पाकिस्तान ने कश्मीर में दशकों तक जिस 'आज़ादी' के नैरेटिव को हथियार बनाया, वही अब PoK के मुज़फ़्फ़राबाद से गिलगित-बाल्टिस्तान तक विद्रोह की शक्ल में पलट रहा है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, पाकिस्तान की प्रॉक्सी-वॉर नीति अब उसके अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन चुकी है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: पाकिस्तान सरकार, PoK की जनता, गिलगित-बाल्टिस्तान के निवासी, TTP, भारत सरकार (MEA)
  • क्या: पाकिस्तान की कश्मीर में 'आज़ादी' प्रॉक्सी-वॉर नीति अब PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान में उसी के ख़िलाफ़ विद्रोह के रूप में बूमरैंग बन रही है
  • कब: 2025-2026 में PoK में बढ़ते विरोध प्रदर्शन और पाक-अफ़ग़ान सीमा पर लगातार हमले; कराची हमले के बाद MEA का ताज़ा बयान (जून 2025)
  • कहाँ: PoK (मुज़फ़्फ़राबाद), गिलगित-बाल्टिस्तान, पाक-अफ़ग़ान सीमा (ख़ैबर पख़्तूनख़्वा), कराची
  • क्यों: दशकों तक प्रॉक्सी-वॉर और 'आज़ादी' नैरेटिव को हथियार बनाने की नीति ने पाकिस्तान के भीतर ही अलगाववादी और विद्रोही ताक़तें पैदा कर दीं
  • कैसे: कश्मीर में जिहादी इंफ़्रास्ट्रक्चर बनाने वाले नेटवर्क अब PoK और बलूचिस्तान में पाकिस्तानी राज्य के ख़िलाफ़ ही सक्रिय हैं; TTP पाक-अफ़ग़ान सीमा से हमले कर रहा है; PoK की जनता बुनियादी अधिकारों की माँग में सड़कों पर है

एक पुरानी कहावत है — जो हवा बोता है, वो तूफ़ान काटता है। पाकिस्तान ने कश्मीर में चार दशक तक 'आज़ादी' की हवा बोई, प्रॉक्सी वॉरियर पाले, मदरसों में नैरेटिव गढ़ा, और संयुक्त राष्ट्र के हर मंच पर इसे 'स्वतंत्रता संग्राम' कहकर बेचा। लेकिन 2026 में खड़े होकर देखिए — वही तूफ़ान अब इस्लामाबाद के अपने आँगन में बवंडर बनकर घूम रहा है। PoK की सड़कें धधक रही हैं, गिलगित-बाल्टिस्तान में लोग संवैधानिक अधिकारों की गुहार लगा रहे हैं, और पाक-अफ़ग़ान सीमा पर TTP के हमलों ने पाकिस्तानी फ़ौज की नाक में दम कर रखा है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक विस्तृत रिपोर्ट इस पूरे चक्र को बेहद शानदार तरीक़े से उजागर करती है — पाकिस्तान ने कश्मीर में जो 'आज़ादी' का बीज दशकों पहले बोया था, वह अब PoK में फ़सल बनकर उग आया है, और यह फ़सल पाकिस्तानी राज्य को ही खा रही है।

PoK: जिस ज़मीन को 'आज़ाद' कहा, वहाँ आज़ादी की चीख़ सबसे तेज़

इसे विडंबना कहें या कर्मफल — पाकिस्तान जिस इलाक़े को 'आज़ाद कश्मीर' कहता है, वहाँ की जनता सबसे ज़्यादा ग़ुलाम महसूस करती है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़, PoK में पिछले दो वर्षों में विरोध प्रदर्शनों की तीव्रता और आवृत्ति दोनों बेतहाशा बढ़ी हैं। महँगाई, बिजली की किल्लत, बुनियादी ढाँचे का पूर्ण अभाव, और इस्लामाबाद द्वारा थोपी गई कठपुतली सरकार — यही वे मुद्दे हैं जो मुज़फ़्फ़राबाद की गलियों में आग लगा रहे हैं।

सबसे ज़हरीली बात यह है कि पाकिस्तान ने PoK को कभी अपना 'नागरिक' माना ही नहीं। न वहाँ पाकिस्तानी संविधान लागू होता है, न सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र है, न ही निवासियों को वे बुनियादी अधिकार मिलते हैं जो पाकिस्तान के अन्य प्रांतों के नागरिकों को हासिल हैं। PoK की जनता एक अजीब 'कानूनी लिम्बो' में फँसी है — न पाकिस्तानी, न भारतीय, न स्वतंत्र। और जब यही जनता 'असल आज़ादी' माँगती है, तो इस्लामाबाद वही करता है जो उसने हमेशा किया — फ़ौज भेजता है, इंटरनेट बंद करता है, और नेताओं को गिरफ़्तार करता है।

गिलगित-बाल्टिस्तान: पाकिस्तान का 'चुपचाप कॉलोनी'

PoK की आग अगर सुलग रही है, तो गिलगित-बाल्टिस्तान में वह धीमी लेकिन गहरी जल रही है। यह वह क्षेत्र है जिसे पाकिस्तान ने CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) के नाम पर चीन को गिरवी रख दिया है। स्थानीय आबादी का आरोप है कि उनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं, खनिज संपदा लूटी जा रही है, और चीनी कंपनियाँ स्थानीय श्रमिकों की जगह अपने मज़दूर ला रही हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान के निवासी पाकिस्तानी संसद में प्रतिनिधित्व की माँग करते हैं, लेकिन इस्लामाबाद जानता है कि ऐसा करने से कश्मीर पर उसका अंतरराष्ट्रीय दावा कमज़ोर पड़ जाएगा — क्योंकि तब यह 'विवादित क्षेत्र' नहीं, पाकिस्तानी प्रांत बन जाएगा।

यानी गिलगित-बाल्टिस्तान की जनता पाकिस्तान की कश्मीर नीति की बंधक है — उन्हें नागरिकता इसलिए नहीं मिल सकती क्योंकि तब कश्मीर पर पाकिस्तान का झूठ उजागर हो जाएगा। इससे बड़ी क्रूर विडंबना और क्या होगी?

पाक-अफ़ग़ान सीमा: तीसरा मोर्चा, वही पुरानी ग़लती

जबकि PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान धीमी आँच पर पक रहे हैं, पश्चिमी सीमा पर आग पहले से लगी हुई है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के हमले अब रोज़मर्रा की बात हैं। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार TTP को पनाह दे रही है — ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान ने दशकों तक अफ़ग़ान तालिबान को पनाह दी थी। यह प्रॉक्सी-वॉर का सबसे क्लासिक बूमरैंग है।

और इन सबके बीच, कराची जैसे शहरों में भी हमले हो रहे हैं। ताज़ा मामले में जब पाकिस्तान ने कराची हमले के पीछे भारत का हाथ होने का दावा किया, तो भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, MEA ने पाकिस्तान के इस आरोप को "बेबुनियाद" करार दिया और कहा कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक विफलताओं का ठीकरा भारत पर फोड़ने की पुरानी आदत से बाज़ नहीं आ रहा।

पॉलिटिकल पल्स: दिल्ली के गलियारों में क्या चर्चा है?

दिल्ली के सियासी गलियारों में PoK को लेकर जो फुसफुसाहट है, वह पिछले कुछ वर्षों में बदली है। सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि मोदी सरकार ने PoK पर 'स्ट्रैटेजिक पेशेंस' — यानी रणनीतिक धैर्य — की नीति अपनाई है, जिसका सार यह है: पाकिस्तान को उसकी अपनी नीतियों के बोझ तले टूटने दो। PoK में बढ़ता असंतोष, गिलगित-बाल्टिस्तान में CPEC विरोध, और पाक-अफ़ग़ान सीमा पर TTP का आतंक — ये तीनों मिलकर पाकिस्तानी राज्य को भीतर से खोखला कर रहे हैं।

रक्षा और विदेश नीति के जानकारों के बीच चर्चा है कि भारत को अभी किसी सैन्य एक्शन की ज़रूरत नहीं — PoK में जनता ख़ुद ही पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खड़ी हो रही है। इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि नई दिल्ली जानबूझकर PoK के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 'मानवाधिकार उल्लंघन' के फ़्रेम में रख रही है, ताकि पाकिस्तान का कश्मीर नैरेटिव उसी की ज़मीन पर पलटा जा सके।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और रणनीतिक विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट आधिकारिक नीति नहीं।)

तीन धागे, एक गाँठ: प्रॉक्सी-वॉर का ज़हर अपने ही शरीर में

इन तीनों मोर्चों को अलग-अलग देखने की ग़लती न कीजिए। PoK का विद्रोह, गिलगित-बाल्टिस्तान का असंतोष, और पाक-अफ़ग़ान सीमा का संकट — ये तीनों एक ही बीमारी के लक्षण हैं। वह बीमारी है: प्रॉक्सी-वॉर को राज्य-नीति बनाना। जब आप दशकों तक 'आज़ादी' को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं, तो एक दिन वही हथियार आपकी अपनी छाती में घूम जाता है।

पाकिस्तान ने कश्मीर में जो इंफ़्रास्ट्रक्चर बनाया — प्रशिक्षण शिविर, हथियारों की सप्लाई चेन, कट्टरपंथी विचारधारा का प्रसार — वही मशीनरी अब बलूचिस्तान, ख़ैबर पख़्तूनख़्वा और PoK में पाकिस्तानी राज्य के ख़िलाफ़ चल रही है। यह कोई संयोग नहीं, यह कारण और परिणाम है।

आगे क्या? PoK का भविष्य और भारत का दाँव

सवाल यह है कि आगे क्या होगा? तीन परिदृश्य संभव हैं।

पहला: पाकिस्तान PoK में और सैन्य दमन बढ़ाए — लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ेगा और भारत को इसे 'मानवाधिकार उल्लंघन' के रूप में प्रोजेक्ट करने का और मौक़ा मिलेगा।

दूसरा: PoK की जनता का असंतोष इतना बढ़े कि वह सशस्त्र विद्रोह में बदल जाए — जो पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान जैसा दूसरा मोर्चा खोल देगा।

तीसरा: भारत अपनी 'स्ट्रैटेजिक पेशेंस' जारी रखे और PoK के मुद्दे को कूटनीतिक और सूचना-युद्ध के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाए — जो सबसे संभावित परिदृश्य लगता है।

जो बात सबसे अहम है और जिसे बाक़ी मीडिया अक्सर नज़रअंदाज़ करता है — वह यह कि PoK में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उठती आवाज़ें किसी बाहरी ताक़त की वजह से नहीं हैं। यह पाकिस्तान की अपनी नीतियों का स्वाभाविक नतीजा है। जब आप किसी इलाक़े को 'आज़ाद' कहते हो लेकिन उसकी जनता को ग़ुलाम रखते हो, तो एक दिन वह जनता आपसे वही सवाल पूछती है जो आपने दूसरों से करवाया था — "हमें आज़ादी चाहिए, आपसे।"

पाकिस्तान ने कश्मीर में जो तूफ़ान बोया, उसकी फ़सल अब उसके अपने खेतों में खड़ी है। सवाल सिर्फ़ यह है — यह फ़सल कब और कैसे काटी जाएगी, और उस वक़्त भारत कहाँ खड़ा होगा?

आँकड़ों में

  • PoK में पाकिस्तानी संविधान लागू नहीं होता और न ही सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र है — निवासी कानूनी लिम्बो में फँसे हैं
  • MEA ने कराची हमले में भारत के हाथ होने के पाकिस्तानी आरोप को सिरे से ख़ारिज किया (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
  • पाकिस्तान की प्रॉक्सी-वॉर नीति अब तीन मोर्चों — PoK, गिलगित-बाल्टिस्तान, पाक-अफ़ग़ान सीमा — पर एक साथ बूमरैंग बन रही है

मुख्य बातें

  • पाकिस्तान की कश्मीर में 'आज़ादी' प्रॉक्सी-वॉर नीति अब PoK, गिलगित-बाल्टिस्तान और पाक-अफ़ग़ान सीमा पर बूमरैंग बन चुकी है — टाइम्स ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट
  • PoK की जनता को न पाकिस्तानी संविधान का संरक्षण मिलता है, न सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र — वे 'कानूनी लिम्बो' में फँसे हैं
  • MEA ने कराची हमले में भारत का हाथ होने के पाकिस्तानी दावे को 'बेबुनियाद' बताकर ख़ारिज किया — टाइम्स ऑफ़ इंडिया
  • गिलगित-बाल्टिस्तान की जनता को नागरिकता इसलिए नहीं दी जाती क्योंकि इससे कश्मीर पर पाकिस्तान का अंतरराष्ट्रीय दावा कमज़ोर होगा
  • भारत की 'स्ट्रैटेजिक पेशेंस' नीति — PoK को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार उल्लंघन के फ़्रेम में रखना — सबसे संभावित रणनीतिक दाँव

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

PoK में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ विद्रोह क्यों बढ़ रहा है?

PoK में पाकिस्तानी संविधान लागू नहीं होता, सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र नहीं है, और जनता को बुनियादी नागरिक अधिकार नहीं मिलते। महँगाई, बिजली संकट और इस्लामाबाद की कठपुतली सरकार से त्रस्त जनता अब सड़कों पर 'असल आज़ादी' की माँग कर रही है। पाकिस्तान ने कश्मीर में दशकों तक जो 'आज़ादी' नैरेटिव बेचा, वही अब उसके अपने क़ब्ज़े वाले इलाक़े में उसके ख़िलाफ़ पलट रहा है।

गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान नागरिकता क्यों नहीं देता?

पाकिस्तान को डर है कि अगर गिलगित-बाल्टिस्तान को प्रांत का दर्जा दिया गया तो कश्मीर पर उसका अंतरराष्ट्रीय दावा कमज़ोर हो जाएगा — क्योंकि तब यह 'विवादित क्षेत्र' नहीं, पाकिस्तानी हिस्सा माना जाएगा। इसलिए वहाँ की जनता को संसदीय प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा जाता है।

भारत PoK पर क्या रणनीति अपना रहा है?

विश्लेषकों के अनुसार भारत 'स्ट्रैटेजिक पेशेंस' की नीति पर चल रहा है — पाकिस्तान को उसकी अपनी प्रॉक्सी-वॉर नीतियों के बोझ तले टूटने देना। साथ ही PoK के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 'मानवाधिकार उल्लंघन' के फ़्रेम में रखा जा रहा है ताकि पाकिस्तान का कश्मीर नैरेटिव कमज़ोर हो।

कराची हमले पर भारत ने क्या कहा?

भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने पाकिस्तान के उस आरोप को 'बेबुनियाद' बताकर सिरे से ख़ारिज कर दिया जिसमें कराची हमले के पीछे भारत का हाथ होने का दावा किया गया था। MEA ने कहा कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक विफलताओं का ठीकरा भारत पर फोड़ने की पुरानी आदत से बाज़ नहीं आ रहा।

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