भारत सरकार ने करीब 300 ज़रूरी दवाओं पर QR कोड अनिवार्य किया है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, हर दवा के पैकेट पर एक यूनीक QR कोड होगा जिसे स्कैन करके बैच नंबर, मैन्युफैक्चरर, एक्सपायरी और सप्लाई चेन की पूरी जानकारी मिलेगी — ताकि नकली दवा खरीदने से पहले ही पकड़ी जा सके।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने यह नियम लागू किया है।
  • क्या: लगभग 300 ज़रूरी दवाओं (जिनमें पैरासिटामोल, मेटफॉर्मिन, एंटीबायोटिक्स जैसी रोज़मर्रा की दवाएँ शामिल हैं) के हर पैकेट पर यूनीक QR कोड लगाना अनिवार्य किया गया है।
  • कब: 2025-26 में चरणबद्ध तरीके से यह नियम लागू हो रहा है, द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार कुछ कैटेगरी की दवाओं पर तत्काल प्रभाव से लागू।
  • कहाँ: पूरे भारत में — हर लाइसेंसी फार्मेसी, हॉस्पिटल फार्मेसी और ऑनलाइन मेडिकल स्टोर पर।
  • क्यों: WHO के अनुसार भारत में बिकने वाली हर पाँचवीं दवा घटिया या नकली हो सकती है — नकली दवा से हर साल हज़ारों मौतें होती हैं और ये एक लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का अवैध कारोबार है।
  • कैसे: हर दवा पैकेट पर एक यूनीक QR कोड प्रिंट होगा जो केंद्रीय डेटाबेस से जुड़ा होगा। उपभोक्ता अपने स्मार्टफोन कैमरे से स्कैन करके बैच नंबर, निर्माता, एक्सपायरी डेट और सप्लाई चेन वेरिफिकेशन देख सकता है।

एक सीधा सवाल: आपने आखिरी बार कब किसी मेडिकल स्टोर पर खड़े होकर सोचा कि जो पैरासिटामोल या शुगर की गोली आप खरीद रहे हैं, वो असली भी है या नहीं? शायद कभी नहीं। लेकिन भारत सरकार ने 300 ज़रूरी दवाओं पर QR कोड अनिवार्य करके यह सवाल अब आपकी हथेली पर रख दिया है — सचमुच, स्मार्टफोन वाली हथेली पर।

  • ~300 अनिवार्य दवाओं पर यूनीक QR कोड — पैरासिटामोल, मेटफॉर्मिन, एमोक्सिसिलिन, अटॉर्वास्टैटिन सहित
  • स्कैन करने पर बैच नंबर, मैन्युफैक्चरर, एक्सपायरी और सप्लाई चेन की जानकारी केंद्रीय डेटाबेस से तुरंत
  • WHO अनुमान: विकासशील देशों में 10-20% दवाएँ घटिया या नकली
  • CDSCO सैंपलिंग: 3-4% दवाएँ 'Not of Standard Quality' — अरबों गोलियों के पैमाने पर करोड़ों घटिया यूनिट्स
  • ड्रग इंस्पेक्टर पदों में भारी रिक्तियाँ — CAG रिपोर्ट्स बार-बार चेतावनी दे चुकीं

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने अब तकरीबन 300 अनिवार्य दवाओं — जिनमें पैरासिटामोल, मेटफॉर्मिन, एमोक्सिसिलिन, अटॉर्वास्टैटिन जैसी वो गोलियाँ शामिल हैं जो करोड़ों भारतीय रोज़ निगलते हैं — के हर पैकेट पर यूनीक QR कोड लगाना अनिवार्य कर दिया है। यह कोड किसी साधारण बारकोड से अलग है: इसे स्कैन करने पर आपको बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट, एक्सपायरी डेट, निर्माता का नाम और पूरी सप्लाई चेन की जानकारी एक केंद्रीय डेटाबेस से सीधे मिलेगी।

ये 10 सेकंड का काम है — अगर आप जानते हैं कैसे करना है

प्रक्रिया सुनने में आसान है: मेडिकल स्टोर पर दवा का पैकेट उठाइए, स्मार्टफोन कैमरा खोलिए (या सरकार की निर्धारित ऐप), QR कोड स्कैन कीजिए। स्क्रीन पर तुरंत दिखेगा — दवा का नाम, बैच, मैन्युफैक्चरर, एक्सपायरी, और सबसे अहम — क्या यह बैच सरकारी डेटाबेस में रजिस्टर्ड है या नहीं। अगर डेटाबेस में मैच नहीं हुआ, या जानकारी गायब दिखी, तो समझिए कि कुछ गड़बड़ है।

लेकिन यहीं पर असली कहानी शुरू होती है — वो कहानी जो सिर्फ सरकारी प्रेस नोट नहीं बताता।

नकली दवा का कारोबार: आँकड़े जो नींद उड़ा दें

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, विकासशील देशों में बिकने वाली लगभग 10-20% दवाएँ घटिया या नकली होती हैं। भारत में CDSCO (Central Drugs Standard Control Organisation) की अपनी सैंपलिंग रिपोर्ट्स में बार-बार यह सामने आया है कि कुछ बैचों में एक्टिव इंग्रीडिएंट या तो कम है, या है ही नहीं। 2023-24 की एक CDSCO रिपोर्ट के अनुसार, सैंपल में 3-4% दवाएँ 'Not of Standard Quality' पाई गईं — यह आँकड़ा छोटा लगता है, लेकिन जब आप सोचें कि भारत में सालाना अरबों गोलियाँ बिकती हैं, तो 3% का मतलब करोड़ों नकली या घटिया गोलियाँ है जो किसी की नस में, किसी के पेट में, किसी बच्चे के शरीर में जा रही हैं।

इंडस्ट्री अनुमानों के अनुसार, नकली दवाओं का वैश्विक कारोबार 200 बिलियन डॉलर से ज़्यादा बताया जाता है, और भारत इस सप्लाई चेन में एक बड़ा प्लेयर है — कभी शिकार के तौर पर, कभी सोर्स के तौर पर।

QR कोड कैसे तोड़ता है नेक्सस — और कहाँ इसकी सीमा है

पहले समझिए ये सिस्टम असल में क्या बदलता है। अब तक नकली दवा पकड़ने का तरीका था — रैंडम सैंपलिंग, लैब टेस्टिंग, और ड्रग इंस्पेक्टर की रेड। यह रिऐक्टिव था: पहले नकली दवा बिके, फिर कभी पकड़ में आए। QR कोड इस गेम को प्रोऐक्टिव बनाता है — अब उपभोक्ता खुद, बिक्री के समय, असलियत जाँच सकता है।

द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, इस सिस्टम में हर QR कोड एक यूनीक आइडेंटिफायर होगा — मतलब दो अलग-अलग पैकेट्स पर एक ही कोड नहीं हो सकता। अगर कोई नकली दवा माफिया किसी असली बैच के QR कोड को कॉपी करके नकली पैकेट पर लगाता है, तो जैसे ही वो कोड एक से ज़्यादा बार स्कैन होगा, सिस्टम अलर्ट देगा।

लेकिन — और यह 'लेकिन' ही इंडिया हेराल्ड का असली रीड है — ज़मीनी हक़ीक़त इतनी चिकनी नहीं है जितनी प्रेस नोट में दिखती है।

पाँच सवाल जो सरकार को जवाब देने होंगे

पहला: ग्रामीण कनेक्टिविटी। भारत में 8.5 लाख से ज़्यादा रजिस्टर्ड फार्मेसियाँ हैं, और लाखों अनरजिस्टर्ड। इनमें से कितनी के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट कनेक्टिविटी है? ग्रामीण भारत में — जहाँ सबसे ज़्यादा नकली दवाएँ पहुँचती हैं — क्या बिहार के दरभंगा या मध्य प्रदेश के बैतूल में कोई दवा दुकानदार QR कोड स्कैन करवाएगा?

दूसरा: उपभोक्ता जागरूकता। भारत में दवा खरीदना एक ट्रस्ट-बेस्ड ट्रांज़ैक्शन है — लोग दुकानदार पर भरोसा करते हैं, पैकेट पर नहीं। जब तक बड़े पैमाने पर जन-जागरूकता अभियान नहीं चलता, QR कोड पैकेट पर छपा रहेगा और कोई स्कैन नहीं करेगा।

तीसरा: डेटाबेस की मज़बूती। केंद्रीय ट्रैक-एंड-ट्रेस डेटाबेस को रियल-टाइम अपडेट होना होगा। अगर सर्वर डाउन है, या डेटा लेट अपलोड हुआ, तो स्कैन करने पर 'No Data Found' दिखेगा — और ग्राहक को पता नहीं चलेगा कि दवा नकली है या सिस्टम में दिक्कत है।

चौथा: एनफोर्समेंट। भारत में ड्रग इंस्पेक्टर्स की कमी पुरानी समस्या है। Comptroller and Auditor General (CAG) की रिपोर्ट्स बार-बार बता चुकी हैं कि राज्यों में ड्रग इंस्पेक्टर के हज़ारों पद खाली पड़े हैं। QR कोड टेक्नोलॉजी तभी काम करती है जब ज़मीन पर इंस्पेक्शन भी हो — वरना नकली कोड बनाने वाले भी उतने ही तेज़ हैं जितना सिस्टम।

पाँचवाँ: ऑनलाइन फार्मेसी। जब आप PharmEasy, Tata 1mg या NetMeds से दवा मँगवाते हैं, तो QR कोड डिलीवरी के बाद स्कैन होगा — यानी पैसा पहले कट चुका होगा। रिटर्न प्रोसेस और रीफंड तंत्र क्या होगा? यह अभी स्पष्ट नहीं है।

आम आदमी के लिए स्टेप-बाय-स्टेप गाइड: ऐसे पकड़ें नकली दवा

1. पैकेट पर QR कोड देखें: अगर 300 अनिवार्य दवाओं की सूची में आने वाली दवा पर QR कोड नहीं है, तो वो पैकेट ही संदिग्ध है।

2. स्मार्टफोन कैमरे से स्कैन करें: अधिकांश एंड्रॉइड और iOS फ़ोन का बिल्ट-इन कैमरा QR कोड पढ़ लेता है। स्कैन करने पर एक लिंक खुलेगा जो सरकारी डेटाबेस पर ले जाएगा।

3. मैच करें: स्क्रीन पर दिखने वाला बैच नंबर, मैन्युफैक्चरर का नाम, एक्सपायरी डेट — इन्हें पैकेट पर छपी जानकारी से मैच करें। कोई भी विसंगति का मतलब — दवा न खरीदें।

4. एक से ज़्यादा बार स्कैन का अलर्ट: अगर सिस्टम बताए कि यह कोड पहले कई बार स्कैन हो चुका है, तो सावधान — यह डुप्लिकेट कोड हो सकता है।

5. शिकायत करें: संदेह होने पर CDSCO की हेल्पलाइन या राज्य के ड्रग कंट्रोलर को तुरंत सूचित करें।

आगे क्या होगा — इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण

QR कोड सिस्टम एक ज़रूरी पहला कदम है, लेकिन यह अकेले नकली दवा माफिया को नहीं तोड़ेगा। इंडिया हेराल्ड का आकलन यह है कि असली लड़ाई तीन मोर्चों पर लड़नी होगी: पहला, उपभोक्ता जागरूकता — जब तक लोग QR कोड स्कैन करने की आदत नहीं डालते, टेक्नोलॉजी बेकार है। दूसरा, ड्रग इंस्पेक्टर्स की भर्ती और ज़मीनी एनफोर्समेंट — बिना पैर वाली पुलिस चोर नहीं पकड़ सकती। और तीसरा, डेटाबेस की विश्वसनीयता — अगर सिस्टम ही भरोसेमंद नहीं तो लोग स्कैन करना छोड़ देंगे।

आने वाले महीनों में देखना यह होगा कि क्या राज्य सरकारें इस केंद्रीय मानक को गंभीरता से लागू करती हैं — क्योंकि ड्रग रेगुलेशन का एनफोर्समेंट राज्यों की ज़िम्मेदारी है, न कि केंद्र की। अगर राज्य सरकारें ड्रग इंस्पेक्टर्स की भर्ती नहीं करतीं, अगर ग्रामीण फार्मेसियों तक इंटरनेट नहीं पहुँचता, तो QR कोड सिर्फ एक और चमकता हुआ स्टिकर बनकर रह जाएगा — नकली दवा बेचने वाले उसी स्टिकर को भी नकली बना लेंगे।

लेकिन अगर सिस्टम ईमानदारी से चला, तो यह भारत के फार्मा सेक्टर में ट्रैसेबिलिटी की सबसे बड़ी क्रांति हो सकती है — वो क्रांति जहाँ पावर पहली बार दवा कंपनी या दुकानदार के हाथ से निकलकर उस इंसान के हाथ में आती है जो बीमार है और जिसकी ज़िंदगी उस एक गोली पर टिकी है।

अगली बार जब आप मेडिकल स्टोर पर खड़े हों, तो एक काम ज़रूर करें: फ़ोन निकालें, QR कोड स्कैन करें। दस सेकंड लगेंगे। लेकिन वो दस सेकंड आपकी ज़िंदगी और एक नकली गोली के बीच का फ़र्क हो सकते हैं।

आँकड़ों में

  • WHO अनुमान: विकासशील देशों में 10-20% दवाएँ घटिया या नकली
  • CDSCO सैंपलिंग: 3-4% दवाएँ 'Not of Standard Quality'
  • भारत में 8.5 लाख+ रजिस्टर्ड फार्मेसियाँ
  • वैश्विक नकली दवा कारोबार 200 बिलियन डॉलर+ (इंडस्ट्री अनुमान)
  • लगभग 300 अनिवार्य दवाओं पर QR कोड नियम लागू

मुख्य बातें

  • भारत सरकार ने लगभग 300 ज़रूरी दवाओं पर यूनीक QR कोड अनिवार्य किया है — स्कैन करके बैच, मैन्युफैक्चरर, एक्सपायरी की तुरंत जाँच होगी (द इंडियन एक्सप्रेस)
  • WHO के अनुसार विकासशील देशों में 10-20% दवाएँ घटिया या नकली हो सकती हैं — भारत में CDSCO सैंपलिंग में 3-4% दवाएँ 'Not of Standard Quality' पाई गईं
  • हर QR कोड यूनीक होगा — एक ही कोड एक से ज़्यादा बार स्कैन होने पर सिस्टम अलर्ट देगा, जिससे डुप्लिकेट पकड़ा जा सके
  • भारत में 8.5 लाख+ रजिस्टर्ड फार्मेसियाँ हैं — ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और जागरूकता सबसे बड़ी चुनौती होगी
  • ड्रग इंस्पेक्टर्स के हज़ारों पद खाली — CAG रिपोर्ट्स के अनुसार एनफोर्समेंट ढाँचा कमज़ोर, बिना ज़मीनी निगरानी QR कोड अकेला काफ़ी नहीं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नकली दवा की पहचान कैसे करें QR कोड से?

दवा के पैकेट पर छपे QR कोड को स्मार्टफोन कैमरे से स्कैन करें। सरकारी डेटाबेस से बैच नंबर, मैन्युफैक्चरर और एक्सपायरी की जानकारी तुरंत मिलेगी। अगर डेटा मैच नहीं करता या कोड पहले कई बार स्कैन हो चुका दिखता है, तो दवा संदिग्ध है — तुरंत CDSCO हेल्पलाइन पर शिकायत करें।

किन दवाओं पर QR कोड अनिवार्य है?

द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, सरकार ने लगभग 300 ज़रूरी दवाओं पर QR कोड अनिवार्य किया है — जिनमें पैरासिटामोल, मेटफॉर्मिन, एमोक्सिसिलिन, अटॉर्वास्टैटिन जैसी आम दवाएँ शामिल हैं।

QR कोड स्कैन करने पर क्या जानकारी दिखती है?

स्कैन करने पर दवा का नाम, बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट, एक्सपायरी डेट, निर्माता का नाम और सप्लाई चेन वेरिफिकेशन की जानकारी केंद्रीय डेटाबेस से दिखाई जाती है।

क्या ऑनलाइन फार्मेसी से मँगवाई दवा पर भी QR कोड होगा?

हाँ, नियम सभी लाइसेंसी फार्मेसियों पर लागू होता है — ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों। लेकिन ऑनलाइन ऑर्डर में दवा डिलीवरी के बाद ही स्कैन हो पाएगा, इसलिए रिटर्न और रीफंड प्रक्रिया पर स्पष्टता अभी बाकी है।

अगर QR कोड स्कैन करने पर डेटा नहीं मिले तो क्या करें?

डेटा न मिलने के दो कारण हो सकते हैं — या तो दवा नकली है, या सर्वर/डेटाबेस में तकनीकी दिक्कत है। ऐसी स्थिति में वो दवा न खरीदें और CDSCO या राज्य ड्रग कंट्रोलर को तुरंत सूचित करें।

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