इजरायल ने गाज़ा में हमास की 16 किलोमीटर लंबी सुरंग को टनों सीमेंट भरकर नष्ट किया — इसमें 80 कमरों वाला बंकर, फौलादी दीवारें और पूरा कमांड ढाँचा शामिल था। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ यह हमास का 'अंडरग्राउंड स्टेट' था, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि ज़मीन के नीचे जीत ज़मीन के ऊपर शांति की गारंटी नहीं।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: इजरायली सेना (IDF) ने हमास के भूमिगत सुरंग नेटवर्क को निशाना बनाया — ज़ी न्यूज़ और वनइंडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार।
- क्या: गाज़ा में 16 किलोमीटर लंबी सुरंग — जिसमें 80 कमरे और फौलादी दीवारें थीं — को सीमेंट भरकर पूरी तरह बंद किया गया।
- कब: 2025-2026 के बीच चल रहे इजरायल-हमास युद्ध के दौरान यह ऑपरेशन अंजाम दिया गया।
- कहाँ: गाज़ा पट्टी, फ़लस्तीन — हमास के सबसे बड़े भूमिगत ठिकानों में से एक।
- क्यों: इजरायल का मक़सद हमास के 'अंडरग्राउंड स्टेट' — सुरंगों के ज़रिए हथियारों की सप्लाई, कमांड-कंट्रोल और प्रशासनिक ढाँचे — को पूरी तरह ध्वस्त करना था।
- कैसे: IDF ने सुरंगों की मैपिंग के बाद उनमें भारी मात्रा में सीमेंट और कंक्रीट पंप किया, जिससे ये स्थायी रूप से अनुपयोगी हो गईं — ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़।
ज़मीन के सोलह किलोमीटर नीचे एक शहर बसा था — 80 कमरे, फौलादी दीवारें, कमांड सेंटर, और एक पूरा तंत्र जो हमास का 'भूमिगत राज' था। इजरायल ने उसमें सीमेंट भर दिया। लेकिन सवाल यह है: क्या कंक्रीट से क्रांतियाँ दफ़नाई जाती हैं, या बस सुरंगें?
ज़ी न्यूज़ और वनइंडिया की ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इजरायली सेना ने गाज़ा पट्टी में हमास की 16 किलोमीटर लंबी सुरंग — जिसे 'सीक्रेट बंकर' कहा जा रहा है — को टनों सीमेंट भरकर स्थायी रूप से नष्ट कर दिया है। इस सुरंग में 80 कमरे थे, फौलादी दीवारें थीं, और यह सिर्फ़ शरणस्थल नहीं बल्कि हमास का कमांड-एंड-कंट्रोल हब था — जहाँ से हथियारों की आपूर्ति, रणनीतिक फ़ैसले और यहाँ तक कि नागरिक प्रशासन का एक हिस्सा भी संचालित होता था।
सुरंग नहीं, 'अंडरग्राउंड स्टेट' था
इसे समझने के लिए एक बात साफ़ करनी ज़रूरी है: गाज़ा की सुरंगें वो नहीं हैं जो बॉलीवुड की फ़िल्मों में दिखती हैं — अँधेरी, तंग, सीलन भरी। हमास ने दशकों में ज़मीन के नीचे एक समानांतर राज्य खड़ा किया था। ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट बताती है कि इन सुरंगों में फौलादी दीवारें लगी थीं, कमरे एयर-कंडीशंड थे, बिजली-पानी का इंतज़ाम था, और कई किलोमीटर लंबे रास्ते अस्पतालों, स्कूलों और मस्जिदों के नीचे से गुज़रते थे। यह हमास के लिए सिर्फ़ छुपने की जगह नहीं थी — यह उनका 'ऑपरेशनल स्पाइन' था।
इजरायल जानता था कि बम गिराकर सुरंग टूटती है, पर ख़त्म नहीं होती — मलबा हटाकर फिर बनाई जा सकती है। इसलिए IDF ने एक अलग रणनीति अपनाई: सुरंगों की भीतरी मैपिंग के बाद उनमें भारी मात्रा में सीमेंट और कंक्रीट पंप किया गया। वनइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार इसका मक़सद सुरंगों को 'स्थायी क़ब्रिस्तान' में बदलना था — ताकि दोबारा इस्तेमाल की कोई गुंजाइश न बचे।
सीमेंट की राजनीति — ऑप्टिक्स या असली जीत?
सैन्य विश्लेषकों में इस ऑपरेशन को लेकर दो धाराएँ हैं। पहली कहती है कि यह हमास की 'रीढ़ तोड़ने' जैसा क़दम है — सुरंगों के बिना हमास की रसद लाइन, कमांड चेन और गुरिल्ला युद्ध की क्षमता गंभीर रूप से कमज़ोर होगी। दूसरी धारा यह मानती है कि हमास का असली 'बंकर' कंक्रीट नहीं, विचारधारा है — और विचारधारा में सीमेंट नहीं भरा जा सकता।
एक अहम तथ्य: इजरायल ने पहले भी 2014 और 2021 में गाज़ा की सुरंगों पर बड़े ऑपरेशन चलाए थे। दोनों बार 'मिशन पूरा हुआ' का दावा किया गया। दोनों बार हमास ने कुछ ही सालों में नया नेटवर्क खड़ा कर लिया। इस बार सीमेंट भरने का तरीक़ा पहले से अलग है — लेकिन क्या नतीजा अलग होगा?
पॉलिटिकल पल्स
दिल्ली और वॉशिंगटन के कूटनीतिक गलियारों में जो बात दबी ज़ुबान होती है, वह यह है: इजरायल के लिए यह ऑपरेशन सिर्फ़ सैन्य नहीं, राजनीतिक भी है। नेतन्याहू सरकार पर घरेलू दबाव भारी है — बंधकों की वापसी न होना, युद्ध की बढ़ती लागत, और अंतरराष्ट्रीय आलोचना। ऐसे में '16 किलोमीटर सुरंग सीमेंट से पाटी' एक शक्तिशाली नैरेटिव है — चाहे ज़मीनी हक़ीक़त कुछ भी हो। सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह भी है कि इजरायल इन तस्वीरों का इस्तेमाल अमेरिकी कांग्रेस में फंडिंग बहस के दौरान करेगा। (यह राजनीतिक विश्लेषण और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
भारत के लिए इसके मायने — 90 लाख प्रवासी, तेल और कूटनीति
मध्य-पूर्व में हर भूकंप की लहर भारत तक आती है — और यह कोई मुहावरा नहीं, अंकगणित है। खाड़ी देशों में क़रीब 90 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं। भारत अपनी कुल तेल ज़रूरत का लगभग 60 प्रतिशत से अधिक मध्य-पूर्व से आयात करता है। इजरायल-हमास युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाली ऊर्जा सप्लाई लाइन उतनी ही असुरक्षित रहेगी। रिफाइनरी मार्जिन, शिपिंग इंश्योरेंस प्रीमियम और कच्चे तेल के दाम — तीनों पर इस युद्ध की लंबी छाया है।
कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की 'सबका साथ' वाली मध्य-पूर्व नीति दबाव में है। इजरायल से रक्षा सहयोग और अरब देशों से ऊर्जा-व्यापार — दोनों एक साथ सँभालना उस करतब जैसा है जहाँ एक ग़लत क़दम पूरा संतुलन बिगाड़ सकता है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड — सीमेंट के नीचे असली सवाल
इंडिया हेराल्ड का स्पष्ट आकलन यह है कि इजरायल ने इस ऑपरेशन से हमास की 'हार्डवेयर' क्षमता को एक गंभीर झटका दिया है — इसमें कोई शक नहीं। 16 किलोमीटर का नेटवर्क दोबारा खड़ा करना आसान नहीं, ख़ासतौर पर जब सीमाएँ सील हों और मिस्र की रफ़ा सीमा पर कड़ी निगरानी हो। लेकिन 'सॉफ़्टवेयर' — यानी हमास की भर्ती क्षमता, उसकी वैचारिक पकड़, और गाज़ा की तबाह आबादी में बढ़ता ग़ुस्सा — उस पर कंक्रीट का कोई असर नहीं।
आने वाले हफ़्तों में तीन चीज़ें देखने लायक होंगी: पहली, क्या इजरायल इस 'जीत' को युद्धविराम वार्ता में बार्गेनिंग चिप की तरह इस्तेमाल करता है; दूसरी, क्या हमास ज़मीन के ऊपर गुरिल्ला रणनीति की ओर शिफ़्ट होता है — जो और ख़तरनाक हो सकता है; और तीसरी, क्या ईरान, जो हमास का सबसे बड़ा समर्थक माना जाता है, इसे 'ज़मीनी हार' मानकर प्रॉक्सी रणनीति बदलता है। अगर ईरान ने हिज़्बुल्लाह या यमन के हूती मोर्चे पर दबाव बढ़ाया, तो लाल सागर की शिपिंग लाइनें फिर अशांत होंगी — और भारत के पेट्रोलियम बिल पर सीधा असर पड़ेगा।
एक और कोण जो अक्सर छूट जाता है: इजरायल की यह 'सीमेंट रणनीति' अगर सफल मानी गई, तो दुनिया भर में 'टनल वॉरफेयर' के ख़िलाफ़ एक नया डॉक्ट्रिन बन सकती है — उत्तर कोरिया की DMZ सुरंगों से लेकर म्यांमार-भारत सीमा पर ड्रग सुरंगों तक।
सुरंग पाट दी गई है। लेकिन ज़मीन के ऊपर गाज़ा में 23 लाख लोग अब भी मलबे में रहते हैं, बच्चे भूखे सो रहे हैं, और अस्पतालों में दवाइयाँ ख़त्म हैं। असली सवाल यह नहीं कि सुरंग में कितना सीमेंट भरा — असली सवाल यह है: जब सीमेंट सूख जाएगा, तो ज़मीन के ऊपर क्या बचेगा — शांति, या अगली सुरंग खोदने का ग़ुस्सा?
आँकड़ों में
- इजरायल ने गाज़ा में हमास की 16 किलोमीटर लंबी सुरंग में सीमेंट भरा — जिसमें 80 कमरे और फौलादी दीवारें थीं।
- भारत अपनी कुल तेल ज़रूरत का लगभग 60 प्रतिशत से अधिक मध्य-पूर्व से आयात करता है।
- खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं।
- इजरायल ने 2014 और 2021 में भी गाज़ा सुरंग ऑपरेशन चलाए थे — दोनों बार हमास ने नेटवर्क दोबारा बनाया।
मुख्य बातें
- इजरायल ने गाज़ा में हमास की 16 किलोमीटर लंबी, 80 कमरों वाली सुरंग को सीमेंट भरकर स्थायी रूप से नष्ट किया — यह हमास का कमांड-कंट्रोल हब था, सिर्फ़ शरणस्थल नहीं।
- इजरायल ने पहले भी 2014 और 2021 में सुरंग ऑपरेशन चलाए थे, लेकिन हमास ने हर बार नेटवर्क दोबारा खड़ा कर लिया — इस बार सीमेंट भरने की रणनीति पुनर्निर्माण रोकने के लिए है।
- भारत के लिए ख़तरा सीधा है: 90 लाख प्रवासी खाड़ी में हैं, 60% से अधिक तेल आयात मध्य-पूर्व से आता है, और युद्ध लंबा खिंचने पर ऊर्जा आपूर्ति और शिपिंग लागत दोनों प्रभावित होंगे।
- विश्लेषकों का मानना है कि हमास की 'हार्डवेयर' क्षमता को झटका लगा है, लेकिन 'सॉफ़्टवेयर' — विचारधारा, भर्ती और जनता का ग़ुस्सा — कंक्रीट से नहीं रुकेगा।
- अगर ईरान ने इसे ज़मीनी हार मानकर हिज़्बुल्लाह या हूती मोर्चे पर दबाव बढ़ाया, तो लाल सागर शिपिंग लाइनें फिर अशांत होंगी — भारत के पेट्रोलियम बिल पर सीधा असर।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
इजरायल ने हमास की सुरंग में सीमेंट क्यों भरा, बम क्यों नहीं गिराया?
बम से सुरंग टूटती है लेकिन मलबा हटाकर दोबारा बनाई जा सकती है। सीमेंट भरने से सुरंग स्थायी रूप से अनुपयोगी हो जाती है — इजरायल का मक़सद दोबारा इस्तेमाल की गुंजाइश ख़त्म करना था।
हमास की इस सुरंग में क्या-क्या था?
ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस 16 किलोमीटर लंबी सुरंग में 80 कमरे थे, फौलादी दीवारें थीं, बिजली-पानी का इंतज़ाम था, और यह हमास के कमांड-एंड-कंट्रोल हब के रूप में काम करती थी।
इस युद्ध का भारत पर क्या असर पड़ रहा है?
भारत की 60% से अधिक तेल आपूर्ति मध्य-पूर्व से आती है, खाड़ी में 90 लाख भारतीय प्रवासी हैं, और युद्ध लंबा खिंचने पर शिपिंग लागत, तेल के दाम और कूटनीतिक संतुलन — तीनों प्रभावित होते हैं।
क्या इजरायल पहले भी हमास की सुरंगें तबाह कर चुका है?
हाँ — 2014 और 2021 में इजरायल ने बड़े सुरंग ऑपरेशन चलाए थे। दोनों बार हमास ने कुछ ही सालों में नया नेटवर्क खड़ा कर लिया। इस बार सीमेंट रणनीति का मक़सद पुनर्निर्माण रोकना है।



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