**उमर अब्दुल्ला** ने भारत-पाक वार्ता का समर्थन करते हुए कहा कि **RSS** भी संवाद चाहता है, तो कश्मीरी नेताओं की इसी माँग पर आक्रोश क्यों। यह बयान 370 हटने के बाद **नेशनल कॉन्फ्रेंस** की बदली रणनीति, केंद्र से रिश्तों में नरमी और 2029 के चुनावी समीकरणों की ओर इशारा करता है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला (नेशनल कॉन्फ्रेंस)।
- क्या: उन्होंने भारत-पाकिस्तान वार्ता का खुला समर्थन करते हुए कहा कि RSS भी बातचीत के पक्ष में है, लेकिन जब कश्मीरी नेता यही कहते हैं तो आक्रोश होता है — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
- कब: जून 2025 में दिया गया ताज़ा बयान।
- कहाँ: जम्मू-कश्मीर, भारत।
- क्यों: 370 हटने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस को केंद्र के साथ सहयोगात्मक छवि बनानी है और कश्मीर में शांति की माँग को वैधता देनी है — News18 के अनुसार।
- कैसे: उमर ने RSS के पाक-संवाद समर्थक बयानों का हवाला देकर अपनी माँग को भगवा खेमे की ही विचारधारा से जोड़ दिया, जिससे BJP के लिए इसका विरोध करना मुश्किल हो गया।
Key Takeaways
- उमर अब्दुल्ला ने RSS के पाक-संवाद समर्थक बयानों का हवाला देकर भारत-पाक वार्ता की माँग को 'भगवा स्वीकृत' बना दिया — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
- 370 हटने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 'टकराव' से 'सहयोग' की रणनीति अपनाई है — यह बयान उसी दिशा में है।
- BJP के लिए यह एक असुविधाजनक स्थिति है: या तो RSS से सहमत हों या अपने ही पितृ संगठन से असहमति जताएँ।
- अगर आने वाले हफ़्तों में केंद्र सरकार की ओर से कोई नरम संकेत आया तो यह 'बैकडोर डील' की अटकलों को और बल देगा।
- उमर का असली निशाना 2029 के लोकसभा चुनाव हो सकते हैं — वे 'ज़िम्मेदार राष्ट्रवादी' की छवि गढ़ रहे हैं।
एक वक्त था जब कश्मीर घाटी से 'पाकिस्तान से बात करो' की आवाज़ उठती थी तो दिल्ली के सत्ता गलियारों में भौंहें तन जाती थीं, टीवी एंकर चीख़ते थे और ट्विटर पर 'देशद्रोह' ट्रेंड करने लगता था। लेकिन जब वही बात RSS के मंच से आए तो? — चुप्पी। यही वो विडंबना है जिसे जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ठीक उस नस पर उँगली रखकर उजागर किया है जहाँ भारतीय राजनीति का डबल स्टैंडर्ड सबसे ज़्यादा दर्द करता है।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उमर अब्दुल्ला ने भारत-पाकिस्तान वार्ता का खुलकर समर्थन करते हुए कहा कि जब RSS जैसा संगठन ख़ुद पाकिस्तान से बातचीत की ज़रूरत मानता है, तो कश्मीर के नेताओं की इसी माँग पर इतना शोर क्यों? News18 के अनुसार उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि बेहतर भारत-पाक रिश्ते ज़रूरी हैं — और यह कोई कश्मीरी 'अलगाववाद' नहीं बल्कि राष्ट्रीय हित है।
RSS और पाकिस्तान — उतना सीधा नहीं जितना दिखता है
उमर अब्दुल्ला का यह दाँव जितना सरल दिखता है, उतना है नहीं। RSS का पाकिस्तान के प्रति रुख़ हमेशा से बहुस्तरीय रहा है। एक तरफ़ 'अखंड भारत' का सपना जिसमें पाकिस्तान का अलग अस्तित्व ही अस्वीकार्य है, दूसरी तरफ़ व्यावहारिक राजनीति में बातचीत को पूरी तरह ख़ारिज न करना। पिछले कुछ वर्षों में RSS के वरिष्ठ नेताओं ने कई बार संकेत दिए हैं कि संवाद बंद नहीं होना चाहिए — हालाँकि हमेशा 'भारत की शर्तों पर' की शर्त लगाकर।
उमर ने इसी अंतर्विरोध को पकड़ा है। वे जानते हैं कि RSS के इस रुख़ का हवाला देकर वे BJP को एक असुविधाजनक स्थिति में डाल सकते हैं — या तो BJP RSS से सहमत होगी और वार्ता को 'देशद्रोह' बताना बंद करेगी, या फिर अपने ही वैचारिक पितृ संगठन से असहमति जताएगी। दोनों ही स्थितियाँ उमर के लिए फ़ायदेमंद हैं।
370 के बाद का कश्मीर — नेशनल कॉन्फ्रेंस का नया चेहरा
अनुच्छेद 370 हटने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जो रणनीतिक बदलाव किया है, वह ग़ौर करने लायक़ है। एक दौर था जब पार्टी का एजेंडा 'विशेष दर्जे की बहाली' था — आज उमर अब्दुल्ला की भाषा काफ़ी बदल चुकी है। वे अब 'विकास', 'शांति' और 'संवाद' की बात करते हैं, वह भी ऐसी भाषा में जो दिल्ली को चुभे नहीं बल्कि गुदगुदाए।
इसके पीछे ठोस चुनावी गणित है। 2024 के विधानसभा चुनावों में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सत्ता तो हासिल की, लेकिन बिना पूर्ण राज्य का दर्जा और असली शक्तियों के। केंद्र शासित प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी एक सजावटी पद बनकर रह सकती है — जब तक कि दिल्ली से 'सहयोग' न मिले। उमर अब्दुल्ला यह समझते हैं कि भगवा खेमे से सीधे टकराव का रास्ता अब काम नहीं करेगा।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में एक दिलचस्प फुसफुसाहट चल रही है। कश्मीर के राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि उमर अब्दुल्ला का यह 'RSS वाला कार्ड' अचानक नहीं खेला गया — कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार इसके पीछे केंद्र सरकार के साथ पर्दे के पीछे किसी समझौते के संकेत हो सकते हैं। क्या दिल्ली ने उमर को 'नरम' भाषा बोलने की 'ग्रीन सिग्नल' दी है ताकि पाक-वार्ता की ज़मीन तैयार हो सके? या फिर उमर ख़ुद 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले 'ज़िम्मेदार राष्ट्रवादी' की छवि गढ़ रहे हैं जो उनकी पार्टी को बाक़ी भारत में भी स्वीकार्य बनाए?
(यह राजनीतिक हलकों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
दोहरे मापदंड की राजनीति — असली मुद्दा
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में उमर अब्दुल्ला ने सीधे सवाल उठाया — जब RSS के नेता कहते हैं कि पाकिस्तान से बातचीत होनी चाहिए तो कोई सवाल नहीं उठाता, लेकिन जब कश्मीर का कोई नेता यही बात कहता है तो उसे 'पाक-परस्त' करार दे दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड भारतीय राजनीति का एक पुराना ज़ख़्म है — और उमर ने इसे ठीक उस वक्त छेड़ा है जब यह सबसे ज़्यादा चुभेगा।
इस बयान की ताक़त इसकी तार्किक सादगी में है। अगर बातचीत का समर्थन 'देशभक्ति' है जब वह नागपुर से आती है, तो वही बात 'देशद्रोह' कैसे बन जाती है जब श्रीनगर से आती है? यह सवाल BJP के लिए इसलिए ख़तरनाक है क्योंकि इसका कोई सुविधाजनक जवाब नहीं।
बड़ा सवाल — बैकडोर डील या चुनावी शिगूफ़ा?
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि उमर अब्दुल्ला का यह बयान तीन परतों पर काम करता है।
पहली परत: यह कश्मीर के भीतर उन मतदाताओं के लिए है जो शांति और सामान्य ज़िंदगी चाहते हैं और जिन्हें 370 के बाद 'हम भी राष्ट्रवादी हैं' वाला भरोसा चाहिए।
दूसरी परत: यह दिल्ली के लिए एक सिग्नल है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस 'ज़िम्मेदार विपक्ष' नहीं, 'सहयोगी शासक' बनना चाहती है — बशर्ते राज्य का पूरा दर्जा और कुछ असली शक्तियाँ वापस मिलें।
तीसरी परत: यह 2029 के लिए एक ब्रांड बिल्डिंग है — उमर ख़ुद को ऐसे नेता के रूप में पेश कर रहे हैं जो घाटी और दिल्ली दोनों की भाषा बोल सकते हैं।
अगर यह सच में कोई बैकडोर डील है — जैसा कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक अनुमान लगा रहे हैं — तो उसके संकेत आने वाले हफ़्तों में दिखेंगे: केंद्र सरकार की ओर से पाक-वार्ता पर किसी नरम बयान में, या J&K को राज्य का दर्जा वापस देने की कोई ठोस हलचल में। अगर इनमें से कुछ नहीं होता, तो समझिए कि यह एक चतुर राजनीतिक चाल थी — ऐसी चाल जिसमें हारने का कोई रास्ता ही नहीं था।
आगे क्या देखें
अब नज़र रखनी चाहिए कि BJP और RSS इस बयान पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। अगर चुप्पी रही — जो कि सबसे सम्भावित परिणाम है — तो यह ख़ुद में एक जवाब होगा। अगर तीखा हमला हुआ, तो उमर के पास पहले से ही RSS के अपने बयानों का हथियार तैयार है। और अगर — सबसे दिलचस्प संभावना — केंद्र ने कोई नरम संकेत दिया, तो 2025 का यह जून भारत-पाक रिश्तों में एक नए अध्याय की शुरुआत के तौर पर याद किया जा सकता है।
एक बात तय है: उमर अब्दुल्ला ने वह सवाल पूछा है जो कोई और पूछने से डरता था — और इस सवाल का जवाब अब दिल्ली को देना है, कश्मीर को नहीं।
आँकड़ों में
- उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जब RSS पाक-वार्ता का समर्थन करता है तो कोई सवाल नहीं, लेकिन कश्मीरी नेताओं पर आक्रोश — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
- News18 के अनुसार उमर ने कहा कि बेहतर भारत-पाक रिश्ते दोनों देशों के लिए ज़रूरी हैं।
मुख्य बातें
- उमर अब्दुल्ला ने RSS के पाक-संवाद समर्थक बयानों का हवाला देकर भारत-पाक वार्ता की माँग को 'भगवा स्वीकृत' बना दिया — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
- 370 हटने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 'टकराव' से 'सहयोग' की रणनीति अपनाई है — यह बयान उसी दिशा में है।
- BJP के लिए यह एक असुविधाजनक स्थिति है: या तो RSS से सहमत हों या अपने ही पितृ संगठन से असहमति जताएँ।
- अगर आने वाले हफ़्तों में केंद्र सरकार की ओर से कोई नरम संकेत आया तो यह 'बैकडोर डील' की अटकलों को और बल देगा।
- उमर का असली निशाना 2029 के लोकसभा चुनाव हो सकते हैं — वे 'ज़िम्मेदार राष्ट्रवादी' की छवि गढ़ रहे हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
उमर अब्दुल्ला ने RSS का नाम लेकर पाकिस्तान से बातचीत की बात क्यों कही?
उमर ने RSS के पाक-संवाद समर्थक रुख़ का हवाला देकर यह दिखाने की कोशिश की कि बातचीत की माँग कोई 'कश्मीरी अलगाववाद' नहीं बल्कि भगवा खेमे की भी सोच है — जिससे BJP के लिए विरोध करना मुश्किल हो गया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार उन्होंने दोहरे मापदंड पर सवाल उठाया।
क्या RSS सचमुच पाकिस्तान से बातचीत का समर्थन करता है?
RSS का रुख़ बहुस्तरीय रहा है। एक तरफ़ 'अखंड भारत' का सैद्धांतिक दृष्टिकोण है, दूसरी तरफ़ व्यावहारिक राजनीति में वरिष्ठ नेताओं ने कई बार संवाद की ज़रूरत स्वीकार की है — हालाँकि 'भारत की शर्तों पर' की शर्त हमेशा रही है।
क्या कश्मीर में कोई बैकडोर डील चल रही है?
राजनीतिक हलकों में ऐसी अटकलें हैं, लेकिन अभी तक कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है। अगर आने वाले हफ़्तों में केंद्र से पाक-वार्ता पर नरम बयान या J&K को राज्य का दर्जा वापस देने की हलचल दिखे, तो ये अटकलें और मज़बूत होंगी।
370 हटने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस की रणनीति कैसे बदली है?
370 हटने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सीधे टकराव के बजाय 'सहयोगी शासक' की रणनीति अपनाई है। उमर अब्दुल्ला अब 'विकास', 'शांति' और 'संवाद' की भाषा बोल रहे हैं जो दिल्ली को चुभे नहीं बल्कि सहयोग का दरवाज़ा खुला रखे।


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