पीएम मोदी ने deregulation की प्रगति की समीक्षा की। केंद्र का दावा है कि 75,000 से अधिक कम्प्लायंस बोझ हटाए गए, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि UP, बिहार, MP जैसे राज्यों में छोटे कारोबारी, स्ट्रीट वेंडर और MSME अभी भी राज्य-स्तरीय लाइसेंस राज, इंस्पेक्टर राज और भ्रष्टाचार से जूझ रहे हैं।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट टीम ने deregulation प्रगति की समीक्षा की — इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार।
- क्या: केंद्र सरकार ने दावा किया कि 75,000 से अधिक कम्प्लायंस बोझ ख़त्म किए गए और कई सेक्टर में रेगुलेटरी सुधार लागू हुए — इंडियन एक्सप्रेस।
- कब: 2026 में हालिया समीक्षा बैठक, जो NDA सरकार के तीसरे कार्यकाल के शुरुआती चरण में हो रही है।
- कहाँ: नई दिल्ली — प्रधानमंत्री कार्यालय स्तर पर; लेकिन असर UP, बिहार, MP, राजस्थान जैसे हिंदी बेल्ट राज्यों में आँका जा रहा है।
- क्यों: 2024 आम चुनाव में हिंदी बेल्ट में BJP की सीटों में गिरावट के बाद सरकार 'ease of doing business' को ज़मीन तक पहुँचाने की कोशिश कर रही है — विश्लेषकों के अनुसार।
- कैसे: केंद्र ने कम्प्लायंस बोझ कम करने, सेल्फ-सर्टिफ़िकेशन, डिजिटल अप्रूवल और कई सेक्टर में लाइसेंस ख़त्म करने जैसे कदम उठाए — लेकिन राज्य-स्तरीय अमल अभी भी कमज़ोर है।
एक नंबर से शुरू करें — 75,000। इतने कम्प्लायंस बोझ केंद्र सरकार ने ख़त्म किए, यह दावा है। अब दूसरा नंबर देखिए — 40 लाख से ज़्यादा। इतने MSME उत्तर प्रदेश और बिहार में रजिस्टर्ड हैं, जिनमें से अधिकतर आज भी किसी न किसी लाइसेंस, NOC, या इंस्पेक्टर की मर्ज़ी पर निर्भर हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पीएम नरेंद्र मोदी ने हाल ही में deregulation और सुधारों की प्रगति का जायज़ा लिया — लेकिन दिल्ली की समीक्षा बैठक और लखनऊ-पटना की गली में जो फ़ासला है, वही असली कहानी है।
यह कहानी उस शख़्स की है जो मुरादाबाद में पीतल का काम करता है, जिसे फ़ैक्ट्री लाइसेंस, प्रदूषण NOC, लेबर इंस्पेक्शन, GST रिटर्न — हर महीने पाँच-छह सरकारी खिड़कियों पर सिर पटकना पड़ता है। केंद्र कहता है कि उसने अपने हिस्से के 75,000 बोझ हटा दिए। सवाल यह है — क्या वो बोझ उस कारोबारी की पीठ पर थे, या सिर्फ़ किसी मंत्रालय की फ़ाइल में?
दिल्ली का दावा बनाम ज़मीन का हिसाब
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मोदी सरकार ने कई सेक्टर में रेगुलेटरी बोझ कम किए हैं — सेल्फ-सर्टिफ़िकेशन बढ़ाया, थर्ड-पार्टी ऑडिट लाए, डिजिटल अप्रूवल सिस्टम खड़े किए। विश्व बैंक की 'Ease of Doing Business' रैंकिंग में भारत 2014 के 142वें स्थान से 2020 में 63वें पर आ गया था — यह उपलब्धि वास्तविक है। लेकिन यह रैंकिंग मुंबई और दिल्ली के बड़े शहरी केंद्रों के आधार पर बनती थी, छोटे शहरों और कस्बों के MSME इसमें कहीं नहीं थे।
NITI Aayog की अपनी 'Enterprise Survey' रिपोर्ट्स बताती हैं कि UP, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में छोटे उद्यमी अभी भी औसतन 7-10 लाइसेंस या अनुमतियाँ लेते हैं, जिनमें राज्य-स्तरीय प्रक्रियाएँ शामिल हैं जो केंद्र के सुधारों से अछूती रहीं। एक तरफ़ केंद्र ने कम्प्लायंस कम किए, दूसरी तरफ़ राज्यों ने अपने 'इंस्पेक्टर राज' को बरक़रार रखा — कहीं-कहीं तो नई फ़ीस और नए NOC जोड़ दिए।
पॉलिटिकल पल्स — असली हिसाब चुनावी है
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि 2024 के आम चुनाव में UP-बिहार में BJP की सीटों में जो गिरावट आई, उसकी एक बड़ी वजह यही थी कि छोटे कारोबारी — जो 2014 और 2019 में मोदी के सबसे मज़बूत वोटर थे — GST की जटिलता, बार-बार बदलते नियमों और ज़मीनी स्तर पर 'ease' न होने से नाराज़ थे। अब जबकि 2027 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, यह deregulation समीक्षा सिर्फ़ नीतिगत कवायद नहीं, एक चुनावी ज़रूरत है।
विपक्ष का तर्क सीधा है — कांग्रेस और RJD लगातार कह रहे हैं कि मोदी सरकार का 'ease of doing business' सिर्फ़ बड़े कॉर्पोरेट्स, अडानी-अंबानी जैसे घरानों के लिए है, आम ठेले वाले और चाय की दुकान वाले के लिए नहीं। इसमें कुछ राजनीतिक अतिशयोक्ति है, लेकिन ज़मीनी शिकायतों में दम भी है — PM स्वनिधि योजना के तहत स्ट्रीट वेंडर्स को क़र्ज़ तो मिला, लेकिन नगर निगम की दैनिक वसूली और अतिक्रमण कार्रवाई से राहत नहीं मिली।
(यह सियासी गलियारों की चर्चा और जनभावना पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
कहाँ सुधार हुआ, कहाँ फ़ाइलों में रहा
निष्पक्ष रूप से देखें तो कुछ सेक्टर में बदलाव ठोस हुआ है। टेलीकॉम और IT सेक्टर में लाइसेंसिंग प्रक्रिया वाक़ई सरल हुई। कोयला खनन में ऑक्शन-बेस्ड आवंटन आया। ड्रोन पॉलिसी में भारत ने ग्लोबल स्तर पर उदार नियम बनाए। लेकिन जहाँ असली रोज़गार है — छोटी मैन्युफ़ैक्चरिंग, फ़ूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल — वहाँ लेबर लॉ रिफॉर्म के चार श्रम संहिताएँ पास हो चुकी हैं लेकिन अधिकतर राज्यों ने उन्हें लागू ही नहीं किया। जानकारों के अनुसार, UP ने आंशिक रूप से लागू किया है, बिहार में अभी तक नोटिफ़िकेशन तक नहीं आया।
UDYAM रजिस्ट्रेशन पोर्टल — जो MSME के लिए एक बड़ा सुधार माना गया — उसमें 4.5 करोड़ से ज़्यादा रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं। लेकिन रजिस्ट्रेशन होना और ज़मीन पर राहत मिलना दो अलग बातें हैं। एक रजिस्टर्ड MSME को भी बैंक लोन के लिए औसतन 45-60 दिन लगते हैं, जबकि सरकार का लक्ष्य 59 मिनट में लोन स्वीकृति का था।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड — यह समीक्षा नीति कम, सिग्नल ज़्यादा है
इस deregulation समीक्षा के पीछे की असली चाल को इंडिया हेराल्ड ने भांपा है — यह बैठक उतनी नीतिगत नहीं है जितनी राजनीतिक सिग्नलिंग है। GST लॉन्च के समय भी मोदी ने ऐतिहासिक सुधार का नैरेटिव सेट किया था, और अब दूसरी पारी में — जबकि हिंदी बेल्ट में ज़मीनी नाराज़गी है — deregulation को 'जनता के लिए' रीब्रांड करने की कोशिश है। अगर सरकार सच में छोटे कारोबारी तक पहुँचना चाहती है, तो अगला कदम राज्यों को बाध्य करना होगा — या तो वित्तीय प्रोत्साहन से या केंद्रीय फंड को 'ease of doing business' रैंकिंग से जोड़कर।
आने वाले महीनों में देखने लायक़ यह होगा — क्या मोदी सरकार सिर्फ़ 'कितने कम्प्लायंस हटाए' की संख्या गिनाती रहेगी, या कोई ठोस मैकेनिज़्म लाएगी जिससे मुरादाबाद के पीतल कारीगर और पटना के चाय वाले को असल में इंस्पेक्टर का डर कम हो? विपक्ष तो इसे चुनावी मुद्दा बनाएगा ही — असली सवाल यह है कि BJP का अपना कैडर, जो 2014 में 'अच्छे दिन' के वादे पर खड़ा हुआ था, 2027 तक किस हिसाब-किताब से संतुष्ट होगा।
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75,000 कम्प्लायंस की संख्या बड़ी लगती है — जब तक आप उस शख़्स से न मिलें जो बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में लीची का छोटा-सा प्रोसेसिंग यूनिट खोलना चाहता है और जिसे FSSAI, प्रदूषण बोर्ड, बिजली विभाग, ज़िला प्रशासन — चार अलग-अलग दरवाज़ों पर जाना पड़ता है। जब तक वो चार दरवाज़े एक नहीं होते, 75,000 का आँकड़ा दिल्ली के पावरपॉइंट में चमकेगा, मुज़फ़्फ़रपुर की गली में नहीं।
आँकड़ों में
- केंद्र सरकार ने 75,000 से अधिक कम्प्लायंस बोझ ख़त्म करने का दावा किया — इंडियन एक्सप्रेस।
- UDYAM पोर्टल पर 4.5 करोड़ से ज़्यादा MSME रजिस्ट्रेशन हुए — सरकारी आँकड़ों के अनुसार।
- भारत की Ease of Doing Business रैंकिंग 2014 में 142वीं से 2020 में 63वीं पर आई थी — विश्व बैंक।
- UP-बिहार में 40 लाख से अधिक रजिस्टर्ड MSME हैं — UDYAM पोर्टल डेटा।
मुख्य बातें
- केंद्र सरकार का दावा है कि 75,000 से अधिक कम्प्लायंस बोझ हटाए गए, लेकिन अधिकतर सुधार केंद्रीय स्तर पर हैं — राज्य-स्तरीय लाइसेंस राज बरक़रार है।
- UP-बिहार-MP में छोटे MSME को अभी भी औसतन 7-10 लाइसेंस या अनुमतियाँ लेनी पड़ती हैं — NITI Aayog की रिपोर्ट्स के अनुसार।
- चार श्रम संहिताएँ संसद से पास हो चुकी हैं, लेकिन बिहार समेत कई राज्यों ने उन्हें अभी तक लागू नहीं किया।
- 59 मिनट में MSME लोन स्वीकृति का लक्ष्य था, ज़मीनी हक़ीक़त 45-60 दिन की है।
- 2024 के चुनाव में हिंदी बेल्ट में BJP की सीट गिरावट और 2027 के राज्य चुनावों की पृष्ठभूमि में यह समीक्षा चुनावी सिग्नलिंग भी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मोदी सरकार की deregulation में क्या-क्या सुधार हुए हैं?
केंद्र ने 75,000 से अधिक कम्प्लायंस बोझ हटाने का दावा किया है — इसमें सेल्फ-सर्टिफ़िकेशन, डिजिटल अप्रूवल, थर्ड-पार्टी ऑडिट, ड्रोन पॉलिसी उदारीकरण और कोयला ऑक्शन जैसे क़दम शामिल हैं — इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार।
UP-बिहार के छोटे कारोबारियों को deregulation से कितना फ़ायदा हुआ?
NITI Aayog की रिपोर्ट्स के अनुसार, इन राज्यों में छोटे MSME को अभी भी 7-10 लाइसेंस लेने पड़ते हैं। केंद्रीय सुधार हुए, लेकिन राज्य-स्तरीय प्रक्रियाएँ और इंस्पेक्टर राज बरक़रार है।
श्रम संहिताएँ (Labour Codes) कितने राज्यों में लागू हुई हैं?
संसद से चार श्रम संहिताएँ पास हो चुकी हैं, लेकिन अधिकतर राज्यों ने — ख़ासकर बिहार जैसे राज्यों ने — अभी तक इन्हें पूरी तरह लागू नहीं किया। UP ने आंशिक रूप से नोटिफ़ाई किया है।
UDYAM पोर्टल पर कितने MSME रजिस्टर्ड हैं?
सरकारी आँकड़ों के अनुसार UDYAM पोर्टल पर 4.5 करोड़ से ज़्यादा MSME रजिस्ट्रेशन हुए हैं, लेकिन रजिस्ट्रेशन और ज़मीनी राहत में बड़ा अंतर है।



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