सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का चौथा दिन है, CJP प्रोटेस्ट 12वें दिन में है, उनका वज़न 2 किलो गिर चुका है — लेकिन केंद्र सरकार लद्दाख को छठी अनुसूची देने पर चुप है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, यह चुप्पी लद्दाख की ज़मीन और खनिज संपदा पर नियंत्रण के सवाल से जुड़ी है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक, जो लद्दाख के लिए छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा माँग रहे हैं।
  • क्या: CJP (Citizens for Justice and Peace) के जंतर मंतर प्रोटेस्ट के 12वें दिन वांगचुक की भूख हड़ताल चौथे दिन में प्रवेश कर चुकी है, उनका वज़न 2 किलो कम हो गया है — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
  • कब: प्रोटेस्ट पिछले 12 दिनों से जारी है, भूख हड़ताल चौथे दिन में है — 2026 में।
  • कहाँ: नई दिल्ली के जंतर मंतर पर — तेलंगाना टुडे के अनुसार।
  • क्यों: लद्दाख को 2019 में UT बनाया गया पर छठी अनुसूची नहीं दी गई; स्थानीय जनता को ज़मीन, नौकरी और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा का डर है।
  • कैसे: वांगचुक ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, CJP ने 12 दिन का धरना दिया; सरकार ने अब तक कोई आधिकारिक बातचीत का संकेत नहीं दिया है।

एक आदमी का शरीर 2 किलो हल्का हो चुका है। चार दिन से उसके पेट में अन्न का एक दाना नहीं गया। जंतर मंतर की धूप में बैठा वह आदमी — सोनम वांगचुक — लद्दाख की ज़मीन, पानी और पहचान के लिए अपना बदन गला रहा है। और दिल्ली? दिल्ली ऐसे चुप है जैसे कोई सुन ही नहीं रहा।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, CJP (Citizens for Justice and Peace) का जंतर मंतर प्रोटेस्ट 12वें दिन में दाख़िल हो चुका है। वांगचुक की भूख हड़ताल चौथे दिन में है और उनका वज़न 2 किलो गिर चुका है। सरकार की ओर से? पिन-ड्रॉप साइलेंस। न कोई बयान, न कोई बातचीत का न्यौता, न कोई कमेटी का गठन।

यह पहली बार नहीं है। वांगचुक पिछले कई सालों से यही करते आ रहे हैं — दिल्ली आते हैं, भूखे रहते हैं, मीडिया कवरेज मिलती है, सरकार 'देखेंगे' कहती है, और लद्दाख वापस वैसा ही रहता है। सवाल यह है कि इस बार भी वही स्क्रिप्ट चलेगी, या 2029 का चुनावी गणित इस चुप्पी की क़ीमत वसूलेगा?

कश्मीर से अलग किया — लेकिन किसके फ़ायदे के लिए?

अगस्त 2019 में जब अनुच्छेद 370 हटाया गया, लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। लद्दाखी जनता ने इसे जश्न की तरह मनाया था — दशकों से यही माँग थी। लेकिन एक बात चुपचाप छूट गई: छठी अनुसूची। यह वह संवैधानिक ढाल है जो आदिवासी और जनजातीय इलाक़ों की ज़मीन, संस्कृति और प्रशासन को बाहरी हस्तक्षेप से बचाती है।

जब तक लद्दाख जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था, अनुच्छेद 370 और 35A एक तरह की सुरक्षा दीवार थे — बाहर का कोई व्यक्ति वहाँ ज़मीन नहीं ख़रीद सकता था। UT बनने के बाद वह दीवार गिर गई, और छठी अनुसूची नहीं दी गई। नतीजा? तेलंगाना टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, लद्दाखी जनता को डर है कि उनकी ज़मीन, उनके चरागाह, उनके ग्लेशियर और उनके खनिज — सब कुछ बाहरी कॉर्पोरेट हितों के लिए खुल जाएगा।

और यह डर निराधार नहीं है। लद्दाख में लिथियम के भंडार मिले हैं — जो इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति की रीढ़ है। ग्रीन हाइड्रोजन और सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स की बात हो रही है। बिना छठी अनुसूची के, स्थानीय जनता का इन संसाधनों पर कोई संवैधानिक दावा नहीं बनता।

BJP का लद्दाख कैलकुलेशन — वोट बनाम संसाधन

यहीं पर सियासत का असली खेल शुरू होता है। लद्दाख में BJP ने 2024 के लोकसभा चुनाव में अपनी पकड़ बनाए रखी। लेकिन एक सच यह भी है कि लद्दाख की कुल आबादी तीन लाख के आसपास है — यानी चुनावी गणित में इसका वज़न बेहद कम है। एक लोकसभा सीट। कोई विधानसभा नहीं। कोई स्थानीय विधायक नहीं जो संसद में सवाल उठा सके।

इसलिए केंद्र के लिए लद्दाख की नाराज़गी की 'चुनावी क़ीमत' लगभग शून्य है — कम से कम कागज़ पर। लेकिन 'नैरेटिव की क़ीमत' ज़ीरो नहीं है। वांगचुक एक राष्ट्रीय चेहरा हैं — '3 इडियट्स' के फुंसुक वांगडू का असली इंसान, रेमन मैग्सेसे अवार्ड विजेता, जिनकी छवि किसी पार्टी-लाइन से बड़ी है। जब ऐसा इंसान दिल्ली में भूखा बैठता है और सरकार अनसुना करती है, तो ऑप्टिक्स ख़राब होते हैं — ख़ासकर जब विपक्ष को बिना कुछ किए एक रेडीमेड नैरेटिव मिल जाता है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि सरकार जानबूझकर इस मुद्दे को ठंडा रखना चाहती है। छठी अनुसूची दे दी तो लद्दाख में कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट्स — लिथियम माइनिंग, सोलर पार्क, सामरिक इंफ्रास्ट्रक्चर — सब पर स्थानीय निकायों को वीटो पावर मिल जाएगी। और यह वीटो पावर केंद्र की विकास योजनाओं (और कॉर्पोरेट निवेश) के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बन सकती है। (यह इंडस्ट्री और सियासी हलकों में चल रही चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट सरकारी बयान नहीं।)

दूसरी ओर, चीन सीमा पर लगातार तनाव है। LAC पर जब-तब झड़पें होती हैं। ऐसे में लद्दाखी जनता — जो सीमा पर रहती है, जो सेना की पहली ढाल है — उसे नाराज़ करना रणनीतिक रूप से कितना समझदारी भरा है? विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर सीमावर्ती आबादी का भरोसा टूटता है, तो LAC पर ह्यूमन इंटेलिजेंस और लोकल सपोर्ट — जो भारतीय सेना की ताक़त है — कमज़ोर हो सकता है।

वांगचुक का हथियार — शरीर ही शरीर है

वांगचुक के पास न कोई पार्टी है, न कोई सांसद, न कोई संसदीय ताक़त। उनका एकमात्र हथियार उनका शरीर है — और उसका धीरे-धीरे गलना। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, 2 किलो वज़न गिर चुका है। यह कोई बड़ी संख्या नहीं लगती, लेकिन अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल में हर गुज़रता दिन ख़तरे को बढ़ाता है — शरीर प्रोटीन तोड़ना शुरू करता है, अंगों पर दबाव बढ़ता है।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि सरकार एक ख़तरनाक दाँव खेल रही है — वह शर्त लगा रही है कि वांगचुक मीडिया साइकल से बाहर हो जाएँगे, जनता भूल जाएगी, और लद्दाख का मुद्दा फिर से फ़ाइलों में दफ़न हो जाएगा। लेकिन अगर वांगचुक की तबीयत गंभीर हो गई, तो यही चुप्पी सरकार का सबसे बड़ा संकट बन सकती है — एक ऐसा संकट जो ऑप्टिक्स से शुरू होगा और 2029 के चुनावी मैदान तक पहुँचेगा।

2029 का साया और 'लद्दाख गैम्बिट' का भविष्य

अगर आने वाले दिनों में सरकार ने बातचीत का रास्ता नहीं खोला, तो विपक्ष के लिए यह सोने पर सुहागा होगा। कांग्रेस, AAP, और तमाम क्षेत्रीय दल पहले से ही 'जनजातीय अधिकार' और 'आदिवासी ज़मीन' को 2029 का चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं। वांगचुक की भूख हड़ताल उन्हें एक ज़िंदा, दिखने वाला, भावनात्मक प्रतीक दे रही है — बिना किसी ख़र्चे के।

लद्दाख अकेला नहीं है। पूर्वोत्तर के कई राज्य — जहाँ छठी अनुसूची लागू है — देख रहे हैं कि केंद्र लद्दाख के साथ क्या करता है। अगर लद्दाख को छठी अनुसूची नहीं मिली, तो क्या कल किसी और जनजातीय क्षेत्र से वह सुरक्षा छीनी जा सकती है? यह सवाल लद्दाख से कहीं बड़ा है — और यही वह नस है जिस पर वांगचुक हाथ रख रहे हैं।

दो किलो वज़न। बारह दिन का प्रोटेस्ट। दिल्ली की चुप्पी। सवाल यह नहीं है कि वांगचुक कब तक टिकेंगे — सवाल यह है कि सरकार की यह चुप्पी कब तक टिकेगी, और जब टूटेगी तो क्या बोलेगी — 'हाँ' या 'और चुप रहो'?

आँकड़ों में

  • सोनम वांगचुक का वज़न भूख हड़ताल के 4 दिनों में 2 किलो गिरा — टाइम्स ऑफ़ इंडिया
  • CJP का जंतर मंतर प्रोटेस्ट 12वें दिन में प्रवेश कर चुका है
  • लद्दाख की कुल आबादी लगभग 3 लाख — एक लोकसभा सीट, कोई विधानसभा नहीं

मुख्य बातें

  • सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल चौथे दिन में, CJP प्रोटेस्ट 12वें दिन में — 2 किलो वज़न गिरा, केंद्र सरकार पूरी तरह चुप।
  • 2019 में लद्दाख को UT बनाया गया लेकिन छठी अनुसूची नहीं दी गई — अनुच्छेद 370 हटने के बाद ज़मीन सुरक्षा की कोई संवैधानिक ढाल नहीं बची।
  • लद्दाख में लिथियम भंडार और सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स — छठी अनुसूची से स्थानीय निकायों को वीटो पावर मिलती जो कॉर्पोरेट प्लान अटका सकती।
  • सीमा पर चीन से तनाव के बीच सीमावर्ती लद्दाखी आबादी को नाराज़ करना रणनीतिक ख़तरा — ह्यूमन इंटेलिजेंस और लोकल सपोर्ट कमज़ोर हो सकता है।
  • 2029 के चुनाव में विपक्ष को जनजातीय अधिकारों का रेडीमेड नैरेटिव मिल रहा है — वांगचुक का चेहरा इसका प्रतीक बन सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सोनम वांगचुक लद्दाख के लिए क्या माँग कर रहे हैं?

वांगचुक लद्दाख के लिए छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और पूर्ण राज्य का दर्जा माँग रहे हैं, ताकि स्थानीय ज़मीन, संस्कृति और प्रशासन बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित रहे।

छठी अनुसूची क्या है और लद्दाख के लिए क्यों ज़रूरी है?

संविधान की छठी अनुसूची जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त परिषदें देती है जो ज़मीन, जंगल और प्रशासन पर स्थानीय नियंत्रण रखती हैं। अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख में ज़मीन सुरक्षा की कोई संवैधानिक ढाल नहीं बची, इसलिए यह माँग तेज़ हुई है।

केंद्र सरकार लद्दाख को छठी अनुसूची क्यों नहीं दे रही?

विश्लेषकों के अनुसार, छठी अनुसूची से स्थानीय निकायों को लिथियम माइनिंग, सोलर पार्क और सामरिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर वीटो पावर मिल जाएगी, जो केंद्र की विकास और कॉर्पोरेट निवेश योजनाओं में बाधा बन सकती है।

वांगचुक की भूख हड़ताल का 2029 चुनाव पर क्या असर हो सकता है?

वांगचुक की भूख हड़ताल विपक्ष को जनजातीय अधिकारों का एक शक्तिशाली प्रतीक दे रही है। अगर सरकार ने बातचीत नहीं की, तो 2029 में यह मुद्दा न सिर्फ़ लद्दाख बल्कि पूर्वोत्तर और अन्य जनजातीय क्षेत्रों में भी BJP के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो सकता है।

Find out more: