सोनू सूद ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि कोविड के बाद उनकी 'मसीहा' छवि इतनी मज़बूत हो गई कि दर्शक अब उन्हें विलेन के रूप में स्वीकार नहीं कर पाते। नतीजा — मेकर्स रिस्क नहीं लेना चाहते और बॉलीवुड का सबसे धाकड़ विलेन परदे से ग़ायब होता जा रहा है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद, जो 'दबंग', 'सिम्बा', 'हैप्पी न्यू ईयर' जैसी फ़िल्मों के आइकॉनिक विलेन रहे हैं।
- क्या: सोनू ने माना कि कोविड के दौरान बनी मसीहा इमेज के बाद उन्हें नेगेटिव रोल मिलना लगभग बंद हो गया है।
- कब: 2026 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए हालिया इंटरव्यू में यह बात सामने आई।
- कहाँ: बॉलीवुड इंडस्ट्री, मुंबई।
- क्यों: दर्शकों के मन में सोनू की रियल-लाइफ़ हीरो छवि इतनी गहरी बैठ गई कि परदे पर उनका विलेन अवतार अब ऑडियंस को असहज करता है, जिससे मेकर्स कमर्शियल रिस्क से बचते हैं।
- कैसे: कोविड लॉकडाउन में लाखों प्रवासी मज़दूरों की मदद करने से सोनू की पब्लिक इमेज पूरी तरह बदल गई, और अब प्रोडक्शन हाउसेज़ उन्हें विलेन कास्ट करने से कतराते हैं — जबकि हीरो रोल्स में उन्हें बड़ा स्टारडम अभी नहीं मिला है।
एक एक्टर जिसकी आँखों में ठंडा ग़ुस्सा देखकर सलमान ख़ान का चुलबुल पांडे भी दो कदम पीछे हट जाता था — वही सोनू सूद आज ख़ुद कबूल कर रहे हैं कि अब कोई उन्हें परदे पर ख़लनायक बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। बॉलीवुड के इतिहास में शायद यह पहली बार है कि किसी एक्टर की असल ज़िंदगी की नेकी ने उसके सबसे ताक़तवर ऑन-स्क्रीन हुनर को ही बेदख़ल कर दिया।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में सोनू सूद ने साफ़ शब्दों में कहा — 'It's tough for people to see me doing negative roles now।' यह एक लाइन है, लेकिन इसमें एक पूरा करियर-क्राइसिस छिपा है। वही सोनू सूद जिनका 'दबंग' (2010) का छेदी सिंह बॉलीवुड के सबसे यादगार विलेन्स में गिना जाता है, जिनके 'सिम्बा' (2018) के दुर्वा राणे ने रणवीर सिंह को भी टक्कर दी, जिनकी 'हैप्पी न्यू ईयर' (2014) में फ़िज़िकल प्रेज़ेंस से पूरा फ़्रेम भर जाता था — वो एक्टर अब एक अजीब लिम्बो में फँसा है।
और यह लिम्बो किसी फ़्लॉप फ़िल्म या स्कैंडल से नहीं आया — बल्कि 2020 के लॉकडाउन में लाखों प्रवासी मज़दूरों को बसों, ट्रेनों और चार्टर्ड फ़्लाइट्स से घर पहुँचाने वाली उस मुहिम से आया जिसने सोनू सूद को रातोंरात 'गरीबों का मसीहा' बना दिया। सोशल मीडिया पर उन्हें 'असली हीरो' कहा गया, सड़कों पर उनके पोस्टर लगे, गाँवों में उनके नाम की दुआएँ हुईं। लेकिन इस प्यार की एक क़ीमत थी — और वो क़ीमत अब उनका बॉलीवुड करियर चुका रहा है।
इनसाइड टॉक
इंडस्ट्री के हलकों में जो बात दबी ज़ुबान में कही जाती है, वो यह है कि सोनू सूद अब एक 'अनकास्टेबल ज़ोन' में आ गए हैं। ट्रेड सूत्रों के मुताबिक़, कई बड़े प्रोडक्शन हाउसेज़ ने पिछले कुछ सालों में विलेन रोल्स के लिए सोनू का नाम विचार तो किया, लेकिन मार्केटिंग टीम के एक सवाल पर पीछे हट गए — 'ऑडियंस कैसे रिएक्ट करेगी?' (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
बात सीधी-सी है: आज के बॉलीवुड में एक फ़िल्म की कमाई सिर्फ़ स्क्रिप्ट पर नहीं, सोशल मीडिया सेंटिमेंट पर टिकी है। अगर ट्रेलर रिलीज़ के दिन ट्विटर पर ट्रेंड हो कि 'जिस इंसान ने लाखों ज़िंदगियाँ बचाईं उसे विलेन बना रहे हो?' — तो फ़िल्म ओपनिंग डे से पहले ही बैकफ़ुट पर आ जाती है। इंडस्ट्री बज़ के मुताबिक़, मेकर्स इस 'सेंटिमेंट रिस्क' को कमर्शियल सुसाइड मानते हैं।
फ़ैन्स के बीच एक और धारणा ज़ोरों पर है — कि सोनू सूद ख़ुद भी शायद अब विलेन रोल्स से बचना चाहते हैं क्योंकि उनकी राजनीतिक और सामाजिक पहचान को कोई नुकसान न पहुँचे। याद कीजिए, सोनू ने पंजाब में राजनीतिक सक्रियता दिखाई थी और कई राज्यों में उनकी 'लीडर' इमेज बनी हुई है। क्या एक एक्टर अपनी पॉलिटिकल एम्बिशन के लिए अपने सबसे बड़े प्रोफ़ेशनल हुनर को दाँव पर लगा रहा है? सवाल खुला है।
विलेन से मसीहा — और फिर कहीं नहीं?
बॉलीवुड में यह समस्या नई नहीं है, लेकिन सोनू सूद का केस अनोखा है। अमिताभ बच्चन ने 'एंग्री यंग मैन' इमेज के बाद रीइन्वेंशन किया और 'मोहब्बतें' से 'पीकू' तक का सफ़र तय किया। लेकिन अमिताभ के पास हमेशा एक मेनस्ट्रीम हीरो का ट्रैक रिकॉर्ड था। सोनू सूद का करियर — 'अरुंधति', 'जोधा अकबर', 'शूटआउट एट वडाला' — मुख्य रूप से विलेन या सपोर्टिंग रोल्स पर टिका रहा। हीरो के तौर पर उनका स्टारडम कभी उस लेवल पर नहीं पहुँचा जहाँ से ₹100 करोड़+ की फ़िल्में ओपन होतीं।
अब जो तस्वीर बन रही है वो और भी पेचीदा है। विलेन रोल — जो उनका ब्रेड एंड बटर था — ऑडियंस स्वीकार नहीं कर रही। और हीरो रोल्स में उन्हें प्रोड्यूसर्स उस कमर्शियल वैल्यू पर नहीं आँकते जो एक अक्षय कुमार या अजय देवगन को मिलती है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ सोनू ने ख़ुद इस दुविधा को स्वीकार किया है। नतीजा — एक ऐसा नो-मैन्स लैंड जहाँ न विलेनी बची, न हीरोगीरी मिली।
नंबर जो कहानी बयान करते हैं
सोनू सूद की आख़िरी बड़ी कमर्शियल बॉलीवुड फ़िल्म 'सिम्बा' 2018 में आई थी जिसने बॉक्स ऑफ़िस पर करीब ₹240 करोड़ वर्ल्डवाइड कमाए (बॉक्स ऑफ़िस इंडिया के अनुसार)। उसके बाद — कोविड, फिर मसीहा इमेज, और फिर बड़े परदे पर लगभग सन्नाटा। तेलुगु फ़िल्म 'आचार्य' (2022) जिसमें उन्होंने विलेन किया, बॉक्स ऑफ़िस पर भारी फ़्लॉप रही। क्या इसमें सोनू की बदली इमेज का भी योगदान था — यह बहस का विषय है, लेकिन ट्रेड एनालिस्ट्स ने इस एंगल को नज़रअंदाज़ नहीं किया।
इसके मुक़ाबले देखिए: सोनू सूद के सोशल मीडिया पर आज भी 2 करोड़ से ज़्यादा फ़ॉलोअर्स हैं (इंस्टाग्राम डेटा के अनुसार), और उनकी हर चैरिटी पोस्ट पर लाखों लाइक्स आते हैं। यानी 'सोनू सूद ब्रांड' ज़िंदा है — लेकिन 'सोनू सूद एक्टर' पीछे छूट रहा है।
इंडिया हेराल्ड का पॉइंट-ब्लैंक रीड
इस पूरे मामले को इंडिया हेराल्ड इस नज़रिए से देखता है: सोनू सूद का क्राइसिस सिर्फ़ उनका निजी नहीं है — यह बॉलीवुड की उस पुरानी बीमारी का नया लक्षण है जहाँ इंडस्ट्री एक एक्टर को एक ख़ाने में बंद कर देती है और बाहर निकलने का रास्ता ख़ुद भी नहीं जानती। अमरीश पुरी, प्रकाश राज, डैनी डेन्ज़ोंगपा — इन दिग्गजों ने भी विलेन टैग से जूझा, लेकिन उनके सामने 'रियल लाइफ़ मसीहा' वाला बैरियर नहीं था। सोनू के सामने है।
आने वाले दिनों में अगर सोनू सूद को वापसी करनी है, तो शायद उन्हें वो रास्ता चुनना होगा जो बॉलीवुड में अभी तक किसी ने नहीं आज़माया — एक 'ग्रे कैरेक्टर' जो न पूरा हीरो हो, न विलेन। एक ऐसा किरदार जो उनकी रियल-लाइफ़ ऑथेंटिसिटी को भी सलामत रखे और ऑन-स्क्रीन उनकी एक्टिंग रेंज को भी साबित करे। OTT प्लेटफ़ॉर्म्स इसका बेहतर माध्यम हो सकते हैं जहाँ दर्शक मॉरली कॉम्प्लेक्स कैरेक्टर्स ज़्यादा स्वीकार करते हैं — जैसे 'मिर्ज़ापुर' का मुन्ना या 'सैक्रेड गेम्स' का गणेश गायतोंडे।
लेकिन सवाल यह भी है — क्या सोनू ख़ुद यह चाहते हैं? या उनकी नज़र अब सिनेमा से ज़्यादा पब्लिक लाइफ़ और राजनीति पर है? अगर ऐसा है, तो बॉलीवुड का यह नुकसान उनकी अपनी चॉइस होगी, मजबूरी नहीं। [EMBED-SUGGESTION:tweet]
फ़िलहाल जो तस्वीर है वो साफ़ है: बॉलीवुड का एक ऐसा एक्टर जिसने असल ज़िंदगी में वो किया जो उसके किसी किरदार ने नहीं किया — और उसी काम ने उसे उस इंडस्ट्री के लिए 'अनफ़िट' बना दिया जो सपनों का कारोबार करती है। अगर यह विडंबना नहीं है, तो क्या है?
आँकड़ों में
- सोनू सूद की आख़िरी बड़ी कमर्शियल हिट 'सिम्बा' (2018) ने बॉक्स ऑफ़िस पर करीब ₹240 करोड़ वर्ल्डवाइड कमाए (बॉक्स ऑफ़िस इंडिया)।
- सोनू सूद के इंस्टाग्राम पर 2 करोड़ से ज़्यादा फ़ॉलोअर्स हैं — ब्रांड ज़िंदा है, एक्टिंग करियर पीछे।
- 2020 के लॉकडाउन में सोनू ने हज़ारों प्रवासी मज़दूरों को बसों, ट्रेनों और फ़्लाइट्स से घर पहुँचाया — जिसके बाद उनकी पब्लिक इमेज पूरी तरह बदल गई।
मुख्य बातें
- सोनू सूद ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को ख़ुद माना कि कोविड के बाद उनकी मसीहा इमेज ने विलेन रोल्स की राह लगभग बंद कर दी है।
- बॉलीवुड की ट्रेड कैलकुलेशन सोशल मीडिया सेंटिमेंट पर टिकी है — मेकर्स 'ऑडियंस बैकलैश' का रिस्क लेने से कतराते हैं।
- विलेन रोल गया, हीरो रोल मिला नहीं — सोनू एक कमर्शियल नो-मैन्स लैंड में फँसे हैं।
- OTT प्लेटफ़ॉर्म और ग्रे कैरेक्टर्स सोनू के लिए संभावित वापसी का रास्ता हो सकते हैं।
- सोनू की पॉलिटिकल एम्बिशन भी उनके रोल सिलेक्शन को प्रभावित कर सकती है — यह इंडस्ट्री हलकों में खुली चर्चा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सोनू सूद को अब विलेन रोल्स क्यों नहीं मिल रहे?
टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए इंटरव्यू में सोनू ने ख़ुद कहा कि कोविड के दौरान बनी उनकी 'मसीहा' इमेज के बाद दर्शक उन्हें नेगेटिव रोल में स्वीकार नहीं कर पाते, जिससे मेकर्स कमर्शियल रिस्क से बचते हैं।
सोनू सूद की आख़िरी बड़ी बॉलीवुड हिट कौन सी थी?
सोनू सूद की आख़िरी बड़ी कमर्शियल बॉलीवुड फ़िल्म 'सिम्बा' (2018) थी जिसने बॉक्स ऑफ़िस इंडिया के अनुसार करीब ₹240 करोड़ वर्ल्डवाइड कमाए।
क्या सोनू सूद अब राजनीति में जा रहे हैं?
इंडस्ट्री हलकों में यह चर्चा ज़ोरों पर है कि सोनू की नज़र अब सिनेमा से ज़्यादा पब्लिक लाइफ़ और राजनीतिक करियर पर है, हालाँकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
क्या सोनू सूद OTT पर काम कर सकते हैं?
ट्रेड एनालिस्ट्स मानते हैं कि OTT प्लेटफ़ॉर्म्स पर ग्रे कैरेक्टर्स ज़्यादा स्वीकार किए जाते हैं — जैसे 'मिर्ज़ापुर' या 'सैक्रेड गेम्स' — और यह सोनू के लिए रीइन्वेंशन का बेहतर रास्ता हो सकता है।

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