अमेरिकी संसद में एक सांसद ने कोका-कोला के प्रतिनिधि से सीधा सवाल पूछा — 'क्या इसके बिना लोग मर जाएँगे?' आज तक के अनुसार यह सुनवाई सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट कटौतियों के संदर्भ में हुई। भारत में जहाँ कोला कंपनियों पर भूजल दोहन और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर सवाल उठते रहे हैं, यह बहस अब संसद तक पहुँचने की माँग कर रही है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: अमेरिकी सांसद ने कोका-कोला कंपनी के प्रतिनिधि से सवाल किया; भारत में राजस्थान-तमिलनाडु सरकारों ने स्कूलों में कोला पर पाबंदी लगाई है।
  • क्या: अमेरिकी संसद की सुनवाई में सांसद ने पूछा कि क्या कोका-कोला के बिना लोग जिंदा नहीं रह सकते — यह सवाल सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च में कटौती और कोला कंपनियों की लॉबिंग के संदर्भ में उठा।
  • कब: 2025 में अमेरिकी संसद की सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा; भारत में कोला विवाद दशकों पुराना है।
  • कहाँ: अमेरिकी कांग्रेस (वाशिंगटन डीसी); भारत में राजस्थान, केरल, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के ज़मीनी विवाद।
  • क्यों: सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट में कटौती के बीच कोका-कोला जैसी कंपनियों की लॉबिंग और उनके उत्पादों के स्वास्थ्य प्रभावों पर सवाल उठे; भारत में भूजल दोहन, मोटापा और बच्चों के स्वास्थ्य पर लंबी बहस चल रही है।
  • कैसे: अमेरिकी सांसद ने कांग्रेसनल हियरिंग के दौरान सीधे कोका-कोला प्रतिनिधि को गवाह के तौर पर बुलाकर सार्वजनिक रूप से सवाल किया; भारत में यह मुद्दा अभी तक राज्य-स्तरीय फ़ैसलों और FSSAI की नियामक बहस तक सीमित है, संसदीय सुनवाई तक नहीं पहुँचा।

एक सांसद, एक माइक्रोफ़ोन, और एक सवाल जिसने दुनिया की सबसे बड़ी बेवरेज कंपनी के प्रतिनिधि को कुर्सी पर बेचैन कर दिया — 'क्या कोका-कोला के बिना लोग मर जाएँगे?' अमेरिकी संसद में गूँजा यह सवाल सुनने में सीधा लगता है, लेकिन इसके पीछे एक विशाल सियासी और सार्वजनिक स्वास्थ्य बहस छिपी है। आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक यह सुनवाई उस वक़्त हुई जब अमेरिका में सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट में कटौतियों पर बहस चल रही थी और कोका-कोला समेत बड़ी बेवरेज कंपनियों की लॉबिंग सवालों के घेरे में आई।

लेकिन इस खबर का असली दंश अमेरिका से बारह हज़ार किलोमीटर दूर है — भारत के हिंदी बेल्ट में, जहाँ कोला कंपनियाँ न सिर्फ़ बच्चों की सेहत बल्कि ज़मीन के नीचे के पानी पर भी सवालों के घेरे में रही हैं।

अमेरिका में क्या हुआ — और क्यों यह सामान्य सुनवाई नहीं है

अमेरिकी कांग्रेस की सुनवाई में सांसद ने कोका-कोला के प्रतिनिधि से सीधे पूछा कि उनका प्रोडक्ट अगर बाज़ार से हट जाए तो क्या किसी की जान जाएगी। आज तक के अनुसार, यह सवाल इसलिए उठा क्योंकि अमेरिका में हेल्थ बजट में कटौती की जा रही है जबकि कोला कंपनियाँ अरबों डॉलर लॉबिंग पर ख़र्च कर रही हैं। सांसद का तर्क सीधा था — जब सरकार पब्लिक हेल्थ पर ख़र्च घटा रही है, तो ऐसी कंपनियों की ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है जिनके प्रोडक्ट मोटापा, डायबिटीज़ और हृदय रोग से जुड़े हैं।

यह सवाल इसलिए भी तीखा था क्योंकि कोका-कोला जैसी कंपनियाँ दशकों से अमेरिका में न्यूट्रिशन रिसर्च को फ़ंड करती रही हैं — वही रिसर्च जो अक्सर शुगर ड्रिंक्स के नुकसान को कम करके आँकती है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने पहले भी रिपोर्ट किया है कि कोका-कोला ने ऐसे अकादमिक अध्ययनों को प्रायोजित किया जो व्यायाम को मोटापे का मुख्य कारण बताते थे, न कि शुगर वाली ड्रिंक्स को।

भारत: जहाँ सवाल संसद तक पहुँचने से पहले ही दब जाते हैं

भारत में कोला कंपनियों पर सवाल नए नहीं हैं, लेकिन वे हमेशा ज़मीनी आंदोलन या राज्य सरकारों के दायरे में रहे — केंद्रीय संसद के फ़्लोर तक शायद ही कभी पहुँचे। केरल में प्लाचीमाडा का मामला इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जहाँ 2004 में स्थानीय पंचायत ने कोका-कोला के बॉटलिंग प्लांट का लाइसेंस रद्द कर दिया था क्योंकि गाँव का भूजल स्तर ख़तरनाक हद तक गिर गया था। केरल हाईकोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया था।

राजस्थान में कई ज़िलों ने स्कूलों और सरकारी परिसरों में कोला बैन किया है। तमिलनाडु में भी समय-समय पर स्कूल कैंटीनों से कार्बोनेटेड ड्रिंक्स हटाने के आदेश आए हैं। लेकिन ये सब क़दम बिखरे हुए हैं — कोई केंद्रीय नीति नहीं, कोई संसदीय बहस नहीं, कोई कोका-कोला को गवाह के तौर पर बुलाने की हिम्मत नहीं।

उत्तर प्रदेश के मेहंदीगंज (वाराणसी के पास) में कोका-कोला प्लांट के ख़िलाफ़ किसानों का आंदोलन दो दशक से ज़्यादा पुराना है। किसानों का आरोप रहा है कि प्लांट ने भूजल इतना खींचा कि खेतों की सिंचाई मुश्किल हो गई। डाउन टू अर्थ पत्रिका ने इस पर विस्तार से रिपोर्ट किया है। लेकिन यह मुद्दा कभी लोकसभा या राज्यसभा में गंभीर बहस का विषय नहीं बना।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में यह बात फुसफुसाहट में चलती है कि बड़ी बेवरेज कंपनियाँ चुनावी फ़ंडिंग में 'अदृश्य खिलाड़ी' हैं। इलेक्टोरल बॉन्ड के ख़ुलासों ने बहुत-सी कंपनियों के चंदे का पर्दा उठाया, लेकिन बेवरेज सेक्टर की फ़ंडिंग पर अभी तक उतनी बारीक नज़र नहीं गई। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि कोई भी बड़ी पार्टी — चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष — कोला कंपनियों के ख़िलाफ़ संसदीय सुनवाई का जोखिम नहीं उठाना चाहती, क्योंकि इन कंपनियों का विज्ञापन बजट मीडिया से लेकर क्रिकेट स्पॉन्सरशिप तक फैला है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

दिलचस्प बात यह है कि 'स्वदेशी बनाम विदेशी' का नैरेटिव, जो योग गुरुओं और स्वदेशी लॉबी ने दशकों से चलाया, कभी ठोस नीतिगत रूप नहीं ले पाया। पतंजलि जैसे ब्रांड कोला के विकल्प लाए, लेकिन बाज़ार में कोका-कोला और पेप्सिको की पकड़ कम नहीं हुई।

FSSAI और चीनी की लड़ाई — आधी-अधूरी बहस

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पैकेज्ड फ़ूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग लागू करने की बात कही है ताकि उपभोक्ता को पता चले कि किसी प्रोडक्ट में कितनी चीनी, नमक और फ़ैट है। लेकिन यह नियम अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बार-बार कहा है कि शुगर-स्वीटेंड बेवरेजेज़ पर टैक्स बढ़ाना मोटापा और डायबिटीज़ रोकने के सबसे कारगर तरीकों में से एक है। मेक्सिको ने 2014 में सोडा टैक्स लगाया और वहाँ कोला की खपत में गिरावट दर्ज हुई — लेकिन भारत ने इस रास्ते पर अभी तक ठोस क़दम नहीं उठाया।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि अमेरिकी सांसद का सवाल असल में कोला के बारे में नहीं, कॉरपोरेट लॉबिंग और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के बीच के टकराव के बारे में है — और भारत में यह टकराव और भी गहरा है क्योंकि यहाँ भूजल का संकट, बच्चों में बढ़ती डायबिटीज़ और कमज़ोर नियामक ढाँचा, तीनों एक साथ मौजूद हैं। फिर भी कोई सांसद इसे उठाने को तैयार नहीं — यही इस कहानी की सबसे बड़ी और सबसे चिंताजनक पंक्ति है।

आगे क्या — देखने लायक़ तीन बातें

पहला, FSSAI का फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग नियम अगर 2026 में पूरी तरह लागू होता है तो कोला कंपनियों को अपने पैकेट पर लाल निशान (हाई शुगर) लगाना होगा — यह बाज़ार में उनकी छवि बदल सकता है। दूसरा, अगर विपक्ष या कोई क्षेत्रीय दल 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले 'जंक फ़ूड टैक्स' या 'कोला टैक्स' का मुद्दा उठाता है, तो यह हिंदी बेल्ट में एक नया चुनावी नैरेटिव बन सकता है — ख़ासकर ग्रामीण इलाकों में जहाँ भूजल संकट सीधे किसान की रोज़ी से जुड़ा है। तीसरा, अमेरिका में इस सुनवाई के बाद अगर कोई ठोस नियम बनता है, तो भारतीय सिविल सोसाइटी और स्वास्थ्य संगठन इसे उदाहरण बनाकर दबाव बनाएँगे।

अमेरिकी सांसद ने एक सवाल पूछा और कोका-कोला के प्रतिनिधि को जवाब देना पड़ा। भारत में सवाल वही है, ज़रूरत उससे ज़्यादा है — लेकिन पूछने वाला कोई नहीं। जब तक कोई सांसद माइक्रोफ़ोन उठाकर यह पूछने की हिम्मत नहीं करता कि 'क्या कोका-कोला के बिना हिंदुस्तान मर जाएगा?', तब तक यह बहस चाय की दुकानों पर रहेगी, संसद भवन में नहीं। सवाल यह नहीं है कि जवाब क्या होगा — सवाल यह है कि पूछेगा कौन।

आँकड़ों में

  • केरल में प्लाचीमाडा में 2004 में कोका-कोला बॉटलिंग प्लांट का लाइसेंस भूजल संकट के कारण रद्द हुआ।
  • मेक्सिको ने 2014 में सोडा टैक्स लगाया और कोला खपत में गिरावट दर्ज हुई।
  • WHO के अनुसार शुगर-स्वीटेंड बेवरेजेज़ पर टैक्स मोटापा और डायबिटीज़ रोकने के सबसे कारगर उपायों में से एक है।

मुख्य बातें

  • अमेरिकी संसद में सांसद ने कोका-कोला से पूछा — 'क्या इसके बिना लोग मर जाएँगे?' — यह सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट कटौती के संदर्भ में था।
  • भारत में केरल, राजस्थान, तमिलनाडु और यूपी में कोला कंपनियों पर भूजल दोहन और स्वास्थ्य के सवाल उठे, लेकिन केंद्रीय संसद में कभी गंभीर बहस नहीं हुई।
  • FSSAI का फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग नियम लागू होने पर कोला कंपनियों की पैकेजिंग पर 'हाई शुगर' चेतावनी आ सकती है।
  • मेक्सिको में सोडा टैक्स से कोला खपत घटी — भारत ने अभी तक यह क़दम नहीं उठाया।
  • 2027 विधानसभा चुनावों से पहले 'कोला टैक्स' एक नया चुनावी नैरेटिव बन सकता है, ख़ासकर हिंदी बेल्ट में।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अमेरिकी सांसद ने कोका-कोला से क्या सवाल पूछा?

अमेरिकी संसद की सुनवाई में सांसद ने कोका-कोला के प्रतिनिधि से पूछा कि क्या उनके प्रोडक्ट के बिना लोग मर जाएँगे — यह सवाल सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट में कटौती और कोला कंपनियों की लॉबिंग के संदर्भ में उठा।

भारत में कोला कंपनियों पर क्या विवाद रहे हैं?

केरल के प्लाचीमाडा में भूजल दोहन, यूपी के मेहंदीगंज में किसान आंदोलन, राजस्थान-तमिलनाडु में स्कूलों में कोला बैन — ये प्रमुख विवाद रहे हैं, लेकिन ये कभी केंद्रीय संसद में गंभीर बहस का विषय नहीं बने।

क्या भारत में कोला पर टैक्स बढ़ सकता है?

WHO ने शुगर ड्रिंक्स पर टैक्स की सिफ़ारिश की है और मेक्सिको में इसके सकारात्मक नतीजे आए हैं। भारत में FSSAI लेबलिंग और 2027 चुनावी दबाव के चलते इस दिशा में क़दम संभव हैं, हालाँकि अभी तक ठोस नीतिगत पहल नहीं हुई।

FSSAI का फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग नियम क्या है?

FSSAI ने पैकेज्ड फ़ूड प्रोडक्ट्स पर आगे की तरफ़ चीनी, नमक और फ़ैट की मात्रा का स्पष्ट लेबल लगाने का प्रस्ताव रखा है ताकि उपभोक्ता सूचित फ़ैसला ले सकें। इसके पूरी तरह लागू होने पर कोला जैसी ड्रिंक्स पर 'हाई शुगर' चेतावनी आ सकती है।

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