मोदी की सेशेल्स यात्रा हिंद महासागर में भारत के सामरिक प्रभाव को गहरा करने की कोशिश है। News18 के अनुसार, असम्पशन द्वीप पर नौसैनिक अड्डे की योजना, चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति के जवाब में भारत का सबसे अहम कदम है — और यह दौरा उसी दिशा में अगली चाल है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सेशेल्स के राष्ट्रपति डॉ. वावेल रामकलावन — Telangana Today के अनुसार।
- क्या: मोदी ने सेशेल्स का तीन दिवसीय राजकीय दौरा शुरू किया, जिसमें रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने पर बात होगी — News18 के अनुसार।
- कब: जून 2025 — मोदी 2015 के बाद दूसरी बार सेशेल्स गए हैं — Telangana Today के अनुसार।
- कहाँ: विक्टोरिया, सेशेल्स — हिंद महासागर का रणनीतिक रूप से अहम द्वीप राष्ट्र — News18 के अनुसार।
- क्यों: चीन की बढ़ती हिंद महासागर उपस्थिति — जिबूती बेस, हम्बनटोटा बंदरगाह — के मद्देनज़र भारत को सेशेल्स में अपनी पकड़ मजबूत करनी है — News18 के अनुसार।
- कैसे: असम्पशन द्वीप पर नौसैनिक सुविधा विकसित करने की योजना, INS इक्षक जैसे गश्ती जहाज़ की तैनाती, और डायस्पोरा कनेक्ट के ज़रिए — Telangana Today और News18 के अनुसार।
194 साल का कछुआ 'जोनाथन' — दुनिया का सबसे बूढ़ा ज़मीनी जीव — जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिला, तो तस्वीर प्यारी थी। लेकिन असली कहानी उस कछुए की उम्र जितनी ही पुरानी है: हिंद महासागर पर नियंत्रण की होड़, जो ब्रिटिश साम्राज्य के ज़माने से चली आ रही है और आज बीजिंग-दिल्ली के बीच सबसे तीखी शक्ल ले चुकी है। मोदी का सेशेल्स दौरा इसी होड़ में भारत की ताज़ातरीन — और शायद सबसे अहम — चाल है।
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News18 की रिपोर्ट के अनुसार, सेशेल्स भौगोलिक रूप से हिंद महासागर के ठीक बीच में स्थित है — अफ़्रीका, मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया के बीच समुद्री व्यापार मार्गों का चौराहा। चीन ने पिछले एक दशक में जिबूती में सैन्य अड्डा बनाया, श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह 99 साल की लीज़ पर लिया, और पाकिस्तान के ग्वादर को अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' की कड़ी बनाया। इस चेन में हर मोती भारत की समुद्री सीमाओं को एक और कोण से घेरता है।
और यहीं असम्पशन द्वीप का नाम आता है — वह 11 वर्ग किलोमीटर का टापू जो भारत की हिंद महासागर रणनीति का केंद्रबिंदु बनता जा रहा है। News18 के अनुसार, भारत और सेशेल्स के बीच असम्पशन द्वीप पर संयुक्त नौसैनिक सुविधा विकसित करने की योजना वर्षों से चर्चा में है। 2018 में सेशेल्स की घरेलू राजनीति ने इसे रोक दिया था — विपक्ष ने संप्रभुता का मुद्दा उठाया। लेकिन 2025 में मोदी की यह दूसरी यात्रा — पहली 2015 में हुई थी — संकेत देती है कि दोनों देश अब इस 'अधूरी चाल' को पूरा करने के क़रीब हैं।
यह दौरा महज़ फोटो-ऑप नहीं है। Telangana Today की रिपोर्ट के अनुसार, मोदी ने यात्रा से पहले कहा कि इससे दोनों देशों के बीच 'रक्षा, समुद्री सुरक्षा और विकास सहयोग' को नई गति मिलेगी। भारतीय डायस्पोरा ने विक्टोरिया में मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया — Telangana Today के अनुसार, सेशेल्स में बसे भारतीय समुदाय ने कहा कि यह दौरा 'व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करेगा'।
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चीन का असली डर: मोतियों की माला कट रही है
चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति को समझिए तो मोदी की सेशेल्स यात्रा का असली मतलब साफ़ होता है। बीजिंग ने जिबूती, ग्वादर, हम्बनटोटा, म्यानमार के क्याउकफ्यू बंदरगाह — हर जगह या तो सैन्य उपस्थिति बनाई या 'ऋण-जाल' से बंदरगाहों पर नियंत्रण हासिल किया। News18 के अनुसार, इसी के जवाब में भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मॉरीशस, मेडागास्कर, मालदीव और अब सेशेल्स के साथ अपने रक्षा संबंधों को तेज़ी से गहरा किया है।
लेकिन सेशेल्स बाक़ी सबसे अलग है — और यहीं वह बात है जो वायर कॉपी नहीं बताती। सेशेल्स में लगभग 10% आबादी भारतीय मूल की है। भारत सेशेल्स का सबसे बड़ा विकास सहयोगी है। INS इक्षक जैसे गश्ती जहाज़ भारत ने सेशेल्स को भेंट किए हैं। और असम्पशन द्वीप — अगर वहां भारतीय नौसैनिक सुविधा बन जाती है — तो यह चीन के जिबूती बेस के ठीक दक्षिण में एक 'काउंटर-वेट' खड़ा कर देगी। यह वह मोहरा है जो चेसबोर्ड पर रानी की तरह काम कर सकता है — चारों दिशाओं में।
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50 साल पुरानी दोस्ती, नया दांव
भारत और सेशेल्स के राजनयिक संबंध 1976 से हैं — तब सेशेल्स ब्रिटेन से आज़ाद हुआ था। लगभग 50 साल की इस दोस्ती में भारत ने तटरक्षक बल प्रशिक्षण, हाइड्रोग्राफ़िक सर्वे, और बुनियादी ढांचा विकास में लगातार निवेश किया है। लेकिन रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भारत ने सेशेल्स में 'बहुत कम, बहुत देर से' किया — जबकि चीन ने इसी बीच हिंद महासागर में अपने पांव तेज़ी से फैलाए।
मोदी की इस यात्रा में सेशेल्स नेशनल बॉटैनिकल गार्डन का दौरा, राष्ट्रपति रामकलावन के साथ द्विपक्षीय वार्ता, और कई समझौतों पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। News18 के अनुसार, समुद्री डोमेन अवेयरनेस (MDA), ब्लू इकॉनमी और हरित ऊर्जा सहयोग इस यात्रा के प्रमुख एजेंडा में हैं।
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घरेलू राजनीति की गणित: विदेश नीति का इनाम
एक राजनीतिक ब्यूरो की नज़र से देखें तो मोदी के लिए यह यात्रा सिर्फ भू-रणनीति नहीं, घरेलू राजनीतिक संदेश भी है। 2024 के आम चुनावों के बाद और 2026 के राज्य चुनावों के बीच, विदेश नीति में 'मज़बूत नेता' की छवि — ख़ासकर चीन के ख़िलाफ़ — बीजेपी के कोर वोटर बेस के लिए सबसे शक्तिशाली नैरेटिव है। लद्दाख़ सीमा विवाद अभी भी अनसुलझा है; ऐसे में हिंद महासागर में चीन को 'घेरने' की तस्वीरें दिल्ली के लिए वह कथा गढ़ती हैं जो सीमा पर अधूरी रह गई।
यह कोई अलग-थलग चाल नहीं है। भारत ने पिछले कुछ महीनों में QUAD को पुनर्जीवित करने, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस के साथ हिंद-प्रशांत नौसैनिक अभ्यास बढ़ाने, और मालदीव में 'इंडिया आउट' अभियान के बाद रिश्ते सुधारने में सक्रियता दिखाई है। सेशेल्स इस पूरी श्रृंखला की सबसे पश्चिमी कड़ी है — अगर असम्पशन द्वीप पर भारतीय सुविधा बनती है, तो भारत का नौसैनिक दायरा अदन की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य तक एक अर्धचंद्राकार में फैल जाएगा।
असली सवाल — और सबसे कठिन
लेकिन एक सवाल है जो कूटनीतिक भाषणों और फोटो-ऑप के पीछे छुपा रहता है: क्या सेशेल्स की घरेलू राजनीति इस बार भारत को 'हां' कहेगी? 2018 में असम्पशन द्वीप पर भारतीय बेस का समझौता सेशेल्स की संसद में रद्द हो गया था। सेशेल्स एक छोटा लोकतंत्र है — जनमत संवेदनशील है, और 'विदेशी सैन्य उपस्थिति' का मुद्दा वहां उतना ही गर्म है जितना भारत में कश्मीर। मोदी को इस बार सिर्फ राष्ट्रपति रामकलावन को नहीं, सेशेल्स की जनता को भी 'कनविंस' करना होगा कि भारत सहयोगी है, मालिक नहीं।
और यही वह जगह है जहां चीन चुपचाप अपना दांव खेलता है — बड़े ऋणों, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, और 'बिना शर्त' मदद के वादों से छोटे द्वीप राष्ट्रों को लुभाना बीजिंग का आज़माया हुआ नुस्ख़ा है। भारत के पास वह आर्थिक ताक़त नहीं है जो चीन के पास है — लेकिन भारत के पास वह चीज़ है जो बीजिंग कभी नहीं ख़रीद सकता: सांस्कृतिक रिश्ता, भाषाई क़रीबी, और 50 साल का भरोसा।
सवाल यह है कि क्या भरोसा रनवे बना सकता है — या रनवे बनाने के लिए चेकबुक ज़रूरी है? मोदी की सेशेल्स यात्रा इसी सवाल का जवाब तलाश रही है। और उस जवाब पर सिर्फ दो देशों का नहीं, पूरे हिंद महासागर का भविष्य टिका है।
आँकड़ों में
- असम्पशन द्वीप का क्षेत्रफल लगभग 11 वर्ग किलोमीटर — भारत की प्रस्तावित नौसैनिक सुविधा के लिए केंद्रबिंदु (News18)
- सेशेल्स की लगभग 10% आबादी भारतीय मूल की है
- भारत-सेशेल्स राजनयिक संबंध 1976 से — लगभग 50 साल पुराने
- चीन का जिबूती में सैन्य अड्डा, हम्बनटोटा बंदरगाह 99 साल की लीज़ पर — 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' की प्रमुख कड़ियां (News18)
मुख्य बातें
- News18 के अनुसार, सेशेल्स हिंद महासागर के केंद्र में स्थित है और चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' के जवाब में भारत का सबसे अहम रणनीतिक साझेदार है।
- असम्पशन द्वीप पर भारतीय नौसैनिक सुविधा की योजना 2018 में सेशेल्स की संसद में रद्द हो गई थी — इस बार मोदी की यात्रा इसे पुनर्जीवित करने का संकेत है।
- Telangana Today के अनुसार, भारतीय डायस्पोरा ने कहा कि यह दौरा व्यापारिक संबंधों को मजबूत करेगा — सेशेल्स की लगभग 10% आबादी भारतीय मूल की है।
- भारत ने मॉरीशस, मालदीव और अब सेशेल्स के साथ नौसैनिक सहयोग बढ़ाकर अदन की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य तक अर्धचंद्राकार नौसैनिक दायरा बनाने की कोशिश तेज़ की है।
- यह दौरा घरेलू राजनीति के लिए भी अहम है — लद्दाख़ सीमा विवाद अनसुलझा होने के बीच हिंद महासागर में चीन को 'घेरने' की छवि बीजेपी के कोर वोटर बेस के लिए शक्तिशाली नैरेटिव है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मोदी की सेशेल्स यात्रा क्यों अहम है?
हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति के जवाब में भारत सेशेल्स को रणनीतिक साझेदार के रूप में मजबूत कर रहा है। News18 के अनुसार, असम्पशन द्वीप पर नौसैनिक सुविधा की योजना इसकी सबसे अहम कड़ी है।
असम्पशन द्वीप पर भारतीय नौसैनिक बेस क्यों नहीं बन पाया?
2018 में सेशेल्स के विपक्ष ने संप्रभुता का मुद्दा उठाकर इस समझौते को संसद में रोक दिया था। मोदी की 2025 यात्रा इसे पुनर्जीवित करने का संकेत मानी जा रही है।
चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' क्या है?
चीन ने जिबूती, ग्वादर, हम्बनटोटा और क्याउकफ्यू जैसे बंदरगाहों पर नियंत्रण या उपस्थिति बनाकर हिंद महासागर में एक श्रृंखला बनाई है जिसे 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' कहा जाता है — News18 के अनुसार।
सेशेल्स में भारतीय डायस्पोरा की भूमिका क्या है?
Telangana Today के अनुसार, सेशेल्स की लगभग 10% आबादी भारतीय मूल की है और उन्होंने कहा कि मोदी का दौरा व्यापारिक संबंधों को मजबूत करेगा।




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