PM eBus Sewa के तहत बेंगलुरु को 4,500 ई-बसें मिलनी हैं, लेकिन केंद्र मात्र ₹22 प्रति किलोमीटर दे रहा है जबकि राज्य पर ₹65/km का बोझ पड़ेगा। कर्नाटक के मंत्री ने इसे 'भारी वित्तीय बोझ' बताया है — यह विपक्षी शासित राज्यों और केंद्र के बीच राजकोषीय संघवाद की नई लड़ाई का मोर्चा बन गया है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: कर्नाटक के परिवहन मंत्री और राज्य सरकार, जिन्होंने केंद्र की PM eBus Sewa योजना पर आपत्ति जताई है।
  • क्या: PM eBus Sewa के तहत बेंगलुरु को 4,500 ई-बसें आवंटित की गई हैं, जिसमें केंद्र केवल ₹22/km सब्सिडी देगा और शेष लगभग ₹65/km का बोझ राज्य पर होगा — मंत्री ने इसे 'भारी बोझ' करार दिया।
  • कब: 2026 में कर्नाटक सरकार ने यह आपत्ति सार्वजनिक रूप से दर्ज कराई, डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार।
  • कहाँ: बेंगलुरु, कर्नाटक — भारत के सबसे बड़े IT हब और ट्रैफिक संकट से जूझते महानगर में।
  • क्यों: केंद्र और राज्य के बीच फंडिंग अनुपात (लगभग 1:3) अत्यंत असमान है, जिससे राज्य की वित्तीय सेहत पर गंभीर असर पड़ता है — विपक्षी शासित राज्य इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित भेदभाव मानते हैं।
  • कैसे: PM eBus Sewa योजना में केंद्र ऑपरेटर को प्रति किलोमीटर एक निश्चित सब्सिडी देता है, बाक़ी ऑपरेशनल लागत — ड्राइवर, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, डिपो, रखरखाव — राज्य सरकार या शहरी निकाय को उठानी होती है।

एक सरल सवाल पूछिए — अगर आपको एक गाड़ी 'मुफ़्त' में मिले लेकिन पेट्रोल, इंश्योरेंस, सर्विसिंग और ड्राइवर की तनख़्वाह आपकी जेब से जाए, तो क्या आप उसे 'तोहफ़ा' कहेंगे? बेंगलुरु की 4,500 ई-बसों का हिसाब कुछ ऐसा ही है।

डेक्कन हेराल्ड की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक के परिवहन मंत्री ने केंद्र सरकार की PM eBus Sewa योजना को राज्य पर 'भारी बोझ' बताया है। उनका गणित साफ़ है: केंद्र हर किलोमीटर पर मात्र ₹22 की सब्सिडी देगा, जबकि राज्य को हर किलोमीटर पर लगभग ₹65 ख़र्च करने होंगे। यानी कुल ₹87 प्रति किलोमीटर की लागत में केंद्र का हिस्सा सिर्फ़ 25 फ़ीसदी है — बाक़ी 75 फ़ीसदी का बिल राज्य के ख़ज़ाने पर।

अब इसे 4,500 बसों और बेंगलुरु जैसे शहर के विशाल नेटवर्क से गुणा कीजिए। अगर एक बस रोज़ाना औसतन 200 किलोमीटर भी चले, तो राज्य पर सालाना अतिरिक्त बोझ सैकड़ों करोड़ रुपये पहुँचता है। और यह सिर्फ़ ऑपरेशनल लागत है — चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, डिपो निर्माण और ज़मीन अधिग्रहण अलग।

₹22 बनाम ₹65 — यह अनुपात ही असली कहानी है

PM eBus Sewa योजना का ढाँचा समझना ज़रूरी है। केंद्र सरकार ने इसे 'ग्रीन मोबिलिटी' और 'नेट-ज़ीरो' लक्ष्यों की ओर एक बड़ा क़दम बताया है। प्रेस रिलीज़ में बड़ी संख्या चमकती है — हज़ारों बसें, करोड़ों का आवंटन, दर्जनों शहर। लेकिन जब राज्य स्तर पर गणित खुलता है, तो तस्वीर बदल जाती है।

डेक्कन हेराल्ड के अनुसार, ई-बस की प्रति किलोमीटर ऑपरेशनल लागत लगभग ₹87 आती है। इसमें बस का किराया (ऑपरेटर को), बिजली, ड्राइवर, कंडक्टर, रखरखाव, और चार्जिंग इंफ्रा शामिल है। केंद्र की सब्सिडी ₹22/km इस लागत का एक चौथाई भी नहीं है। बाक़ी ₹65/km — यानी तीन-चौथाई — राज्य की जेब से।

तुलना कीजिए: पंजाब में भगवंत मान सरकार मुफ़्त बिजली के वादे के बोझ तले दबी है, जहाँ 300 यूनिट मुफ़्त बिजली का वादा राज्य के वित्त पर भारी पड़ रहा है। कर्नाटक की ई-बस योजना भी ठीक उसी ढर्रे पर है — केंद्र का 'विज़न', राज्य का 'बिल'।

पॉलिटिकल पल्स — जो प्रेस रिलीज़ में नहीं लिखा

सियासी गलियारों में इस मुद्दे को सिर्फ़ बसों का मामला नहीं माना जा रहा। कांग्रेस शासित राज्यों — कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल — में यह फुसफुसाहट ज़ोरों पर है कि केंद्र जानबूझकर ऐसी योजनाएँ डिज़ाइन करता है जिनका 'क्रेडिट' प्रधानमंत्री को मिले और 'ख़र्चा' विपक्षी मुख्यमंत्री की बैलेंस शीट पर गिरे। अगर योजना सफल हो, तो 'PM eBus Sewa' का ब्रांडिंग केंद्र का। अगर बसें न चलें या सेवा ख़राब रहे, तो शहर की ट्रांसपोर्ट व्यवस्था पर सवाल राज्य से।

(यह इंडस्ट्री और राजनीतिक हलकों की चर्चा पर आधारित है, पुष्ट सरकारी स्थिति नहीं।)

बीजेपी शासित राज्यों ने भी इस फंडिंग मॉडल पर सवाल उठाए हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से विरोध कम दिखता है — कारण स्पष्ट है: पार्टी अनुशासन। कांग्रेस शासित राज्यों को यह 'लग्ज़री' हासिल है कि वे खुलकर केंद्र पर हमला कर सकते हैं — और कर्नाटक का यह क़दम ठीक वही है।

संघवाद का नया युद्धक्षेत्र: बसें, बजट और ब्रांडिंग

भारत में केंद्र-राज्य राजकोषीय टकराव नया नहीं है। GST क्षतिपूर्ति का विवाद हो, FRBM की सीमाओं के भीतर फ्रीबीज़ चलाने की चुनौती हो, या कोयला और खनिज रॉयल्टी का बँटवारा — हर दशक में यह लड़ाई नए रूप में सामने आती है। लेकिन ई-बस योजना का मामला कुछ अलग है क्योंकि यहाँ विरोध करना राजनीतिक रूप से भी मुश्किल है।

सोचिए — कोई मुख्यमंत्री कैसे कहे कि 'हमें ई-बसें नहीं चाहिए'? ग्रीन ट्रांसपोर्ट, प्रदूषण कम करने का लक्ष्य, शहरी मतदाता की माँग — इन सबसे मुँह मोड़ना राजनीतिक आत्मघात है। तो राज्य फँसता है: न मना कर सकता है, न बिल चुकाने की हालत में है। केंद्र का 'ऑफ़र' एक ऐसा तोहफ़ा बन जाता है जिसे लेना भी बोझ, छोड़ना भी नुक़सान।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि कर्नाटक की यह 'बग़ावत' अकेली नहीं रहेगी — आने वाले महीनों में केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल से भी ऐसी ही आवाज़ें उठ सकती हैं। 15वें वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के बाद से विपक्षी राज्यों में यह भावना गहरी हुई है कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं का ढाँचा ही असमान है।

बेंगलुरु का ट्रैफिक — समस्या असली है, समाधान विवादित

बेंगलुरु का ट्रैफिक संकट किसी से छिपा नहीं। भारत के IT कैपिटल में एक कर्मचारी रोज़ाना औसतन 1.5 से 2 घंटे ट्रैफिक में गँवाता है। शहर को बड़े पैमाने पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट की ज़रूरत है — इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सवाल यह है कि 4,500 ई-बसें चलाने का ख़र्चा कौन उठाएगा, और क्या यह मॉडल टिकाऊ है?

अगर राज्य सरकार ₹65/km का ख़र्चा टिकट रेवेन्यू से वसूलने की कोशिश करे, तो किराये इतने बढ़ जाएँगे कि मक़सद ही मारा जाए। अगर सब्सिडी दे, तो पहले से तनी हुई बैलेंस शीट और खिंचेगी। यह वही 'फ्रीबीज़ बनाम इंफ्रास्ट्रक्चर' की बहस है जो हर चुनाव से पहले उबलती है।

आगे का रास्ता — और क्या बदल सकता है

कर्नाटक ने जो सवाल उठाया है, वह सिर्फ़ बेंगलुरु तक सीमित नहीं रहेगा। PM eBus Sewa के तहत देश भर के 169 शहरों को ई-बसें मिलनी हैं। अगर हर राज्य यही हिसाब लगाए — 75% ख़र्चा मेरा, 25% क्रेडिट आपका — तो योजना ज़मीन पर उतरने से पहले ही राजनीतिक बारूद बन सकती है।

देखने वाली बात यह होगी कि क्या केंद्र फंडिंग अनुपात में बदलाव करता है, या कर्नाटक जैसे राज्य FAME-III और अन्य ग्रीन मोबिलिटी फंड्स से इस अंतर को पाटने की कोशिश करते हैं। बंगाल में बीजेपी का 'शैडो CM' गेम हो या कर्नाटक में कांग्रेस की ई-बस बग़ावत — हर मोर्चे पर केंद्र-राज्य का तनाव 2026 की राजनीति की सबसे बड़ी अंडरकरेंट बनता जा रहा है।

आख़िरी सवाल यह है: क्या 'ग्रीन इंडिया' का सपना उन राज्यों की जेब पर टिका रहेगा जिनकी अपनी वित्तीय साँसें उखड़ रही हैं? या फिर केंद्र को स्वीकार करना होगा कि 'विज़न' बेचना आसान है, 'बिल' बाँटना ज़रूरी? जब तक यह ₹22 बनाम ₹65 का गणित नहीं बदलता, हर नई ई-बस सड़क पर उतरने से पहले एक राजनीतिक सवाल बनकर खड़ी रहेगी।

आँकड़ों में

  • PM eBus Sewa में केंद्र ₹22/km बनाम राज्य ₹65/km — यानी 1:3 का फंडिंग अनुपात, डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार।
  • बेंगलुरु को 4,500 ई-बसें आवंटित — भारत के किसी शहर के लिए सबसे बड़े आवंटनों में से एक।
  • PM eBus Sewa देशभर के 169 शहरों में लागू होनी है।

मुख्य बातें

  • PM eBus Sewa में केंद्र सिर्फ़ ₹22/km सब्सिडी देता है, कुल ₹87/km लागत का 75% यानी ₹65/km राज्य पर — कर्नाटक ने इसे 'भारी बोझ' कहा।
  • 4,500 बसों के साथ बेंगलुरु में राज्य पर सालाना सैकड़ों करोड़ का अतिरिक्त ख़र्चा आएगा — चार्जिंग इंफ्रा और डिपो अलग।
  • यह सिर्फ़ कर्नाटक का मामला नहीं — 169 शहरों में योजना लागू होनी है, विपक्षी राज्यों से इसी तरह के विरोध की संभावना है।
  • केंद्र-राज्य राजकोषीय संघवाद का यह नया मोर्चा 2026 की राजनीति की प्रमुख अंडरकरेंट बनता जा रहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

PM eBus Sewa योजना में केंद्र और राज्य का फंडिंग अनुपात क्या है?

डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, ई-बस की कुल लागत लगभग ₹87 प्रति किलोमीटर है। इसमें केंद्र सिर्फ़ ₹22/km सब्सिडी देता है जबकि ₹65/km — यानी लगभग 75% — राज्य को वहन करना होता है।

कर्नाटक ने PM eBus Sewa का विरोध क्यों किया?

कर्नाटक के परिवहन मंत्री ने बेंगलुरु के लिए 4,500 ई-बसों के आवंटन को 'भारी वित्तीय बोझ' बताया क्योंकि ऑपरेशनल लागत का बड़ा हिस्सा राज्य पर पड़ता है — इसमें चार्जिंग इंफ्रा, डिपो और रखरखाव शामिल है।

PM eBus Sewa कितने शहरों में लागू होगी?

PM eBus Sewa योजना भारत के 169 शहरों में लागू होनी है, जिससे यह सिर्फ़ कर्नाटक नहीं बल्कि कई राज्यों के लिए राजकोषीय चुनौती बन सकती है।

क्या बीजेपी शासित राज्यों ने भी इस योजना पर सवाल उठाए हैं?

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि बीजेपी शासित राज्यों में भी फंडिंग मॉडल को लेकर असंतोष है, लेकिन पार्टी अनुशासन के कारण सार्वजनिक विरोध कम दिखता है — कांग्रेस शासित राज्य खुलकर आवाज़ उठा रहे हैं।

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