कुकी-ज़ो काउंसिल ने मणिपुर में छह नागा नागरिकों की हत्या पर खेद जताते हुए इसे 'भारी भूल' बताया है। इंडिया टुडे के मुताबिक काउंसिल ने निष्पक्ष जाँच की माँग की, लेकिन नागा छात्र संगठन ने इस माफ़ी को सिरे से नकार दिया। यह हत्याकांड 2023 से चली आ रही कुकी-नागा हिंसा की सबसे ख़तरनाक कड़ी बन गया है।
कुकी-ज़ो काउंसिल ने मणिपुर में छह नागा नागरिकों की हत्या पर खेद जताते हुए इसे 'भारी भूल' कहा — लेकिन छह शव, एक प्रेस रिलीज़ से ज़िंदा नहीं होते। और न ही वह आख़िरी बची बैकचैनल शांति, जो इस हत्याकांड ने शायद हमेशा के लिए ध्वस्त कर दी है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, कुकी-ज़ो काउंसिल — जो मणिपुर की कुकी-ज़ो जनजातियों का शीर्ष निकाय है — ने 25 जून 2026 को एक बयान जारी कर छह नागा नागरिकों की हत्या पर 'गहरा खेद' व्यक्त किया। काउंसिल ने इसे 'एक भारी भूल' (a great mistake) बताया और एक निष्पक्ष जाँच की माँग की।
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द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, KZC ने स्वीकार किया कि यह घटना उनके समुदाय के लोगों द्वारा अंजाम दी गई।
View on Xलेकिन इस 'स्वीकारोक्ति' में सबसे बड़ा सवाल छुपा हुआ है: अगर शीर्ष निकाय को खुद यह 'भूल' बताना पड़ रहा है, तो ज़मीन पर सशस्त्र गुटों पर उसका नियंत्रण कितना बचा है?
नागा पक्ष का जवाब: 'दिखावटी माफ़ी काफ़ी नहीं'
26 जून को मणिपुर के एक प्रभावशाली नागा छात्र संगठन ने KZC की इस माफ़ी को सिरे से ख़ारिज कर दिया। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, छात्र संगठन ने इसे 'तथाकथित माफ़ी' (so-called apology) करार दिया और कहा कि शब्दों से नहीं, ठोस कार्रवाई से न्याय होगा।
View on Xद हिंदू ने भी इस प्रतिक्रिया की पुष्टि की — नागा पक्ष का कहना है कि जब तक दोषियों पर सख़्त कार्रवाई नहीं होती, यह माफ़ी एक 'दिखावा' (tokenism) से ज़्यादा कुछ नहीं।
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इसके साथ ही KZC ने 26 जून को एक 'स्पष्टीकरण' (Clarification) भी जारी किया, जिसमें अपने बयान के संदर्भ को स्पष्ट करने की कोशिश की गई।
View on Xलेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि दो बयानों के बीच छह परिवारों का सब कुछ ख़त्म हो चुका है।
2023 से चली आ रही हिंसा की सबसे ख़तरनाक कड़ी
मणिपुर में मई 2023 से जो जातीय हिंसा शुरू हुई, वह मुख्य रूप से मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच थी। लेकिन पिछले दो वर्षों में कुकी-ज़ो और नागा समुदायों के बीच भी तनाव लगातार बढ़ता गया — ज़मीन विवाद, सीमा-रेखा और सशस्त्र गुटों की आपसी रंजिश ने एक नया मोर्चा खोल दिया। बंधक बनाना और जवाबी कार्रवाई — यह चक्र अब इतना गहरा हो चुका है कि हर घटना पिछली से ज़्यादा ख़ूनी होती जा रही है।
छह नागा नागरिकों की हत्या इस चक्र की अब तक की सबसे भयावह कड़ी है। जब बंधकों को मार दिया जाता है, तो बातचीत की आख़िरी भाषा भी ख़त्म हो जाती है। बंधक-विनिमय, चाहे कितना भी अनैतिक हो, एक 'लेन-देन' का ढाँचा बनाए रखता था — कम से कम ज़िंदा रखने का प्रोत्साहन तो था। अब वह प्रोत्साहन भी गया।
दिल्ली और इम्फाल के पास विकल्प — या विकल्पों का अभाव
केंद्र सरकार मणिपुर में 2023 से एक नाज़ुक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती रही है — सेना की तैनाती, इंटरनेट प्रतिबंध, और पर्दे के पीछे बातचीत। लेकिन हर नया हत्याकांड उस संतुलन को और कमज़ोर करता है। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की सरकार पर पहले से ही पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं — अब नागा समुदाय का भरोसा किसी भी राज्य-स्तरीय मध्यस्थता पर टिक पाएगा, यह सवाल है।
दिल्ली के पास जो सीमित विकल्प बचे हैं, उनमें सबसे ज़रूरी है: दोषियों की तुरंत गिरफ़्तारी और पारदर्शी जाँच — ताकि कम से कम 'प्रक्रिया' में भरोसा बचे। लेकिन मणिपुर की पहाड़ियों में, जहाँ दर्जनों सशस्त्र गुट अपने-अपने इलाक़ों पर क़ाबिज़ हैं, 'गिरफ़्तारी' शब्द कहना जितना आसान है, करना उतना ही लगभग असंभव।
असली सवाल: काउंसिल की 'भूल' या व्यवस्था की विफलता?
KZC इस हत्या को 'भूल' कह रहा है — जैसे कोई ग़लत रास्ता मोड़ लिया हो। लेकिन छह लोगों को बंधक बनाना, फिर उनकी हत्या करना — यह 'भूल' नहीं, यह एक योजनाबद्ध कृत्य है। और सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि किसने किया, बल्कि यह है कि ऐसा कर पाना इतना आसान क्यों है? तीन साल की हिंसा के बाद भी अगर सशस्त्र गुट बेख़ौफ़ बंधक ले सकते हैं और मार सकते हैं, तो राज्य की सत्ता कहाँ है? सुरक्षा बल कहाँ हैं? और बैकचैनल वार्ता किनके बीच हो रही थी, जब ज़मीन पर हथियारों वाले किसी की नहीं सुनते?
मणिपुर की त्रासदी यह नहीं है कि हिंसा होती है — दुनिया के कई जातीय संघर्षों में होती है। त्रासदी यह है कि हर बार 'खेद' और 'जाँच' के शब्द दोहराए जाते हैं, और हर बार अगला शव पिछले से पहले गिरता है।
अब जो सवाल मणिपुर की हर जनजाति, दिल्ली का हर नीति-निर्माता, और देश का हर नागरिक पूछ रहा है, वह एक ही है: अगर शीर्ष निकाय की 'माफ़ी' भी नकार दी जाती है, और 'जाँच' की माँग हर बार हवा में रहती है — तो बातचीत की अगली भाषा क्या होगी? या फिर, भाषा बची ही नहीं?
Key Takeaways
- इंडिया टुडे के अनुसार कुकी-ज़ो काउंसिल ने छह नागा नागरिकों की हत्या को 'भारी भूल' बताया और निष्पक्ष जाँच की माँग की
- द हिंदू और पीटीआई के मुताबिक नागा छात्र संगठन ने इस माफ़ी को 'दिखावा' बताकर ख़ारिज कर दिया
- यह हत्याकांड 2023 से चले आ रहे कुकी-नागा जातीय तनाव की सबसे ख़तरनाक कड़ी है — बंधक मारे जाने से बातचीत का आख़िरी ढाँचा भी टूट गया
- दिल्ली और इम्फाल के पास दोषियों की तुरंत गिरफ़्तारी के अलावा कोई ठोस विकल्प नहीं बचा — लेकिन ज़मीन पर यह लगभग असंभव है
- KZC का बयान यह भी उजागर करता है कि शीर्ष जनजातीय निकायों का अपने सशस्त्र गुटों पर नियंत्रण कितना सीमित हो चुका है
Frequently Asked Questions
कुकी-ज़ो काउंसिल (KZC) क्या है?
कुकी-ज़ो काउंसिल मणिपुर की कुकी-ज़ो जनजातियों का शीर्ष निकाय है, जिसका मुख्यालय लामका में है। यह कुकी-ज़ो समुदाय की राजनीतिक और सामाजिक आवाज़ मानी जाती है।
मणिपुर में कुकी-नागा विवाद क्या है?
2023 से मणिपुर में मुख्य रूप से मैतेई-कुकी संघर्ष चला, लेकिन कुकी-ज़ो और नागा समुदायों के बीच भी ज़मीन, सीमा और सशस्त्र गुटों की रंजिश ने अलग मोर्चा खोल दिया। बंधक बनाना और जवाबी हिंसा इसका हिस्सा रहा है।
छह नागा बंधकों की हत्या पर क्या प्रतिक्रिया आई?
KZC ने इसे 'भारी भूल' बताकर खेद जताया और निष्पक्ष जाँच माँगी। लेकिन नागा छात्र संगठन ने पीटीआई और द हिंदू के मुताबिक इस माफ़ी को 'दिखावा' बताकर ख़ारिज कर दिया।
क्या कुकी लोग नागा हैं?
नहीं — कुकी-ज़ो और नागा दोनों पूर्वोत्तर भारत की अलग-अलग जनजातीय पहचान रखते हैं। दोनों अनुसूचित जनजाति हैं, लेकिन भाषा, संस्कृति और राजनीतिक माँगों में भिन्न हैं। मणिपुर में दोनों के बीच ज़मीन और प्रभाव को लेकर लंबा विवाद रहा है।




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