राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) के चलते ICU में भर्ती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, 65+ आयु वर्ग में UTI अक्सर बिना क्लासिक लक्षणों के आती है — भ्रम, बेचैनी या अचानक कमज़ोरी इसके पहले संकेत हो सकते हैं, और देर होने पर यह सेप्सिस में बदल सकती है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास (लगभग 86 वर्ष), द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
- क्या: यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) की गंभीर स्थिति के कारण ICU में भर्ती, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़।
- कब: जुलाई 2025 में, रिपोर्ट प्रकाशन के अनुसार।
- कहाँ: अयोध्या/लखनऊ के अस्पताल में, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार।
- क्यों: बुज़ुर्गों में कमज़ोर इम्यून सिस्टम और बदले हुए लक्षणों के कारण UTI का निदान देर से होता है, जिससे संक्रमण ब्लडस्ट्रीम में फैल सकता है — यह चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है।
- कैसे: मूत्र मार्ग में बैक्टीरियल संक्रमण जो बिना समय पर इलाज के गुर्दों तक पहुँचा और ब्लडस्ट्रीम में फैलकर सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति बना सकता है, जिसके चलते ICU केयर ज़रूरी हुई।
घर में बुज़ुर्ग अचानक उलझी-उलझी बातें करने लगें, नाम भूल जाएँ, बिना बात बेचैन हों — तो ज़्यादातर परिवार सोचते हैं, 'उम्र का असर है।' लेकिन गेरियाट्रिक मेडिसिन का एक कड़वा सच यह है कि यही लक्षण अक्सर किसी 'मामूली' यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन की पहली दस्तक होते हैं — और यह दस्तक अगर अनसुनी रही, तो ICU का दरवाज़ा खोल देती है।
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास — लगभग 86 साल की उम्र, राम मंदिर आंदोलन के सबसे वरिष्ठ चेहरों में से एक — इस वक़्त यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) के कारण ICU में भर्ती हैं। द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार उनकी हालत गंभीर मानी जा रही है। महंत जी पहले भी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ चुके हैं, लेकिन इस बार की ख़बर हर उस भारतीय परिवार के लिए सीधा अलर्ट है जिसके घर में कोई बुज़ुर्ग है।
सवाल यह है: एक ऐसा संक्रमण जिसे युवा दो-तीन दिन की एंटीबायोटिक से ठीक कर लेते हैं, वह 65 पार के शरीर में कैसे इतना ख़तरनाक हो जाता है कि ICU की नौबत आ जाए?
बुज़ुर्गों का शरीर — जहाँ UTI 'साइलेंट' हो जाती है
युवाओं में UTI के लक्षण साफ़ होते हैं — पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब आना, पेट के निचले हिस्से में दर्द। लेकिन अमेरिकन जेरियाट्रिक्स सोसाइटी के शोध के अनुसार, 65 से ऊपर की उम्र में ये 'क्लासिक' लक्षण अक्सर ग़ायब रहते हैं। उनकी जगह आते हैं एकदम अलग संकेत:
अचानक भ्रम (confusion) या बेतुकी बातें करना, बिना वजह गिरना या बैलेंस बिगड़ना, खाना-पीना छोड़ देना, असामान्य बेचैनी या अकारण चिड़चिड़ापन, और कभी-कभी हल्का बुख़ार — जो बुज़ुर्गों में तेज़ बुख़ार की बजाय सामान्य से सिर्फ़ एक-डेढ़ डिग्री ऊपर होता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (BMJ) में प्रकाशित अध्ययनों के मुताबिक़, बुज़ुर्गों में बुख़ार का 'सामान्य' पैमाना ही अलग होता है — 37.5°C भी उनके लिए उतना ही अलार्मिंग हो सकता है जितना किसी युवा के लिए 39°C।
यही वह जगह है जहाँ त्रासदी शुरू होती है — परिवार 'उम्र का असर' समझकर अनदेखा करता है, और बैक्टीरिया चुपचाप मूत्र मार्ग से गुर्दों तक, और फिर ख़ून में पहुँच जाते हैं।
UTI से सेप्सिस तक — शरीर के अंदर क्या होता है?
मेडिकल साइंस में इसे 'यूरोसेप्सिस' कहते हैं — और यह बुज़ुर्गों में सेप्सिस के सबसे आम कारणों में से एक है। द लैंसेट में प्रकाशित डेटा के अनुसार, 65+ आयु वर्ग में सेप्सिस के क़रीब 25-30% मामलों का स्रोत यूरिनरी ट्रैक्ट होता है।
प्रक्रिया कुछ ऐसी है: बैक्टीरिया (अक्सर ई. कोलाई) मूत्राशय में पहुँचते हैं → बुज़ुर्गों की कमज़ोर इम्यून प्रतिक्रिया उन्हें रोक नहीं पाती → संक्रमण गुर्दों तक चढ़ता है (पायलोनेफ्राइटिस) → बैक्टीरिया ब्लडस्ट्रीम में प्रवेश करते हैं (बैक्टीरीमिया) → शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया ही अंगों को नुक़सान पहुँचाने लगती है → सेप्सिस, और अगर इलाज न हो तो सेप्टिक शॉक। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार सेप्सिस दुनिया भर में हर साल क़रीब 1.1 करोड़ मौतों का कारण है — और इसका सबसे बड़ा शिकार बुज़ुर्ग होते हैं।
महंत जी का मामला हर भारतीय घर का आईना क्यों है
इंडिया हेराल्ड का आकलन है कि महंत नृत्य गोपाल दास का ICU में भर्ती होना सिर्फ़ एक व्यक्ति की बीमारी की ख़बर नहीं — यह भारत के उस बड़े, अनकहे संकट को सामने लाता है जहाँ 14 करोड़ से ज़्यादा बुज़ुर्ग आबादी (भारत की जनगणना अनुमान 2026) के स्वास्थ्य की निगरानी का कोई व्यवस्थित ढाँचा नहीं है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के आँकड़ों के मुताबिक़, भारत में बुज़ुर्गों की बड़ी आबादी छोटे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में रहती है, जहाँ गेरियाट्रिक स्पेशलिस्ट की उपलब्धता नगण्य है।
तस्वीर यह है: परिवार का बुज़ुर्ग दो दिन से थोड़ा 'अजीब' व्यवहार कर रहा है, नाम भूल रहा है, खाना नहीं खा रहा — और घरवाले कह रहे हैं 'बाबूजी उम्र से ऐसे हो गए हैं।' जब तक तेज़ बुख़ार या बेहोशी आती है, तब तक संक्रमण ख़ून में फैल चुका होता है। ज़रा कल्पना कीजिए — जब महंत जी जैसी विशिष्ट हस्ती, जिनकी सेवा में चिकित्सा टीम तैनात रहती है, को ICU की ज़रूरत पड़ रही है, तो किसी कस्बे के उस बुज़ुर्ग का क्या होगा जिसका नज़दीकी अस्पताल 40 किलोमीटर दूर है?
क्या करें — परिवारों के लिए ठोस गाइड
भारतीय गेरियाट्रिक विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों (जैसे NHS UK और Mayo Clinic) के आधार पर कुछ ज़रूरी बातें:
पहला — भ्रम को कभी 'उम्र का असर' मत मानिए। किसी बुज़ुर्ग में अगर 24-48 घंटों में अचानक व्यवहार बदले — भ्रम, बेचैनी, असामान्य नींद — तो यह मेडिकल इमरजेंसी का संकेत हो सकता है, उम्र नहीं। तुरंत यूरिन टेस्ट करवाएँ।
दूसरा — पानी की मात्रा पर नज़र रखें। बुज़ुर्गों में प्यास की अनुभूति कम हो जाती है, जिससे डिहाइड्रेशन होता है और यह UTI का सीधा रिस्क फ़ैक्टर है। Mayo Clinic के अनुसार, पर्याप्त तरल पदार्थ (दिन में कम से कम 6-8 गिलास, जब तक डॉक्टर ने किसी कारण मना न किया हो) UTI की रोकथाम का सबसे सरल उपाय है।
तीसरा — कैथेटर वाले मरीज़ों पर दोगुनी सतर्कता। बिस्तर पर रहने वाले या कैथेटर लगे बुज़ुर्गों में UTI का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है। अमेरिकन यूरोलॉजिकल एसोसिएशन के दिशानिर्देशों के मुताबिक़, कैथेटर का नियमित और स्वच्छ प्रबंधन अत्यंत ज़रूरी है।
चौथा — एंटीबायोटिक ख़ुद से कभी न दें। बुज़ुर्गों में UTI का इलाज युवाओं से अलग होता है — ग़लत एंटीबायोटिक या अधूरा कोर्स एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस बढ़ाता है, जो ICMR के अनुसार भारत में पहले से ही एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है।
आने वाले दिन और बड़ा सवाल
महंत नृत्य गोपाल दास की सेहत पर सबकी नज़र है — अयोध्या और राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़ी हर गतिविधि उनके स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। लेकिन उनकी बीमारी जो बड़ा सवाल खड़ा करती है, वह व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक है: भारत जिस रफ़्तार से बूढ़ा हो रहा है, क्या हमारा स्वास्थ्य तंत्र, हमारे परिवार, और हम ख़ुद इतने तैयार हैं कि एक 'मामूली' UTI को पहचान सकें — इससे पहले कि वह ICU का रास्ता खोल दे?
अगली बार जब घर के बुज़ुर्ग थोड़े 'अजीब' लगें — रुककर सोचिए। वह 'उम्र का असर' नहीं, शरीर का अलार्म हो सकता है।
आँकड़ों में
- WHO के अनुसार सेप्सिस दुनिया भर में सालाना लगभग 1.1 करोड़ मौतों का कारण है, और बुज़ुर्ग सबसे अधिक प्रभावित वर्ग हैं।
- द लैंसेट के अनुसार 65+ आयु वर्ग में सेप्सिस के 25-30% मामलों का स्रोत यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन होता है।
- भारत में 2026 तक अनुमानित 14 करोड़ से अधिक बुज़ुर्ग आबादी है, जबकि गेरियाट्रिक स्पेशलिस्ट की संख्या नगण्य है।
मुख्य बातें
- बुज़ुर्गों में UTI के 'क्लासिक' लक्षण (जलन, बार-बार पेशाब) अक्सर दिखते ही नहीं — भ्रम, बेचैनी, गिरना या खाना छोड़ना पहले संकेत होते हैं।
- 65+ उम्र में UTI से सेप्सिस का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है — द लैंसेट के अनुसार इस आयु वर्ग में सेप्सिस के 25-30% मामलों का स्रोत मूत्र मार्ग होता है।
- पानी कम पीना, कैथेटर का इस्तेमाल, और कमज़ोर इम्यूनिटी बुज़ुर्गों में UTI के तीन सबसे बड़े रिस्क फ़ैक्टर हैं।
- बुज़ुर्गों में अचानक भ्रम या व्यवहार बदलाव को कभी 'उम्र का असर' मानकर अनदेखा न करें — तुरंत यूरिन टेस्ट करवाएँ।
- भारत में 14 करोड़+ बुज़ुर्ग आबादी के लिए गेरियाट्रिक स्पेशलिस्ट की भारी कमी इस समस्या को और गहरा बनाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बुज़ुर्गों में UTI के लक्षण युवाओं से अलग कैसे होते हैं?
बुज़ुर्गों में पेशाब में जलन या बार-बार पेशाब जैसे 'क्लासिक' लक्षण अक्सर नहीं दिखते। इसकी बजाय अचानक भ्रम (confusion), बेचैनी, गिरना, खाना-पीना छोड़ना और हल्का बुख़ार जैसे असामान्य लक्षण होते हैं, जिन्हें परिवार अक्सर 'उम्र का असर' समझ लेता है।
UTI से सेप्सिस कैसे होता है?
जब मूत्र मार्ग का बैक्टीरियल संक्रमण समय पर नहीं पकड़ा जाता, तो बैक्टीरिया गुर्दों तक पहुँचते हैं और फिर ख़ून में फैल जाते हैं (बैक्टीरीमिया)। इससे शरीर की अत्यधिक इम्यून प्रतिक्रिया अंगों को नुक़सान पहुँचाती है — इसे सेप्सिस कहते हैं, जो जानलेवा हो सकता है।
बुज़ुर्गों में UTI से बचाव के लिए क्या करें?
पर्याप्त पानी पिलाएँ (6-8 गिलास/दिन, डॉक्टर की सलाह अनुसार), कैथेटर की स्वच्छता का ध्यान रखें, भ्रम या व्यवहार बदलाव को तुरंत गंभीरता से लें और यूरिन टेस्ट करवाएँ, और बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक कभी न दें।
क्या UTI सिर्फ़ महिलाओं को होती है?
नहीं। हालाँकि महिलाओं में UTI अधिक आम है, बुज़ुर्ग पुरुषों में भी — ख़ासकर प्रोस्टेट संबंधी समस्याओं या कैथेटर के कारण — UTI का ख़तरा काफ़ी बढ़ जाता है। महंत नृत्य गोपाल दास का मामला इसकी पुष्टि करता है।

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