ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में TMC के बागी गुट ने चुनाव आयोग से मुलाक़ात कर पार्टी के चुनाव चिह्न 'जोड़ा फूल' और पार्टी फंड पर दावा ठोक दिया है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, यह ठीक वही रणनीति है जो शिवसेना और NCP विभाजन में कामयाब हुई थी।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: ऋतब्रत बनर्जी और उनके नेतृत्व में TMC के बागी विधायक-नेता (टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार)।
- क्या: बागी गुट ने चुनाव आयोग से मिलकर TMC के चुनाव चिह्न 'जोड़ा फूल' और पार्टी के फंड पर अपना दावा पेश किया है।
- कब: 2026 में, चुनाव आयोग से निर्धारित मुलाक़ात के दौरान (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
- कहाँ: दिल्ली स्थित भारत निर्वाचन आयोग मुख्यालय।
- क्यों: बागी गुट का दावा है कि ममता बनर्जी का नेतृत्व पार्टी के संविधान और लोकतांत्रिक ढाँचे का उल्लंघन कर रहा है, इसलिए 'असली TMC' वे हैं।
- कैसे: चुनाव आयोग के समक्ष विधायकों-पदाधिकारियों के समर्थन पत्र, पार्टी संविधान के हवाले, और संगठनात्मक चुनावों की माँग के ज़रिए — ठीक वैसे ही जैसे शिंदे गुट ने शिवसेना और अजित पवार गुट ने NCP में किया था।
महाराष्ट्र की सियासत में जो नुस्ख़ा दो बार आज़माया गया और दोनों बार कामयाब रहा, वह अब बंगाल की धरती पर उतर चुका है। ऋतब्रत बनर्जी — वही नाम जो कभी ममता बनर्जी के भरोसेमंद सिपाही माने जाते थे — अब चुनाव आयोग के दरवाज़े पर खड़े हैं, हाथ में वही हथियार जो एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे से और अजित पवार ने शरद पवार से शिवसेना और NCP छीनने के लिए इस्तेमाल किया था: पार्टी का चुनाव चिह्न।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में TMC बागी गुट ने भारत निर्वाचन आयोग से मुलाक़ात कर तृणमूल कांग्रेस के प्रतिष्ठित 'जोड़ा फूल' चुनाव चिह्न और पार्टी फंड पर औपचारिक दावा दायर किया है। यह महज़ एक याचिका नहीं — यह एक सुनियोजित 'ऑपरेशन सिंबल' है जिसकी स्क्रिप्ट भारतीय राजनीति ने पिछले तीन साल में दो बार पढ़ चुकी है।
शिंदे-अजित पवार फ़ॉर्मूला: वह ब्लूप्रिंट जो अब बंगाल में खुल रहा है
2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के बहुमत विधायकों को अपने साथ लेकर चुनाव आयोग के सामने दावा किया कि 'असली शिवसेना' उनकी है। आयोग ने विधायकों की संख्या, संगठनात्मक समर्थन और पार्टी संविधान की व्याख्या के आधार पर शिंदे गुट को धनुष-बाण चिह्न सौंप दिया। ठीक यही प्रयोग 2023 में अजित पवार ने NCP के 'घड़ी' चिह्न पर दोहराया — और कामयाब रहे।
दोनों मामलों में एक साझा सूत्र था: बाग़ी गुट के पास विधायकों का बहुमत, केंद्र सरकार की 'मूक सहमति' का आभास, और चुनाव आयोग के समक्ष एक तकनीकी-क़ानूनी तर्क कि पार्टी संविधान के अनुसार असली पार्टी वही है जिसके पास निर्वाचित प्रतिनिधियों का बहुमत हो। ऋतब्रत बनर्जी का दावा भी इसी ढाँचे पर टिका है।
लेकिन ऋतब्रत की ताक़त कहाँ से आ रही है?
यहाँ वह सवाल है जो कोई प्रेस रिलीज़ नहीं बताएगी। ऋतब्रत बनर्जी — जो कभी CPI(M) से राज्यसभा सांसद थे, फिर TMC में आए, और बाद में पार्टी ने उन्हें निकाल दिया — अचानक इतनी बड़ी चुनौती खड़ी करने की हैसियत में कैसे पहुँचे? चुनाव आयोग के सामने सिंबल क्लेम करना कोई चाय की दुकान पर शिकायत दर्ज़ कराना नहीं — इसके लिए विधायकों-सांसदों का ठोस समर्थन, क़ानूनी टीम, और सबसे बड़ी बात — राजनीतिक संरक्षण चाहिए।
सियासी गलियारों में जो फुसफुसाहट है वह साफ़ इशारा करती है: बिना किसी बड़ी ताक़त के पीछे खड़े हुए, यह 'ऑपरेशन' संभव ही नहीं था। शिंदे ने जब शिवसेना तोड़ी, तब भी यही सवाल उठा था — और जवाब सबको पता था, भले ही कोई खुलकर नहीं बोला। अजित पवार के मामले में तो केंद्रीय एजेंसियों के मामलों का अचानक 'ठंडा' पड़ना अपने आप में एक बयान था।
पॉलिटिकल पल्स
बंगाल की ज़मीनी राजनीति में एक अलग तरह की चर्चा चल रही है जो दिल्ली के टीवी स्टूडियो तक नहीं पहुँचती। TMC के भीतर एक तबक़ा — ख़ासकर वे नेता जो अभिषेक बनर्जी के तेज़ी से बढ़ते वर्चस्व से असहज हैं — इस बाग़ी गुट को 'सहानुभूति' की नज़र से देख रहा है, भले ही खुलकर साथ नहीं आया। ट्रेड पंडितों और राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर ऋतब्रत को चुनाव आयोग से थोड़ी भी अनुकूल सुनवाई मिली, तो TMC में 'फ़ेंस-सिटर्स' का एक बड़ा समूह करवट बदल सकता है — ठीक वैसे ही जैसे शिंदे को शुरुआती सफलता मिलते ही शिवसेना के कई विधायक 'अचानक' उनके कैंप में पहुँच गए थे।
(यह इंडस्ट्री और सियासी हलकों में चल रही चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
चुनाव आयोग के सामने असली इम्तिहान
चुनाव आयोग के पास इस तरह के विवादों को सुलझाने का एक स्थापित ढाँचा है — 'दसवीं अनुसूची' (दल-बदल विरोधी क़ानून) और 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968'। आयोग दोनों गुटों से संगठनात्मक समर्थन के सबूत माँगता है — विधायकों-सांसदों की संख्या, पार्टी संविधान के प्रावधान, और संगठनात्मक चुनावों का रिकॉर्ड। शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी आयोग के इस अधिकार को मान्यता दी थी।
लेकिन यहाँ एक अहम फ़र्क़ है जो इस मामले को शिंदे-अजित पवार से अलग करता है। महाराष्ट्र में शिंदे के पास शिवसेना के 55 में से 40 विधायक थे — यानी दो-तिहाई से ज़्यादा। अजित पवार के पास भी NCP विधायकों का स्पष्ट बहुमत था। ऋतब्रत बनर्जी के गुट के पास TMC के 215 विधायकों (2021 के आँकड़े) में से कितने हैं — यह अभी तक सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। और यही वह बिंदु है जहाँ यह दावा कामयाब भी हो सकता है और धराशायी भी।
ममता बनर्जी के लिए ख़तरे की असली परत
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि भले ही ऋतब्रत का यह दावा तत्काल सफल न हो, इसका असली नुक़सान कहीं और है। पहला: यह TMC के भीतर के असंतोष को एक वैध मंच दे देता है — जो नेता अब तक चुपचाप नाराज़ थे, उन्हें अब एक 'विकल्प' दिखने लगता है। दूसरा: 2026 के बंगाल नगरपालिका चुनावों से पहले यह विवाद TMC की संगठनात्मक एकजुटता पर सीधा हमला है। तीसरा और सबसे गंभीर: अगर चुनाव आयोग ने शिंदे-अजित पवार की तर्ज़ पर इसे 'सुनवाई योग्य' भी मान लिया, तो ममता बनर्जी को वह लड़ाई लड़नी पड़ेगी जो उद्धव ठाकरे और शरद पवार दोनों हार चुके हैं।
और इसीलिए यह मामला सिर्फ़ बंगाल का नहीं रहा। यह भारतीय लोकतंत्र में एक नए पैटर्न की पुष्टि है — जहाँ विपक्षी दलों को 'बाहर से हराने' की ज़रूरत नहीं, उन्हें 'भीतर से तोड़ने' का एक संस्थागत रास्ता तैयार हो चुका है। चुनाव आयोग का सिंबल-ऑर्डर वह हथियार बन गया है जो चुनाव जीते बिना सत्ता पलट सकता है।
आगे क्या देखना है
अगले कुछ हफ़्तों में तीन बातों पर नज़र रखनी ज़रूरी है। पहला — ऋतब्रत गुट विधायकों के समर्थन पत्रों का क्या आँकड़ा चुनाव आयोग के सामने रखता है; अगर यह TMC विधायकों का एक-तिहाई भी पार करता है, तो मामला गंभीर हो जाएगा। दूसरा — ममता बनर्जी की काउंटर-स्ट्रैटेजी: क्या वे उद्धव ठाकरे की तरह क़ानूनी लड़ाई चुनेंगी, या शरद पवार की तरह सड़क पर उतरकर जनसमर्थन जुटाएँगी? तीसरा — केंद्रीय एजेंसियों की गतिविधि: शिंदे और अजित पवार दोनों मामलों में बाग़ी गुट के नेताओं पर चल रहे मामले 'अचानक' ठंडे पड़े थे — बंगाल में भी यह संकेत देखने लायक़ होगा।
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आँकड़ों में
- शिंदे के पास शिवसेना के 55 में से 40 विधायक थे — यानी 72% से अधिक — जब उन्होंने सिंबल क्लेम किया (चुनाव आयोग रिकॉर्ड)।
- TMC ने 2021 बंगाल विधानसभा चुनाव में 294 में से 215 सीटें जीती थीं — ऋतब्रत को इस संख्या का एक-तिहाई भी तोड़ना होगा।
- भारत में 2022-2024 के बीच तीन प्रमुख राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय दलों — शिवसेना, NCP, और अब TMC — में सिंबल विवाद चुनाव आयोग के समक्ष आया।
मुख्य बातें
- ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में TMC बागी गुट ने चुनाव आयोग से 'जोड़ा फूल' चिह्न और पार्टी फंड पर दावा किया — यह ठीक वही रणनीति है जो शिंदे (शिवसेना) और अजित पवार (NCP) में सफल रही।
- चुनाव आयोग के 'चुनाव चिह्न आदेश 1968' के तहत विधायकों के बहुमत, संगठनात्मक समर्थन और पार्टी संविधान के आधार पर फ़ैसला होगा — शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को मान्यता दी थी।
- शिंदे के पास शिवसेना के 55 में से 40 विधायक थे; ऋतब्रत के गुट के पास TMC के 215+ विधायकों में से कितने हैं, यह निर्णायक सवाल है।
- यह विवाद भारतीय राजनीति में 'सिंबल-ऑर्डर' के ज़रिए विपक्षी दलों को भीतर से तोड़ने के एक नए संस्थागत पैटर्न की पुष्टि करता है।
- 2026 बंगाल नगरपालिका चुनावों से पहले यह TMC की संगठनात्मक एकजुटता पर सीधा हमला है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ऋतब्रत बनर्जी कौन हैं और उन्होंने TMC सिंबल पर दावा क्यों किया?
ऋतब्रत बनर्जी TMC के पूर्व नेता और राज्यसभा सांसद रहे हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, उन्होंने बागी गुट के नेतृत्व में चुनाव आयोग से मिलकर TMC के 'जोड़ा फूल' चिह्न और पार्टी फंड पर दावा किया है — उनका तर्क है कि मौजूदा नेतृत्व पार्टी संविधान का उल्लंघन कर रहा है।
क्या चुनाव आयोग सच में TMC का सिंबल ऋतब्रत गुट को दे सकता है?
हाँ, सैद्धांतिक रूप से यह संभव है। चुनाव आयोग 'चुनाव चिह्न आदेश 1968' के तहत विधायकों के बहुमत और संगठनात्मक समर्थन के आधार पर फ़ैसला करता है। शिवसेना और NCP दोनों मामलों में आयोग ने बागी गुट को सिंबल दिया था। हालाँकि, ऋतब्रत गुट के पास कितने विधायकों का समर्थन है, यह निर्णायक सवाल है।
शिंदे-अजित पवार मॉडल और ऋतब्रत के दावे में क्या फ़र्क़ है?
सबसे बड़ा फ़र्क़ संख्या बल का है। शिंदे के पास शिवसेना के 72% से अधिक विधायक थे, अजित पवार के पास भी NCP का स्पष्ट बहुमत। ऋतब्रत गुट के पास TMC के 215+ विधायकों में से कितने हैं — यह अभी स्पष्ट नहीं है। बिना पर्याप्त विधायक समर्थन के यह दावा तकनीकी रूप से कमज़ोर रह सकता है।
इस विवाद का 2026 बंगाल चुनावों पर क्या असर पड़ेगा?
भले ही ऋतब्रत का दावा तत्काल सफल न हो, यह TMC के भीतर असंतोष को सार्वजनिक मंच देता है। 2026 नगरपालिका चुनावों से पहले यह पार्टी की एकजुटता पर सीधा हमला है और चुपचाप नाराज़ नेताओं को एक 'विकल्प' दिखा सकता है।



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