ट्रंप ने ईरान को 'प्यारा देश' बताकर और MOU पर दस्तख़त कर अपनी ही 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति पलट दी है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह बदलाव भारत की चाबहार बंदरगाह योजना, ईरानी तेल आयात और इज़राइल से रक्षा ख़रीद — तीनों के समीकरण एक साथ हिला देता है।

एक हफ़्ते पहले तक वॉशिंगटन का रुख़ साफ़ था — ईरान पर 'मैक्सिमम प्रेशर', तेल पर प्रतिबंध, और तेहरान को परमाणु हथियारों से दूर रखने का अमेरिकी संकल्प। फिर डोनाल्ड ट्रंप ने कैमरे के सामने ईरान को 'lovely country' बताया, एक MOU पर दस्तख़त किए, और पूरे पश्चिम एशिया का शतरंज बोर्ड उलट दिया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने न सिर्फ़ ईरान की तारीफ़ की बल्कि इज़राइल और अमेरिकियों को एक साथ चौंकाने वाला संदेश दिया।

इस एक वाक्य ने दिल्ली के साउथ ब्लॉक में उतनी ही हलचल मचाई जितनी तेल अवीव के किर्या कॉम्प्लेक्स में। क्योंकि भारत वह देश है जो एक ही समय में चाबहार बंदरगाह पर ईरान से करार रखता है, हाइफ़ा बंदरगाह पर इज़राइल से रणनीतिक साझेदारी निभाता है, और व्हाइट हाउस से सबसे बड़ी रक्षा डील्स साइन करता है। जब वॉशिंगटन ख़ुद अपनी स्क्रिप्ट पलट दे, तो दिल्ली की तिकड़ी कहाँ खड़ी रहेगी?

ट्रंप का यू-टर्न: 'प्रेशर' से 'पार्टनरशिप' तक

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक अन्य रिपोर्ट बताती है कि ठीक उसी दौर में जब ट्रंप 'लवली कंट्री' कह रहे थे, इज़राइली लड़ाकू विमान ईरानी सीमा के क़रीब उड़ान भर रहे थे और ईरान ने ट्रंप से कहा कि 'बीबी (नेतन्याहू) को क़ाबू करो वरना...'। यानी एक ही फ़्रेम में दो विरोधाभासी तस्वीरें — अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान से दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं, और अमेरिका का सबसे क़रीबी सहयोगी इज़राइल ईरान की सीमा पर सैन्य दबाव बना रहा है।

इज़राइल के अमेरिका में राजदूत येचिएल लीटर ने MOU पर दस्तख़त के बाद ट्रंप प्रशासन का आभार जताया — लेकिन तेल अवीव के भीतर की बेचैनी छिपी नहीं रह सकी।

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएँ कड़ी हैं। एक धड़ा मान रहा है कि नेतन्याहू अब ट्रंप के सामने 'कमज़ोर' पड़ चुके हैं, जबकि दूसरा धड़ा इसे ईरान को परमाणु हथियार की ओर बढ़ने का रास्ता मान रहा है।

भारत के लिए तीन मोर्चे एक साथ हिले

पहला — चाबहार बंदरगाह और अफ़ग़ानिस्तान कनेक्टिविटी: भारत ने चाबहार पर अरबों का निवेश इसलिए किया क्योंकि यह पाकिस्तान को बायपास करके अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने का एकमात्र ज़मीनी रास्ता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के दौर में यह प्रोजेक्ट हमेशा 'waiver' के सहारे चलता रहा — कभी मिला, कभी नहीं। अगर ट्रंप सचमुच ईरान से संबंध सामान्य करते हैं, तो चाबहार पर अमेरिकी प्रतिबंधों का ख़तरा कम होगा। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है — अगर अमेरिकी कंपनियाँ ख़ुद ईरान में घुसती हैं, तो भारत का 'विशेष पहुँच' वाला दर्जा ख़त्म हो जाएगा।

दूसरा — तेल आयात और होर्मुज़ जलसंधि: भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का लगभग 85% आयात करता है, और इसका बड़ा हिस्सा होर्मुज़ जलसंधि से गुज़रता है। अमेरिका-ईरान तनाव के हर दौर में इस जलसंधि पर ख़तरा बढ़ा है। अगर दोनों देशों के रिश्ते सचमुच सुधरते हैं, तो भारत के लिए तेल की सप्लाई लाइन कुछ सुरक्षित होगी। लेकिन — और यह बड़ा 'लेकिन' है — ट्रंप की विदेश नीति में 'lovely' आज है, कल 'maximum pressure' भी हो सकता है। इस अनिश्चितता में दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति बनाना किसी को भी मुश्किल लगेगा।

तीसरा — इज़राइल से रक्षा ख़रीद और ख़ुफ़िया सहयोग: भारत इज़राइल से बड़े पैमाने पर ड्रोन, मिसाइल रक्षा प्रणालियाँ और ख़ुफ़िया तकनीक ख़रीदता रहा है। यह रिश्ता सिर्फ़ हथियारों का नहीं, रणनीतिक ख़ुफ़िया साझेदारी का भी है। अगर वॉशिंगटन तेहरान के क़रीब जाता है तो तेल अवीव का अमेरिका पर भरोसा डगमगाएगा — और ऐसे में इज़राइल भारत जैसे 'भरोसेमंद दोस्तों' से और चिपकेगा। दिल्ली के लिए यह अवसर है, लेकिन साथ ही यह जोख़िम भी है कि इज़राइल भारत से ऐसी माँगें रखे जो ईरान से रिश्तों की क़ीमत पर आएँ।

असली सवाल: ट्रंप का 'lovely' कितने दिन टिकेगा?

यही वह बिंदु है जो दिल्ली की पूरी गणित को अनिश्चित बनाता है। ट्रंप की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी अप्रत्याशितता है। जो आदमी उत्तर कोरिया के किम जोंग-उन से 'love letters' का ज़िक्र कर सकता है और फिर 'fire and fury' की धमकी दे सकता है, वह ईरान के साथ भी यही कर सकता है। भारत के विदेश मंत्रालय के लिए चुनौती यह नहीं है कि ट्रंप ईरान से दोस्ती कर रहे हैं — चुनौती यह है कि यह दोस्ती कितनी असली है और कितनी ट्रांज़ैक्शनल।

मोदी सरकार ने पिछले एक दशक में पश्चिम एशिया में जो 'मल्टी-अलाइनमेंट' की नीति अपनाई है — जहाँ दिल्ली एक ही हफ़्ते में रियाद, तेहरान और तेल अवीव तीनों से गर्मजोशी दिखा सकती है — वह नीति तभी तक काम करती है जब तक बड़ी ताक़तें आपस में एक-दूसरे से दूर रहें। जैसे ही वॉशिंगटन और तेहरान एक मेज़ पर बैठते हैं, भारत की 'बीच वाली कुर्सी' का मोल घट जाता है। क्योंकि अब तक दिल्ली की उपयोगिता यह थी कि वह ईरान से बात कर सकती है जब अमेरिका नहीं कर सकता — अगर अमेरिका ख़ुद बात करने लगे, तो दिल्ली बिचौलिया नहीं रहती, दर्शक बन जाती है।

चुनावी कैलकुलेशन: घरेलू राजनीति की गूँज

इस पूरे घटनाक्रम का एक घरेलू राजनीतिक आयाम भी है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ट्रंप की डिपोर्टेशन नीतियों और भारतीय प्रवासियों पर उनके रुख़ ने भारत में मिश्रित प्रतिक्रिया पैदा की है — एक तरफ़ उनकी 'कड़ी कार्रवाई' की तारीफ़ है, दूसरी तरफ़ अर्थव्यवस्था पर असर की चिंता। जनभावना में 'Trump destroying economy' और 'no one has done it better' दोनों धाराएँ साथ-साथ बह रही हैं। ऐसे में मोदी सरकार के लिए ट्रंप के हर यू-टर्न पर तुरंत प्रतिक्रिया देना राजनीतिक रूप से जोख़िम भरा है — न तेहरान को गले लगा सकते हैं, न तेल अवीव को नाराज़ कर सकते हैं, न वॉशिंगटन को अनदेखा कर सकते हैं।

आगे क्या?

दिल्ली की असली परीक्षा अगले कुछ हफ़्तों में है। अगर ट्रंप-ईरान MOU आगे बढ़ता है और प्रतिबंध ढीले होते हैं, तो भारत को चाबहार में निवेश तेज़ करना होगा — इससे पहले कि चीन या कोई और खिलाड़ी वहाँ पहुँचे। साथ ही इज़राइल से रक्षा साझेदारी को इस तरह मज़बूत करना होगा कि वह किसी तीसरे रिश्ते की भेंट न चढ़े। और सबसे ज़रूरी — दिल्ली को यह समझना होगा कि ट्रंप की विदेश नीति में 'lovely' एक विशेषण है, कोई रणनीति नहीं। जो देश इसे रणनीति मानकर अपनी चाल चलेगा, वह अगले ट्वीट पर औंधे मुँह गिरेगा।

असली सवाल यह नहीं है कि ट्रंप ने ईरान को 'lovely' क्यों कहा। असली सवाल यह है कि जब वह अगली सुबह इसे 'horrible' कहें, तो क्या दिल्ली के पास प्लान बी तैयार होगा?

Key Takeaways

  • टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार ट्रंप ने ईरान को 'lovely country' कहकर MOU साइन किया — यह 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति से सीधा यू-टर्न है
  • ठीक इसी दौरान इज़राइली लड़ाकू विमान ईरानी सीमा के पास उड़ रहे थे और ईरान ने ट्रंप से नेतन्याहू को 'क़ाबू' करने को कहा
  • भारत के तीन मोर्चे एक साथ प्रभावित — चाबहार बंदरगाह निवेश, होर्मुज़ से तेल आयात, और इज़राइल से रक्षा ख़रीद
  • अगर अमेरिका ख़ुद ईरान से बात करने लगे तो भारत की 'बिचौलिया' उपयोगिता घटती है
  • ट्रंप की विदेश नीति की अप्रत्याशितता ही भारत के लिए सबसे बड़ा जोख़िम — 'lovely' आज है, 'maximum pressure' कल हो सकता है

Frequently Asked Questions

ट्रंप ने ईरान के बारे में क्या कहा?

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप ने ईरान को 'lovely country' बताया और एक MOU पर दस्तख़त किए, जो उनकी पूर्व 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति से पूरी तरह उलट है।

ट्रंप की ईरान नीति बदलने से भारत पर क्या असर पड़ेगा?

भारत के तीन मोर्चे प्रभावित होंगे — चाबहार बंदरगाह पर निवेश की स्थिति, होर्मुज़ जलसंधि से तेल आयात की सुरक्षा, और इज़राइल से रक्षा ख़रीद व ख़ुफ़िया सहयोग का भविष्य।

इज़राइल की इस पर क्या प्रतिक्रिया है?

इज़राइल के राजदूत ने MOU पर ट्रंप का आभार जताया, लेकिन ईरानी सीमा के पास इज़राइली लड़ाकू विमानों की उड़ान से तनाव बना हुआ है। ईरान ने ट्रंप से नेतन्याहू को 'क़ाबू' करने की चेतावनी दी है।

भारत की मल्टी-अलाइनमेंट नीति क्या है?

भारत की पश्चिम एशिया नीति में एक साथ ईरान, इज़राइल और अमेरिका तीनों से अच्छे संबंध बनाए रखना शामिल है — चाबहार ईरान से, रक्षा तकनीक इज़राइल से, और व्यापक रणनीतिक साझेदारी अमेरिका से।

Find out more: