उमर खालिद को UAPA के तहत दिल्ली दंगों के मामले में गिरफ़्तार हुए छह साल बीत चुके हैं, ट्रायल अब तक शुरू नहीं हुआ। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसे 'न्याय का मज़ाक' बताया है। सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी और विपक्ष की हलचल दोनों मिलकर इस केस को 2027 तक के राजनीतिक गणित का हिस्सा बना रहे हैं।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: JNU के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद, जो UAPA के तहत तिहाड़ जेल में बंद हैं, और कांग्रेस सांसद शशि थरूर जिन्होंने उनके इंटरव्यू को साझा किया
  • क्या: थरूर ने उमर खालिद के छह साल बिना ट्रायल जेल में बिताने को 'ट्रैवेस्टी ऑफ जस्टिस' बताया और कहा कि आरोप साबित करो कोर्ट में, हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार
  • कब: 2026 में, उमर खालिद की सितंबर 2020 में गिरफ़्तारी के लगभग छह साल बाद
  • कहाँ: दिल्ली — तिहाड़ जेल में उमर खालिद बंद हैं, मामला दिल्ली की अदालत में विचाराधीन
  • क्यों: UAPA के सख़्त ज़मानत प्रावधानों और सैकड़ों गवाहों वाली विशाल चार्जशीट के कारण ट्रायल शुरू नहीं हो सका, हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार
  • कैसे: UAPA की धारा 43D(5) के तहत ज़मानत पाना लगभग असंभव है क्योंकि आरोपी को प्रथम दृष्टया यह साबित करना होता है कि आरोप झूठे हैं — यह बोझ सामान्य आपराधिक कानून से उलट है

छह साल। 2,190 दिन से ज़्यादा। इतने वक़्त में एक इंसान मेडिकल की डिग्री पूरी कर सकता है, एक स्टार्टअप खड़ा कर सकता है, एक बच्चे को स्कूल भेजने लायक बना सकता है। उमर खालिद ने ये छह साल तिहाड़ जेल की दीवारों के पीछे बिताए हैं — बिना ट्रायल, बिना सज़ा, बिना बरी। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ उमर खालिद ने अपना मौन तोड़ते हुए कहा है — 'लोग भूल जाते हैं कि मैं भी एक इंसान हूँ।'

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने उमर खालिद के इस इंटरव्यू को साझा करते हुए इसे 'ट्रैवेस्टी ऑफ जस्टिस' — यानी न्याय का खुला मज़ाक — बताया। थरूर का कहना है कि अगर सरकार के पास सबूत हैं तो कोर्ट में साबित करो, छह साल तक बिना ट्रायल किसी को बंद रखना किसी भी लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, खालिद ने अपने इंटरव्यू में कहा कि 'इंसानियत एक विशेषाधिकार है, जो मेरे जैसे लोगों को नहीं दी जाती।'

UAPA का वह ताला जिसकी चाबी किसी के पास नहीं

इस पूरे मामले की जड़ UAPA — गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम — की उस धारा 43D(5) में है जो ज़मानत के लिए अभियुक्त पर ही सबूत का बोझ डालती है। सामान्य आपराधिक कानून में सरकार को साबित करना होता है कि आरोपी दोषी है; UAPA में आरोपी को साबित करना होता है कि वह निर्दोष है — और वह भी तब जब उसे चार्जशीट में मौजूद सारे सबूत देखने का पूरा मौक़ा भी नहीं मिलता। यह क़ानूनी उलटबाँसी है जिसने उमर खालिद ही नहीं, दर्जनों आरोपियों को वर्षों तक बिना सुनवाई जेल में रखा है।

दिल्ली दंगा षड्यंत्र केस की चार्जशीट ही एक विशालकाय दस्तावेज़ है — सैकड़ों गवाह, हज़ारों पन्ने। ट्रायल की गति इतनी धीमी है कि अभी तक आरोप तय करने की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई। छह साल में जो स्थिति बनी है, उसे कोर्ट की भाषा में 'अंडरट्रायल' कहते हैं — पर आम भाषा में इसे 'बिना सज़ा की सज़ा' कहना कहीं ज़्यादा सटीक होगा।

थरूर का बयान — सहानुभूति या चुनावी पैंतरा?

शशि थरूर का यह बयान सिर्फ़ एक सांसद की व्यक्तिगत संवेदना नहीं है — यह कांग्रेस की उस बड़ी रणनीति का संकेत है जो UAPA के दुरुपयोग को 2027 के आम चुनावों से पहले एक राजनीतिक हथियार के रूप में तैयार कर रही है। विपक्ष का तर्क सीधा है: BJP सरकार ने UAPA को असहमति कुचलने का औज़ार बना दिया है, और हज़ारों नागरिक बिना ट्रायल जेलों में सड़ रहे हैं। BJP का जवाब भी उतना ही सीधा है: UAPA राष्ट्रीय सुरक्षा की ज़रूरत है और दिल्ली दंगे कोई साधारण कानून-व्यवस्था का मामला नहीं था।

लेकिन राजनीतिक बिसात पर देखें तो दोनों पक्ष इस केस को अपने-अपने वोट बैंक के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। BJP के लिए उमर खालिद का जेल में रहना 'सख़्त राष्ट्रवाद' की छवि को मज़बूत करता है — ख़ासकर हिंदी बेल्ट के उन वोटरों के बीच जहाँ दिल्ली दंगों की याद अब भी तीखी है। कांग्रेस और AIMIM जैसी पार्टियों के लिए यह 'अल्पसंख्यक उत्पीड़न' का सबसे ताज़ा और सबसे भावनात्मक उदाहरण है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में एक फुसफुसाहट ज़ोर पकड़ रही है — कि विपक्ष UAPA के बंदियों के केसों को एक 'बंडल' की तरह पेश करने की तैयारी कर रहा है, जहाँ उमर खालिद पोस्टर-बॉय होंगे और दर्जनों कम चर्चित नाम बैकग्राउंड में। ट्रेड पंडितों का कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट अगले कुछ महीनों में किसी UAPA केस में ज़मानत का बड़ा फ़ैसला देता है, तो विपक्ष उसे 'न्यायपालिका ने सरकार को झटका दिया' के फ़्रेम में तुरंत पेश करेगा। दूसरी तरफ़, BJP के भीतर माना जा रहा है कि ट्रायल जितना लंबा खिंचेगा, उतना ही 'मज़बूत शासन' का नैरेटिव टिकेगा — पर अगर कोर्ट ने ज़मानत दे दी, तो 'कमज़ोर अभियोजन' का सवाल उठेगा जो ख़ुद सत्तापक्ष के लिए शर्मनाक होगा।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक हलकों में घूम रही अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी — कब तक?

सबसे बड़ा सवाल वहाँ है जहाँ सबसे ज़्यादा चुप्पी है — सुप्रीम कोर्ट। पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने कई UAPA मामलों में 'लंबी क़ैद बिना ट्रायल' पर चिंता जताई है। भीमा कोरेगाँव केस में कुछ आरोपियों को ज़मानत मिली, NIA मामलों में भी कोर्ट ने 'स्पीडी ट्रायल' पर ज़ोर दिया। लेकिन दिल्ली दंगा षड्यंत्र केस — जो राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील है — में सर्वोच्च अदालत अब तक किसी निर्णायक हस्तक्षेप से बचती रही है।

इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यह है कि सुप्रीम कोर्ट की यह चुप्पी अनंतकाल तक नहीं टिक सकती। अगर 2026 के बचे महीनों में ट्रायल शुरू नहीं हुआ, तो कोर्ट के सामने दो ही रास्ते बचेंगे — या तो ट्रायल कोर्ट को समयसीमा बाँधे, या ज़मानत के सवाल को ख़ुद उठाए। दोनों ही विकल्प सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के लिए तूफ़ान लाने वाले हैं।

'इंसानियत एक विशेषाधिकार' — यह वाक्य क्यों भारी है

उमर खालिद का वह एक वाक्य — 'इंसानियत एक विशेषाधिकार है, जो मेरे जैसे लोगों को नहीं दी जाती' — इस पूरी बहस को क़ानूनी दायरे से बाहर खींचकर एक बुनियादी मानवाधिकार के सवाल पर ला खड़ा करता है। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, खालिद ने कहा कि लोग भूल जाते हैं कि वह भी एक इंसान हैं। यह कोई राजनीतिक बयान नहीं, एक ऐसे शख़्स की पुकार है जो छह साल से एक ऐसी व्यवस्था में फँसा है जहाँ न सज़ा है, न बरी होने का रास्ता।

चाहे कोई उमर खालिद को दोषी माने या निर्दोष — यह फ़ैसला कोर्ट का है, किसी राजनीतिक दल या ट्विटर ट्रेंड का नहीं — एक सवाल हर नागरिक का है: क्या कोई भी लोकतंत्र अपने किसी नागरिक को छह साल बिना सुनवाई बंद रख सकता है और फिर भी ख़ुद को 'विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र' कह सकता है?

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आने वाले महीने बताएँगे कि सुप्रीम कोर्ट इस चुप्पी को तोड़ता है या यह केस 2027 के चुनावी शोर में एक और पोस्टर बनकर रह जाता है। लेकिन एक बात तय है — जब तक ट्रायल शुरू नहीं होता, यह सवाल भारत के लोकतांत्रिक दावों पर एक ऐसा दाग़ बना रहेगा जिसे कोई प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं धो सकती।

आँकड़ों में

  • उमर खालिद की गिरफ़्तारी के बाद से 2,190+ दिन बीत चुके हैं, ट्रायल शुरू नहीं हुआ
  • UAPA की धारा 43D(5) के तहत ज़मानत का बोझ अभियुक्त पर है, अभियोजन पर नहीं — सामान्य क़ानून के उलट

मुख्य बातें

  • उमर खालिद UAPA के तहत छह साल से तिहाड़ जेल में हैं, ट्रायल अब तक शुरू नहीं हुआ — यह भारत के सबसे लंबे अंडरट्रायल मामलों में से एक है
  • UAPA की धारा 43D(5) ज़मानत का बोझ आरोपी पर डालती है — सामान्य आपराधिक क़ानून के ठीक उलट
  • शशि थरूर ने इसे 'ट्रैवेस्टी ऑफ जस्टिस' बताया — विपक्ष UAPA को 2027 चुनाव से पहले राजनीतिक मुद्दा बनाने की तैयारी में दिखता है
  • BJP के लिए UAPA 'सख़्त शासन' की छवि का हिस्सा है, पर अगर कोर्ट ने ज़मानत दी तो 'कमज़ोर अभियोजन' का सवाल ख़ुद सत्तापक्ष को घेरेगा
  • सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी अब सबसे बड़ा सवाल है — अगले कुछ महीनों में या तो ट्रायल कोर्ट को समयसीमा मिलेगी या ज़मानत का सवाल उठेगा

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

उमर खालिद को किस क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया गया था?

उमर खालिद को UAPA (गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम) के तहत दिल्ली दंगा षड्यंत्र केस में सितंबर 2020 में गिरफ़्तार किया गया था। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, उन पर दंगों की साज़िश रचने का आरोप है।

UAPA में ज़मानत मिलना इतना मुश्किल क्यों है?

UAPA की धारा 43D(5) के तहत ज़मानत का बोझ अभियुक्त पर होता है — उसे प्रथम दृष्टया यह साबित करना होता है कि आरोप झूठे हैं, जो सामान्य आपराधिक क़ानून में अभियोजन पक्ष की ज़िम्मेदारी होती है।

शशि थरूर ने उमर खालिद के बारे में क्या कहा?

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने उमर खालिद के छह साल बिना ट्रायल जेल में बिताने को 'ट्रैवेस्टी ऑफ जस्टिस' बताया और कहा कि सरकार को आरोप कोर्ट में साबित करने चाहिए।

क्या सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई टिप्पणी की है?

अब तक सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगा षड्यंत्र केस में कोई निर्णायक हस्तक्षेप नहीं किया है, हालाँकि अन्य UAPA मामलों में कोर्ट ने लंबी अंडरट्रायल क़ैद पर चिंता जताई है।

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