जनरल उपेंद्र द्विवेदी को औपचारिक विदाई दी गई। उनके कार्यकाल में LAC पर डिसइंगेजमेंट हुआ पर पूर्ण डी-एस्केलेशन अधूरा रहा। अग्निपथ योजना पर सेना के भीतर गंभीर सवाल बरकरार हैं और थिएटर कमांड का खाका लंबित है — यही तीन चुनौतियां नए आर्मी चीफ की मेज पर सबसे पहले खुलेंगी।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: निवर्तमान सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, भारतीय सेना
  • क्या: जनरल द्विवेदी को औपचारिक विदाई (सेरेमोनियल फेयरवेल) दी गई; उनके कार्यकाल की उपलब्धियों और अनसुलझी चुनौतियों का आकलन
  • कब: जून 2025, जनरल द्विवेदी के सेवानिवृत्ति के अवसर पर
  • कहाँ: नई दिल्ली, भारतीय सेना मुख्यालय
  • क्यों: सेना प्रमुख का कार्यकाल पूरा होने पर परंपरागत औपचारिक विदाई; LAC, अग्निपथ और थिएटर कमांड जैसे मुद्दे उत्तराधिकारी को हस्तांतरित
  • कैसे: गार्ड ऑफ ऑनर और औपचारिक सेरेमनी के ज़रिए विदाई; शेष एजेंडा नए सेना प्रमुख को सौंपा गया

एक सेना प्रमुख की विदाई सिर्फ़ गार्ड ऑफ ऑनर और सैल्यूट का मामला नहीं होती — वह उस अनकही चेकलिस्ट की विदाई भी होती है जिस पर हरे निशान लगाने का वक्त नहीं मिला। जनरल उपेंद्र द्विवेदी को जब दिल्ली में औपचारिक विदाई दी गई, तो कैमरों के सामने तमाम गर्मजोशी थी — लेकिन परदे के पीछे तीन फाइलें ऐसी हैं जो खुली रह गईं और अब अगले सेना प्रमुख की मेज पर उनका इंतज़ार है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जनरल द्विवेदी को पूरे सैन्य सम्मान के साथ सेरेमोनियल फेयरवेल दिया गया। द हिंदू ने भी इस अवसर को कवर करते हुए बताया कि जनरल द्विवेदी ने अपने अंतिम संबोधन में सेना के आधुनिकीकरण और सीमा सुरक्षा पर ज़ोर दिया। लेकिन जो बातें इन विदाई भाषणों में नहीं कही गईं, वही इस कहानी का असली मर्म हैं।

LAC: डिसइंगेजमेंट हुआ, डी-एस्केलेशन कहाँ?

जनरल द्विवेदी के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि यह मानी जाती है कि पूर्वी लद्दाख में कई घर्षण बिंदुओं पर भारत-चीन सेनाओं के बीच डिसइंगेजमेंट हुआ। देपसांग और डेमचोक जैसे इलाकों में पैट्रोलिंग व्यवस्था बहाल हुई — यह कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम था। लेकिन सैन्य विश्लेषक और रक्षा मामलों के जानकार लगातार एक फ़र्क रेखांकित करते हैं: डिसइंगेजमेंट और डी-एस्केलेशन एक ही चीज़ नहीं हैं।

डिसइंगेजमेंट का मतलब है कि दोनों पक्षों ने अपने सैनिक पीछे हटाए। लेकिन डी-एस्केलेशन का मतलब होता है कि बुनियादी ढाँचा — सड़कें, हवाई पट्टियाँ, हेलीपैड, भंडारण — भी पीछे हटे और तनाव का मूल ढाँचा ही विखंडित हो। चीन ने LAC के अपनी तरफ जो विशाल सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है, वह यथावत है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार चीन की PLA ने पिछले पाँच वर्षों में LAC के पास क़रीब 600 से ज़्यादा नए सैन्य ढाँचे बनाए हैं — एयरफ़ील्ड्स से लेकर मिसाइल शेल्टर तक।

नए आर्मी चीफ के लिए यही पहली और सबसे तीखी चुनौती है: क्या भारत डिसइंगेजमेंट को डी-एस्केलेशन में बदल पाएगा, या अप्रैल 2020 की तरह कभी भी एक नया गतिरोध खड़ा हो सकता है?

अग्निपथ: जो सवाल प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं पूछे गए

अग्निपथ योजना — 2022 में शुरू हुई, राजनीतिक विवाद से घिरी, और अब अपने तीसरे बैच की भर्ती के दौर में — जनरल द्विवेदी के कार्यकाल का सबसे संवेदनशील विषय रही। सार्वजनिक रूप से सेना ने योजना का समर्थन किया, लेकिन सैन्य गलियारों में फुसफुसाहट इसकी उलट दिशा में बहती रही।

सबसे बड़ा सवाल रिटेंशन का है। अग्निवीरों का पहला बैच जल्द सेवा पूरी करेगा — चार साल बाद 75 प्रतिशत अग्निवीर सेना से बाहर होंगे। इन प्रशिक्षित युवाओं का पुनर्वास कैसे होगा, इसका कोई ठोस रोडमैप अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ। रक्षा मामलों के पूर्व अधिकारियों ने बार-बार चिंता जताई है कि अनुभवी जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स (JCOs) की कमी से सेना की ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित हो सकती है।

सियासी गलियारों में चर्चा यह भी है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा, राजस्थान और यूपी के सैन्य भर्ती वाले इलाकों में अग्निपथ एक चुनावी मुद्दा बना। सत्तारूढ़ दल ने योजना में 'सुधार' की बात कही, लेकिन मूल ढाँचे में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ। नए आर्मी चीफ को यह तय करना होगा कि क्या वे सरकार को स्पष्ट ऑपरेशनल फीडबैक दे पाएंगे — या यह फ़ाइल भी अगले उत्तराधिकारी तक खुली रहेगी।

पॉलिटिकल पल्स

रक्षा प्रतिष्ठान के भीतर की बात यह है कि जनरल द्विवेदी का कार्यकाल 'स्थिरता का कार्यकाल' माना जाता है — न कोई बड़ा विवाद, न कोई बड़ी सर्जिकल कार्रवाई, न कोई खुला टकराव। लेकिन ठीक इसी 'स्थिरता' को कुछ सेवानिवृत्त जनरल 'यथास्थितिवाद' भी कहते हैं। गलियारों में एक पुरानी कहावत गूँजती है — "जो आर्मी चीफ़ शांति से रिटायर हो, उसके कार्यकाल का असली आकलन अगले दो साल में होता है — जब उसकी छोड़ी हुई फाइलें या तो सुलझती हैं या फटती हैं।"

नए सेना प्रमुख की नियुक्ति को लेकर भी राजनीतिक गणित चर्चा में है। सीनियरिटी, रेजीमेंटल बैलेंस और सरकार के साथ समीकरण — ये तीनों कारक हमेशा से इस नियुक्ति को प्रभावित करते रहे हैं। विपक्ष ने पहले भी सेना प्रमुख की नियुक्ति प्रक्रिया में 'पारदर्शिता' की माँग उठाई है — यह माँग इस बार भी उठ सकती है।

(यह अनुभाग रक्षा हलकों की चर्चा और विश्लेषकों के आकलन पर आधारित है, पुष्ट आधिकारिक बयान नहीं।)

थिएटर कमांड: सबसे बड़ा अधूरा सपना

जनरल बिपिन रावत के समय से चल रहा थिएटर कमांड का प्रस्ताव — जिसमें थलसेना, वायुसेना और नौसेना की एकीकृत कमान बनाने की बात है — जनरल द्विवेदी के कार्यकाल में भी 'चर्चा में' ही रहा, 'अमल में' नहीं आया। वायुसेना की आपत्तियाँ, संसाधनों के बँटवारे को लेकर तीनों सेनाओं की खींचतान, और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी — ये तीन रुकावटें जस की तस हैं।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि नए आर्मी चीफ के पास इन तीनों चुनौतियों को साथ-साथ संभालने का बेहद सीमित समय होगा — और सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि वे क्या करेंगे, बल्कि यह है कि क्या उन्हें करने दिया जाएगा। सैन्य नियुक्तियों में राजनीतिक समीकरण और नौकरशाही की गति दोनों मिलकर तय करती हैं कि कोई आर्मी चीफ 'ट्रांसफ़ॉर्मर' बनता है या 'केयरटेकर'।

आगे क्या देखना है

अगले तीन से छह महीने निर्णायक होंगे। LAC पर अगर चीन कोई नया प्रोवोकेशन करता है, तो डिसइंगेजमेंट की पूरी विरासत दाँव पर होगी। अग्निपथ के पहले बैच की 'पासिंग आउट' के बाद इन युवाओं का पुनर्वास या बेरोज़गारी — दोनों सीधे राजनीतिक गूँज पैदा करेंगे। और थिएटर कमांड पर अगर कोई ठोस कदम नहीं उठा, तो भारत की 'जॉइंट ऑपरेशंस' क्षमता का सपना एक और कार्यकाल के लिए टल जाएगा।

जनरल द्विवेदी की विदाई एक कार्यकाल का अंत है — लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है, और वह परीक्षा उनकी नहीं, उनके उत्तराधिकारी की है। सवाल यह है: क्या नए आर्मी चीफ के पास वह राजनीतिक पूँजी और सैन्य स्वायत्तता होगी कि वे इन फाइलों को बंद कर सकें — या ये फाइलें फिर अगली विदाई तक खुली रहेंगी?

आँकड़ों में

  • LAC के पास चीन ने पिछले पाँच वर्षों में क़रीब 600+ नए सैन्य ढाँचे बनाए — एयरफ़ील्ड्स से मिसाइल शेल्टर तक (रक्षा विश्लेषकों के अनुमान)
  • अग्निपथ: चार साल बाद 75% अग्निवीर सेना से बाहर होंगे — पुनर्वास रोडमैप अभी तक अघोषित

मुख्य बातें

  • जनरल द्विवेदी के कार्यकाल में LAC पर डिसइंगेजमेंट हुआ, लेकिन पूर्ण डी-एस्केलेशन नहीं — चीन का सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर LAC के पास यथावत है।
  • अग्निपथ योजना का पहला बैच जल्द सेवा पूरी करेगा — 75% अग्निवीरों के पुनर्वास का ठोस रोडमैप अभी तक सार्वजनिक नहीं।
  • थिएटर कमांड का प्रस्ताव तीसरे आर्मी चीफ के कार्यकाल में भी लंबित — वायुसेना की आपत्तियाँ और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों रुकावट।
  • नए सेना प्रमुख की असली परीक्षा: क्या उन्हें 'ट्रांसफ़ॉर्मर' बनने का राजनीतिक और संस्थागत स्पेस मिलेगा?

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जनरल उपेंद्र द्विवेदी के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानी जाती है?

पूर्वी लद्दाख में कई घर्षण बिंदुओं पर भारत-चीन सेनाओं के बीच डिसइंगेजमेंट — विशेषकर देपसांग और डेमचोक में पैट्रोलिंग व्यवस्था बहाल होना — उनकी प्रमुख उपलब्धि मानी जाती है।

अग्निपथ योजना पर सेना के भीतर क्या चिंताएँ हैं?

सबसे बड़ी चिंता रिटेंशन और अनुभव की है — चार साल बाद 75% अग्निवीर बाहर होंगे, जिससे अनुभवी JCOs की कमी और ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित होने का ख़तरा जताया जाता है। पुनर्वास का ठोस रोडमैप अभी सार्वजनिक नहीं है।

थिएटर कमांड क्या है और यह क्यों अटकी है?

थिएटर कमांड में थलसेना, वायुसेना और नौसेना की एकीकृत कमान बनाने का प्रस्ताव है। वायुसेना की आपत्तियाँ, संसाधन बँटवारे की खींचतान और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी — तीनों कारणों से यह जनरल रावत के बाद से लंबित है।

नए आर्मी चीफ के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?

LAC पर डी-एस्केलेशन को वास्तविक बनाना, अग्निपथ पर सरकार को स्पष्ट ऑपरेशनल फीडबैक देना, और थिएटर कमांड को अमल में लाना — ये तीन प्राथमिक चुनौतियां होंगी।

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