सऊदी अरब और UAE के बीच यमन, सोमालिया और इसराइल को लेकर बढ़ती दरार सीधे भारत की खाड़ी नीति को चुनौती दे रही है — लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह फ्रैक्चर मुस्लिम दुनिया को दो खेमों में बाँट रहा है, जिससे भारत के 90 लाख प्रवासियों की सुरक्षा और सालाना अरबों डॉलर का रेमिटेंस ख़तरे में है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: सऊदी अरब, UAE, भारत सरकार, खाड़ी में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी
  • क्या: सऊदी-UAE के बीच यमन, सोमालिया और इसराइल को लेकर रणनीतिक दरार गहरा रही है जो भारतीय प्रवासियों और रेमिटेंस को सीधे प्रभावित कर सकती है
  • कब: 2024-2026 के दौरान यह दरार तेज़ी से बढ़ी, लाइव हिन्दुस्तान ने 2026 में इसकी विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की
  • कहाँ: खाड़ी क्षेत्र — सऊदी अरब, UAE, यमन, सोमालिया; प्रभाव क्षेत्र: भारत का हिंदी बेल्ट (UP, बिहार, राजस्थान, केरल)
  • क्यों: यमन में हूती संकट, सोमालिया में प्रभाव-क्षेत्र की होड़, और इसराइल के साथ UAE के अब्राहम समझौते ने सऊदी-UAE रिश्तों में गहरी दरार डाल दी — लाइव हिन्दुस्तान के अनुसार यह मुस्लिम दुनिया को विभाजित कर रहा है
  • कैसे: यमन में दोनों देशों ने अलग-अलग गुटों को समर्थन दिया, सोमालिया में UAE ने स्वतंत्र सैन्य ठिकाने बनाए, और इसराइल से UAE के कूटनीतिक रिश्तों ने सऊदी अरब की OIC नेतृत्व की स्थिति को चुनौती दी — लाइव हिन्दुस्तान

90 लाख भारतीय। केरल से लेकर बिहार तक के मज़दूर, इंजीनियर, नर्स, ड्राइवर — जो खाड़ी की रेत में पसीना बहाकर हर साल भारत भेजते हैं अरबों डॉलर। अब उसी खाड़ी की ज़मीन के नीचे एक भूचाल आ रहा है, और इसकी दरारें दिल्ली के साउथ ब्लॉक तक पहुँच रही हैं। सऊदी अरब और UAE — दो देश जो दशकों तक एक ही तेल-तंबू के नीचे बैठे दिखे — अब एक-दूसरे की आँखों में आँखें डालकर अलग-अलग रास्ते चुन रहे हैं। और इस टूटन की सबसे बड़ी क़ीमत चुकाने वाला कोई अरब शेख़ नहीं, बल्कि लखनऊ का वह मिस्त्री है जो दुबई में अपने बेटे की फ़ीस का जुगाड़ करता है।

लाइव हिन्दुस्तान की विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक़ सऊदी अरब और UAE के बीच दरार की जड़ें तीन मोर्चों पर फैली हैं — यमन, सोमालिया और इसराइल। ये तीन नाम सुनने में भारत से बहुत दूर लगते हैं, लेकिन इनका असर उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ से लेकर राजस्थान के जोधपुर तक के उन लाखों घरों पर पड़ सकता है जहाँ 'गल्फ़ मनी' ही एकमात्र सहारा है।

यमन: एक युद्ध, दो 'दोस्त', और दो अलग-अलग दाँव

यमन गृहयुद्ध — जिसे दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी कहा जाता है — ने सऊदी और UAE को एक साथ लाया था, ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़। लेकिन लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट बताती है कि इस गठबंधन में दरारें जल्दी ही दिखने लगीं। सऊदी अरब ने हादी सरकार का साथ दिया, जबकि UAE ने दक्षिणी यमन के अलगाववादी STC (साउदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल) को खड़ा किया। नतीजा? एक ही युद्ध में दो 'सहयोगी' अलग-अलग गुटों के पीछे खड़े हो गए। यह किसी फ़िल्म की स्क्रिप्ट नहीं, यह असली भू-राजनीति है — जहाँ दोस्त के दोस्त, दुश्मन हो जाते हैं।

अदन बंदरगाह पर UAE का नियंत्रण सऊदी अरब के लिए सीधी चुनौती बन गया। रिपोर्ट के अनुसार, UAE ने सोकोत्रा द्वीप पर अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई — एक ऐसी चाल जिसे रियाद ने अपने रणनीतिक क्षेत्र में अतिक्रमण माना। यमन का यह प्रॉक्सी वॉर अब सिर्फ़ हूतियों के ख़िलाफ़ नहीं रहा — यह सऊदी-UAE के बीच प्रभाव-क्षेत्र की लड़ाई बन चुकी है।

सोमालिया: अफ़्रीका के हॉर्न पर दूसरा मोर्चा

लाइव हिन्दुस्तान के अनुसार, हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका में भी यही पैटर्न दोहराया गया। UAE ने सोमालीलैंड (जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं है) में बरबेरा बंदरगाह पर सैन्य ठिकाना बनाया, और इरिट्रिया में असब बंदरगाह पर भी पैर जमाए। सऊदी अरब, जो पारंपरिक रूप से सोमालिया की केंद्रीय सरकार के क़रीब रहा है, इसे अपने प्रभाव-क्षेत्र में सेंध मानता है।

यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है: ये दोनों देश, जो एक ही GCC (गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल) के सदस्य हैं, अफ़्रीका में क्यों एक-दूसरे के ख़िलाफ़ चाल चल रहे हैं? इसका जवाब है — व्यापार मार्ग, सामरिक गहराई, और लाल सागर पर नियंत्रण। जो देश लाल सागर के दोनों तरफ़ के बंदरगाहों को नियंत्रित करेगा, वही वैश्विक व्यापार की चाबी अपनी जेब में रखेगा।

इसराइल फ़ैक्टर: वह फ़ाँस जिसने पूरे मुस्लिम जगत को बाँट दिया

और फिर आया वह बदलाव जिसने सब कुछ पलट दिया। 2020 में अब्राहम समझौते के तहत UAE ने इसराइल के साथ कूटनीतिक रिश्ते क़ायम किए — लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट इसे इस दरार का सबसे गहरा और सबसे विवादित पहलू मानती है। सऊदी अरब, जो दशकों से मुस्लिम दुनिया में OIC (ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन) के ज़रिए फ़लस्तीनी मुद्दे का 'ठेकेदार' बना हुआ था, ने इसे अपनी नेतृत्वकारी भूमिका पर सीधा हमला माना।

ग़ज़ा संकट ने इस खाई को और गहरा कर दिया। जहाँ सऊदी अरब ने इसराइल के साथ सामान्यीकरण वार्ता रोक दी और फ़लस्तीनी मुद्दे पर सख़्त रुख़ अपनाया, वहीं UAE ने इसराइल के साथ व्यापारिक और रक्षा संबंध जारी रखे। नतीजा: मुस्लिम दुनिया दो खेमों में बँट गई — एक जो इसराइल से बात करने को तैयार है, और दूसरा जो इसे 'ग़द्दारी' मानता है।

पॉलिटिकल पल्स

दिल्ली के विदेश मंत्रालय के गलियारों में इस फ्रैक्चर को लेकर फुसफुसाहटें तेज़ हैं। सूत्रों के मुताबिक़ साउथ ब्लॉक में यह चिंता गहरी है कि अगर खाड़ी में तनाव सैन्य टकराव में बदला, तो 'ऑपरेशन वंदे भारत' जैसे अभियान की ज़रूरत पड़ सकती है — लेकिन इस बार पैमाना कहीं बड़ा होगा। 2015 में यमन से 'ऑपरेशन राहत' के तहत लगभग 4,640 भारतीय निकाले गए थे। अब कल्पना कीजिए अगर यह संकट पूरी खाड़ी में फैले — 90 लाख लोगों को कहाँ ले जाएँगे?

सियासी गलियारों में एक और बात चल रही है: मोदी सरकार की 'सबसे दोस्ती' नीति — जहाँ भारत ने सऊदी अरब और UAE दोनों के साथ बराबर क़रीबी रिश्ते बनाए — अब तलवार की धार पर चल रही है। जब दो दोस्त आपस में लड़ें, तो बीच वाले को सबसे ज़्यादा तकलीफ़ होती है। (यह इंडस्ट्री/सियासी चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

₹3.85 लाख करोड़ का रेमिटेंस — दाँव पर क्या है?

आँकड़ों की बात करें तो भारतीय रिज़र्व बैंक और विश्व बैंक के आँकड़ों के मुताबिक़ भारत दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्तकर्ता देश है — 2024-25 में अनुमानतः $110 बिलियन (लगभग ₹9.2 लाख करोड़) से अधिक का रेमिटेंस आया, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। विश्व बैंक के अनुमान बताते हैं कि अकेले सऊदी अरब और UAE से भारत को सालाना $40-45 बिलियन (लगभग ₹3.85 लाख करोड़) का रेमिटेंस आता है।

अब सोचिए — अगर इन दो देशों के बीच तनाव से वीज़ा नीतियाँ बदलीं, श्रम क़ानून सख़्त हुए, या सबसे बुरी स्थिति में सुरक्षा हालात बिगड़े, तो इसका असर सीधे बिहार के दरभंगा, यूपी के ग़ाज़ीपुर और राजस्थान के जोधपुर तक पहुँचेगा। ये वो ज़िले हैं जहाँ खाड़ी का पैसा घरों की नींव रखता है, बच्चों की पढ़ाई चलाता है, और बुज़ुर्गों का इलाज कराता है।

हिंदी बेल्ट पर सीधा असर: जो कोण बाकी मीडिया से छूटा

इस पूरे भू-राजनीतिक उथल-पुथल में एक कोण है जो अक्सर अनदेखा रह जाता है — हिंदी बेल्ट का ख़ास जोखिम। केरल और तमिलनाडु के प्रवासियों के बारे में चर्चा होती है, लेकिन पिछले दशक में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश से खाड़ी जाने वालों की संख्या में भारी उछाल आई है। विदेश मंत्रालय के eMigrate डेटा के अनुसार, इन राज्यों से जाने वाले श्रमिकों का अनुपात लगातार बढ़ रहा है — और ये वही लोग हैं जो सबसे कमज़ोर श्रम श्रेणियों (कंस्ट्रक्शन, ड्राइविंग, घरेलू काम) में काम करते हैं, जहाँ किसी भी नीतिगत बदलाव का सबसे पहला और सबसे कड़ा असर पड़ता है।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि यह दरार महज़ एक भू-राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि भारतीय घरेलू राजनीति के लिए एक टाइम बम है। अगर खाड़ी से बड़ी संख्या में लोग लौटे, तो यूपी-बिहार के रोज़गार बाज़ार पर दबाव बढ़ेगा, रेमिटेंस-आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था लड़खड़ाएगी, और सत्तारूढ़ दल के लिए 2027 के राज्य चुनावों में यह एक बारूदी सुरंग बन सकती है। यही वह कोण है जो किसी प्रेस रिलीज़ में नहीं मिलेगा।

मोदी की कूटनीतिक तिकड़ी: रियाद-अबू धाबी-तेल अवीव का त्रिकोण

भारत ने पिछले दशक में एक अभूतपूर्व कूटनीतिक करतब दिखाया है — सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया, UAE के साथ CEPA (व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता) किया, और इसराइल के साथ रक्षा-तकनीक गठजोड़ को नई ऊँचाई दी। लेकिन जब ये तीनों आपस में टकरा रहे हों, तो भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' नीति का असली इम्तिहान शुरू होता है।

लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट इशारा करती है कि सऊदी अरब ने OPEC+ में तेल उत्पादन कटौती को लेकर UAE से सीधे टकराव लिया था — एक आर्थिक लड़ाई जिसका असर सीधे भारत के तेल आयात बिल पर पड़ता है। भारत, जो अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का 85% से अधिक आयात करता है, इस कश्मकश में मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकता।

आगे क्या? — वह सवाल जो दिल्ली से दोहा तक गूँज रहा है

आने वाले महीनों में कुछ चीज़ें देखने लायक़ हैं। पहला — यमन में सीज़फ़ायर की कोशिशें किस दिशा में जाती हैं। अगर सऊदी-हूती बातचीत आगे बढ़ी, तो UAE को अपनी दक्षिणी यमन रणनीति पर दोबारा सोचना होगा। दूसरा — OPEC+ में अगली तेल-उत्पादन बैठक, जहाँ सऊदी-UAE का तनाव सीधे तेल की क़ीमतों को प्रभावित कर सकता है। और तीसरा — इसराइल-फ़लस्तीन संकट का कोई भी नया मोड़, जो मुस्लिम दुनिया के इस विभाजन को और गहरा या कम कर सकता है।

भारत के लिए यह सिर्फ़ विदेश नीति का मामला नहीं है। यह आज़मगढ़ के उस कारपेंटर के परिवार का मामला है जो दुबई से हर महीने ₹15,000 भेजता है। यह दरभंगा की उस माँ का मामला है जिसका बेटा रियाद में ड्राइवर है। और यह उस सरकार का मामला है जो 2027 में हिंदी बेल्ट में वोट माँगने जाएगी — क्योंकि अगर खाड़ी का पैसा रुका, तो वोटर का ग़ुस्सा भी नहीं रुकेगा।

दुनिया भले मान ले कि यह रियाद-अबू धाबी का झगड़ा है। लेकिन असली सवाल यह है: जब दो अरबपति पड़ोसी लड़ते हैं, तो उनके घर में काम करने वाले की नौकरी का क्या होता है?

आँकड़ों में

  • खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी कार्यरत — विदेश मंत्रालय अनुमान
  • सऊदी-UAE से भारत को अनुमानतः $40-45 बिलियन (₹3.85 लाख करोड़+) सालाना रेमिटेंस — विश्व बैंक अनुमान
  • 2015 में यमन से 'ऑपरेशन राहत' के तहत लगभग 4,640 भारतीय निकाले गए — विदेश मंत्रालय
  • भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का 85% से अधिक आयात करता है — पेट्रोलियम मंत्रालय

मुख्य बातें

  • सऊदी-UAE दरार तीन मोर्चों पर — यमन में प्रॉक्सी वॉर, सोमालिया में सैन्य प्रतिस्पर्धा, और इसराइल के साथ UAE के कूटनीतिक संबंध — लाइव हिन्दुस्तान रिपोर्ट
  • भारत को खाड़ी से सालाना अनुमानतः $40-45 बिलियन (₹3.85 लाख करोड़+) रेमिटेंस आता है — सऊदी और UAE अकेले; हिंदी बेल्ट की ग्रामीण अर्थव्यवस्था इस पर निर्भर
  • मोदी की 'मल्टी-अलाइनमेंट' नीति — सऊदी, UAE और इसराइल तीनों से दोस्ती — अब तलवार की धार पर; OPEC+ तनाव से तेल आयात बिल सीधे प्रभावित
  • हिंदी बेल्ट (UP, बिहार, राजस्थान) से खाड़ी जाने वाले श्रमिक सबसे कमज़ोर श्रेणी में — किसी भी नीतिगत बदलाव का पहला असर इन्हीं पर
  • 2027 के राज्य चुनावों में यह मुद्दा बारूदी सुरंग बन सकता है — खाड़ी रेमिटेंस रुकी तो हिंदी बेल्ट में वोटर का ग़ुस्सा सत्ताधारी दल पर

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सऊदी अरब और UAE में दरार क्यों पड़ी?

लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार तीन प्रमुख कारण हैं: यमन गृहयुद्ध में दोनों ने अलग-अलग गुटों का समर्थन किया, सोमालिया/हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका में UAE ने स्वतंत्र सैन्य ठिकाने बनाए, और 2020 में अब्राहम समझौते के तहत UAE ने इसराइल से कूटनीतिक रिश्ते क़ायम किए जिसे सऊदी अरब ने मुस्लिम दुनिया में अपने नेतृत्व पर चुनौती माना।

खाड़ी की दरार से भारत के प्रवासी श्रमिकों पर क्या असर पड़ सकता है?

खाड़ी में लगभग 90 लाख भारतीय काम करते हैं। तनाव बढ़ने पर वीज़ा नीतियाँ सख़्त हो सकती हैं, श्रम क़ानून बदल सकते हैं, और सुरक्षा हालात बिगड़ने पर बड़े पैमाने पर निकासी की ज़रूरत पड़ सकती है — 2015 के यमन ऑपरेशन राहत से कहीं बड़े पैमाने पर।

भारत को खाड़ी से कितना रेमिटेंस आता है?

विश्व बैंक के अनुमानों के अनुसार अकेले सऊदी अरब और UAE से भारत को सालाना अनुमानतः $40-45 बिलियन (लगभग ₹3.85 लाख करोड़) का रेमिटेंस आता है, जो हिंदी बेल्ट सहित कई राज्यों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

मोदी सरकार की खाड़ी नीति पर इसका क्या असर होगा?

भारत ने सऊदी, UAE और इसराइल तीनों से क़रीबी रिश्ते बनाए हैं। जब ये तीनों आपस में टकरा रहे हों, तो भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' नीति की परीक्षा है — किसी एक का पक्ष लेना दूसरे से रिश्ते ख़राब कर सकता है, और तटस्थ रहना दोनों को नाराज़ कर सकता है।

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