टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी ज़िले में आदिवासी समुदाय ने आरोप लगाया है कि चीन पिछले छह वर्षों से LAC के भारतीय हिस्से में धीमी घुसपैठ कर रहा है — सड़कें और संरचनाएँ बना रहा है — जबकि केंद्र व राज्य सरकार ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी ज़िले का आदिवासी (ट्राइबल) समुदाय, जिसने चीन की कथित घुसपैठ का मुद्दा उठाया है (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • क्या: आदिवासियों का आरोप है कि चीनी पक्ष ने छह वर्षों में भारतीय सीमा क्षेत्र में सड़कें और संरचनाएँ बनाकर 'सलामी-स्लाइसिंग' रणनीति से ज़मीन पर कब्ज़ा बढ़ाया है (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • कब: यह घुसपैठ लगभग छह साल पहले शुरू हुई बताई जाती है और 2026 तक जारी है (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • कहाँ: अरुणाचल प्रदेश का अपर सुबनसिरी ज़िला, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से सटा हुआ है (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • क्यों: आदिवासियों का कहना है कि दुर्गम भौगोलिक स्थिति, सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे की कमी और केंद्र-राज्य स्तर पर ठोस कार्रवाई के अभाव ने चीन को धीमी घुसपैठ का मौका दिया है (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • कैसे: चीन ने कथित रूप से LAC के भारतीय हिस्से में सड़क निर्माण और स्थायी संरचनाओं के ज़रिए यथास्थिति बदलने की 'सलामी-स्लाइसिंग' रणनीति अपनाई — छोटे-छोटे क़दमों से ज़मीन पर नियंत्रण बढ़ाया (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।

छह साल। यानी दो लोकसभा चुनावों का वक़्त। यानी कम से कम दो केंद्रीय बजट, कई विदेश मंत्री स्तर की बैठकें, और LAC पर तनाव-शांति-तनाव के अनगिनत चक्र। इतने लंबे अरसे में अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी ज़िले का एक आदिवासी समुदाय बार-बार एक ही बात चिल्लाता रहा — "चीन हमारी ज़मीन पर आ रहा है" — और दिल्ली तथा ईटानगर, दोनों ने ऐसे सुना जैसे पहाड़ों से बस हवा गुज़र रही हो।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ताज़ा रिपोर्ट ने इस ख़ामोशी की परतें उधेड़ी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़, अपर सुबनसिरी के आदिवासी समुदाय ने स्पष्ट आरोप लगाया है कि चीनी पक्ष ने पिछले छह वर्षों में LAC के भारतीय हिस्से में सड़कें बनाईं, संरचनाएँ खड़ी कीं, और धीरे-धीरे ज़मीनी यथास्थिति को अपने पक्ष में बदल डाला। यह वही रणनीति है जिसे रक्षा विश्लेषक 'सलामी-स्लाइसिंग' कहते हैं — एक बड़ा टुकड़ा नहीं काटना, बल्कि इतने पतले-पतले स्लाइस काटना कि किसी को पता ही न चले कब आधी सलामी ख़त्म हो गई।

सलामी-स्लाइसिंग: वह रणनीति जो लद्दाख़ में काम कर चुकी है

अपर सुबनसिरी की कहानी को अलग-थलग करके देखना भूल होगी। 2020 में गलवान घाटी में जो हुआ, उसके पहले भी डेपसांग, डेमचोक और गोगरा जैसे इलाक़ों में चीन ने यही किया था — छोटे-छोटे क़दमों से बफ़र ज़ोन बनाना, गश्ती रास्ते बदलना, और एक दिन दावा करना कि 'यह तो हमेशा से हमारा था।' टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में आदिवासियों की शिकायत का सार यही है — चीन सड़कें बना रहा है, कंक्रीट की संरचनाएँ खड़ी कर रहा है, और हर गुज़रते साल के साथ उसकी 'उपस्थिति' थोड़ी और भीतर आ रही है।

सवाल यह नहीं है कि चीन ऐसा कर रहा है या नहीं — बीजिंग की सीमा नीति में यह कोई नई बात नहीं। असली सवाल यह है कि जब स्थानीय समुदाय छह साल से चेतावनी दे रहा है, तो भारतीय तंत्र — चाहे सेना हो, ITBP हो, या नागरिक प्रशासन — ने इतनी देर क्यों लगाई?

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में इस कहानी को लेकर एक अजीब चुप्पी है, और वह चुप्पी ही असल ख़बर है। अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की सरकार है — और केंद्र में भी। विपक्ष इस मुद्दे को उठाने से हिचकता है क्योंकि 'राष्ट्रीय सुरक्षा' पर सवाल उठाना 'देशद्रोही' ठहराए जाने का जोखिम रखता है। सत्ता पक्ष इसलिए चुप है क्योंकि यह उसकी अपनी विफलता का आईना है। नतीजा? जो आदिवासी समुदाय ज़मीन पर सबसे पहले ख़तरा भाँपता है, वही सबसे अकेला है।

रक्षा विश्लेषकों के हलक़ों में फुसफुसाहट यह है कि अपर सुबनसिरी जैसे इलाक़ों में भारतीय गश्त की फ्रीक्वेंसी उतनी नहीं है जितनी लद्दाख़ सेक्टर में 2020 के बाद बढ़ाई गई — क्योंकि मीडिया का ध्यान पश्चिमी सेक्टर पर केंद्रित रहा और पूर्वी सेक्टर 'शांत' मान लिया गया। लेकिन चीन के लिए 'शांत' का मतलब 'मौक़ा' होता है — यह बात दोआब से लेकर दक्षिण चीन सागर तक उसके हर पड़ोसी ने सीखी है।

(यह अनुभाग इंडस्ट्री और सुरक्षा हलकों में चल रही चर्चा तथा अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

बुनियादी ढाँचे का अंतर: LAC के दोनों तरफ़ की तस्वीर

चीन की सलामी-स्लाइसिंग तभी काम करती है जब दूसरी तरफ़ सड़क न हो, चौकी न हो, और आँख न हो। अपर सुबनसिरी की भौगोलिक सच्चाई यही है — दुर्गम पहाड़ी इलाक़ा, बारिश में टूट जाने वाली सड़कें, और भारतीय सीमा अवसंरचना जो अभी भी 'निर्माणाधीन' की तख़्ती लगाए बैठी है। दूसरी तरफ़, सैटेलाइट इमेजरी विश्लेषकों ने पिछले वर्षों में दिखाया है कि चीन ने LAC के अपने हिस्से में — और कई बार भारतीय दावे वाले हिस्से में — तेज़ी से ऑल-वेदर सड़कें, हेलीपैड और निगरानी ढाँचा खड़ा किया है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में आदिवासियों ने ठीक इसी अंतर की ओर इशारा किया — कि चीनी पक्ष बना रहा है और भारतीय पक्ष देख रहा है।

भारत सरकार ने हाल के वर्षों में सीमा सड़क संगठन (BRO) के ज़रिए अरुणाचल में कई परियोजनाएँ शुरू कीं — सेला टनल जैसी उपलब्धियाँ इसका प्रमाण हैं। लेकिन जब तक बुनियादी ढाँचा 'पहुँचता' है, तब तक चीन ज़मीनी हक़ीक़त एक क़दम और आगे बढ़ा चुका होता है। यही सलामी-स्लाइसिंग की क्रूर गणित है — आपकी सड़क पहुँचे इससे पहले उसकी दीवार खड़ी हो जाती है।

आदिवासी: सीमा सुरक्षा के 'अनसंग सेंटिनल'

इस पूरे प्रकरण का सबसे त्रासद पहलू यह है कि भारत की सीमा नीति में आदिवासी समुदायों को 'लाभार्थी' तो माना जाता है — वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम, सीमा विकास योजनाएँ — लेकिन 'सूचनादाता' या 'भागीदार' शायद ही कभी। जबकि सच्चाई यह है कि LAC पर ये समुदाय वह 'ह्यूमन सेंसर नेटवर्क' हैं जो किसी सैटेलाइट से पहले बता सकते हैं कि पहाड़ की उस तरफ़ कुछ बदल रहा है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में यही बात सबसे ज़ोर से गूँजती है — छह साल। छह साल तक आदिवासी ने बताया, और तंत्र ने अनसुना किया।

इंडिया हेराल्ड का आकलन यह है कि अपर सुबनसिरी का यह मामला सिर्फ़ एक ज़िले की कहानी नहीं है — यह भारत की पूरी LAC नीति में उस संरचनात्मक खामी का आईना है जहाँ 'ग्राउंड इंटेलिजेंस' और 'पॉलिसी रिस्पॉन्स' के बीच छह-छह साल का अंतर हो सकता है। जब तक यह अंतर नहीं पटता, चीन की सलामी से और स्लाइस कटते रहेंगे।

आगे क्या: दिल्ली के लिए तीन अनिवार्य क़दम

पहला — अपर सुबनसिरी सहित पूर्वी LAC सेक्टर में गश्त की फ्रीक्वेंसी और गुणवत्ता बढ़ाना ज़रूरी है। गलवान के बाद पश्चिमी सेक्टर में जो सतर्कता आई, वह पूर्व में 'बाय डिफ़ॉल्ट' नहीं पहुँची — इसे नीतिगत रूप से स्थानांतरित करना होगा।

दूसरा — आदिवासी समुदायों को सीमा निगरानी में औपचारिक भूमिका देनी होगी। केवल 'योजनाओं का लाभ' नहीं, बल्कि 'सूचना-साझेदारी तंत्र' में शामिल करना होगा — जैसे कुछ हद तक लद्दाख़ में स्थानीय खुफ़िया इकाइयाँ करती हैं।

तीसरा — और शायद सबसे ज़रूरी — सियासी चुप्पी तोड़नी होगी। अगर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों इस मुद्दे पर चुप रहते हैं — एक शर्मिंदगी से, दूसरा 'राष्ट्रवादी' लेबल के डर से — तो वह आदिवासी समुदाय, जो ज़मीन पर सबसे पहले ख़तरा देखता है, फिर अगले छह साल भी अकेला चिल्लाता रहेगा।

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अपर सुबनसिरी की यह कहानी अभी शुरू नहीं हुई है — यह छह साल पुरानी है। सवाल यह नहीं कि चीन रुकेगा या नहीं। सवाल यह है कि भारत सुनना कब शुरू करेगा — और सुनने के बाद हिलना कब?

आँकड़ों में

  • अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी ज़िले में आदिवासी समुदाय के अनुसार चीन की कथित घुसपैठ लगभग 6 वर्षों से जारी है (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • भारत-चीन LAC लगभग 3,488 किमी लंबी है, जिसमें अरुणाचल प्रदेश का पूर्वी सेक्टर सबसे लंबा हिस्सा है।

मुख्य बातें

  • टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, अपर सुबनसिरी के आदिवासी समुदाय ने आरोप लगाया है कि चीन छह वर्षों से LAC के भारतीय हिस्से में सड़कें और संरचनाएँ बना रहा है।
  • 'सलामी-स्लाइसिंग' रणनीति — छोटे-छोटे क़दमों से ज़मीनी यथास्थिति बदलना — चीन ने लद्दाख़ में भी अपनाई थी; अब पूर्वी सेक्टर में इसकी पुनरावृत्ति का ख़तरा है।
  • भारत की सीमा नीति में आदिवासी समुदायों को 'सूचनादाता' की बजाय सिर्फ़ 'लाभार्थी' माना जाता है — यह संरचनात्मक खामी है।
  • सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की सियासी चुप्पी इस मुद्दे पर सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
  • पूर्वी LAC सेक्टर में गश्त की सघनता पश्चिमी सेक्टर की तुलना में कम बताई जाती है — रक्षा विश्लेषकों के हलकों में यह चिंता का विषय है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अपर सुबनसिरी में चीन की कथित घुसपैठ कब से हो रही है?

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय आदिवासी समुदाय का कहना है कि यह घुसपैठ लगभग छह वर्षों से जारी है, जिसमें चीनी पक्ष ने सड़कें और संरचनाएँ बनाई हैं।

सलामी-स्लाइसिंग रणनीति क्या होती है?

यह एक सैन्य-राजनयिक रणनीति है जिसमें किसी देश की सीमा पर छोटे-छोटे, लगभग अदृश्य क़दमों से ज़मीनी नियंत्रण बढ़ाया जाता है — ताकि कोई एक बड़ा उकसावा न हो, लेकिन समय के साथ यथास्थिति बदल जाए। चीन ने लद्दाख़ और दक्षिण चीन सागर में भी यही रणनीति अपनाई है।

भारत सरकार ने अरुणाचल में सीमा सुरक्षा के लिए क्या क़दम उठाए हैं?

सरकार ने BRO के ज़रिए सेला टनल जैसी परियोजनाएँ पूरी की हैं और वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम जैसी योजनाएँ शुरू की हैं, लेकिन आदिवासी समुदाय का आरोप है कि ज़मीनी स्तर पर निगरानी और प्रतिक्रिया में अभी भी बड़ा अंतर है।

अरुणाचल प्रदेश में LAC कितनी लंबी है?

भारत-चीन LAC कुल लगभग 3,488 किमी लंबी है, जिसमें अरुणाचल प्रदेश का पूर्वी सेक्टर सबसे बड़ा हिस्सा है — यही वह सेक्टर है जहाँ चीन पूरे अरुणाचल को 'दक्षिणी तिब्बत' बताकर दावा करता है।

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