पुष्कर सिंह धामी 2022 में अपनी सीट हारने के बावजूद उत्तराखंड के सबसे लंबे कार्यकाल वाले BJP मुख्यमंत्री बन गए। दैनिक भास्कर और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, UCC लागू करने, सख्त धर्मांतरण कानून और हाईकमान की पूर्ण आज्ञाकारिता — यही उनके सर्वाइवल का त्रिकोण है।
उत्तराखंड की राजनीति में एक मज़ाक चलता रहा है — 'यहाँ CM की कुर्सी पर बैठते ही गिनती शुरू हो जाती है कि अगला कब आएगा।' 2000 में राज्य बनने के बाद से नारायण दत्त तिवारी, भगत सिंह कोश्यारी, बीसी खंडूरी, रमेश पोखरियाल, विजय बहुगुणा, हरीश रावत, त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत — एक लंबी कतार है जो बताती है कि यहाँ कोई CM अपना पूरा कार्यकाल शांति से नहीं बैठ पाया। फिर आए पुष्कर सिंह धामी — और इस 'श्राप' को तोड़ दिया।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, धामी ने ऋषिकेश में अपने पाँच साल पूरे होने पर सुशासन की उपलब्धियाँ गिनाईं और 2035 तक 'विकसित उत्तराखंड' का संकल्प दोहराया। लेकिन उपलब्धियों की लिस्ट से कहीं ज़्यादा दिलचस्प कहानी वह है जो प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं कही गई — एक ऐसा नेता जो 2022 में अपनी सीट हार गया, फिर भी न सिर्फ़ CM बना रहा, बल्कि पाँच साल पूरे करने वाला पहला BJP मुख्यमंत्री बन गया। यह कहानी सिर्फ़ सुशासन की नहीं, सर्वाइवल के गणित की है।
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हारा हुआ CM — दिल्ली ने हाथ क्यों नहीं खींचा?
2022 का विधानसभा चुनाव याद कीजिए। BJP ने उत्तराखंड में 47 सीटें जीतकर सरकार बना ली, लेकिन ख़ुद CM धामी खटीमा सीट से हार गए। राजनीतिक इतिहास में यह शर्मिंदगी का क्षण था — अपनी सीट हारने वाले CM को आमतौर पर बदल दिया जाता है। कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा से लेकर मध्य प्रदेश में कमलनाथ तक, यह अलिखित नियम रहा है। लेकिन दिल्ली ने धामी को बदला नहीं। क्यों?
इसका जवाब दो शब्दों में है — 'कोई विकल्प नहीं।' उत्तराखंड BJP में धामी से पहले जितने भी CM आए, सबने अपनी अलग 'पॉवर सेंटर' बनाने की कोशिश की। त्रिवेंद्र रावत ने RSS से अपने रिश्तों का हवाला दिया, तीरथ सिंह रावत को लगा कि संघ का बैकिंग काफ़ी है। दोनों को बदल दिया गया। धामी ने शुरू से एक अलग रास्ता चुना — पूर्ण समर्पण। कोई अलग गुट नहीं, कोई समानांतर शक्ति केंद्र नहीं, हाईकमान जो कहे वह तुरंत लागू।
UCC — वह हथियार जिसने खेल पलट दिया
अगर धामी के पूरे कार्यकाल में एक चीज़ उनके सर्वाइवल को सबसे ज़्यादा मज़बूत करती है, तो वह है यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (UCC)। उत्तराखंड ने पूरे देश में सबसे पहले UCC लागू किया — BJP का दशकों पुराना वादा जिसे कोई राज्य ज़मीन पर उतारने की हिम्मत नहीं कर रहा था। धामी ने किया। यह सिर्फ़ कानून नहीं था, यह दिल्ली को एक संदेश था — 'मैं वह काम कर सकता हूँ जो आपके बड़े-बड़े CM नहीं करते।'
इसके साथ सख्त धर्मांतरण विरोधी कानून भी आया। रिपोर्टों के अनुसार धामी ने 'लव जिहाद' के ख़िलाफ़ सख्त रुख अपनाया और इसे विधानसभा से पास कराया। वैचारिक एजेंडे की यह डिलीवरी — जो BJP के राष्ट्रीय नैरेटिव का सबसे शक्तिशाली हिस्सा है — धामी को 'बदलने लायक' CM से 'बदलना मुश्किल' CM बना देती है। आख़िर जो आदमी आपका सबसे मुश्किल एजेंडा ज़मीन पर लागू कर रहा हो, उसे क्यों बदलें?
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि धामी का असली मास्टरस्ट्रोक सिर्फ़ कानून बनाना नहीं, बल्कि 'समय' को समझना था। जब 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP को कई राज्यों में सीटें गँवानी पड़ीं, उत्तराखंड की सभी पाँच सीटें BJP ने जीतीं। इसका श्रेय सीधे संगठन और CM को जाता है। पार्टी हलकों में कहा जाता है कि धामी ने वह काम किया जो कोई 'जूनियर' CM शायद ही करे — अपने ऊपर के नेताओं से कभी नहीं टकराए, न कभी अपनी 'कद्र' बढ़ाने की कोशिश की। यही 'जूनियरपन' उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
2035 का विज़न — लेकिन 2027 की असली परीक्षा
धामी ने 2035 तक विकसित उत्तराखंड का लक्ष्य रखा है। लेकिन इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह कहता है कि असली इम्तिहान 2027 का विधानसभा चुनाव है। पहाड़ी राज्यों में एंटी-इनकम्बेंसी का इतिहास भयानक है — उत्तराखंड में 2002 से लेकर 2017 तक हर बार सत्ता बदली। 2022 में पहली बार यह पैटर्न टूटा जब BJP लगातार दूसरी बार जीती। क्या धामी इसे तीसरी बार तोड़ सकते हैं?
पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। पहाड़ के गाँव ख़ाली हो रहे हैं, नौजवान मैदानी शहरों की ओर भाग रहे हैं। चार धाम यात्रा से पर्यटन को बढ़ावा ज़रूर मिला है, लेकिन स्थानीय रोज़गार अभी भी बड़ा सवाल है। अगर धामी 2027 तक पहाड़ के पलायन पर कोई ठोस जवाब नहीं दे पाते, तो UCC और हिंदुत्व का कार्ड अकेला काफ़ी नहीं होगा।
धामी मॉडल — BJP के लिए ब्लूप्रिंट या अपवाद?
धामी की कहानी सिर्फ़ उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। यह BJP के भीतर एक नया पैटर्न बना रही है — 'जूनियर, आज्ञाकारी, वैचारिक रूप से डिलीवर करने वाला' CM ही सबसे ज़्यादा टिकता है। योगी आदित्यनाथ की तरह अपनी स्वतंत्र छवि बनाना ज़रूरी नहीं — बस हाईकमान का एजेंडा ईमानदारी से लागू करो। यह मॉडल आगे हिमाचल, गोवा, या अन्य छोटे राज्यों में भी दिख सकता है।
लेकिन इस मॉडल में एक बुनियादी कमज़ोरी है — ज़मीनी जनाधार। धामी 2022 में अपनी सीट हारे थे, यह तथ्य मिटता नहीं। अगर 2027 में फिर वही हुआ, तो दिल्ली कितनी बार किसी हारे हुए उम्मीदवार को CM बना सकती है? यही वह सवाल है जो धामी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है — और जिसका जवाब उन्हें मंच पर नहीं, मतदान केंद्र पर देना होगा।
आरोप और दावे यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट किए गए हैं और जब तक अदालत ने निर्णय न दिया हो, अप्रमाणित हैं; न्यायालय में लंबित मामले बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- उत्तराखंड में BJP के किसी भी CM का यह सबसे लंबा अविरल कार्यकाल है — धामी ने 5 साल का 'कुर्सी का श्राप' तोड़ दिया।
- 2022 में अपनी सीट हारने के बावजूद धामी CM बने रहे — उनका फ़ॉर्मूला: हाईकमान की पूर्ण आज्ञाकारिता + UCC जैसे वैचारिक एजेंडे की ज़मीनी डिलीवरी।
- UCC को देश में सबसे पहले लागू करना धामी का मास्टरस्ट्रोक रहा — इससे दिल्ली के पास उन्हें बदलने का कोई कारण नहीं बचा।
- असली इम्तिहान 2027 का चुनाव है — पहाड़ी पलायन और रोज़गार का सवाल UCC से नहीं, ज़मीनी काम से हल होगा।
- धामी मॉडल BJP के लिए एक नया ब्लूप्रिंट बना सकता है — छोटे राज्यों में 'जूनियर, वफ़ादार, वैचारिक डिलीवरी' वाला CM ही टिकेगा।
आँकड़ों में
- उत्तराखंड में 2000 से 2021 तक 8 मुख्यमंत्री बदले — किसी ने भी पूरा 5 साल का कार्यकाल नहीं निभाया।
- 2024 लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की सभी 5 सीटें BJP ने जीतीं — CM धामी की सांगठनिक पकड़ का सबसे बड़ा प्रमाण।
- उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना जिसने यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू किया।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी — BJP के सबसे कम उम्र के CM जिन्होंने राज्य में पार्टी का 'म्यूजिकल चेयर्स' पैटर्न तोड़ा।
- क्या: धामी ने 5 साल का कार्यकाल पूरा किया — उत्तराखंड में BJP के किसी भी मुख्यमंत्री का सबसे लंबा अविरल कार्यकाल। उन्होंने 2035 तक 'विकसित उत्तराखंड' का संकल्प दोहराया।
- कब: जून 2026 में धामी ने 5 साल पूरे किए; दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार ऋषिकेश में सुशासन की उपलब्धियाँ गिनाईं।
- कहाँ: उत्तराखंड — ऋषिकेश में आयोजित कार्यक्रम में घोषणा।
- क्यों: UCC जैसे वैचारिक एजेंडे को ज़मीन पर लागू करना, हाईकमान की हर इच्छा पर बिना सवाल अमल, और राज्य में कोई विश्वसनीय विपक्षी या पार्टी के भीतर का विकल्प न होना — ये तीन कारण धामी के टिकने की बुनियाद हैं।
- कैसे: धामी ने 2022 में अपनी खामीरपुर सीट हारने के बाद उपचुनाव जीतकर वापसी की, फिर UCC को पूरे देश में पहली बार लागू करके हाईकमान को ठोस वैचारिक डिलीवरी दी — जिससे उन्हें बदलने का कोई कारण दिल्ली के पास नहीं बचा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड के CM कब बने?
धामी जुलाई 2021 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। 2022 विधानसभा चुनाव में BJP की जीत के बाद उन्हें फिर से CM नियुक्त किया गया, हालाँकि वे अपनी खटीमा सीट से चुनाव हार गए थे।
उत्तराखंड में UCC कब लागू हुआ?
उत्तराखंड ने देश में सबसे पहले यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू किया। यह धामी सरकार की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि मानी जाती है।
क्या धामी 2027 का चुनाव लड़ेंगे?
अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन धामी ने 2035 तक विकसित उत्तराखंड का संकल्प लिया है — जो संकेत देता है कि वे 2027 में फिर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।
उत्तराखंड में BJP के कितने मुख्यमंत्री बदले गए?
2000 में राज्य गठन से 2021 तक उत्तराखंड में कुल 8 मुख्यमंत्री बदले — इनमें BJP और कांग्रेस दोनों शामिल हैं। किसी ने भी पूरा 5 साल का कार्यकाल नहीं निभाया।





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