मुख्य चुनाव आयुक्त ने द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार भारत को प्रमुख लोकतंत्रों में चुनावी पारदर्शिता में अग्रणी बताया है। यह दावा ऐसे वक़्त आया है जब हिंदी बेल्ट के पाँच राज्यों में उपचुनाव नज़दीक हैं, विपक्ष EVM-VVPAT पर सवाल उठा रहा है, और 'वन नेशन वन इलेक्शन' की बहस गरम है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ने यह दावा किया, जबकि विपक्षी दल — कांग्रेस, TMC, AAP — EVM पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठा रहे हैं।
  • क्या: CEC ने कहा कि भारत प्रमुख लोकतंत्रों में चुनावी पारदर्शिता के मामले में अग्रणी है — द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार।
  • कब: यह बयान 2026 में आया है जब कई राज्यों में उपचुनावों की तैयारी ज़ोरों पर है और 'वन नेशन वन इलेक्शन' विधेयक पर संसदीय चर्चा प्रत्याशित है।
  • कहाँ: भारत — विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली जैसे हिंदी बेल्ट राज्यों के संदर्भ में।
  • क्यों: CEC ने भारत की बहु-स्तरीय चुनावी प्रक्रिया — EVM, VVPAT, वेब-कास्टिंग, आधार-लिंक्ड वोटर लिस्ट — को अंतरराष्ट्रीय तुलना में श्रेष्ठ बताया।
  • कैसे: CEC ने अंतरराष्ट्रीय चुनावी प्रक्रियाओं से तुलना करते हुए भारत के बहु-स्तरीय ऑडिट, VVPAT सत्यापन और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम का हवाला दिया — द हिंदू के अनुसार।

एक आँकड़ा सोचिए — भारत में क़रीब 97 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं, दुनिया के किसी भी लोकतंत्र से ज़्यादा। अब कल्पना कीजिए कि इन 97 करोड़ लोगों की हर एक वोट को 'दुनिया में सबसे पारदर्शी' बताया जा रहा हो — और यह दावा कर रहे हों ख़ुद वे लोग जो इस प्रक्रिया को चलाते हैं। द हिंदू की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ने दावा किया है कि भारत प्रमुख लोकतंत्रों में चुनावी पारदर्शिता के मामले में नंबर-1 पर है। सवाल सीधा है — अगर यह सच है तो विपक्ष बार-बार EVM की पारदर्शिता पर क्यों सवाल उठाता है, और अगर यह सिर्फ़ दावा है तो इसकी टाइमिंग इतनी 'सही' क्यों है?

CEC का तर्क तकनीकी रूप से मज़बूत दिखता है। भारत की चुनावी प्रक्रिया में EVM (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) के साथ VVPAT (वोटर वेरिफ़ायबल पेपर ऑडिट ट्रेल) की बहु-स्तरीय व्यवस्था है। 2019 के बाद सुप्रीम कोर्ट ने प्रति विधानसभा क्षेत्र पाँच VVPAT मशीनों का मिलान अनिवार्य किया। इसके अलावा, पोलिंग बूथों की वेब-कास्टिंग, सी-विजिल ऐप जैसी शिकायत प्रणालियाँ, और डिजिटल वोटर लिस्ट — यह सब अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों की तुलना में तकनीकी रूप से अधिक जटिल और व्यापक हैं। अमेरिका में तो कई राज्यों में अब भी पेपर बैलट हैं जिनकी मैनुअल काउंटिंग होती है, और ब्रिटेन में EVM का इस्तेमाल ही नहीं होता। इस लिहाज़ से CEC का दावा बिलकुल ग़लत नहीं है।

लेकिन पारदर्शिता सिर्फ़ टेक्नोलॉजी का खेल नहीं है — यह भरोसे का खेल है। और यहीं कहानी पलटती है।

विपक्ष का EVM-VVPAT आरोप — सिर्फ़ हार का बहाना या असली सवाल?

कांग्रेस, TMC और AAP जैसी विपक्षी पार्टियाँ लगातार माँग करती रही हैं कि 100% VVPAT मिलान हो — यानी हर एक EVM की पर्ची गिनी जाए, सिर्फ़ पाँच मशीनों का सैंपल नहीं। उनका तर्क है कि जब तक पूर्ण सत्यापन नहीं होता, 'पारदर्शिता' शब्द सिर्फ़ सरकारी रिपोर्ट कार्ड है, ज़मीनी हक़ीक़त नहीं। 2024 के आम चुनावों के बाद विपक्ष ने कई सीटों पर EVM डेटा में विसंगतियों का आरोप लगाया था — हालाँकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों को ख़ारिज किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, IDEA (International Institute for Democracy and Electoral Assistance) जैसी संस्थाएँ भारत की चुनावी प्रक्रिया को 'बड़े पैमाने पर सफल' तो मानती हैं, लेकिन चुनाव आयोग की स्वायत्तता और नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाती रहती हैं। V-Dem Institute ने भी भारत की 'इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी' रेटिंग पर बहस छेड़ी है। CEC का 'नंबर-1' दावा इन अंतरराष्ट्रीय आकलनों से टकराता है — और यही टकराव इसे सिर्फ़ तथ्य नहीं, बल्कि एक 'फ्रेमिंग एक्सरसाइज़' बनाता है।

टाइमिंग — उपचुनाव और 'वन नेशन वन इलेक्शन' का जोड़

इस बयान की टाइमिंग को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है। हिंदी बेल्ट के पाँच राज्यों — उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली — में 2026 के उपचुनाव नज़दीक आ रहे हैं। UP में BJP को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उपचुनावी परफ़ॉर्मेंस से मैसेज देना है, बिहार में NDA की गठबंधन गणित की परीक्षा होगी, और दिल्ली में AAP बनाम BJP की सीधी टक्कर फिर से गरम होगी। ऐसे माहौल में जब चुनाव आयोग ख़ुद अपनी पीठ थपथपाए, तो सत्ता पक्ष को एक तैयार 'शील्ड' मिलती है — कोई भी EVM विवाद उठे तो जवाब तैयार है: "दुनिया हमें सबसे पारदर्शी मानती है।"

इसके साथ ही 'वन नेशन वन इलेक्शन' (ONOE) विधेयक की चर्चा संसद के आगामी सत्र में प्रत्याशित है। ONOE का तर्क है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के एक साथ चुनाव कराने से संसाधन बचेंगे और 'चुनावी मोड' से मुक्ति मिलेगी। लेकिन विपक्ष इसे संघीय ढाँचे पर हमला मानता है। जब CEC 'पारदर्शिता में नंबर-1' कहते हैं, तो अनकहा मैसेज यह भी है — "हमारा सिस्टम इतना मज़बूत है कि एक साथ चुनाव कराने की क्षमता रखता है।" यह ONOE की वैधता के लिए ज़मीन तैयार करने जैसा दिखता है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि यह बयान सिर्फ़ CEC की व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि एक 'कोऑर्डिनेटेड नैरेटिव' का हिस्सा है। सत्ता पक्ष के क़रीबी सूत्र मानते हैं कि उपचुनावों से पहले EVM विवाद को 'सेटल' करना ज़रूरी है — ताकि अगर कहीं हार हो तो विपक्ष EVM को निशाना न बना सके। दूसरी तरफ़ विपक्षी खेमे में बात यह है कि "जब सिस्टम इतना पारदर्शी है तो 100% VVPAT मिलान से डर क्यों?" — यह सवाल 2024 से हर चुनावी साइकिल में गूँजता है और अभी तक इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। ट्रेड हलकों में यह भी चर्चा है कि ONOE विधेयक को पारित कराने से पहले सरकार एक 'विश्वसनीयता अभियान' चला रही है जिसमें CEC का यह बयान एक महत्वपूर्ण कड़ी है। (यह राजनीतिक गलियारों की चर्चा और विश्लेषण है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

असली सवाल — पारदर्शिता किसके लिए?

पारदर्शिता का पैमाना क्या होना चाहिए — यह सवाल ही इस पूरी बहस की जड़ है। अगर पैमाना तकनीकी बुनियादी ढाँचा है — EVM, VVPAT, वेब-कास्टिंग, डिजिटल निगरानी — तो CEC का दावा काफ़ी हद तक खड़ा है। भारत की चुनावी मशीनरी दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे जटिल है, और कई पश्चिमी देशों से तकनीकी रूप से आगे है। लेकिन अगर पैमाना संस्थागत स्वायत्तता, नियुक्ति प्रक्रिया और जन-विश्वास है, तो तस्वीर बदल जाती है। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी व्यवस्था का सुझाव दिया था, लेकिन सरकार ने बाद में क़ानून बनाकर इसे बदल दिया — अब प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति नियुक्ति करती है। विपक्ष इसे 'कैप्चर्ड इंस्टीट्यूशन' कहता है। इस पृष्ठभूमि में जब CEC 'पारदर्शिता' कहते हैं तो विपक्ष सुनता है 'प्रोपेगंडा'।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि इस बयान को न तो पूरा सच माना जा सकता है और न ही पूरा झूठ — यह एक 'हाफ़-ट्रुथ' है जिसकी टाइमिंग इसे तथ्य से ज़्यादा रणनीति बनाती है। CEC का तकनीकी दावा अपनी जगह खड़ा है, लेकिन संस्थागत स्वायत्तता और जन-विश्वास के पैमाने पर यह बहस अधूरी है। और जब यह बहस उपचुनावों की दहलीज़ पर आती है, तो इसका मक़सद जानकारी देना कम और 'नैरेटिव सेट करना' ज़्यादा दिखता है।

आगे क्या देखें?

आने वाले हफ़्तों में तीन चीज़ें देखने लायक हैं। पहली — क्या विपक्षी दल इस बयान को लेकर संसद में या सड़क पर कोई संगठित प्रतिक्रिया देते हैं, ख़ासकर कांग्रेस और TMC जो 100% VVPAT की माँग पर सबसे मुखर रही हैं। दूसरी — ONOE विधेयक पर संसदीय समिति की रिपोर्ट कब आती है और उसमें चुनाव आयोग की 'क्षमता' को कैसे पेश किया जाता है — CEC का यह बयान उस रिपोर्ट के लिए एक 'प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक' हो सकता है। तीसरी — हिंदी बेल्ट के उपचुनावों में अगर कहीं विपक्ष जीतता है तो क्या वह EVM विवाद को फिर से ज़िंदा करता है, और अगर हारता है तो क्या CEC का 'पारदर्शिता' दावा उनके ख़िलाफ़ हथियार की तरह इस्तेमाल होता है।

अंत में एक बात याद रखिए — लोकतंत्र में पारदर्शिता वह नहीं होती जो सरकार या उसकी संस्थाएँ बताएँ। पारदर्शिता वह होती है जो नागरिक महसूस करे। और जब तक 97 करोड़ मतदाताओं में से एक बड़ा हिस्सा यह पूछता रहेगा कि "मेरी VVPAT पर्ची गिनी क्यों नहीं गई?", तब तक 'नंबर-1 पारदर्शिता' का तमग़ा एक दावा बना रहेगा — सच नहीं।

आँकड़ों में

  • भारत में क़रीब 97 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं — दुनिया के किसी भी लोकतंत्र से सबसे ज़्यादा।
  • सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में प्रति विधानसभा क्षेत्र 5 VVPAT मशीनों का मिलान अनिवार्य किया — विपक्ष 100% मिलान माँगता है।
  • V-Dem Institute ने भारत को 'इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी' श्रेणी में रखा है, जो CEC के 'पारदर्शिता नंबर-1' दावे से सीधे टकराता है।

मुख्य बातें

  • CEC ने द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार भारत को प्रमुख लोकतंत्रों में चुनावी पारदर्शिता में अग्रणी बताया — EVM, VVPAT, वेब-कास्टिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग का हवाला देते हुए।
  • विपक्ष 100% VVPAT मिलान की माँग पर अड़ा है — उनका कहना है कि सैंपल सत्यापन 'पारदर्शिता' नहीं, 'प्रबंधित आश्वासन' है।
  • अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ जैसे V-Dem और IDEA भारत की चुनावी स्वायत्तता पर सवाल उठाती रही हैं, जो CEC के 'नंबर-1' दावे से टकराता है।
  • यह बयान ऐसे समय आया है जब हिंदी बेल्ट में उपचुनाव नज़दीक हैं और 'वन नेशन वन इलेक्शन' विधेयक पर संसदीय चर्चा प्रत्याशित है।
  • 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने CEC नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी व्यवस्था सुझाई थी, लेकिन सरकार ने क़ानून बदलकर PM-नीत समिति बनाई — विपक्ष इसे स्वायत्तता पर हमला मानता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

CEC ने भारत की चुनावी पारदर्शिता के बारे में क्या कहा?

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि भारत प्रमुख लोकतंत्रों में चुनावी पारदर्शिता में अग्रणी है — EVM, VVPAT, वेब-कास्टिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम का हवाला देते हुए।

विपक्ष EVM पारदर्शिता पर क्या माँग करता है?

कांग्रेस, TMC और AAP जैसी पार्टियाँ 100% VVPAT मिलान की माँग करती हैं — यानी हर EVM की पेपर पर्ची गिनी जाए, न कि सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रति क्षेत्र 5 मशीनों का सैंपल।

अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भारत की चुनावी प्रक्रिया को कैसे आँकती हैं?

IDEA जैसी संस्थाएँ भारत की चुनावी प्रक्रिया को 'बड़े पैमाने पर सफल' मानती हैं लेकिन चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर सवाल उठाती हैं। V-Dem Institute ने भारत को 'इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी' श्रेणी में रखा है।

'वन नेशन वन इलेक्शन' से CEC के बयान का क्या संबंध है?

CEC का 'पारदर्शिता नंबर-1' दावा अप्रत्यक्ष रूप से यह मैसेज देता है कि भारत का चुनावी तंत्र इतना सक्षम है कि एक साथ चुनाव करा सकता है — यह ONOE विधेयक की वैधता के लिए ज़मीन तैयार करने जैसा दिखता है।

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