इजरायल के पूर्व सेना प्रमुख गदी आइजनकोट ने आगामी चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को हटाने के लिए चुनावी अभियान शुरू कर दिया है। NDTV और The Hindu के अनुसार, यह कदम इजरायल में युद्ध नीति के खिलाफ बढ़ते असंतोष का सबसे बड़ा संकेत है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: इजरायल के पूर्व सेना प्रमुख (Chief of General Staff) गदी आइजनकोट, जो नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का अभियान चला रहे हैं।
  • क्या: आइजनकोट ने आगामी इजरायली चुनावों से पहले नेतन्याहू के खिलाफ औपचारिक चुनावी अभियान शुरू किया है।
  • कब: 2025 के अंत / 2026 की शुरुआत में, जबकि गाजा और लेबनान में सैन्य अभियान जारी हैं।
  • कहाँ: इजरायल — जहाँ घरेलू राजनीतिक संकट और बाहरी युद्ध एक साथ चल रहे हैं।
  • क्यों: गाजा युद्ध की लंबी अवधि, बंधकों की वापसी में विफलता, और नेतन्याहू की युद्ध नीति पर गहरे असंतोष के कारण।
  • कैसे: आइजनकोट ने एक नई राजनीतिक पहल के तहत चुनावी अभियान लॉन्च किया, जिसमें उन्होंने अपनी सैन्य विश्वसनीयता को नेतन्याहू की युद्धकालीन विफलताओं के बरक्स रखा है। (The Hindu, NDTV)

पूर्व सेना प्रमुख गदी आइजनकोट ने नेतन्याहू को सीधी चुनौती दी है — इजरायल में यह वह दरार है जो युद्ध नहीं, बल्कि युद्ध की 'नीति' ने खोली है। जो देश बाहर हमास और हिजबुल्लाह से लड़ रहा है, उसके भीतर का सबसे ताकतवर सैन्य चेहरा अब कह रहा है कि असली खतरा दुश्मन नहीं, अपना नेतृत्व है। The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, आइजनकोट ने आगामी चुनावों से पहले नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए औपचारिक चुनावी अभियान शुरू कर दिया है।

यह कोई मामूली विपक्षी हलचल नहीं है। गदी आइजनकोट वो शख्स हैं जिन्होंने 2015 से 2019 तक इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ के रूप में देश की सुरक्षा मशीनरी चलाई। NDTV के अनुसार, उनके अपने बेटे ने गाजा युद्ध में अपनी जान गँवाई — यानी यह शख्स न सिर्फ पेशेवर बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी युद्ध की कीमत जानता है। जब ऐसा आदमी कहता है कि 'यह जंग गलत तरीके से लड़ी जा रही है', तो उसकी बात में एक ऐसा वज़न होता है जो किसी राजनेता के बयान में नहीं मिलता।

नेतन्याहू का 'स्ट्रॉन्गमैन' इमेज और भीतर की सच्चाई

दुनिया बेंजामिन नेतन्याहू को एक 'स्ट्रॉन्गमैन' के रूप में जानती है — वो नेता जो पश्चिम एशिया में ताकत की भाषा बोलता है, जो हमास के खिलाफ बेरहम सैन्य अभियान चलाता है, जो अमेरिका तक को अपनी शर्तों पर रखने की हिम्मत रखता है। लेकिन इस चमकती छवि के पीछे एक ऐसी कहानी है जो इजरायल की गलियों में, बंधकों के परिवारों की आँखों में, और अब सेना के पूर्व शीर्ष अफसर के अभियान में दिख रही है।

The Hindu के अनुसार, आइजनकोट ने अपने अभियान की शुरुआत में नेतन्याहू की युद्ध नीति पर सीधा हमला बोला है। उनका मुख्य तर्क यह है कि गाजा युद्ध ने न तो बंधकों को वापस लाया, न ही इजरायल को ज्यादा सुरक्षित बनाया — बल्कि यह एक ऐसे दलदल में बदल गया है जिसमें इजरायल फँसता जा रहा है। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, आइजनकोट ने स्पष्ट किया कि वो इस चुनाव को 'राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम राजनीतिक अस्तित्व' के मुद्दे पर लड़ना चाहते हैं।

पॉलिटिकल पल्स — परदे के पीछे क्या चल रहा है?

इजरायली राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि आइजनकोट का यह कदम अकेला नहीं है। सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि इजरायल के सुरक्षा प्रतिष्ठान — जिसमें शिन बेट और मोसाद के पूर्व प्रमुख भी शामिल हैं — नेतन्याहू की युद्धकालीन रणनीति से गहरे असंतुष्ट हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि आइजनकोट का अभियान एक व्यापक 'सुरक्षा-प्रतिष्ठान बनाम नेतन्याहू' टकराव का सबसे ताजा अध्याय है।

जनता की नब्ज़ भी बदल रही है। इजरायल में हर शनिवार होने वाले विशाल प्रदर्शनों ने नेतन्याहू की सरकार पर लगातार दबाव बनाया है। बंधकों के परिवार सड़कों पर हैं, रिजर्विस्ट सैनिकों ने खुलेआम सरकार की आलोचना की है। ऐसे माहौल में जब एक पूर्व सेना प्रमुख मैदान में उतरता है, तो यह सिर्फ चुनावी गणित नहीं रहता — यह एक भावनात्मक भूचाल बन जाता है।

(यह अनुभाग इंडस्ट्री चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, ये पुष्ट तथ्य नहीं हैं।)

भारत को इससे क्यों फर्क पड़ता है?

यहाँ एक सवाल उठता है जो भारतीय पाठक के लिए सीधे प्रासंगिक है — इजरायल का नेतृत्व बदला तो भारत-इजरायल रिश्ते पर क्या असर होगा? नेतन्याहू का दौर भारत-इजरायल के सबसे गर्म संबंधों का दौर रहा है। रक्षा सौदे, खुफिया साझेदारी, कृषि तकनीक — ये सब इसी 'नेतन्याहू युग' की देन हैं। अगर आइजनकोट जैसा सुरक्षा-केंद्रित नेता सत्ता में आता है, तो रक्षा सहयोग का तकनीकी ढाँचा शायद बरकरार रहे, लेकिन राजनीतिक गर्मजोशी का स्तर बदल सकता है।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि आइजनकोट की असली ताकत उनकी सैन्य विश्वसनीयता है — और यही नेतन्याहू की सबसे बड़ी कमजोरी भी। नेतन्याहू ने सालों तक खुद को 'मिस्टर सिक्योरिटी' के रूप में पेश किया, लेकिन 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले ने उस छवि को तार-तार कर दिया। अब जब एक असली सैन्य कमांडर — जिसने युद्ध में अपना बेटा खोया — कहता है कि 'मैं बेहतर कर सकता हूँ', तो नेतन्याहू के पास जवाब में सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी बचती है, अनुभव नहीं।

क्या नेतन्याहू की कुर्सी सच में खतरे में है?

इजरायल का चुनावी इतिहास बताता है कि सेना प्रमुखों का राजनीति में आना कोई नई बात नहीं है — यित्जाक राबिन, एहुद बराक, एरियल शेरोन, सब जनरल से प्रधानमंत्री बने। लेकिन हर बार ऐसा तभी हुआ जब जनता ने महसूस किया कि मौजूदा नेतृत्व से सुरक्षा को खतरा है। आज इजरायल ठीक उसी मोड़ पर खड़ा है।

हालाँकि, नेतन्याहू को कमतर आँकना भी गलत होगा। वो इजरायल के सबसे अनुभवी राजनीतिक उत्तरजीवी हैं — भ्रष्टाचार के मुकदमे, गठबंधन टूटना, जनता का गुस्सा — इन सबसे वो पहले भी बचते आए हैं। उनकी दक्षिणपंथी गठबंधन की जड़ें गहरी हैं, और धार्मिक-राष्ट्रवादी दल अभी भी उनके साथ खड़े हैं।

लेकिन इस बार का समीकरण अलग है। The Hindu के अनुसार, आइजनकोट जिस मंच पर खड़े हैं, वह सिर्फ एक पार्टी का मंच नहीं — वो एक व्यापक नागरिक आंदोलन की आवाज़ बनने की कोशिश में हैं। अगर वो केंद्रवादी और उदारवादी वोट बैंक को एकजुट कर पाए, तो नेतन्याहू के लिए गणित मुश्किल हो सकता है।

आगे क्या देखना है?

अगले कुछ हफ्ते निर्णायक होंगे। देखने लायक यह होगा कि आइजनकोट किस पार्टी या गठबंधन के तहत चुनाव लड़ते हैं, क्या वो बेनी गैंट्ज़ जैसे अन्य केंद्रवादी नेताओं के साथ आते हैं, और क्या इजरायली मतदाता 'सुरक्षा बनाम राजनीति' के इस नए फ्रेम को स्वीकार करते हैं। अगर गाजा में जंग और लंबी खिंची और बंधक वापस नहीं आए, तो आइजनकोट का यह दाँव नेतन्याहू के राजनीतिक करियर का अंतिम अध्याय लिख सकता है।

और भारत के लिए? नई दिल्ली के गलियारों में यह बात साफ है — कोई भी सरकार हो, भारत-इजरायल के रणनीतिक रिश्ते संस्थागत स्तर पर मजबूत हैं। लेकिन राजनीतिक रसायन बदलता है, और वो रसायन कभी-कभी बड़े सौदों की दिशा तय करता है।

गाजा की आग ने जो सबसे बड़ा काम किया, वो यह है कि उसने इजरायल के 'अजेय नेता' की छवि में दरार डाल दी। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि नेतन्याहू जीतेंगे या हारेंगे — सवाल यह है कि क्या इजरायल का लोकतंत्र अपने ही स्ट्रॉन्गमैन को बदलने का साहस दिखाएगा, या डर फिर से जीत जाएगा?

आँकड़ों में

  • गदी आइजनकोट ने 2015-2019 तक इजरायल डिफेंस फोर्सेज के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ के रूप में सेवा दी (NDTV)
  • आइजनकोट के बेटे ने गाजा युद्ध में अपनी जान गँवाई — जो इस चुनौती को व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों बनाता है (NDTV)
  • इजरायल के इतिहास में कम से कम तीन पूर्व सेना प्रमुख — राबिन, बराक, शेरोन — प्रधानमंत्री बने

मुख्य बातें

  • गदी आइजनकोट ने नेतन्याहू को हटाने के लिए औपचारिक चुनावी अभियान शुरू किया — वो IDF के पूर्व चीफ ऑफ जनरल स्टाफ हैं जिनके बेटे ने गाजा युद्ध में जान गँवाई।
  • नेतन्याहू की 'स्ट्रॉन्गमैन' छवि 7 अक्टूबर 2023 के हमले और उसके बाद की लंबी जंग से गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुई है।
  • इजरायल का इतिहास बताता है कि सेना प्रमुख से प्रधानमंत्री बनना (राबिन, बराक, शेरोन) तब होता है जब जनता मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा खो देती है।
  • भारत-इजरायल रिश्तों पर सीधा असर: रक्षा सहयोग संस्थागत रहेगा, लेकिन राजनीतिक रसायन बदल सकता है।
  • आइजनकोट की असली ताकत यह है कि वो 'सुरक्षा बनाम राजनीति' का फ्रेम बना रहे हैं — जो नेतन्याहू की सबसे बड़ी कमजोरी को निशाना बनाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गदी आइजनकोट कौन हैं और उन्होंने नेतन्याहू को चुनौती क्यों दी?

गदी आइजनकोट इजरायल डिफेंस फोर्सेज के पूर्व चीफ ऑफ जनरल स्टाफ (2015-2019) हैं। उनके बेटे ने गाजा युद्ध में जान गँवाई। NDTV और The Hindu के अनुसार, उन्होंने नेतन्याहू की युद्ध नीति के खिलाफ और बंधकों की वापसी में विफलता के कारण चुनावी अभियान शुरू किया है।

क्या इजरायल में पूर्व सेना प्रमुख पहले भी प्रधानमंत्री बने हैं?

हाँ, इजरायल के इतिहास में यित्जाक राबिन, एहुद बराक और एरियल शेरोन जैसे कम से कम तीन पूर्व सेना प्रमुख प्रधानमंत्री बने — हर बार जब जनता को मौजूदा नेतृत्व से सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ।

नेतन्याहू के हटने से भारत-इजरायल संबंधों पर क्या असर होगा?

रक्षा सहयोग, खुफिया साझेदारी और कृषि तकनीक जैसे संस्थागत रिश्ते बरकरार रहने की संभावना है। हालाँकि, नेतन्याहू-युग की राजनीतिक गर्मजोशी का स्तर बदल सकता है, जो बड़े सौदों की दिशा पर असर डाल सकता है।

आइजनकोट की सबसे बड़ी ताकत क्या है?

उनकी सैन्य विश्वसनीयता और व्यक्तिगत बलिदान (बेटे की शहादत) उन्हें एक ऐसी नैतिक ऊँचाई देते हैं जो किसी पेशेवर राजनेता के पास नहीं है। वो 'सुरक्षा बनाम राजनीति' के फ्रेम पर चुनाव लड़ रहे हैं — जो नेतन्याहू की सबसे कमजोर नस को निशाना बनाता है।

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