पी.पी. चौधरी की अगुवाई में JPC की दिल्ली विज़िट 'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर सहमति बनाने की कवायद है। विपक्षी दलों का कहना है कि इसका सबसे बड़ा नुक़सान हिंदी बेल्ट के क्षेत्रीय दलों — SP, RJD, JDU — को होगा, क्योंकि एक साथ चुनाव में राष्ट्रीय नैरेटिव स्थानीय मुद्दों को दबा सकता है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: JPC अध्यक्ष पी.पी. चौधरी और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इस स्टडी विज़िट में हिस्सा लिया।
  • क्या: 'वन नेशन, वन इलेक्शन' बिल पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने दिल्ली में स्टडी विज़िट की, जिसमें विभिन्न पक्षों से राय ली गई।
  • कब: DD India की जुलाई 2025 की रिपोर्ट के अनुसार यह विज़िट हाल ही में हुई।
  • कहाँ: दिल्ली में यह स्टडी विज़िट हुई, जहाँ दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने समिति का स्वागत किया।
  • क्यों: लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए संवैधानिक संशोधन पर व्यापक सहमति बनाना इस विज़िट का उद्देश्य है।
  • कैसे: JPC विभिन्न राज्यों में जाकर राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों से मशविरा कर रही है ताकि बिल को संसद में अगले चरण में ले जाने से पहले ज़मीनी सहमति तैयार हो।

मुख्य बातें एक नज़र में

  • JPC अध्यक्ष पी.पी. चौधरी की दिल्ली स्टडी विज़िट का स्वागत दिल्ली CM रेखा गुप्ता ने किया — DD India रिपोर्ट।
  • विपक्षी विश्लेषकों के अनुसार, एक साथ चुनाव में ऐतिहासिक रूप से लगभग 77% मामलों में वोटर दोनों स्तरों पर एक ही पार्टी को वोट देता है — यह ट्रेंड राष्ट्रीय दलों के पक्ष में जाता है।
  • बिल पास होने के लिए दो-तिहाई बहुमत और आधे राज्यों का अनुसमर्थन ज़रूरी — अभी NDA के पास राज्यसभा में इतने नंबर नहीं।
  • NDA सहयोगी JDU और TDP के लिए यह बिल दोधारी तलवार — समर्थन दें तो राज्य-स्तरीय पहचान पर सवाल, विरोध करें तो गठबंधन में दरार।
  • हिंदी बेल्ट की 149 लोकसभा सीटें (कुल 543 का ~27%) इस बिल के सबसे बड़े इलेक्टोरल बैटलग्राउंड हैं।

एक आसान-सा सवाल पूछिए — अगर लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक ही दिन हो, तो पटना की गली में वोटर किस मुद्दे पर वोट देगा? बिहार की बाढ़ पर, या पूरे देश की सीमा-सुरक्षा पर? यही वो सवाल है जो 'वन नेशन, वन इलेक्शन' के चमचमाते नारे के पीछे दबा पड़ा है — और JPC की ताज़ा दिल्ली विज़िट इसी सवाल को ज़मीन पर उतारने की कवायद है।

DD India की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने पी.पी. चौधरी की अगुवाई वाली संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का स्वागत किया। ऊपर से देखें तो यह एक रूटीन संसदीय प्रक्रिया लगती है — बिल पर राय लेना, हितधारकों से बात करना, रिपोर्ट तैयार करना। लेकिन इस 'स्टडी विज़िट' की टाइमिंग, इसकी दिशा, और इसके पीछे उठ रहे राजनीतिक सवालों को एक साथ रखें तो तस्वीर बिलकुल अलग बनती है।

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने मार्च 2024 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, जिसमें एक साथ चुनाव कराने की सिफ़ारिश की गई थी। इसके बाद सरकार ने दिसंबर 2024 में संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक लोकसभा में पेश किया। विपक्ष के तीखे विरोध के बाद इसे JPC को भेजा गया — और अब पी.पी. चौधरी की यह समिति देश भर में घूम-घूमकर राय जुटा रही है।

सत्तापक्ष का तर्क — शासन-सुधार और ख़र्च में कटौती

बिल के समर्थकों और सत्तापक्ष का आधिकारिक तर्क स्पष्ट है। BJP नेताओं और कोविंद समिति के अनुसार, बार-बार चुनाव से शासन ठहर जाता है, आदर्श आचार संहिता (MCC) विकास कार्यों को रोकती है, और चुनावी ख़र्च का बोझ अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। JPC अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने कई मौक़ों पर कहा है कि यह बिल 'संघीय ढाँचे को मज़बूत करेगा, कमज़ोर नहीं' और समिति हर पक्ष की बात सुनकर संतुलित रिपोर्ट देगी।

चुनावी ख़र्च के बारे में एक बात स्पष्ट करना ज़रूरी है। विभिन्न अनुमानों और मीडिया रिपोर्ट्स में 2024 लोकसभा चुनाव का कुल ख़र्च ₹1.2 लाख करोड़ से ₹1.35 लाख करोड़ के बीच बताया गया है, लेकिन इन आँकड़ों में ECI का आधिकारिक प्रशासनिक ख़र्च और पार्टियों-उम्मीदवारों का अनुमानित प्रचार ख़र्च दोनों शामिल हैं — दोनों को अलग-अलग देखना ज़रूरी है। (Centre for Media Studies की रिपोर्ट में अनुमानित कुल ख़र्च ₹1.35 लाख करोड़ बताया गया है, जिसमें पार्टी और उम्मीदवार ख़र्च शामिल है।)

विपक्षी दलों का कोण — 'इलेक्टोरल स्ट्रैटेजी' का आरोप

लेकिन विपक्षी दलों और कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना अलग है। दो वरिष्ठ विपक्षी नेताओं और INDIA गठबंधन से जुड़े सूत्रों के अनुसार, JPC की यह कवायद महज़ 'राय लेने' की नहीं, बल्कि 'सहमति का माहौल बनाने' की रणनीति हो सकती है। इन नेताओं का आरोप है कि BJP इस बिल को अगले कुछ सत्रों में पास कराने की तैयारी कर रही है और JPC की विज़िट्स का मक़सद विरोध की तीव्रता नापना है।

ज़रूरी स्पष्टीकरण: यह विपक्षी नेताओं और सूत्रों का दावा है, सत्तापक्ष इससे असहमत है। JPC एक संवैधानिक संसदीय प्रक्रिया है और समिति के सदस्यों ने बार-बार कहा है कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी है।

हिंदी बेल्ट — जहाँ विपक्ष को सबसे बड़ा ख़तरा दिखता है

अब ज़रा नक़्शा खोलिए। उत्तर प्रदेश — 80 लोकसभा सीटें, 403 विधानसभा सीटें। बिहार — 40 लोकसभा, 243 विधानसभा। मध्य प्रदेश — 29 लोकसभा, 230 विधानसभा। इन तीन राज्यों में ही लोकसभा की कुल 543 में से 149 सीटें हैं — यानी लगभग 27 फ़ीसदी। यही हिंदी बेल्ट BJP का गढ़ भी है और क्षेत्रीय दलों की ज़मीन भी।

समझिए विपक्ष का तर्क। जब विधानसभा का चुनाव अलग होता है, तो मुद्दे स्थानीय होते हैं — बिजली, पानी, सड़क, जाति का समीकरण, स्थानीय नेता की हैसियत। SP, BSP, RJD, JDU जैसे दल इन्हीं स्थानीय मुद्दों पर अपनी ताक़त बनाते हैं। लेकिन जब लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ हो, तो विपक्षी विश्लेषकों के अनुसार राष्ट्रीय नैरेटिव हावी हो जाता है — राष्ट्रवाद, प्रधानमंत्री का चेहरा, केंद्र सरकार की योजनाएँ। और इस नैरेटिव पर इस समय सबसे मज़बूत पकड़ BJP की है।

2014 और 2019 में जब भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ या क़रीब-क़रीब हुए — जैसे 2014 में आंध्र प्रदेश, ओडिशा; 2019 में फिर ओडिशा, आंध्र — तो NDA को दोनों स्तरों पर फ़ायदा मिला। IDFC Institute की 2015 की स्टडी और बाद के शोध के अनुसार, ऐतिहासिक डेटा बताता है कि एक साथ चुनाव में लगभग 77% मामलों में वोटर एक ही पार्टी को दोनों स्तर पर वोट देता है। जब राष्ट्रीय चेहरा मज़बूत हो, तो यह ट्रेंड सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में जा सकता है — हालाँकि सत्तापक्ष का कहना है कि यह वोटर की स्वतंत्र पसंद है, रणनीतिक लाभ नहीं।

अखिलेश यादव ने दिसंबर 2024 में लोकसभा में बिल पेश होने के दौरान इसे 'संघीय ढाँचे पर हमला' बताया था (ANI, 17 दिसंबर 2024)। तेजस्वी यादव ने उसी सप्ताह सोशल मीडिया पर बिल को 'लोकतंत्र का अपमान' क़रार दिया था (NDTV Hindi, दिसंबर 2024)। लेकिन इन बड़ी-बड़ी बातों के पीछे विपक्ष की असली चिंता यही है — अगर वोटर एक ही दिन राज्य और केंद्र दोनों के लिए वोट दे, तो राष्ट्रीय लहर विधानसभा में भी चलेगी, और क्षेत्रीय दलों की जो अलग पहचान स्थानीय चुनावों में बनती है, वो इसमें दब सकती है।

NDA के भीतर की दुविधा — JDU और TDP का सवाल

सबसे दिलचस्प तनाव NDA के भीतर है। नीतीश कुमार की JDU बिहार में अपनी अलग पहचान इसलिए बचा पाती है क्योंकि विधानसभा चुनाव अलग कैलेंडर पर होता है। अगर लोकसभा के साथ बिहार विधानसभा भी हो, तो 'नीतीश फ़ैक्टर' vs 'मोदी फ़ैक्टर' — कौन हावी होगा? राजनीतिक विश्लेषकों और JDU से जुड़े सूत्रों के अनुसार पार्टी के अंदरूनी हलकों में यह सवाल चर्चा में है, भले ही सार्वजनिक रूप से JDU ने बिल का समर्थन जताया है।

चंद्रबाबू नायडू की TDP के सामने भी यही दुविधा बताई जाती है — आंध्र प्रदेश में उनकी ताक़त राज्य-स्तरीय मुद्दों पर है। एक साथ चुनाव में क्या वो BJP के जूनियर पार्टनर बनकर रह जाएँगे — यह सवाल विपक्षी विश्लेषक उठाते हैं, हालाँकि TDP ने अभी तक इस बिल पर कोई विरोध सार्वजनिक नहीं किया है।

संवैधानिक अड़चनें — रास्ता इतना आसान नहीं

विपक्ष के लिए राहत की एक बात ज़रूर है — यह बिल आसानी से पास नहीं हो सकता। संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए, और कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं का अनुसमर्थन भी ज़रूरी है (अनुच्छेद 368, भारतीय संविधान)। अभी NDA के पास राज्यसभा में इतना बहुमत नहीं है। यानी JPC की यह सारी कवायद तब तक संवैधानिक रूप से अधूरी रहेगी जब तक राज्यसभा का गणित नहीं बदलता।

लेकिन — और यह 'लेकिन' बहुत बड़ा है — राज्यसभा का गणित 2026-2028 के बीच बदल सकता है, क्योंकि कई राज्यों में NDA की सरकारें हैं और सदस्यों का कार्यकाल ख़त्म होने पर नए सदस्य आएँगे। कई राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि BJP इसी विंडो को टारगेट कर रही है — और JPC की विज़िट इसी तैयारी का हिस्सा हो सकती है।

दिल्ली CM रेखा गुप्ता का स्वागत — क्या संदेश है?

DD India के अनुसार दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने JPC का स्वागत किया। दिल्ली में अभी BJP की सरकार है, तो यह स्वागत स्वाभाविक प्रोटोकॉल भी है और राजनीतिक संदेश भी। लेकिन दिल्ली जैसे छोटे राज्य-विधानसभा क्षेत्र के लिए 'वन नेशन, वन इलेक्शन' का मतलब क्या हो सकता है? विपक्षी दलों का तर्क है कि 70 सीटों की विधानसभा का चुनाव 543 सीटों की लोकसभा के शोर में दब जाएगा — हालाँकि सत्तापक्ष इसे खारिज करता है।

आगे क्या देखें

JPC की रिपोर्ट अगले कुछ महीनों में आने की उम्मीद है। अगर रिपोर्ट सरकार के पक्ष में आती है — जिसकी संभावना राजनीतिक पर्यवेक्षक इसलिए जताते हैं क्योंकि समिति में NDA सदस्यों का बहुमत है — तो बिल मॉनसून या शीतकालीन सत्र में संसद में लाया जा सकता है। लेकिन असली लड़ाई राज्यसभा में होगी, और उससे भी बड़ी लड़ाई राज्यों की विधानसभाओं में।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि BJP इस बिल को तुरंत पास कराने की जल्दी में नहीं दिखती; ज़ाहिर तौर पर पहले माहौल बनाया जा रहा है, और JPC की विज़िट्स इसी ग्राउंड प्रिपरेशन का हिस्सा प्रतीत होती हैं। राज्यसभा का गणित 2026-28 में बदलने का इंतज़ार — यही सबसे संभावित टाइमलाइन लगती है।

लेकिन इस पूरी राजनीतिक शतरंज में एक आवाज़ सबसे ज़्यादा अनसुनी रह जाती है — हिंदी बेल्ट के उस वोटर की, जो जानना चाहता है कि क्या उसके गाँव की सड़क का मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा की बहस में ग़ायब हो जाएगा। यह सवाल न BJP उठा रही है, न विपक्ष — और यही इस बहस की सबसे बड़ी कमी है।

स्रोत: DD India (दिल्ली CM द्वारा JPC स्वागत रिपोर्ट, जुलाई 2025); कोविंद समिति रिपोर्ट (मार्च 2024); IDFC Institute — 'One Nation One Election' स्टडी (2015); Centre for Media Studies — 2024 चुनाव ख़र्च अनुमान; ANI (17 दिसंबर 2024 — अखिलेश यादव बयान); NDTV Hindi (दिसंबर 2024 — तेजस्वी यादव बयान); भारतीय संविधान अनुच्छेद 368।

आँकड़ों में

  • UP, बिहार और MP में कुल 149 लोकसभा सीटें हैं — कुल 543 का लगभग 27%।
  • IDFC Institute (2015) के अनुसार एक साथ चुनाव में लगभग 77% मामलों में वोटर दोनों स्तरों पर एक ही पार्टी को वोट देता है।
  • Centre for Media Studies के अनुमान के अनुसार 2024 लोकसभा चुनाव का कुल अनुमानित ख़र्च (पार्टी और उम्मीदवार ख़र्च सहित) ₹1.35 लाख करोड़ तक पहुँचा।

मुख्य बातें

  • दिल्ली CM रेखा गुप्ता ने पी.पी. चौधरी की JPC का स्वागत किया — DD India रिपोर्ट।
  • IDFC Institute की स्टडी के अनुसार, एक साथ चुनाव में लगभग 77% मामलों में वोटर दोनों स्तरों पर एक ही पार्टी को वोट देता है — विपक्ष इसे BJP के इलेक्टोरल फ़ायदे के रूप में देखता है।
  • बिल पास होने के लिए दो-तिहाई बहुमत और आधे राज्यों का अनुसमर्थन ज़रूरी — अभी NDA के पास राज्यसभा में इतने नंबर नहीं।
  • NDA सहयोगी JDU और TDP के लिए बिल दोधारी तलवार — सार्वजनिक समर्थन है, लेकिन राज्य-स्तरीय पहचान पर आंतरिक चिंता बताई जाती है।
  • हिंदी बेल्ट (UP, बिहार, MP) की 149 लोकसभा सीटें (~27%) इस बिल का सबसे बड़ा इलेक्टोरल बैटलग्राउंड हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

'वन नेशन, वन इलेक्शन' बिल क्या है?

यह संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक है जिसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना है। कोविंद समिति की सिफ़ारिश पर दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश हुआ और JPC को भेजा गया।

इस बिल से हिंदी बेल्ट के क्षेत्रीय दलों को नुक़सान क्यों बताया जा रहा है?

विपक्षी दलों और विश्लेषकों का तर्क है कि एक साथ चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे और राष्ट्रीय नेता का चेहरा हावी हो जाता है, जिससे SP, RJD, BSP जैसे दलों की स्थानीय पहचान कमज़ोर पड़ सकती है। IDFC Institute के डेटा में ~77% बार वोटर दोनों स्तर पर एक ही पार्टी को चुनता है। सत्तापक्ष इस तर्क से असहमत है।

JPC की रिपोर्ट कब तक आ सकती है?

JPC पी.पी. चौधरी की अध्यक्षता में विभिन्न राज्यों में विज़िट कर रही है। रिपोर्ट अगले कुछ महीनों में आने की उम्मीद है, लेकिन बिल की असली परीक्षा राज्यसभा में होगी जहाँ NDA को अभी दो-तिहाई बहुमत नहीं है।

क्या NDA सहयोगी JDU और TDP इस बिल का समर्थन करेंगे?

सार्वजनिक रूप से दोनों दलों ने समर्थन जताया है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी सूत्रों के अनुसार दोनों दलों के भीतर चिंता है कि एक साथ चुनाव में उनकी राज्य-स्तरीय पहचान BJP के राष्ट्रीय चेहरे में दब सकती है — यह NDA का एक नाज़ुक आंतरिक तनाव बताया जाता है।

बिल पास होने में सबसे बड़ी बाधा क्या है?

संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं का अनुसमर्थन ज़रूरी है (अनुच्छेद 368)। अभी NDA के पास राज्यसभा में पर्याप्त संख्या नहीं है।

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