मोदी कैबिनेट रिशफल में धर्मेंद्र प्रधान को HRD मंत्रालय से हटाए जाने की चर्चा ज़ोरों पर है। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ यह सिर्फ़ प्रदर्शन का मामला नहीं बल्कि 2029 लोकसभा की तैयारी, ओडिशा-बिहार की सीट-गणित और RSS की लॉबिंग से जुड़ा व्यापक फ़ैक्शनल खेल है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, और BJP का केंद्रीय नेतृत्व — रिपोर्ट्स के मुताबिक़ (India.com)
- क्या: कैबिनेट रिशफल में प्रधान को HRD से हटाकर किसी अन्य पोर्टफ़ोलियो में भेजने या ड्रॉप करने की चर्चा — India.com की रिपोर्ट के अनुसार
- कब: 2026 के मध्य में संभावित कैबिनेट रिशफल, कई सूत्रों के अनुसार मानसून सत्र से पहले हो सकता है
- कहाँ: नई दिल्ली — केंद्रीय मंत्रिमंडल, संसद भवन और BJP मुख्यालय
- क्यों: रिपोर्ट्स के मुताबिक़ NEP के ज़मीनी क्रियान्वयन पर सवाल, ओडिशा में पार्टी के विस्तार की ज़रूरत, और 2029 के लिए फ्रेश चेहरों की तलाश प्रमुख कारण हैं
- कैसे: PM के 'परफ़ॉर्मेंस ऑडिट' मॉडल के तहत मंत्रियों के काम की समीक्षा, RSS इनपुट और संगठनात्मक फ़ीडबैक के आधार पर — सूत्रों के हवाले से
दिल्ली की सियासी गलियों में इन दिनों एक नाम बार-बार गूँज रहा है — धर्मेंद्र प्रधान। लेकिन यह गूँज तारीफ़ की नहीं, बल्कि सस्पेंस की है। मोदी कैबिनेट रिशफल की अफ़वाहें हर बार उठती हैं, मगर इस बार India.com की रिपोर्ट ने जो तस्वीर खींची है, वह सिर्फ़ एक मंत्री के तबादले की नहीं — पूरी 2029 की चुनावी बिसात की है। सवाल यह नहीं कि प्रधान रहेंगे या जाएँगे — सवाल यह है कि उनकी कुर्सी हिलाने से किसकी गोटी आगे बढ़ती है।
पहले ऊपरी परत समझ लीजिए। धर्मेंद्र प्रधान 2021 से शिक्षा मंत्रालय (HRD) सँभाल रहे हैं। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) उनके नाम पर है, लेकिन शिक्षा जगत के जानकारों और ख़ुद BJP के अंदरूनी हलकों में फुसफुसाहट है कि ज़मीनी क्रियान्वयन उम्मीद से बहुत पीछे है। राज्यों में NEP को लागू करने की रफ़्तार धीमी रही — ख़ासकर हिंदी बेल्ट के BJP-शासित राज्यों में भी। India.com की रिपोर्ट के मुताबिक़ PM मोदी के 'परफ़ॉर्मेंस ऑडिट' मॉडल में शिक्षा मंत्रालय का रिपोर्ट कार्ड संतोषजनक नहीं आया है।
लेकिन असली कहानी यहाँ शुरू होती है — और यही वह कोण है जो गलियारों की चर्चा में है, प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नहीं।
ओडिशा फ़ैक्टर: प्रधान की कुर्सी और BJP का पूर्वी मोर्चा
धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा के सबसे बड़े BJP चेहरे हैं। 2024 में BJP ने ओडिशा में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी, लेकिन राज्य में पार्टी का संगठनात्मक ढाँचा अभी भी 'प्रधान-केंद्रित' है। सूत्रों के हवाले से ख़बर है कि RSS और संगठन का एक धड़ा चाहता है कि प्रधान को दिल्ली से वापस ओडिशा भेजा जाए — ताकि 2029 तक पूर्वी भारत का यह गढ़ पक्का किया जा सके। दूसरा धड़ा मानता है कि प्रधान को केंद्र में रखना ज़रूरी है ताकि ओडिशा के OBC-ट्राइबल वोट बैंक पर दिल्ली से नज़र रहे।
यह द्वंद्व सिर्फ़ प्रधान का नहीं — यह BJP की उस बड़ी दुविधा का आईना है जो हर रिशफल में सामने आती है: क्या आपके सबसे अच्छे खिलाड़ी को मैदान (राज्य) पर रखना बेहतर है, या ड्रेसिंग रूम (दिल्ली) में?
पॉलिटिकल पल्स
गलियारों में जो बात सबसे ज़्यादा घूम रही है, वह यह: प्रधान का 'कटना' तय है या नहीं, यह कम अहम है — ज़्यादा अहम यह है कि उनकी जगह किसका नाम ऊपर आ रहा है। सियासी हलकों में चर्चा है कि बिहार और UP से कुछ OBC चेहरों को कैबिनेट में बड़ी ज़िम्मेदारी दी जा सकती है — ख़ासकर 2025 बिहार चुनाव के बाद NDA की सीट शेयरिंग और JDU-BJP समीकरण को देखते हुए। एक बड़ा नाम जो बार-बार आ रहा है, वह है अश्विनी वैष्णव — जो ख़ुद ओडिशा कनेक्शन वाले टेक्नोक्रेट हैं और जिन पर PM का भरोसा माना जाता है।
RSS की भूमिका को कम करके नहीं आँका जा सकता। शिक्षा मंत्रालय संघ के लिए सबसे 'सेंसिटिव' पोर्टफ़ोलियो है — पाठ्यक्रम, भाषा नीति, संस्कृत, नैतिक शिक्षा। सूत्रों के मुताबिक़ संघ के शिक्षा प्रकोष्ठ ने केंद्रीय नेतृत्व को फ़ीडबैक दिया है कि NEP का 'भारतीयकरण' वाला हिस्सा अभी काग़ज़ों पर ही है। यह फ़ीडबैक प्रधान के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है — क्योंकि मोदी सरकार में RSS इनपुट को 'सलाह' नहीं, 'निर्देश' की तरह पढ़ा जाता है।
(यह सियासी गलियारों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
2029 की बिसात: रिशफल सिर्फ़ आज का नहीं, कल का खेल है
इस रिशफल को समझने की सबसे बड़ी चाबी यह है कि इसे 2026 के चश्मे से न देखें — 2029 के चश्मे से देखें। मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल अब आधे पड़ाव पर है। अगले लोकसभा चुनाव से पहले यह आख़िरी 'बड़ा' रिशफल हो सकता है जहाँ PM के पास पूरे तीन साल का रनवे हो — नए चेहरों को स्थापित करने, राज्यों में इलेक्टोरल मशीनरी तैयार करने और 'मोदी के बाद' की पहली पंक्ति खड़ी करने के लिए।
India.com की रिपोर्ट के अनुसार, कई मौजूदा कैबिनेट मंत्रियों का 'परफ़ॉर्मेंस ऑडिट' पूरा हो चुका है और PMO ने कुछ मंत्रालयों को 'अंडरपरफ़ॉर्मिंग' की श्रेणी में रखा है। शिक्षा मंत्रालय के अलावा कृषि और ग्रामीण विकास मंत्रालय भी इस लिस्ट में बताए जा रहे हैं।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि इस रिशफल की असली स्क्रिप्ट तीन अक्षरों में लिखी जा रही है — OBC। 2024 में INDIA गठबंधन ने जातिगणना और OBC आरक्षण को जिस तरह मुद्दा बनाया, उसने BJP को हिलाया। अब 2029 से पहले कैबिनेट में OBC चेहरों की 'विज़िबिलिटी' बढ़ाना BJP की रणनीतिक ज़रूरत है। प्रधान ख़ुद OBC हैं, लेकिन ओडिशा के OBC और UP-बिहार के OBC में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है — हिंदी बेल्ट के OBC वोटर को अपना चेहरा चाहिए, ओडिशा का नहीं।
अगर प्रधान गए, तो क्या बदलेगा?
अगर प्रधान को HRD से हटाया जाता है, तो तीन चीज़ें तुरंत बदलेंगी। पहला, NEP की कमान किसी ऐसे हाथ में जाएगी जिसे 'डिलीवरी' दिखानी होगी — और यह दबाव नए मंत्री पर पहले दिन से होगा। दूसरा, ओडिशा BJP में उत्तराधिकार की लड़ाई और तेज़ होगी — अगर प्रधान राज्य में लौटे तो मुख्यमंत्री मोहन चरण माँझी के लिए चुनौती बढ़ेगी; अगर नहीं लौटे तो राज्य में 'कमान किसकी' का सवाल और गहरा होगा। तीसरा, यह संकेत जाएगा कि मोदी तीसरे कार्यकाल में भी 'हायर-फ़ायर' करने से नहीं हिचकते — जो 2029 तक बाक़ी मंत्रियों पर दबाव बनाए रखेगा।
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क्या प्रधान बच भी सकते हैं?
बिल्कुल — और यह संभावना भी उतनी ही वास्तविक है। अक्सर रिशफल से पहले जो नाम सबसे ज़्यादा चर्चा में होता है, वह बच जाता है — क्योंकि लीक होना ही कभी-कभी बचाव बन जाता है। मोदी का इतिहास बताता है कि वे सरप्राइज़ पसंद करते हैं — 2024 रिशफल में भी सबसे बड़े बदलाव वे नाम थे जिनकी किसी को उम्मीद नहीं थी। प्रधान के पक्ष में यह भी जाता है कि ओडिशा में अभी BJP को स्थिरता चाहिए और उन्हें हटाना राज्य इकाई में अनिश्चितता पैदा कर सकता है।
आगे क्या देखना है
संसद के मानसून सत्र से पहले का समय रिशफल के लिए सबसे 'क्लासिक' विंडो है। अगर प्रधान को शपथ समारोह में शामिल किया जाता है तो साफ़ है कि वे कैबिनेट में हैं — सवाल सिर्फ़ पोर्टफ़ोलियो का होगा। अगर नहीं, तो ओडिशा या संगठन में भूमिका का रास्ता खुलेगा। देखने वाली बात यह भी होगी कि क्या बिहार से कोई JDU या BJP का नया OBC चेहरा कैबिनेट में आता है — क्योंकि वही इस रिशफल का 2029 वाला असली दाँव होगा।
एक बात पक्की है: मोदी कैबिनेट में कोई कुर्सी पैतृक संपत्ति नहीं है। और जो मंत्री यह समझ रहे हैं कि उनका पत्ता नहीं कट सकता — उन्हें 2024 की स्मृति लोप की बीमारी है। असली सवाल यह नहीं कि प्रधान जाएँगे या रहेंगे — असली सवाल यह है कि जब 2029 की बिसात सजेगी, तो PM के दाएँ हाथ पर कौन बैठा होगा।
आँकड़ों में
- NEP 2020 को लागू हुए पाँच साल से अधिक हो चुके हैं, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक़ कई BJP-शासित राज्यों में भी ज़मीनी क्रियान्वयन धीमा है
- 2024 में BJP ने ओडिशा में पहली बार सरकार बनाई — प्रधान इस जीत के सबसे बड़े रणनीतिकार माने जाते हैं
- मोदी का तीसरा कार्यकाल आधे पड़ाव पर है — 2029 से पहले यह आख़िरी 'बड़ा' रिशफल हो सकता है जिसमें तीन साल का रनवे उपलब्ध हो
मुख्य बातें
- India.com की रिपोर्ट के मुताबिक़ धर्मेंद्र प्रधान को HRD मंत्रालय से हटाने की चर्चा 2029 लोकसभा की व्यापक तैयारी से जुड़ी है
- RSS के शिक्षा प्रकोष्ठ ने NEP के ज़मीनी क्रियान्वयन पर असंतोष जताया है — सूत्रों के अनुसार यह प्रधान के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है
- कैबिनेट में हिंदी बेल्ट के OBC चेहरों की 'विज़िबिलिटी' बढ़ाना BJP की 2029 रणनीति का केंद्रबिंदु है
- PMO का 'परफ़ॉर्मेंस ऑडिट' मॉडल सक्रिय है — शिक्षा के अलावा कृषि और ग्रामीण विकास मंत्रालय भी 'अंडरपरफ़ॉर्मिंग' सूची में बताए जा रहे हैं
- ओडिशा BJP में प्रधान की भूमिका को लेकर दो विरोधी धड़े सक्रिय हैं — एक उन्हें राज्य में वापस चाहता है, दूसरा दिल्ली में
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मोदी कैबिनेट रिशफल कब होगा?
सूत्रों के मुताबिक़ संसद के मानसून सत्र से पहले 2026 के मध्य में रिशफल की संभावना है, हालाँकि आधिकारिक तारीख़ की पुष्टि नहीं हुई है।
धर्मेंद्र प्रधान को HRD से क्यों हटाया जा सकता है?
India.com की रिपोर्ट के अनुसार NEP के धीमे क्रियान्वयन, PMO के परफ़ॉर्मेंस ऑडिट में कमज़ोर रिपोर्ट कार्ड, और RSS के शिक्षा प्रकोष्ठ के असंतोष को प्रमुख कारण बताया जा रहा है।
कैबिनेट रिशफल में कौन से नए चेहरे आ सकते हैं?
सियासी हलकों में चर्चा है कि बिहार और UP से OBC चेहरों को बड़ी ज़िम्मेदारी मिल सकती है। अश्विनी वैष्णव का नाम भी बार-बार सामने आ रहा है — हालाँकि ये अपुष्ट अटकलें हैं।
क्या धर्मेंद्र प्रधान कैबिनेट में बने रह सकते हैं?
हाँ, यह संभावना है — मोदी सरप्राइज़ पसंद करते हैं और अक्सर सबसे चर्चित नाम बच जाता है। ओडिशा में स्थिरता की ज़रूरत भी प्रधान के पक्ष में जाती है।

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