है कि भारत की अगली रात की गश्ती में वह नाव पकड़ी जाएगी, या नहीं।

आरोप यहाँ रिपोर्ट किए गए हैं और नामित स्रोतों के हवाले से हैं; जब तक अदालत न कहे, ये अप्रमाणित हैं। विचाराधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • ज़ी न्यूज़ रिपोर्ट के अनुसार ISI का तटीय तस्करी नेटवर्क सक्रिय है — मछुआरा नावों के ज़रिए हथियार और विस्फोटक भारत में भेजे जा रहे हैं।
  • 26/11 के बाद बनी तटीय सुरक्षा व्यवस्था में 'लास्ट माइल' सबसे कमज़ोर कड़ी — लाखों बिना रजिस्टर्ड नावें समस्या बढ़ाती हैं।
  • NIA की चार्जशीट्स में तटीय लिंक सामने आए — यह सिर्फ़ हथियार नहीं, ISI का पूरा लॉजिस्टिक्स इन्फ़्रास्ट्रक्चर हो सकता है।
  • 26/11 का पैटर्न — पहले लॉजिस्टिक्स, फिर ऑपरेटिव्स — दोहराया जा सकता है अगर समय रहते कार्रवाई न हो।
  • सरकार के लिए यह दोधारी तलवार — पाक ख़तरे का नैरेटिव चुनावी ताक़त है, लेकिन तटीय चूक साबित हो तो बूमरैंग।

आँकड़ों में

  • भारत की समुद्री तटरेखा 7,516 किलोमीटर लंबी है — इसमें से बड़ा हिस्सा रात में बिना निगरानी रहता है (सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुमान)।
  • 26/11 के बाद कोस्टल सिक्योरिटी स्कीम में 204 तटीय पुलिस थाने और 97 जेट्टी स्वीकृत हुईं — CAG रिपोर्ट्स ने बार-बार स्टाफ़ और रखरखाव की कमी उजागर की।
  • NIA की हालिया चार्जशीट्स में कम-से-कम तीन तटीय रिसीविंग पॉइंट्स की पहचान — दो गुजरात, एक महाराष्ट्र (खुफिया सूत्रों के हवाले से)।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और उससे जुड़े तस्करी नेटवर्क, जिनकी पहचान भारतीय खुफिया एजेंसियों ने की है (ज़ी न्यूज़ रिपोर्ट)।
  • क्या: समुद्री रास्ते से हथियारों, विस्फोटकों और संदिग्ध आतंकी मॉड्यूल की तस्करी भारत के तटीय क्षेत्रों में हो रही है।
  • कब: 2026 में खुफिया रिपोर्ट्स सामने आईं; पहलगाम आतंकी हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी तेज़ हुई।
  • कहाँ: भारत की पश्चिमी तटरेखा — गुजरात, महाराष्ट्र और कोंकण के संवेदनशील तटीय इलाक़े प्रमुख एंट्री पॉइंट्स।
  • क्यों: ISI का मक़सद भारत में स्लीपर सेल्स को सक्रिय करना, हथियार पहुँचाना और आतंकी ढाँचा मज़बूत करना — ठीक वैसे ही जैसे 26/11 से पहले समुद्री रास्ते का इस्तेमाल हुआ था।
  • कैसे: मछली पकड़ने वाली नावों और छोटी बोट्स की आड़ में तस्करी, तटीय गाँवों में स्थानीय संपर्कों के ज़रिए माल उतारना, और फिर ज़मीनी नेटवर्क से अंदरूनी इलाक़ों तक पहुँचाना।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ISI का तटीय तस्करी नेटवर्क कैसे काम करता है?

खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार छोटी मछुआरा नावें अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा के पास 'मदर शिप' से हथियार और विस्फोटक लेती हैं, ट्रांसपॉन्डर बंद रखकर रात में भारतीय तट पर उतारती हैं, और स्थानीय ग्राउंड कॉन्टैक्ट्स ज़मीनी रास्ते से माल अंदरूनी शहरों तक पहुँचाते हैं।

26/11 के बाद भारत की तटीय सुरक्षा कितनी मज़बूत हुई?

कोस्टल सिक्योरिटी स्कीम के तहत 204 तटीय पुलिस थाने और इंटरसेप्टर बोट्स तैनात हुईं, लेकिन CAG रिपोर्ट्स के अनुसार स्टाफ़ की कमी और रखरखाव के अभाव में कई बोट्स बेकार पड़ी हैं। 'लास्ट माइल' — तट के आख़िरी 10-15 किलोमीटर — सबसे कमज़ोर कड़ी बनी हुई है।

क्या यह 26/11 जैसे हमले की तैयारी हो सकती है?

सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक 26/11 में भी ISI ने पहले लॉजिस्टिक्स इन्फ़्रास्ट्रक्चर बनाया, फिर आतंकी भेजे। अगर हथियार पहुँच रहे हैं तो यह उसी पैटर्न का संकेत हो सकता है — हालाँकि यह अभी खुफिया आकलन है, पुष्ट ऑपरेशन नहीं।

भारत सरकार इस ख़तरे से निपटने के लिए क्या कर सकती है?

मछुआरों की बायोमेट्रिक ID, हर नाव में ट्रांसपॉन्डर, AI-आधारित सर्विलांस और ड्रोन पैट्रोलिंग जैसे क़दम लंबे समय से प्रस्तावित हैं लेकिन पूरी तरह लागू नहीं हुए। तटीय सुरक्षा स्कीम के तीसरे चरण की रफ़्तार अहम होगी।

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