द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, 'कोर्ट' और 'द डिसाइपल' के निर्देशक चैतन्य तम्हाणे ने कहा है कि अगली फ़िल्म बनाने से पहले वो दर्शकों के मनोविज्ञान को गहराई से समझना चाहते हैं — यह भारतीय इंडी सिनेमा के उस बुनियादी सवाल से जूझना है कि अंतरराष्ट्रीय सम्मान को घरेलू दर्शक में कैसे बदला जाए।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: निर्देशक चैतन्य तम्हाणे — 'कोर्ट' (2014) और 'द डिसाइपल' (2020) के मराठी फ़िल्मकार, जिन्हें अल्फ़ोंसो क्वारोन ने मेंटर किया।
  • क्या: तम्हाणे ने कहा है कि अगली फ़िल्म से पहले वो ऑडियंस साइकोलॉजी और दर्शकों की सोच का अध्ययन करना चाहते हैं, ताकि उनकी अगली कृति फ़ेस्टिवल सर्किट से आगे जाकर आम दर्शक तक पहुँचे।
  • कब: 2026 में इंटरव्यू — अगली फ़िल्म की शूटिंग अभी शुरू नहीं हुई।
  • कहाँ: भारत — तम्हाणे मुंबई-आधारित फ़िल्मकार हैं, उनकी फ़िल्में मराठी भाषा में हैं।
  • क्यों: उनकी दोनों फ़िल्मों को वैश्विक आलोचनात्मक प्रशंसा मिली लेकिन भारतीय बॉक्स ऑफ़िस पर संख्याएँ नगण्य रहीं — यह अंतर उन्हें दर्शक को समझने के लिए प्रेरित कर रहा है।
  • कैसे: द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ तम्हाणे ऑडियंस रिसर्च, दर्शकों की आदतों और मनोविज्ञान के अध्ययन में समय लगा रहे हैं — ताकि रचनात्मक दृष्टि और दर्शकों की ज़रूरत के बीच का फ़ासला कम हो।

एक निर्देशक जिसकी पहली फ़ीचर फ़िल्म 'कोर्ट' ने वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में ऑरिज़ॉन्टी का बेस्ट फ़िल्म अवॉर्ड जीता, जिसकी दूसरी फ़िल्म 'द डिसाइपल' को TIFF में प्रीमियर और नेटफ़्लिक्स पर ग्लोबल रिलीज़ मिली — वो अब बैठकर सोच रहा है कि उसका अपना देश उसकी फ़िल्में क्यों नहीं देखता। यह कहानी सिर्फ़ चैतन्य तम्हाणे की नहीं है। यह भारतीय इंडी सिनेमा के उस ज़ख़्म की कहानी है जो हर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार के साथ और चौड़ा होता जाता है।

द इंडियन एक्सप्रेस की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, तम्हाणे ने कहा है कि अगली फ़िल्म पर काम शुरू करने से पहले वो 'दर्शक का दिमाग़ पढ़ना' चाहते हैं — ऑडियंस साइकोलॉजी, देखने की आदतें, और वो तमाम अदृश्य फ़िल्टर जो तय करते हैं कि एक भारतीय दर्शक किसी फ़िल्म पर पैसा लगाएगा या नहीं। यह सुनने में अकादमिक लगता है, लेकिन इसके पीछे का दर्द बहुत व्यावहारिक है।

'कोर्ट' (2014) की भारतीय बॉक्स ऑफ़िस कमाई — तमाम अनुमानों और रिपोर्ट्स के मुताबिक़ — एक करोड़ रुपये के आसपास रही। 'द डिसाइपल' (2020) तो थिएटर में आई ही नहीं, सीधे नेटफ़्लिक्स पर गई। दोनों फ़िल्मों को जोड़ दें, तो भी वो रक़म किसी स्टार-ड्रिवन मसाला फ़िल्म के ओपनिंग डे कलेक्शन का अंश भी नहीं बनती। कान, वेनिस, TIFF — ये तीनों शब्द किसी भारतीय फ़िल्म डायरेक्टर के बायो में सबसे चमकदार लगते हैं, लेकिन मल्टीप्लेक्स के काउंटर पर इनकी कोई क़ीमत नहीं।

इंडी सिनेमा का पुराना दर्द — सम्मान बहुत, दर्शक कहाँ?

भारतीय इंडी सिनेमा पिछले दो दशकों से इस विरोधाभास में जी रहा है। अनुराग कश्यप की 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' एक दुर्लभ अपवाद थी जिसने कान में भी तालियाँ बटोरीं और भारत में भी कमाई की। लेकिन ज़्यादातर मामलों में फ़ेस्टिवल डार्लिंग और कमर्शियल हिट एक-दूसरे के दुश्मन की तरह रहे हैं। रितेश बत्रा की 'द लंचबॉक्स' ने कुछ हद तक यह दीवार तोड़ी, पर वो भी अंतरराष्ट्रीय कमाई की बदौलत सफल हुई, भारतीय थिएटरों में नहीं।

तम्हाणे इस पैटर्न को तोड़ना चाहते हैं — और उनका तरीक़ा दिलचस्प है। वो फ़ॉर्मूला नहीं अपना रहे, स्टार कास्ट नहीं ला रहे, ना ही अपनी अगली फ़िल्म में आइटम सॉन्ग डाल रहे हैं। वो सवाल पूछ रहे हैं — भारतीय दर्शक फ़िल्म में क्या खोजता है? उसकी एट्रेक्शन की मैकेनिज़्म क्या है? क्या बात उसे मल्टीप्लेक्स तक खींचती है और क्या बात OTT के होम स्क्रीन पर भी स्किप करा देती है?

इनसाइड टॉक

इंडस्ट्री हलकों में चर्चा है कि तम्हाणे का यह 'ऑडियंस स्टडी' वाला फ़ेज़ कम से कम कई महीनों से चल रहा है। ट्रेड सूत्रों के मुताबिक़, कुछ प्रोड्यूसर्स ने तम्हाणे को स्क्रिप्ट्स ऑफ़र कीं, लेकिन उन्होंने फ़िलहाल कोई प्रोजेक्ट अनाउंस नहीं किया। फ़ैन्स और फ़िल्म जगत के लोग मानते हैं कि तम्हाणे शायद ऐसी फ़िल्म बनाना चाहते हैं जो उनके सिनेमाई मानकों से समझौता न करे, लेकिन साथ ही उसे वो ऑडियंस भी मिले जो उनकी पिछली फ़िल्मों को नहीं मिली।

कुछ इंडी फ़िल्ममेकर्स के बीच फुसफुसाहट यह भी है कि तम्हाणे का यह क़दम एक तरह से बाक़ी इंडी डायरेक्टर्स को भी शीशा दिखाता है — कि सिर्फ़ 'मेरी फ़िल्म बहुत इंटेलेक्चुअल है, लोगों को समझ नहीं आती' कहकर दर्शक को दोष देना आसान है, दर्शक को समझने की कोशिश करना कठिन।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

अल्फ़ोंसो क्वारोन कनेक्शन — मेंटरशिप का असर

तम्हाणे की सिनेमाई यात्रा का एक अहम अध्याय मैक्सिकन मास्टर अल्फ़ोंसो क्वारोन ('रोमा', 'ग्रैविटी') से उनकी मेंटरशिप है। क्वारोन ने 'द डिसाइपल' को प्रोड्यूस किया और तम्हाणे को वैश्विक सिनेमा के दरवाज़े खोले। लेकिन एक दिलचस्प बात यह है कि ख़ुद क्वारोन की 'रोमा' — जो ऑस्कर विजेता, श्वेत-श्याम, मैक्सिकन फ़िल्म थी — ने नेटफ़्लिक्स पर करोड़ों दर्शक पाए। क्वारोन ने वह रास्ता पहले से दिखा दिया था: कलात्मक दृष्टि को त्यागे बिना, सही प्लेटफ़ॉर्म और सही समय पर दर्शक तक पहुँचना संभव है।

तम्हाणे शायद इसी सबक़ को अगले स्तर पर ले जा रहे हैं — प्लेटफ़ॉर्म से आगे बढ़कर ख़ुद कंटेंट के भीतर कुछ ऐसा रखना जो भारतीय दर्शक के साथ भावनात्मक तार जोड़े, बिना फ़ॉर्मूले में गिरे।

क्या इंडी सिनेमा को सच में थिएटर चाहिए?

यहाँ एक ज़रूरी सवाल है जो अक्सर छूट जाता है। क्या इंडी सिनेमा की सफलता का पैमाना बॉक्स ऑफ़िस होना चाहिए? 2026 का भारतीय मीडिया लैंडस्केप 2014 से बिलकुल अलग है। OTT प्लेटफ़ॉर्म्स — नेटफ़्लिक्स, MUBI, ज़ी5, JioCinema — ने एक ऐसा इकोसिस्टम बनाया है जहाँ 'कोर्ट' जैसी फ़िल्म को उसका सही दर्शक मिल सकता है, बिना 2,000-सीट वाले मल्टीप्लेक्स को भरे।

लेकिन तम्हाणे की बात का मतलब शायद गहरा है। जब वो 'दर्शक का दिमाग़ पढ़ना' कहते हैं, तो शायद सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि 'लोग टिकट क्यों नहीं ख़रीदते' — बल्कि यह है कि 'लोग कहानी से क्या चाहते हैं?' इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि तम्हाणे असल में भारतीय इंडी सिनेमा के सबसे पुराने अहंकार पर सवाल उठा रहे हैं — कि 'अच्छी फ़िल्म' और 'लोकप्रिय फ़िल्म' हमेशा विपरीत दिशाओं में नहीं जातीं।

आगे क्या — इंडी सिनेमा का रास्ता किधर जाता है?

अगर तम्हाणे सचमुच इस ऑडियंस रिसर्च को अपनी अगली फ़िल्म में उतार पाते हैं, तो यह भारतीय इंडी सिनेमा के लिए एक नया प्रयोग होगा। अब तक का पैटर्न यह रहा है — फ़ेस्टिवल में चमको, OTT पर आओ, और उम्मीद करो कि एल्गोरिदम तुम्हें सही दर्शक तक पहुँचा दे। तम्हाणे उस पैसिव मॉडल को तोड़ रहे हैं।

ट्रेड विश्लेषकों का मानना है कि 2025-26 में भारतीय OTT मार्केट में इंडी कंटेंट के लिए एक नई जगह बन रही है — ख़ासकर हिंदी और मराठी में। लेकिन यह जगह तभी टिकाऊ होगी जब फ़िल्ममेकर दर्शक को 'ऊपर से नीचे' देखना बंद करें।

तम्हाणे की अगली फ़िल्म अभी अनाउंस नहीं हुई है। ना कोई टाइटल, ना कास्ट, ना रिलीज़ डेट। लेकिन जो अनाउंस हुआ है, वो शायद फ़िल्म से ज़्यादा ज़रूरी है — एक इरादा, कि इस बार सिर्फ़ जूरी नहीं, जनता भी तालियाँ बजाए।

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और अगर वो इसमें नाकाम भी रहते हैं, तो भी यह कोशिश भारतीय इंडी सिनेमा के इतिहास में दर्ज होगी — कि कम से कम एक निर्देशक ने दर्शक को दोष देने की बजाय, दर्शक को समझने की कोशिश की।

आँकड़ों में

  • 'कोर्ट' (2014) की अनुमानित भारतीय बॉक्स ऑफ़िस कमाई क़रीब ₹1 करोड़ — जबकि फ़िल्म ने वेनिस ऑरिज़ॉन्टी बेस्ट फ़िल्म अवॉर्ड जीता।
  • 'द डिसाइपल' (2020) भारत में थिएटर में रिलीज़ ही नहीं हुई — सीधे नेटफ़्लिक्स पर गई।
  • अल्फ़ोंसो क्वारोन की 'रोमा' ने ऑस्कर जीते और नेटफ़्लिक्स पर करोड़ों दर्शक पाए — कलात्मक फ़िल्म और बड़ी ऑडियंस साथ चल सकती हैं।

मुख्य बातें

  • चैतन्य तम्हाणे ने अगली फ़िल्म से पहले ऑडियंस साइकोलॉजी का अध्ययन शुरू किया है — यह भारतीय इंडी सिनेमा में अपनी तरह का पहला प्रयोग है।
  • 'कोर्ट' और 'द डिसाइपल' दोनों को वैश्विक सम्मान मिला लेकिन भारतीय बॉक्स ऑफ़िस पर दोनों की संयुक्त कमाई किसी मसाला फ़िल्म के ओपनिंग डे से भी कम रही।
  • तम्हाणे का यह क़दम इंडी सिनेमा के उस पुराने अहंकार पर सवाल है कि 'अच्छी फ़िल्म' को दर्शक समझ नहीं सकता — वो कह रहे हैं कि शायद फ़िल्ममेकर ने दर्शक को समझा नहीं।
  • 2026 के OTT इकोसिस्टम में इंडी कंटेंट के लिए जगह बन रही है, लेकिन टिकाऊ सफलता के लिए दर्शक को 'ऊपर से नीचे' देखने का रवैया बदलना होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

चैतन्य तम्हाणे कौन हैं और उनकी फ़िल्में कौन-सी हैं?

चैतन्य तम्हाणे मराठी फ़िल्मकार हैं जिन्होंने 'कोर्ट' (2014) और 'द डिसाइपल' (2020) बनाई। 'कोर्ट' ने वेनिस में ऑरिज़ॉन्टी बेस्ट फ़िल्म जीता और 'द डिसाइपल' TIFF में प्रीमियर हुई। अल्फ़ोंसो क्वारोन उनके मेंटर रहे हैं।

तम्हाणे 'दर्शक का दिमाग़ पढ़ना' से क्या मतलब रखते हैं?

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, तम्हाणे अगली फ़िल्म से पहले ऑडियंस साइकोलॉजी — दर्शकों की देखने की आदतें, प्राथमिकताएँ, और भावनात्मक ट्रिगर — का अध्ययन करना चाहते हैं ताकि उनकी फ़िल्म सिर्फ़ फ़ेस्टिवल तक सीमित न रहे।

भारतीय इंडी सिनेमा को बॉक्स ऑफ़िस पर सफलता क्यों नहीं मिलती?

अधिकांश भारतीय इंडी फ़िल्में स्टार पावर, मार्केटिंग बजट और मास-अपील फ़ॉर्मूले के बिना बनती हैं। इसके अलावा, मल्टीप्लेक्स चेन्स कमर्शियल फ़िल्मों को स्क्रीन देने में प्राथमिकता देती हैं, जिससे इंडी फ़िल्मों को शोटाइम ही नहीं मिलता।

चैतन्य तम्हाणे की अगली फ़िल्म कब आएगी?

2026 तक तम्हाणे की अगली फ़िल्म का न टाइटल, न कास्ट, न रिलीज़ डेट अनाउंस हुई है। वो फ़िलहाल प्री-प्रोडक्शन से पहले के रिसर्च फ़ेज़ में हैं।

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