मुंबई में हर मॉनसून की बाढ़ बारिश की नहीं, दशकों की राजनीतिक विफलता की कहानी है। BMC का सालाना बजट ₹59,000 करोड़ से ऊपर है, फिर भी ड्रेनेज सिस्टम ब्रिटिश ज़माने का है। India Today के अनुसार IMD ने फिर रेड अलर्ट जारी किया है — सवाल यह है कि पैसा और ज़िम्मेदारी हर बार कहाँ ग़ायब हो जाती है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: BMC (बृहन्मुंबई महानगरपालिका), महाराष्ट्र सरकार (मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस), IMD, और मुंबई-ठाणे के करोड़ों नागरिक
- क्या: IMD ने मुंबई और ठाणे के लिए रेड अलर्ट जारी किया; भारी बारिश से सड़कें जलमग्न, एक व्यक्ति की मौत की ख़बर; इन्फ्रा फेल की पुरानी कहानी फिर दोहराई गई
- कब: जुलाई 2025 — मॉनसून सीज़न की शुरुआत में ही
- कहाँ: मुंबई, ठाणे और महाराष्ट्र के छह ज़िलों में
- क्यों: ब्रिटिश-काल का ड्रेनेज सिस्टम, अनियंत्रित शहरीकरण, मैंग्रोव विनाश, और BMC के बजट का बड़ा हिस्सा ड्रेनेज अपग्रेड की बजाय कॉस्मेटिक प्रोजेक्ट्स में ख़र्च होना
- कैसे: IMD के अनुसार भारी से अत्यधिक भारी बारिश की चेतावनी जारी; Oneindia की रिपोर्ट के मुताबिक़ एक व्यक्ति की मौत; ऑरेंज अलर्ट छह ज़िलों के लिए — लेकिन हर साल यही चक्र दोहराया जाता है बिना स्थायी समाधान के
₹59,000 करोड़ से ऊपर का सालाना बजट। देश की आर्थिक राजधानी का दर्जा। दुनिया के सबसे महँगे इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में से कुछ। और फिर भी — जुलाई आते ही मुंबई की सड़कें नदी बन जाती हैं, ट्रेनें रेंगती हैं, और हर बार कोई न कोई अपनी जान गँवाता है। India Today के अनुसार IMD ने मुंबई और ठाणे के लिए एक बार फिर रेड अलर्ट जारी किया है — भारी से अत्यधिक भारी बारिश की चेतावनी के साथ। Oneindia की रिपोर्ट बताती है कि शहर में एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है और महाराष्ट्र के छह ज़िलों में ऑरेंज अलर्ट है।
सवाल यह नहीं है कि बारिश कितनी हुई। सवाल यह है कि जो शहर हर साल जानता है कि जुलाई में यही होगा, वह हर साल ऐसे क्यों फँसता है जैसे पहली बार बारिश देख रहा हो?
वह ड्रेनेज जो विक्टोरिया के ज़माने का है
मुंबई का स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज सिस्टम 1860 के दशक में डिज़ाइन किया गया था — तब शहर की आबादी कुछ लाख थी। आज ढाई करोड़ से ज़्यादा लोग इसी सिस्टम पर निर्भर हैं। BMC ने बृहन्मुंबई स्टॉर्म वॉटर डिस्पोज़ल सिस्टम (BRIMSTOWAD) प्रोजेक्ट 1990 के दशक में शुरू किया था — तीन दशक बाद भी यह पूरा नहीं हुआ। पम्पिंग स्टेशन बने, कुछ नाले चौड़े हुए, लेकिन शहर की ड्रेनेज क्षमता आज भी 25 मिलीमीटर प्रति घंटा के आसपास मानी जाती है — जबकि मुंबई में मॉनसून में 100 मिलीमीटर प्रति घंटा से ऊपर बारिश आम बात है।
यह अंतर सिर्फ़ तकनीकी नहीं, राजनीतिक है। हर नई सरकार मेट्रो, कोस्टल रोड, बुलेट ट्रेन जैसे 'विज़िबल' प्रोजेक्ट्स पर ज़ोर देती है — क्योंकि वोट ज़मीन के नीचे की पाइपलाइन से नहीं, ऊपर की चमचमाती सड़क से आते हैं। BMC का बजट 2024-25 में ₹59,954 करोड़ था — इसमें से ड्रेनेज अपग्रेड पर ख़र्च का अनुपात उन चमकदार प्रोजेक्ट्स के मुक़ाबले बेहद कम रहा है।
ठाणे: मुंबई का वह जुड़वाँ जिसे कोई नहीं देखता
India Today की रिपोर्ट में ठाणे को भी रेड अलर्ट ज़ोन में रखा गया है, लेकिन ठाणे की त्रासदी मुंबई से भी गहरी है। पिछले दो दशकों में ठाणे की आबादी विस्फोटक रूप से बढ़ी — बिल्डरों ने पहाड़ियाँ काटीं, नाले पाट दिए, और जहाँ पानी का रास्ता था वहाँ टावर खड़े कर दिए। महाराष्ट्र सरकार ने बार-बार 'फ़्लड मैनेजमेंट प्लान' का वादा किया, लेकिन ज़मीन पर हालात यह हैं कि ठाणे में मीठी नदी और उल्हास नदी के किनारे अवैध निर्माण आज भी जारी है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि मुंबई की बाढ़ अब किसी भी पार्टी के लिए 'असली मुद्दा' नहीं रही — यह एक 'सीज़नल इवेंट' बन चुकी है जिसे मैनेज किया जाता है, सॉल्व नहीं। जब शिवसेना (उद्धव गुट) सत्ता में थी तब भी मुंबई डूबी, अब महायुति सरकार में भी डूब रही है। पार्टी हलकों में चर्चा यह है कि BMC पर असली नियंत्रण किसका है — प्रशासक राज में न तो निर्वाचित पार्षद ज़िम्मेदार हैं, न कोई स्थानीय जवाबदेही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के लिए यह दोधारी तलवार है — कोस्टल रोड और मेट्रो से 'विकास पुरुष' की छवि बनती है, लेकिन हर मॉनसून में डूबती मुंबई उसी छवि को नुक़सान पहुँचाती है।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
वह लाखों लोग जिनके लिए बाढ़ 'जीवन-मरण का सवाल' है
मुंबई की बाढ़ सबके लिए एक जैसी नहीं होती। दक्षिण मुंबई के ऊँचे अपार्टमेंट्स में रहने वालों के लिए यह एक 'वर्क फ़्रॉम होम डे' है। लेकिन धारावी, कुर्ला, सायन, वडाला और ठाणे की झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए — जिनमें बड़ी तादाद UP और बिहार से आए प्रवासी मज़दूरों की है — यह हर जुलाई का सर्वाइवल टेस्ट है। उनके घर ज़मीन से बस कुछ इंच ऊपर हैं; दो घंटे की भारी बारिश में सब कुछ डूब जाता है — राशन, कपड़े, बच्चों की किताबें, आधार कार्ड। और अगले दिन वे फिर ड्यूटी पर निकलते हैं — क्योंकि एक दिन की छुट्टी का मतलब है एक दिन की मज़दूरी गई।
इस तबक़े का कोई राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं है। BMC में चुनाव हुए नहीं, विधानसभा में ये वोट बैंक ज़रूर हैं लेकिन इनकी समस्या 'सेक्सी इश्यू' नहीं है। बाढ़ राहत में एक तिरपाल और एक पैकेट बिस्किट — यही इनकी हिस्सेदारी है हज़ारों करोड़ के बजट में।
मैंग्रोव: वह क़ुदरती ढाल जिसे हमने तोड़ दिया
मुंबई के मैंग्रोव वन शहर की प्राकृतिक बाढ़-रक्षा हैं — ये समुद्री ज्वार और बारिश के पानी दोनों को सोखते हैं। पर्यावरणविदों के अनुसार पिछले दो दशकों में मुंबई ने हज़ारों हेक्टेयर मैंग्रोव खो दिए हैं — बिल्डर लॉबी, इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स और अतिक्रमण ने मिलकर यह काम किया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने बार-बार मैंग्रोव विनाश पर चिंता जताई है, लेकिन ज़मीन पर कार्रवाई सुस्त रही है। जब आप शहर की किडनी निकाल दें तो शरीर को ज़हर से कौन बचाएगा?
हर साल का 'एक्शन प्लान' — कागज़ पर परफ़ेक्ट, ज़मीन पर ज़ीरो
BMC हर मॉनसून से पहले 'मॉनसून प्रिपेयर्डनेस प्लान' जारी करती है — नाले साफ़ हुए, पम्प तैयार हैं, कंट्रोल रूम एक्टिव है। India Today की रिपोर्ट के मुताबिक़ IMD ने अगले 15 दिनों को उत्तर भारत समेत पूरे देश के लिए 'क्रूशियल' बताया है। लेकिन मुंबई में 'तैयारी' का मतलब सिर्फ़ रिएक्शन है — प्रोएक्टिव इन्फ्रास्ट्रक्चर ओवरहॉल नहीं। जापान का टोक्यो, जो मुंबई से कम बारिश नहीं झेलता, अपनी अंडरग्राउंड फ़्लड डायवर्शन सिस्टम से शहर को सूखा रखता है — क्योंकि वहाँ ड्रेनेज 'बोरिंग' प्रोजेक्ट नहीं, नागरिक अधिकार माना जाता है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि मुंबई की बाढ़ तब तक नहीं रुकेगी जब तक ड्रेनेज इन्फ्रा को 'इलेक्शन-विज़िबल' नहीं बनाया जाता — यानी जब तक कोई नेता यह न कहे कि 'मैंने ज़मीन के नीचे ₹10,000 करोड़ लगाए' और उसे वोट मिलें, तब तक पैसा ऊपर ही ख़र्च होता रहेगा।
आगे क्या — 2025 मॉनसून का बाक़ी हिसाब
IMD के अनुसार मॉनसून सीज़न अभी शुरू ही हुआ है और अगले 15 दिन पूरे पश्चिमी और उत्तरी भारत के लिए भारी बारिश वाले हैं। अगर मुंबई में 200 मिमी से ऊपर एक दिन की बारिश हुई — जो पिछले कई सालों में होती रही है — तो हिंदमाता, सायन, अंधेरी सबवे जैसे 'क्रॉनिक फ़्लडिंग पॉइंट्स' फिर डूबेंगे। BMC प्रशासक राज में चुनावी दबाव नहीं है, इसलिए जवाबदेही और भी कम है। देखने वाली बात यह होगी कि क्या महाराष्ट्र सरकार इस बार BRIMSTOWAD प्रोजेक्ट को पूरा करने की कोई ठोस टाइमलाइन देती है, या फिर अगले साल यही रेड अलर्ट, यही तस्वीरें, यही सवाल — और वही ख़ामोशी।
मुंबई हर साल डूबती है और हर साल उठ खड़ी होती है — इसे 'स्पिरिट ऑफ़ मुंबई' कहकर महिमामंडित किया जाता है। लेकिन असलियत यह है कि जिस शहर को हर मॉनसून में 'स्पिरिट' दिखानी पड़े, उसका सिस्टम फ़ेल है। और जब तक यह सवाल वोट में न बदले, तब तक कोई जवाब नहीं आएगा।
आँकड़ों में
- BMC बजट 2024-25: ₹59,954 करोड़ — फिर भी ड्रेनेज क्षमता ≈25 मिमी/घंटा, जबकि मॉनसून में 100+ मिमी/घंटा बारिश आम
- BRIMSTOWAD प्रोजेक्ट 1990 के दशक में शुरू — 3 दशक बाद भी अपूर्ण
- IMD ने मुंबई-ठाणे के लिए रेड अलर्ट और महाराष्ट्र के 6 ज़िलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया (India Today, Oneindia)
मुख्य बातें
- मुंबई का ड्रेनेज सिस्टम 1860 के दशक का है और शहर की मौजूदा ज़रूरत का एक-चौथाई भी पूरा नहीं करता — ड्रेनेज क्षमता ≈25 मिमी/घंटा बनाम 100+ मिमी/घंटा बारिश
- BMC का सालाना बजट ₹59,954 करोड़ (2024-25) है, लेकिन ड्रेनेज ओवरहॉल की बजाय कोस्टल रोड-मेट्रो जैसे 'विज़िबल' प्रोजेक्ट्स पर ज़ोर — क्योंकि ज़मीन के नीचे का काम वोट नहीं लाता
- BRIMSTOWAD प्रोजेक्ट तीन दशक बाद भी अधूरा है — यह मुंबई के स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज अपग्रेड की सबसे बड़ी योजना थी
- BMC में प्रशासक राज होने से न निर्वाचित पार्षद हैं, न स्थानीय जवाबदेही — बाढ़ का राजनीतिक मूल्य शून्य हो गया है
- प्रवासी मज़दूर और झुग्गी निवासी सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं — इनका कोई राजनीतिक प्रतिनिधित्व या बाढ़ राहत में सार्थक हिस्सेदारी नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मुंबई हर साल मॉनसून में क्यों डूबती है?
मुंबई का ड्रेनेज सिस्टम 1860 के दशक का है जो ≈25 मिमी/घंटा बारिश के लिए डिज़ाइन था, जबकि अब 100+ मिमी/घंटा बारिश आम है। BRIMSTOWAD जैसे अपग्रेड प्रोजेक्ट 30 साल बाद भी अधूरे हैं, मैंग्रोव नष्ट हो चुके हैं, और अनियंत्रित निर्माण ने पानी के प्राकृतिक रास्ते बंद कर दिए हैं।
BMC का बजट इतना बड़ा होने के बावजूद बाढ़ क्यों नहीं रुकती?
BMC का बजट ₹59,954 करोड़ (2024-25) है, लेकिन बड़ा हिस्सा कोस्टल रोड, मेट्रो जैसे 'विज़िबल' प्रोजेक्ट्स में जाता है। ड्रेनेज ओवरहॉल ज़मीन के नीचे होता है जिसमें वोट की संभावना कम दिखती है, इसलिए राजनीतिक प्राथमिकता नहीं मिलती।
मुंबई की बाढ़ से सबसे ज़्यादा कौन प्रभावित होता है?
धारावी, कुर्ला, सायन जैसे निचले इलाक़ों में रहने वाले प्रवासी मज़दूर और झुग्गी निवासी — जिनके घर ज़मीन से इंच भर ऊपर हैं — सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं। इनका कोई प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं है।
BRIMSTOWAD प्रोजेक्ट क्या है और कहाँ तक पहुँचा?
बृहन्मुंबई स्टॉर्म वॉटर डिस्पोज़ल सिस्टम (BRIMSTOWAD) 1990 के दशक में मुंबई के ड्रेनेज अपग्रेड के लिए शुरू हुआ था। तीन दशक बीतने के बाद भी यह पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है।



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