विपक्षी नेता उमर खालिद और शर्जील इमाम की रिहाई की खुली माँग से बचते हैं क्योंकि हिंदू वोट बैंक में 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का लेबल लगने का जोखिम उनके चुनावी गणित को भारी नुकसान पहुँचा सकता है — यह 'सेफ पॉलिटिक्स' का सबसे निर्मम उदाहरण है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: उमर खालिद (JNU पूर्व छात्रनेता) और शर्जील इमाम (JNU शोधार्थी) — दोनों UAPA के तहत दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद; मुख्यधारा के विपक्षी नेता राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी इनके मामले पर लगभग मौन।
  • क्या: दोनों आरोपियों पर फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की साज़िश रचने का आरोप है, UAPA के तहत ज़मानत बार-बार खारिज हो रही है, और विपक्ष ने इनकी रिहाई को अपना राजनीतिक एजेंडा नहीं बनाया।
  • कब: उमर खालिद सितंबर 2020 से और शर्जील इमाम जनवरी 2020 से जेल में हैं — यानी लगभग पाँच-साढ़े पाँच साल हो चुके।
  • कहाँ: दिल्ली की तिहाड़ जेल; मामले की सुनवाई दिल्ली की अदालतों में जारी।
  • क्यों: UAPA की कठोर ज़मानत शर्तें, धीमी ट्रायल प्रक्रिया, और विपक्ष का इन मामलों को चुनावी रूप से 'विषैला' मानकर दूरी बनाना — ये तीन वजहें हैं।
  • कैसे: UAPA के तहत ज़मानत मिलना लगभग असंभव है क्योंकि अभियोजन को केवल प्राथमिक दृष्टया मामला दिखाना होता है; विपक्ष ने इस विषय को चुनावी अभियानों, संसदीय बहसों और सार्वजनिक रैलियों से व्यवस्थित रूप से बाहर रखा है।

पाँच साल। एक हज़ार आठ सौ से ज़्यादा दिन। तिहाड़ जेल की दीवारों के भीतर दो नाम धीरे-धीरे सुर्खियों से ग़ायब होते गए — उमर खालिद और शर्जील इमाम। दिल्ली दंगों की कथित 'साज़िश' के आरोप में UAPA के तहत बंद ये दोनों शख़्स न तो भूले गए हैं, न माफ़ किए गए — बस राजनीतिक रूप से 'अनटचेबल' बना दिए गए हैं। और यह 'अनटचेबल' बनाने का काम सिर्फ़ नरेंद्र मोदी सरकार ने नहीं किया — विपक्ष ने भी बराबर का हिस्सा निभाया है।

Newslaundry की एक ताज़ा रिपोर्ट ने इस सवाल को फिर सतह पर ला दिया है: मोदी सरकार के भारत में मुसलमान होने का मतलब क्या है? लेकिन असली सवाल इससे कहीं ज़्यादा बेचैन करने वाला है — जो लोग ख़ुद को 'धर्मनिरपेक्षता के रखवाले' कहते हैं, वे इन दो नामों पर चुप क्यों हैं?

राहुल गांधी ने 'मोहब्बत की दुकान' चलाई, 'भारत जोड़ो यात्रा' निकाली, संविधान की प्रतियाँ लहराईं — लेकिन एक बार भी उमर खालिद या शर्जील इमाम का नाम लेकर उनकी रिहाई नहीं माँगी। अखिलेश यादव ने 'PDA' (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) का नारा दिया, मुस्लिम वोटरों को अपना 'नेचुरल बेस' बताया — फिर भी ये दो नाम उनकी ज़ुबान पर कभी नहीं आए। ममता बनर्जी, जो बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक पर राज करती हैं, उन्होंने भी इस मामले पर कोई राष्ट्रीय अभियान नहीं चलाया।

UAPA — वह क़ानूनी जाल जहाँ से बाहर निकलना लगभग नामुमकिन है

इस खामोशी को समझने के लिए पहले UAPA — Unlawful Activities (Prevention) Act — की मशीनरी समझनी होगी। यह वह क़ानून है जहाँ ज़मानत मिलना अपवाद है, नियम नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद कई मौकों पर स्वीकार किया है कि UAPA के तहत आरोपी को ज़मानत मिलना बेहद कठिन है क्योंकि अभियोजन पक्ष को केवल यह दिखाना होता है कि प्राथमिक दृष्टया आरोप बनते हैं — पूरा सबूत साबित करने की ज़रूरत नहीं। The Indian Express की रिपोर्टिंग के मुताबिक, दिल्ली दंगा मामले में चार्जशीट हज़ारों पन्नों की है और ट्रायल की रफ़्तार इतनी धीमी है कि सज़ा या बरी होने में सालों लग सकते हैं।

शर्जील इमाम को जनवरी 2020 में गिरफ़्तार किया गया था — उनके एक भाषण में 'असम को भारत से काटने' जैसे बयान के आधार पर देशद्रोह और UAPA की धाराएँ लगीं। उमर खालिद को सितंबर 2020 में गिरफ़्तार किया गया — आरोप यह कि दिल्ली दंगों की 'साज़िश' में उनकी भूमिका थी। दोनों आरोपों को चुनौती दी गई है, दोनों पक्षों की दलीलें अदालत में हैं, लेकिन UAPA की संरचना ही ऐसी है कि 'प्रक्रिया ही सज़ा' बन जाती है।

पॉलिटिकल पल्स — परदे के पीछे की असली बिसात

सियासी गलियारों में एक खुली फुसफुसाहट है जिसे कोई बड़ा नेता माइक पर नहीं कहेगा: उमर खालिद और शर्जील इमाम के नाम लेना 'इलेक्टोरल पॉइज़न' है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता से जुड़े हलकों में चर्चा यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में INDIA गठबंधन ने जानबूझकर इन नामों को अपने डिस्कोर्स से बाहर रखा — क्योंकि हिंदी बेल्ट में हर सर्वे बताता था कि 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का लेबल सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाता है।

यह गणित कच्चा नहीं है। CSDS-Lokniti के चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों में बार-बार सामने आया है कि हिंदी बेल्ट के ग़ैर-मुस्लिम OBC और दलित वोटर — जो विपक्ष का 'स्विंग वोट' हैं — 'मुस्लिम पक्षधरता' दिखाने वाले नेता से दूरी बनाते हैं। राहुल गांधी की टीम इस डेटा को अच्छी तरह जानती है। इसीलिए वे मंदिर जाते हैं, जनेऊ दिखाते हैं, संविधान की बात करते हैं — लेकिन किसी UAPA बंदी का नाम नहीं लेते।

अखिलेश यादव का गणित और भी नाज़ुक है। उत्तर प्रदेश में यादव-मुस्लिम गठजोड़ सपा की रीढ़ है, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP ने इसी गठजोड़ को 'M-Y' का तमग़ा देकर ग़ैर-यादव OBC वोट को अपनी ओर खींचा। ट्रेड विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश के लिए उमर खालिद का नाम लेना वही करना होगा जो BJP चाहती है — सपा को 'मुस्लिम पार्टी' साबित करना।

(यह इंडस्ट्री/सियासी चर्चा और अटकलों पर आधारित विश्लेषण है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

दो तरफ़ा सुविधा — जब सत्ता और विपक्ष दोनों को खामोशी 'सूट' करे

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि उमर खालिद और शर्जील इमाम का जेल में बने रहना एक ऐसी 'दो तरफ़ा सुविधा' बन गया है जिसमें सत्ता पक्ष और मुख्यधारा का विपक्ष — दोनों को फ़ायदा है। BJP के लिए ये दोनों नाम '2020 की साज़िश' के जीवित प्रतीक हैं — चुनावी रैलियों में 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' का ज़िक्र अभी भी हिंदू वोट कंसोलिडेशन का हथियार है। विपक्ष के लिए इनकी ग़ैर-मौजूदगी एक 'कम्फ़र्ट ज़ोन' है — इन्हें छोड़ दो तो 'सॉफ्ट हिंदुत्व' वाली लाइन पर चल सकते हो, इनका नाम लो तो वह लाइन टूट जाती है।

The Hindu की एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ने रेखांकित किया है कि UAPA के तहत गिरफ़्तार अधिकांश आरोपियों के मामलों में ट्रायल पूरा होने में औसतन सात से दस साल लग जाते हैं। इसका मतलब यह है कि बिना सज़ा हुए, बिना बरी हुए, ये लोग सालों तक 'क़ानूनी लिंबो' में रहते हैं — और यही लिंबो हर पक्ष की राजनीतिक ज़रूरत पूरी करता है।

यहाँ एक और पहलू है जो मुख्यधारा की बहस से ग़ायब है। जो छोटे-मझोले मुस्लिम नेता या सिविल सोसायटी कार्यकर्ता इन नामों को उठाते हैं — जैसे असदुद्दीन ओवैसी — उन्हें बड़ी पार्टियाँ जानबूझकर 'फ्रिंज' में रखती हैं। ओवैसी का हर बयान BJP और कांग्रेस दोनों के 'नैरेटिव' में फिट बैठता है: BJP कहती है 'देखो, ये मुस्लिम कट्टरपंथी', और कांग्रेस कहती है 'ये BJP के एजेंट हैं'। नतीजा? उमर खालिद और शर्जील इमाम की आवाज़ सिर्फ़ स्वतंत्र मीडिया, एक्टिविस्ट सर्किल और सोशल मीडिया के कुछ कोनों तक सिमटकर रह गई है।

क्या यह सिर्फ़ दो लोगों की कहानी है?

NCRB (National Crime Records Bureau) के आँकड़ों के मुताबिक, 2020 से 2024 के बीच UAPA के तहत गिरफ़्तार लोगों में दोषसिद्धि दर 3% से भी कम रही है — यानी 97% से ज़्यादा मामलों में या तो आरोप सिद्ध नहीं हुए या ट्रायल ही पूरा नहीं हुआ। यह संख्या भयावह है। इसका मतलब है कि UAPA सज़ा देने का नहीं, बल्कि 'बंद रखने' का उपकरण बन गया है — और राजनीतिक व्यवस्था इसे सुधारने की कोई जल्दी नहीं दिखा रही।

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राहुल गांधी ने 2024 में 'ख़ून की होली' और 'नफ़रत' के ख़िलाफ़ कई बार बात की। लेकिन जब NDTV ने एक इंटरव्यू में उनसे सीधे पूछा कि क्या वे उमर खालिद की रिहाई की माँग करेंगे, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से बचा — बात को 'न्यायिक प्रक्रिया' की ओर मोड़ दिया। यह एक वाक्य में विपक्ष की पूरी रणनीति बयान कर देता है: सहानुभूति दिखाओ, लेकिन नाम मत लो।

आगे क्या — 2027 का UP चुनाव और इन नामों का भविष्य

अगर ट्रायल इसी रफ़्तार से चलता रहा, तो उमर खालिद और शर्जील इमाम 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक जेल में रह सकते हैं। और विडंबना देखिए — वह चुनाव ठीक वही है जहाँ अखिलेश यादव और कांग्रेस को मुस्लिम वोटरों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी, लेकिन इन नामों को उठाने की सबसे कम हिम्मत। सियासी गलियारों में अनुमान यह है कि विपक्ष 'मुस्लिम अधिकारों' की बात करेगा लेकिन 'मुस्लिम नामों' से परहेज़ जारी रखेगा — 'सबकी सुरक्षा' जैसा कोई जेनेरिक नारा देगा, लेकिन UAPA सुधार या इन विशिष्ट मामलों को मेनिफ़ेस्टो में जगह देने से बचेगा।

सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने UAPA का इस्तेमाल कैसे किया — वह सवाल तो पूछा जा चुका है। असली सवाल वह है जो पूछने से हर कोई कतरा रहा है: जो विपक्ष 'संविधान बचाओ' के नाम पर वोट माँगता है, वह संविधान के अनुच्छेद 21 — व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार — के सबसे प्रत्यक्ष उल्लंघन पर चुप क्यों है? क्या इसलिए कि 'उमर' और 'शर्जील' नाम हिंदी बेल्ट के चुनावी गणित में 'एसेट' नहीं, 'लायबिलिटी' हैं?

यही वह जगह है जहाँ भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी दरार दिखती है — अधिकारों की लड़ाई भी वोट बैंक के तराज़ू पर तोली जाती है। और जब तक यह तराज़ू चलता रहेगा, तिहाड़ की दीवारों के भीतर बैठे दो लोग इंतज़ार करते रहेंगे — न सत्ता उन्हें बरी करेगी, न विपक्ष उनका नाम लेगा।

आँकड़ों में

  • UAPA के तहत 2020-2024 में दोषसिद्धि दर 3% से भी कम — 97% से ज़्यादा मामलों में सज़ा सिद्ध नहीं हुई या ट्रायल अधूरा रहा (NCRB डेटा आधारित)।
  • उमर खालिद — 1,800+ दिन जेल में बिना ट्रायल पूरा हुए; शर्जील इमाम — लगभग 2,000+ दिन।
  • UAPA के तहत औसत ट्रायल अवधि 7-10 साल (The Hindu विश्लेषण)।

मुख्य बातें

  • उमर खालिद सितंबर 2020 से और शर्जील इमाम जनवरी 2020 से तिहाड़ जेल में UAPA के तहत बंद हैं — बिना सज़ा, बिना बरी, पाँच साल से ज़्यादा।
  • NCRB के आँकड़ों के अनुसार UAPA में दोषसिद्धि दर 3% से भी कम है — यह क़ानून 'सज़ा' से ज़्यादा 'बंद रखने' का हथियार बन चुका है।
  • कांग्रेस, सपा, TMC — किसी भी बड़ी विपक्षी पार्टी ने इन दोनों नामों को अपना राजनीतिक एजेंडा नहीं बनाया — क्योंकि हिंदी बेल्ट में 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का लेबल सबसे ज़्यादा चुनावी नुकसान पहुँचाता है।
  • यह खामोशी 'दो तरफ़ा सुविधा' है — BJP को ये नाम ध्रुवीकरण के प्रतीक चाहिए, विपक्ष को इनकी ग़ैर-मौजूदगी अपनी 'सॉफ्ट हिंदुत्व' लाइन बचाने के लिए।
  • 2027 UP चुनाव तक ट्रायल पूरा होने की संभावना कम है — विपक्ष 'मुस्लिम अधिकार' की बात करेगा लेकिन 'मुस्लिम नाम' लेने से बचेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

उमर खालिद और शर्जील इमाम पर क्या आरोप हैं?

दोनों पर फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की कथित साज़िश में शामिल होने का आरोप है। उमर खालिद पर UAPA की धाराओं के तहत दंगों की योजना बनाने का आरोप है, जबकि शर्जील इमाम पर CAA विरोधी भाषण में उकसावे और देशद्रोह के आरोप हैं। दोनों ने आरोपों को खारिज किया है।

UAPA के तहत ज़मानत मिलना इतना मुश्किल क्यों है?

UAPA की धारा 43D(5) के तहत अदालत ज़मानत तभी दे सकती है जब उसे लगे कि आरोप प्राथमिक दृष्टया झूठे हैं — यह बोझ आरोपी पर है, अभियोजन पर नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे बेहद कठोर माना है और NCRB डेटा दिखाता है कि दोषसिद्धि दर 3% से भी कम है, फिर भी ज़मानत दुर्लभ है।

विपक्ष इन दोनों की रिहाई की माँग क्यों नहीं करता?

सियासी विश्लेषकों और CSDS-Lokniti सर्वेक्षणों के अनुसार, हिंदी बेल्ट में 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का लेबल विपक्ष को ग़ैर-मुस्लिम OBC और दलित स्विंग वोटरों में भारी नुकसान पहुँचाता है। इसीलिए कांग्रेस, सपा और TMC जैसी पार्टियाँ इन नामों से रणनीतिक दूरी बनाती हैं।

क्या ट्रायल जल्द पूरा होने की संभावना है?

The Hindu के विश्लेषण के अनुसार UAPA मामलों में औसत ट्रायल अवधि 7 से 10 साल है। दिल्ली दंगा मामले की चार्जशीट हज़ारों पन्नों की है और गवाहों की संख्या बहुत अधिक है, इसलिए 2027-2028 से पहले ट्रायल पूरा होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।

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