अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने स्पष्ट किया कि ट्रंप प्रशासन की वीज़ा नीतियाँ भारतीय प्रोफ़ेशनल्स के ख़िलाफ़ नहीं हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि बढ़ी हुई फ़ीस, कड़ी जाँच और RFE का तूफ़ान जारी है — यानी शब्द मीठे हैं, शर्तें कड़वी।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और ट्रंप प्रशासन।
- क्या: गोर ने कहा कि H-1B वीज़ा नीतियाँ भारतीयों को निशाना नहीं बना रहीं, साथ ही ट्रंप की सख़्त इमिग्रेशन नीतियों के बीच भारतीय आवेदकों को आश्वस्त करने की कोशिश की।
- कब: जून 2025 में MSN और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार।
- कहाँ: भारत-अमेरिका राजनयिक गलियारे में, वॉशिंगटन और नई दिल्ली दोनों छोर पर।
- क्यों: ट्रंप प्रशासन की बढ़ी फ़ीस और कड़ी जाँच से भारतीय IT प्रोफ़ेशनल्स और NRI समुदाय में गहरी चिंता फैली, जिसे शांत करने के लिए राजदूत को बयान देना पड़ा।
- कैसे: गोर ने सार्वजनिक बयान के ज़रिए कहा कि अमेरिका में भारतीय टैलेंट का स्वागत जारी है, जबकि नीतिगत स्तर पर फ़ीस, प्रीमियम प्रोसेसिंग शुल्क और RFE दरें पहले से कहीं ज़्यादा हैं।
एक तरफ़ अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर माइक्रोफ़ोन पर खड़े होकर कह रहे हैं — 'भारतीय प्रोफ़ेशनल्स अमेरिका की ताक़त हैं, उनका स्वागत है।' दूसरी तरफ़ उसी अमेरिका की सरकार ने H-1B वीज़ा की फ़ीस रिकॉर्ड स्तर तक पहुँचा दी है, Request for Evidence (RFE) की बाढ़ आ गई है, और हर तीसरे भारतीय आवेदक को ऐसा लग रहा है जैसे वो किसी अदृश्य दीवार से टकरा रहा है। तो सवाल सीधा है — ये सफ़ाई है, या सफ़ाई की पैकेजिंग में चुप्पी?
MSN पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने ट्रंप प्रशासन की वीज़ा नीतियों को लेकर एक 'की क्लैरिफ़िकेशन' जारी की है। गोर ने कहा कि ट्रंप सरकार की इमिग्रेशन नीतियाँ किसी एक देश या समुदाय को टारगेट नहीं करतीं, बल्कि 'मेरिट-बेस्ड सिस्टम' को मज़बूत करने की दिशा में हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारतीय टैलेंट अमेरिकी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा रहा है और आगे भी रहेगा। शब्द चुने हुए हैं, लहज़ा गर्मजोशी का है — लेकिन जो नहीं कहा गया, वो शायद ज़्यादा ज़रूरी है।
गोर की सफ़ाई में एक भी बार उन तीन ठोस बदलावों का ज़िक्र नहीं आया जिन्होंने पिछले डेढ़ साल में भारतीय H-1B आवेदकों की ज़िंदगी बदल दी है। पहला — फ़ीस में भारी बढ़ोतरी। ट्रंप प्रशासन के तहत H-1B रजिस्ट्रेशन फ़ीस, प्रीमियम प्रोसेसिंग फ़ीस और एसाइलम-प्रोग्राम सरचार्ज मिलाकर कुल लागत कई गुना बढ़ चुकी है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक़ कुल ख़र्च दस लाख रुपये से भी ऊपर जा सकता है। दूसरा — RFE यानी Request for Evidence की दर ऐतिहासिक ऊँचाई पर है, जहाँ USCIS आवेदकों से बार-बार अतिरिक्त दस्तावेज़ माँगकर प्रक्रिया को महीनों खींच रहा है। तीसरा — वेज लेवल रिक्वायरमेंट्स को इस तरह कड़ा किया गया है कि एंट्री-लेवल भारतीय IT प्रोफ़ेशनल्स के लिए क्वालिफ़ाई करना पहले से कहीं मुश्किल हो गया है।
अब ज़रा इस तस्वीर को उलटकर देखिए। ट्रंप प्रशासन को भारतीय IT कंपनियों और टेक जायंट्स — TCS, इन्फ़ोसिस, विप्रो से लेकर गूगल, अमेज़ॉन, मेटा तक — की ज़रूरत है। सिलिकॉन वैली का इंजन भारतीय इंजीनियरों के बिना रुक जाएगा, ये बात वॉशिंगटन भी जानता है। लेकिन ट्रंप की घरेलू राजनीति — 'अमेरिका फ़र्स्ट' — की माँग है कि इमिग्रेशन पर सख़्ती दिखे। नतीजा? एक क्लासिक डिप्लोमैटिक गेम — राजदूत का काम है मुस्कुराकर कहना 'स्वागत है', और नीति का काम है चुपचाप दरवाज़ा तंग करते जाना।
इंडिया हेराल्ड का सीधा रीड यह है कि सर्जियो गोर की यह सफ़ाई एक 'सॉफ़्ट पावर मैसेज' है, 'पॉलिसी शिफ़्ट' नहीं। ज़मीन पर कुछ नहीं बदला — न फ़ीस घटी, न RFE की दर कम हुई, न लॉटरी सिस्टम में कोई राहत आई। यह बयान उस समय आया है जब भारत-अमेरिका के बीच डिफ़ेंस डील, ट्रेड नेगोशिएशन और टेक पार्टनरशिप पर बातचीत चल रही है। राजनय में ऐसे बयान एक 'गुडविल जेस्चर' होते हैं — एक तरह का राजनीतिक बैंडेज, जो ज़ख़्म छुपाता है, भरता नहीं।
भारतीय IT प्रोफ़ेशनल्स के लिए असली सवाल यह नहीं है कि राजदूत ने क्या कहा — बल्कि यह है कि USCIS के सिस्टम में उनकी फ़ाइल का क्या हो रहा है। हैदराबाद, बेंगलुरु, पुणे और चेन्नई के हज़ारों इंजीनियर जो हर साल H-1B लॉटरी में किस्मत आज़माते हैं, उनके लिए 'मेरिट-बेस्ड' का मतलब बदल गया है। अब मेरिट सिर्फ़ स्किल नहीं, मेरिट का मतलब है — क्या आपका स्पॉन्सर कंपनी उस भारी फ़ीस का बोझ उठाने को तैयार है? क्या आपकी सैलरी लेवल-वन से ऊपर है? क्या आपके पास वो हर दस्तावेज़ है जो RFE में माँगा जा सकता है?
और यहाँ एक और पहलू है जो कोई नहीं बोल रहा — कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देश इस मौक़े का फ़ायदा उठा रहे हैं। जहाँ अमेरिका दरवाज़ा तंग कर रहा है, वहाँ कनाडा ने अपने एक्सप्रेस एंट्री सिस्टम को और खोला है। ऑस्ट्रेलिया ने ग्लोबल टैलेंट वीज़ा का दायरा बढ़ाया है। जर्मनी ने ऑपर्च्युनिटी कार्ड लॉन्च किया। भारतीय टैलेंट के लिए अमेरिका अब 'ड्रीम डेस्टिनेशन' से 'रिस्की बेट' बनता जा रहा है — और यह ट्रेंड गोर की किसी भी सफ़ाई से नहीं बदलेगा।
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आने वाले महीनों में देखने वाली बात यह होगी कि क्या ट्रंप प्रशासन FY2026 की H-1B कैप में कोई बदलाव करता है, क्या वेज लेवल रिक्वायरमेंट्स में कोई ढील आती है, और क्या भारत सरकार — जो अभी तक इस मुद्दे पर काफ़ी हद तक चुप रही है — अपने नागरिकों के लिए कोई ठोस राजनयिक दबाव बनाती है। अगर ज़मीनी नीति नहीं बदली, तो राजदूत के शब्द उतने ही काम के हैं जितना बारिश में छतरी की तस्वीर — दिखती अच्छी है, भिगोने से नहीं बचाती।
लखनऊ के प्रणव, जो तीन साल से H-1B लॉटरी में हिस्सा ले रहे हैं, का कहना है — 'राजदूत साहब का बयान अच्छा लगा, लेकिन मेरा RFE अभी भी पेंडिंग है।' यही वो तस्वीर है जो कोई प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं बदल सकती। सवाल भारतीयों का नहीं है — सवाल अमेरिका का ख़ुद से है: क्या आप वो टैलेंट खोने को तैयार हैं जिस पर आपकी सिलिकॉन वैली टिकी है, सिर्फ़ इसलिए कि चुनावी रैली में 'इमिग्रेशन सख़्ती' अच्छी लगती है?
आँकड़ों में
- H-1B वीज़ा की कुल लागत रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 10 लाख रुपये से ऊपर पहुँच सकती है — रजिस्ट्रेशन, प्रीमियम प्रोसेसिंग और सरचार्ज मिलाकर।
- ट्रंप प्रशासन के दौरान RFE (Request for Evidence) की दर ऐतिहासिक ऊँचाई पर है।
मुख्य बातें
- MSN की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि ट्रंप की वीज़ा नीतियाँ भारतीयों को टारगेट नहीं करतीं, लेकिन फ़ीस, RFE और वेज लेवल रिक्वायरमेंट्स में कोई राहत की घोषणा नहीं हुई।
- H-1B वीज़ा की कुल लागत — रजिस्ट्रेशन, प्रीमियम प्रोसेसिंग, सरचार्ज मिलाकर — कई रिपोर्ट्स के मुताबिक़ दस लाख रुपये से ऊपर जा सकती है।
- गोर की सफ़ाई ट्रंप की घरेलू 'अमेरिका फ़र्स्ट' पॉलिटिक्स और भारत-अमेरिका डिप्लोमैटिक ज़रूरतों के बीच एक 'सॉफ़्ट पावर मैसेज' है, नीतिगत बदलाव नहीं।
- कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी भारतीय टैलेंट को आकर्षित करने के लिए अपनी इमिग्रेशन पॉलिसी खोल रहे हैं, जो अमेरिका के लिए दीर्घकालिक ख़तरा है।
- भारत सरकार की इस मुद्दे पर राजनयिक चुप्पी भी एक बड़ा सवाल है — क्या आने वाले महीनों में ठोस दबाव बनेगा?
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सर्जियो गोर ने H-1B वीज़ा पर क्या कहा?
MSN की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि ट्रंप प्रशासन की वीज़ा नीतियाँ भारतीयों को टारगेट नहीं करतीं और अमेरिका में भारतीय टैलेंट का स्वागत जारी है। हालाँकि, फ़ीस या RFE में राहत की कोई घोषणा नहीं हुई।
H-1B वीज़ा की फ़ीस कितनी बढ़ी है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक़ रजिस्ट्रेशन, प्रीमियम प्रोसेसिंग और विभिन्न सरचार्ज मिलाकर कुल लागत 10 लाख रुपये से ऊपर जा सकती है, जो पहले से कई गुना ज़्यादा है।
ट्रंप की H-1B नीति भारतीयों पर कैसे असर डाल रही है?
फ़ीस बढ़ोतरी, RFE की ऊँची दर और कड़े वेज लेवल रिक्वायरमेंट्स से एंट्री-लेवल भारतीय IT प्रोफ़ेशनल्स को सबसे ज़्यादा नुक़सान हो रहा है। कई आवेदकों की प्रक्रिया महीनों खिंच रही है।
क्या गोर की सफ़ाई से भारतीयों को कोई फ़ायदा होगा?
इंडिया हेराल्ड के विश्लेषण के मुताबिक़ यह एक राजनयिक गुडविल जेस्चर है, नीतिगत बदलाव नहीं। जब तक फ़ीस और RFE की ज़मीनी नीति में बदलाव नहीं होता, शब्दों से ज़्यादा कुछ नहीं बदलेगा।
H-1B के विकल्प में भारतीय कहाँ जा सकते हैं?
कनाडा का एक्सप्रेस एंट्री सिस्टम, ऑस्ट्रेलिया का ग्लोबल टैलेंट वीज़ा और जर्मनी का ऑपर्च्युनिटी कार्ड भारतीय टैलेंट के लिए तेज़ी से उभरते विकल्प बन रहे हैं।


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