केंद्र सरकार ने 1 अक्टूबर 2026 से दो चरणों में 16वीं जनगणना शुरू करने की घोषणा की है — 2011 के बाद पहली बार। News On AIR के अनुसार यह प्रक्रिया डिजिटल होगी, लेकिन जाति गणना शामिल होगी या नहीं, यह अब तक अनिर्णीत है — और यही सवाल 2029 तक की पूरी सियासी बिसात बदल सकता है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय और रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इंडिया — News On AIR के अनुसार
- क्या: 16वीं जनगणना दो चरणों में 1 अक्टूबर 2026 से शुरू होगी — 2011 के बाद 15 साल का अंतराल समाप्त होगा
- कब: 1 अक्टूबर 2026 से — पहला चरण हाउस-लिस्टिंग, दूसरा चरण जनसंख्या गणना
- कहाँ: संपूर्ण भारत — सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश
- क्यों: संविधान-अनिवार्य दशकीय गणना; कोविड-19 के कारण 2021 की गणना स्थगित हुई थी, अब 15 साल बाद अपडेटेड डेटा ज़रूरी
- कैसे: डिजिटल मोड में दो चरणों में — पहले मकान-सूचीकरण और आवास गणना, फिर वास्तविक जनसंख्या गिनती
पंद्रह साल। इतने में एक बच्चा पैदा होकर दसवीं पास कर लेता है, एक गाँव शहर बन जाता है, और एक देश की पूरी जनसांख्यिकी पलट जाती है। लेकिन भारत अभी तक 2011 के आँकड़ों से काम चला रहा था — जैसे कोई 2026 में 2011 का नक्शा लेकर रास्ता ढूँढ रहा हो। अब, News On AIR की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 अक्टूबर 2026 से 16वीं जनगणना दो चरणों में शुरू होगी। पहली नज़र में यह सिर्फ़ एक प्रशासनिक घोषणा लगती है — लेकिन जो इसकी सतह के नीचे दबा है, वह 2029 लोकसभा चुनाव तक का सियासी भूचाल तय कर सकता है।
सवाल सीधा है और इसका जवाब रुका हुआ है: क्या इस जनगणना में जाति की गिनती होगी?
जनगणना 2026 — क्या बदला, क्या पुराना?
2011 की जनगणना में भारत की आबादी 121 करोड़ दर्ज हुई थी। अब अनुमान 145 करोड़ से ऊपर पहुँच चुके हैं — संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या अनुमानों के अनुसार भारत 2023 में ही चीन को पछाड़कर दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया। लेकिन इस 'सबसे बड़ी आबादी' का कोई ताज़ा, प्रामाणिक ब्यौरा नहीं था। कोविड-19 महामारी ने 2021 की निर्धारित गणना रोक दी, और फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इसे और लटकाए रखा।
अब जो ढाँचा सामने आया है वह डिजिटल है — पहला चरण मकान-सूचीकरण और आवास गणना का होगा, दूसरा चरण वास्तविक जनसंख्या गिनती का। News On AIR के अनुसार यह पूरी तरह डिजिटल मोड में होगी, जो अपने आप में 1872 से चली आ रही काग़ज़ी परंपरा का सबसे बड़ा बदलाव है।
जाति गणना: वो हाथी जो कमरे में खड़ा है
हर दशक की जनगणना धर्म, भाषा, शिक्षा, आवास गिनती है। लेकिन 1931 के बाद से — लगभग एक सदी से — जाति की व्यवस्थित गणना केंद्रीय जनगणना में नहीं हुई। SC और ST की गिनती होती है, लेकिन OBC समेत पूरी जातीय संरचना का ब्यौरा ग़ायब रहता है। यही वो अँधेरा कोना है जहाँ से सबसे तीखी राजनीतिक लड़ाई निकलती है।
बिहार सरकार ने 2023 में राज्य-स्तरीय जाति सर्वेक्षण कराया — जिसमें OBC आबादी 63% से ऊपर निकली। इस आँकड़े ने विपक्षी गठबंधन INDIA को ज़बरदस्त हथियार दिया, और कांग्रेस-RJD-JDU-SP सबने राष्ट्रीय जाति गणना की माँग तेज़ कर दी। दूसरी तरफ़, BJP का आधिकारिक रुख अब तक सतर्क रहा है — न स्पष्ट 'हाँ', न पूरी 'ना'।
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पॉलिटिकल पल्स — परदे के पीछे क्या चल रहा है?
सियासी गलियारों में जो फुसफुसाहट है, वह इससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प है। पहली बात: सत्तापक्ष के भीतर एक धड़ा मानता है कि अगर जाति गणना होती है तो OBC आँकड़े BJP के 'सबका साथ' नैरेटिव को और मज़बूत कर सकते हैं — ख़ासकर अगर आँकड़े दिखाएँ कि मोदी सरकार के दौर में OBC कल्याण योजनाओं का लाभ पहुँचा। दूसरी बात: विपक्ष में यह गणित है कि जाति के कच्चे आँकड़े सामने आते ही 50% आरक्षण सीमा (इंदिरा साहनी फ़ैसला, 1992) पर सुप्रीम कोर्ट में नई लड़ाई शुरू होगी — और वह लड़ाई 2029 से ठीक पहले चुनावी सोने में बदल सकती है।
तीसरी और सबसे चुप्पी वाली बात: दक्षिण भारत के राज्य — तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक — डरे हुए हैं। क्यों? क्योंकि जनगणना 2026 के आँकड़े परिसीमन (Delimitation) का आधार बनेंगे। 2002 में 84वें संविधान संशोधन ने 2026 तक लोकसभा सीटों की संख्या फ़्रीज़ की थी। अगर नई जनसंख्या के आधार पर सीटें बँटीं, तो UP-बिहार-MP-राजस्थान को दर्जनों नई सीटें मिलेंगी, और दक्षिण के राज्य — जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण किया — सीटें गँवाएँगे। यह उत्तर बनाम दक्षिण का सबसे विस्फोटक सियासी टकराव बन सकता है।
(यह गलियारों की चर्चा और विश्लेषकों के आकलन पर आधारित है, पुष्ट सरकारी फ़ैसला नहीं।)
परिसीमन: कौन जीतेगा, कौन हारेगा?
आँकड़ों को सीधा रखें। 2011 की जनगणना के अनुसार UP की आबादी लगभग 20 करोड़ थी — अब अनुमान 25 करोड़ के पार है। बिहार 10 करोड़ से बढ़कर 13 करोड़ के आसपास। दूसरी ओर, तमिलनाडु और केरल की जनसंख्या वृद्धि दर 1% से भी कम रही है। अगर प्रति व्यक्ति प्रतिनिधित्व के आधार पर सीटें तय हों, तो:
• UP को मौजूदा 80 से बढ़कर 90+ सीटें मिल सकती हैं — विभिन्न जनसंख्या अनुमानों के आधार पर
• बिहार को 40 से बढ़कर 50 के करीब
• तमिलनाडु-केरल को 5-8 सीटों का नुकसान हो सकता है
यह 'अनुशासित राज्यों को सज़ा' का नैरेटिव पहले से ही तमिलनाडु में DMK और केरल में LDF के बयानों में दिख रहा है। इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि परिसीमन का यह टकराव 2029 चुनाव का सबसे बड़ा फ़ॉल्ट-लाइन बनने जा रहा है — जाति गणना से भी बड़ा, क्योंकि इसमें सीधे-सीधे सत्ता की कुर्सियाँ दाँव पर हैं।
आरक्षण: 50% की लक्ष्मण रेखा टूटेगी?
अगर जनगणना 2026 में जातिवार डेटा आता है, तो सबसे पहला असर आरक्षण पर पड़ेगा। बिहार के 2023 के सर्वे में EBC (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) की संख्या 36% निकली — जो अब तक के किसी भी अनुमान से ज़्यादा थी। अगर राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा पैटर्न दिखा, तो:
• 50% आरक्षण सीमा पर नई कानूनी चुनौती अनिवार्य हो जाएगी
• तमिलनाडु (69% आरक्षण) और छत्तीसगढ़-झारखंड जैसे राज्य अपने ऊँचे कोटे को संवैधानिक वैधता दिलाने की माँग तेज़ करेंगे
• SC/ST आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण (sub-classification) की बहस और तीखी होगी — सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इसे अनुमति दी है
डिजिटल जनगणना: नया मौक़ा या नया ख़तरा?
इस बार की गणना पूरी तरह डिजिटल होगी — यानी टैबलेट और ऐप से डेटा कलेक्शन। एक तरफ़ यह पारदर्शिता और गति बढ़ाएगा, दूसरी तरफ़ डेटा प्राइवेसी का सवाल विशाल है। आधार से लिंकेज, NPR (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) के साथ जोड़ने की आशंका, और NRC (नागरिकता रजिस्टर) की छाया — ये सब मिलकर मुस्लिम-अल्पसंख्यक समुदायों और नागरिक अधिकार संगठनों में चिंता पैदा कर रहे हैं। 2019-20 में CAA-NRC विरोध की यादें अभी धुँधली नहीं हुई हैं।
हिंदी बेल्ट: जहाँ सबसे ज़्यादा दाँव पर है
UP, बिहार, MP, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ — यही वो राज्य हैं जहाँ जनगणना 2026 का हर आँकड़ा सीधे सियासत बदलेगा। यहाँ OBC आबादी का सही अनुपात पता चलने से मंडल-उत्तर राजनीति का नया अध्याय शुरू हो सकता है। BJP का 2024 लोकसभा में UP में गिरा वोट-शेयर (विभिन्न विश्लेषणों के अनुसार OBC-दलित समेकन इसकी एक वजह बताई जाती है) और SP-कांग्रेस गठबंधन की 'PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक)' रणनीति — ये सब नई जनगणना के आँकड़ों से या तो पुष्ट होंगे या ख़ारिज।
कहने को यह गणना 'हर दस साल में होने वाली संवैधानिक औपचारिकता' है। लेकिन जब 15 साल का अँधेरा एक साथ छँटेगा, तो जो तस्वीर सामने आएगी — वो सिर्फ़ संख्याओं की नहीं, सत्ता के नक्शे की होगी। जाति गिनी जाएगी या नहीं, परिसीमन कब और कैसे होगा, आरक्षण की सीमा बढ़ेगी या अदालत रोकेगी — इन तीन सवालों के जवाब 2029 तक की भारतीय राजनीति की दिशा तय करेंगे।
और असली सवाल यह है: जिस देश ने 15 साल तक अपने लोगों को गिनने से परहेज़ किया, क्या वह अब उन्हें पहचानने की भी हिम्मत करेगा?
आँकड़ों में
- 2011 की जनगणना में भारत की आबादी 121 करोड़ थी — अनुमानित 2026 आबादी 145 करोड़ से ऊपर (UN जनसंख्या अनुमान)
- बिहार जाति सर्वे 2023 में OBC आबादी 63% से अधिक और EBC 36% दर्ज हुई
- 1931 के बाद — लगभग 95 साल से — केंद्रीय जनगणना में पूर्ण जातीय गणना नहीं हुई
- 84वें संविधान संशोधन (2002) ने 2026 तक लोकसभा सीटों की संख्या फ़्रीज़ की थी
मुख्य बातें
- 16वीं जनगणना 1 अक्टूबर 2026 से दो चरणों में शुरू होगी — 2011 के बाद 15 साल का सबसे लंबा अंतराल समाप्त होगा (News On AIR)
- जाति गणना शामिल होगी या नहीं — यह अनिर्णीत है और 2029 लोकसभा चुनाव से पहले सबसे विस्फोटक राजनीतिक सवाल बना हुआ है
- परिसीमन से UP-बिहार को दर्जनों नई लोकसभा सीटें मिल सकती हैं, जबकि दक्षिणी राज्यों को सीटें गँवानी पड़ सकती हैं — उत्तर बनाम दक्षिण टकराव
- बिहार के 2023 जाति सर्वे में OBC आबादी 63% से ऊपर निकली — अगर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा पैटर्न दिखा तो 50% आरक्षण सीमा पर नई कानूनी लड़ाई अनिवार्य
- पहली बार पूरी तरह डिजिटल गणना — पारदर्शिता बढ़ेगी लेकिन डेटा प्राइवेसी, आधार लिंकेज और NPR-NRC जुड़ाव की आशंकाएँ भी
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जनगणना 2026 कब से शुरू होगी?
News On AIR के अनुसार 16वीं जनगणना 1 अक्टूबर 2026 से दो चरणों में शुरू होगी — पहला चरण मकान-सूचीकरण और दूसरा चरण जनसंख्या गणना।
क्या जनगणना 2026 में जाति गणना होगी?
अभी तक केंद्र सरकार ने जाति गणना शामिल करने का कोई आधिकारिक फ़ैसला नहीं किया है। विपक्ष और कई राज्य सरकारें इसकी माँग कर रही हैं, लेकिन अंतिम निर्णय लंबित है।
जनगणना 2026 का परिसीमन पर क्या असर होगा?
84वें संविधान संशोधन (2002) ने 2026 तक लोकसभा सीटें फ़्रीज़ की थीं। नई जनगणना के आँकड़ों के आधार पर परिसीमन होने पर UP-बिहार जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों को ज़्यादा सीटें मिल सकती हैं और दक्षिणी राज्यों को कम।
जनगणना 2026 डिजिटल कैसे होगी?
इस बार पहली बार गणना पूरी तरह डिजिटल मोड में होगी — टैबलेट और ऐप के ज़रिए डेटा कलेक्शन किया जाएगा, जो पारंपरिक काग़ज़ी प्रक्रिया से बड़ा बदलाव है।
जनगणना 2026 से आरक्षण कैसे प्रभावित होगा?
अगर जातिवार डेटा आता है और OBC आबादी का सही अनुपात सामने आता है, तो सुप्रीम कोर्ट के 50% आरक्षण सीमा (इंदिरा साहनी फ़ैसला, 1992) पर नई कानूनी चुनौती आ सकती है, और राज्यों में आरक्षण विस्तार की माँग तेज़ होगी।





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