हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार कांग्रेस के नए UP प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने गठबंधन में बराबर सीट शेयर की मांग रखी है। यह बयान विपक्षी खेमे की अंदरूनी दरारों का सबसे ताज़ा संकेत है — 2022 में सपा-कांग्रेस गठबंधन फ्लॉप रहा था और अब अखिलेश यादव कांग्रेस को जूनियर पार्टनर से ऊपर उठाने को तैयार नहीं दिखते।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: कांग्रेस के नवनियुक्त UP प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम (हिंदुस्तान टाइम्स)
- क्या: 2027 UP विधानसभा चुनाव में गठबंधन में कांग्रेस को बराबर सीट हिस्सेदारी देने की मांग (हिंदुस्तान टाइम्स)
- कब: जून 2026, गौतम की नियुक्ति के तुरंत बाद (PTI, हिंदुस्तान टाइम्स)
- कहाँ: उत्तर प्रदेश — 403 विधानसभा सीटों वाला भारत का सबसे बड़ा राज्य
- क्यों: 2024 लोकसभा में INDIA ब्लॉक की सापेक्ष सफलता के बाद कांग्रेस अपनी बढ़ी हुई बार्गेनिंग पावर भुनाना चाहती है (हिंदुस्तान टाइम्स)
- कैसे: AICC ने गौतम को UP प्रभारी नियुक्त किया; गौतम ने सार्वजनिक रूप से बराबर सीट शेयर की शर्त रखी — यह गठबंधन वार्ता में कांग्रेस की ओर से पहला फॉर्मल पोज़िशन स्टेटमेंट है (हिंदुस्तान टाइम्स, PTI)
403 सीटों का यूपी। विपक्ष के लिए सबसे बड़ा इनाम — और सबसे बड़ा ज़ख्म भी। 2022 में सपा-कांग्रेस गठबंधन बुरी तरह फ्लॉप हुआ, कांग्रेस महज़ 2 सीटें जीत पाई। दो साल बाद 2024 लोकसभा में INDIA ब्लॉक ने UP की 80 में से 43 सीटें छीनीं — और अचानक कांग्रेस को लगा कि अब वो जूनियर पार्टनर नहीं रही। अब, जून 2026 में, नए UP प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने पदभार संभालते ही वो बात कह दी जो दिल्ली के 24 अकबर रोड पर महीनों से गूंज रही थी — \"कांग्रेस को बराबर हिस्सा मिलना चाहिए।\" हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, गौतम ने साफ़ शब्दों में कहा कि 2027 UP चुनाव में गठबंधन तभी सफल होगा जब कांग्रेस को बराबर सीट शेयर दी जाए।
यह बयान सिर्फ़ एक मांग नहीं है। यह विपक्षी खेमे के अंदर चल रही उस शतरंज की बिसात का सबसे ताज़ा मोहरा है जिसमें हर खिलाड़ी अपनी ताक़त दिखाना चाहता है — लेकिन कोई पहला कदम पीछे हटाने को तैयार नहीं।
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गौतम की नियुक्ति का संदेश: दलित कार्ड, अंबेडकरवाद और UP की जाति-गणित
राजेंद्र पाल गौतम कोई साधारण नियुक्ति नहीं हैं। PTI के अनुसार, AICC ने उन्हें तत्काल प्रभाव से UP प्रभारी बनाया है। गौतम AICC अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष हैं और एक प्रतिबद्ध अंबेडकरवादी नेता के रूप में जाने जाते हैं। दिल्ली में AAP सरकार में मंत्री रह चुके गौतम का चयन बताता है कि कांग्रेस UP में दलित-बहुजन वोट बैंक को सीधे निशाना बना रही है — वो ज़मीन जो परंपरागत रूप से BSP की थी और जिसे BJP ने 2017 और 2022 में बड़े पैमाने पर अपनी तरफ़ खींचा।
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गौतम की नियुक्ति के साथ ही AICC ने हरियाणा के लिए संजय दत्त और ओडिशा के लिए लालजी देसाई को भी प्रभारी बनाया — यह एक बड़ा संगठनात्मक फेरबदल है जो 2027 के चुनावी मौसम की तैयारी का संकेत देता है।
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2022 का ज़ख्म: सपा ने क्या सबक़ सीखा?
इतिहास की फ़ाइल खोलें तो तस्वीर साफ़ है। 2022 में सपा ने कांग्रेस को गठबंधन में जगह दी — लेकिन हाशिए पर। कांग्रेस को मिली सीटों पर उसका प्रदर्शन इतना ख़राब रहा कि सपा के भीतर एक बड़ा तबक़ा आज भी मानता है कि कांग्रेस वोट 'ट्रांसफर' नहीं करती, बल्कि 'ड्रेन' करती है। सपा के अंदर के सूत्रों का यह तर्क है कि कांग्रेस का ज़मीनी ढांचा UP में लगभग ध्वस्त है — उसके पास बूथ लेवल का वर्कर नहीं, पंचायत स्तर पर पकड़ नहीं, और जो कुछ है वो 'ब्रांड गांधी' के सहारे चलता है।
दूसरी तरफ़, 2024 लोकसभा का नतीजा कांग्रेस के लिए एक मज़बूत तर्क बन गया है। INDIA ब्लॉक की सफलता में कांग्रेस की भूमिका — चाहे वो राहुल गांधी की राष्ट्रीय नैरेटिव सेटिंग हो या संविधान-बचाओ अभियान — को नज़रअंदाज़ करना सपा के लिए भी आसान नहीं। गौतम का बयान इसी बढ़ी हुई आत्मविश्वास का प्रतिबिंब है।
सपा के अंदर दो गुट: गठबंधन बनाम अकेला दम
विपक्षी खेमे की असली कहानी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, बैठकों की बंद कमरों में लिखी जा रही है। सपा के भीतर दो साफ़ धाराएं हैं। पहली धारा — जो अखिलेश यादव के क़रीबी माने जाते हैं — का मानना है कि सपा को अकेले लड़ना चाहिए। उनका तर्क: 2012 में सपा ने अकेले 224 सीटें जीतीं, गठबंधन की ज़रूरत ही क्या? दूसरी धारा, जो ज़्यादा व्यावहारिक है, मानती है कि BJP की संगठनात्मक मशीनरी और हिंदुत्व नैरेटिव के सामने बिखरा विपक्ष कभी नहीं जीत सकता।
गौतम की 'बराबर हिस्सा' मांग इस दूसरी धारा को और भी मुश्किल स्थिति में डाल देती है। अगर कांग्रेस 200 सीटों की मांग करती है (बराबर हिस्से का सीधा मतलब), तो सपा के पास सिर्फ़ 200 सीटें बचती हैं — और यह अखिलेश यादव के लिए राजनीतिक आत्मघात जैसा होगा। ऐसे में गठबंधन समर्थक गुट भी पीछे हट सकता है।
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असली फ़ायदा किसका? लखनऊ नहीं, दिल्ली देखिए
यहीं वो मोड़ आता है जो बाक़ी रिपोर्ट्स चूक जाती हैं। गौतम का बयान UP की ज़मीन पर उतना असर नहीं डालेगा जितना दिल्ली की राजनीतिक बिसात पर। कांग्रेस के लिए यह बयान एक नेगोशिएशन टैक्टिक है — ऊंची मांग रखो, ताकि बातचीत में 80-100 सीटें भी मिलें तो 'जीत' दिखाई जा सके। लेकिन इसका दूसरा पहलू ज़्यादा ख़तरनाक है: अगर यह मांग सार्वजनिक रूप से ठुकरा दी गई, तो कांग्रेस के पास अकेले लड़ने का बहाना बन जाता है — और विपक्षी वोट का बंटवारा BJP की सबसे बड़ी सहूलियत।
2017 में BSP-सपा की लड़ाई ने BJP को 312 सीटें दिलाईं। 2022 में विपक्ष का बिखराव फिर भाजपा के काम आया। पैटर्न साफ़ है: जब तक विपक्ष आपस में लड़ता रहता है, लखनऊ का रास्ता कमल के निशान से होकर गुज़रता है।
BJP का मौन: सबसे ऊंची रणनीति
ग़ौर कीजिए — इस पूरे विवाद पर BJP की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। यह मौन अचानक नहीं है। BJP का सबसे कामयाब चुनावी फ़ॉर्मूला हमेशा यही रहा है: विपक्ष को आपस में लड़ने दो, ख़ुद अपना संगठन मज़बूत करो, और चुनाव से ठीक पहले ध्रुवीकरण का बटन दबा दो। गौतम की मांग और सपा की संभावित ना — यह दोनों मिलकर वही स्क्रिप्ट लिख रहे हैं जो BJP चाहती है।
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आगे की राह: तीन सवाल जो 2027 तय करेंगे
पहला — क्या अखिलेश यादव कांग्रेस को 'सम्मानजनक' सीट शेयर देने को तैयार होंगे, या 2022 वाला 'टोकन पार्टनर' फ़ॉर्मूला दोहराएंगे? दूसरा — क्या कांग्रेस की ज़मीनी ताक़त UP में इतनी है कि वो बराबरी की मांग को जस्टिफ़ाई कर सके, या यह सिर्फ़ राष्ट्रीय ब्रांड वैल्यू का खेल है? तीसरा — BSP और AIMIM जैसी पार्टियां इस गठबंधन-नाटक में कहां खड़ी होंगी, और क्या वे विपक्षी वोट को और बांटेंगी?
एक बात तय है — 2027 UP चुनाव का फ़ैसला बूथ पर नहीं, बातचीत की मेज़ पर हो रहा है। और अभी तक उस मेज़ पर सबसे आराम से बैठी पार्टी वो है जिसे निमंत्रण भी नहीं दिया गया — BJP। जब तक कांग्रेस और सपा यह तय नहीं कर लेतीं कि दुश्मन कौन है — सामने वाला या बग़ल वाला — लखनऊ का सिंहासन वहीं रहेगा जहां है।
आँकड़ों में
- 2022 UP चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन में कांग्रेस ने सिर्फ़ 2 सीटें जीतीं
- 2024 लोकसभा में INDIA ब्लॉक ने UP की 80 में से 43 सीटें जीतीं
- UP विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं — बराबर हिस्से का मतलब कांग्रेस लगभग 200 सीटों की दावेदारी कर रही है
- 2017 UP चुनाव में BJP ने विपक्षी बिखराव के बीच 312 सीटें जीती थीं
मुख्य बातें
- हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार कांग्रेस के नए UP प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने 2027 चुनाव में गठबंधन में बराबर सीट शेयर की मांग रखी
- 2022 UP विधानसभा में सपा-कांग्रेस गठबंधन में कांग्रेस महज़ 2 सीटें जीत पाई थी — यह अनुभव सपा के भीतर गठबंधन-विरोधी गुट को मज़बूत करता है
- 2024 लोकसभा में INDIA ब्लॉक ने UP की 80 में से 43 सीटें जीतीं — कांग्रेस इसे अपनी बढ़ी बार्गेनिंग पावर का आधार मानती है
- गौतम अंबेडकरवादी नेता हैं — उनकी नियुक्ति UP में दलित-बहुजन वोट बैंक को निशाना बनाने की कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है
- सपा के अंदर दो गुट हैं: एक गठबंधन चाहता है, दूसरा अकेले लड़ने के पक्ष में — कांग्रेस की ऊंची मांग दोनों गुटों को असहज करती है
- विपक्ष का यह आंतरिक टकराव BJP के लिए सबसे अनुकूल स्थिति बना रहा है — 2017 और 2022 का पैटर्न इसकी पुष्टि करता है
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
2027 UP चुनाव में कांग्रेस कितनी सीटों की मांग कर रही है?
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार कांग्रेस के UP प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने गठबंधन में 'बराबर हिस्सेदारी' की मांग रखी है। UP में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं, इसलिए बराबर हिस्से का मतलब लगभग 200 सीटों की दावेदारी है।
राजेंद्र पाल गौतम कौन हैं और उन्हें UP प्रभारी क्यों बनाया गया?
PTI के अनुसार राजेंद्र पाल गौतम AICC अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष और अंबेडकरवादी नेता हैं। पहले दिल्ली में AAP सरकार में मंत्री रह चुके हैं। उनकी नियुक्ति UP में दलित-बहुजन वोट बैंक को निशाना बनाने की कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
2022 UP चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन का क्या हुआ था?
2022 UP विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस को गठबंधन में शामिल किया था, लेकिन कांग्रेस सिर्फ़ 2 सीटें जीत पाई। सपा के भीतर एक बड़ा वर्ग इसे गठबंधन की विफलता मानता है।
विपक्षी गठबंधन की खींचतान से BJP को क्या फ़ायदा होगा?
2017 में BSP-सपा की लड़ाई के बीच BJP ने 312 सीटें जीतीं। 2022 में भी विपक्षी बिखराव BJP के काम आया। अगर 2027 में भी कांग्रेस-सपा गठबंधन नहीं बनता या बिखरता है, तो विपक्षी वोट बंट जाएगा और BJP को सीधा फ़ायदा होगा।



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