बंगाल कैबिनेट ने अपना यूसीसी ड्राफ्ट तैयार करने के लिए विशेषज्ञ पैनल को मंज़ूरी दे दी है। अगले महीने विधानसभा में बिल पेश होने की संभावना है। यह कदम केंद्र के यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड को संवैधानिक समवर्ती सूची के रास्ते चुनौती देने की ममता बनर्जी की सबसे ठोस रणनीतिक चाल है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: पश्चिम बंगाल कैबिनेट और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
- क्या: राज्य स्तरीय यूसीसी ड्राफ्ट की जांच के लिए विशेषज्ञ पैनल को मंज़ूरी दी गई; अगले महीने विधानसभा में बिल पेश होने की संभावना
- कब: जून 2026 में कैबिनेट की मंज़ूरी; बिल अगले महीने यानी जुलाई 2026 में अपेक्षित
- कहाँ: पश्चिम बंगाल विधानसभा, कोलकाता
- क्यों: केंद्र सरकार के यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (UCC) को राज्य स्तर पर संवैधानिक और राजनीतिक चुनौती देने के लिए
- कैसे: संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) में व्यक्तिगत कानून शामिल हैं — राज्य अपना बिल पहले पास कर केंद्रीय कानून लागू होने पर राष्ट्रपति की मंज़ूरी और अनुच्छेद 254 की बहस खड़ी कर सकता है
पर्सनल लॉ, शादी, तलाक, विरासत — ये शब्द संविधान की समवर्ती सूची में इतने चुपचाप बैठे हैं कि अक्सर दिल्ली को भूल ही जाता है कि इन पर सिर्फ़ संसद का एकाधिकार नहीं है। ममता बनर्जी को यह नहीं भूला। और अब उन्होंने ठीक उसी शांत गली से अपनी सबसे तीखी चाल चली है।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल कैबिनेट ने राज्य स्तरीय यूसीसी ड्राफ्ट की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ पैनल को मंज़ूरी दे दी है। बिल अगले महीने — यानी जुलाई 2026 में — विधानसभा में पेश होने की संभावना है। ऊपरी तौर पर यह एक नियमित विधायी प्रक्रिया लगती है। लेकिन इसकी असली ताक़त उस संवैधानिक ज़मीन में छिपी है जिस पर यह बिल खड़ा होगा।
समवर्ती सूची का वह दरवाज़ा जो दिल्ली बंद नहीं कर सकती
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ हैं — संघ सूची, राज्य सूची, और समवर्ती सूची। पर्सनल लॉ — जिसमें शादी, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार शामिल हैं — समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 में आते हैं। इसका मतलब साफ़ है: इन विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
यहीं खेल पलटता है। अनुच्छेद 254(1) कहता है कि अगर किसी समवर्ती विषय पर राज्य का कानून केंद्रीय कानून से टकराता है, तो केंद्रीय कानून प्रभावी रहेगा। लेकिन अनुच्छेद 254(2) में एक बारीक रास्ता है — अगर राज्य का कानून राष्ट्रपति की मंज़ूरी ले ले, तो वह उस राज्य में केंद्रीय कानून पर हावी हो सकता है। यानी बंगाल का बिल अगर विधानसभा से पास होकर राष्ट्रपति के पास पहुँचता है और मंज़ूरी मिल जाती है, तो सैद्धांतिक रूप से केंद्र का UCC बंगाल में लागू नहीं होगा।
अब ज़ाहिर है कि NDA सरकार में राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलना लगभग असंभव है। लेकिन ममता बनर्जी की असली रणनीति मंज़ूरी लेना नहीं — मंज़ूरी का सवाल खड़ा करना है। बिल पास होते ही यह बहस संसद की गलियों से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचेगी: क्या केंद्र समवर्ती सूची के विषय पर राज्यों की सहमति के बिना एकतरफ़ा कानून थोप सकता है?
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में चर्चा यह है कि ममता बनर्जी का यह कदम सिर्फ़ बंगाल की राजनीति तक सीमित नहीं है। विपक्षी INDIA गठबंधन के कई राज्यों — केरल, तमिलनाडु, झारखंड — में UCC को लेकर गहरी आशंकाएँ हैं। अगर बंगाल पहल करता है और अपना 'वैकल्पिक' बिल पास कर देता है, तो यह दूसरे विपक्ष-शासित राज्यों को भी वही रास्ता अपनाने का नक्शा दे देगा।
ट्रेड हलकों में यह भी फुसफुसाहट है कि TMC ने इस बिल की तैयारी कई महीने पहले शुरू कर दी थी — थिंक टैंक्स और संवैधानिक विशेषज्ञों से विमर्श चल रहा था। दरअसल, 2024 में उत्तराखंड ने अपना UCC लागू किया था और तब से ममता सरकार के कानूनी सलाहकार यह तलाश रहे थे कि राज्य अपनी ज़मीन पर क्या कर सकता है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
254 की बिसात पर दो खिलाड़ी — लेकिन रेफ़री कौन?
ThePrint की रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल कैबिनेट ने जिस विशेषज्ञ पैनल को मंज़ूरी दी है, उसका काम सिर्फ़ ड्राफ्ट लिखना नहीं — बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि बिल की भाषा संवैधानिक चुनौती झेल सके। यानी ममता सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं कर रहीं — वे कानूनी लड़ाई की तैयारी कर रही हैं।
संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, अगर बंगाल अपना बिल केंद्र के UCC से पहले या उसके तुरंत बाद पास करता है, तो कम से कम तीन कानूनी सवाल खड़े होंगे:
पहला: क्या केंद्र का UCC अनुच्छेद 44 (नीति निदेशक तत्व) के तहत बनाया गया है या अनुच्छेद 246 (समवर्ती सूची) के तहत? इसका जवाब तय करेगा कि राज्य को कितनी जगह मिलती है।
दूसरा: राष्ट्रपति अगर राज्य बिल पर मंज़ूरी नहीं देते, तो क्या यह राज्य के विधायी अधिकार का उल्लंघन होगा? केरल में भूमि सुधार विधेयकों पर ऐसे विवाद पहले भी हो चुके हैं।
तीसरा: सबसे बड़ा सवाल — अगर बंगाल का बिल 'समान' (uniform) होने का दावा करता है लेकिन कुछ पर्सनल लॉ प्रावधानों को बचाकर रखता है, तो क्या यह केंद्र के 'वन नेशन वन लॉ' के नैरेटिव को ही बेमतलब बना देगा?
ममता का दोहरा दांव: कानून भी, राजनीति भी
इस पूरे कदम को सिर्फ़ कानूनी चश्मे से देखना अधूरा होगा। 2026 में बंगाल विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं और अल्पसंख्यक वोट बैंक — जो बंगाल की करीब 27-30% आबादी है — UCC को लेकर गहरी चिंता में है। ममता बनर्जी का यह बिल दो काम एक साथ करता है: एक, अल्पसंख्यक समुदाय को यह संदेश कि 'हम आपके पर्सनल लॉ की रक्षा करेंगे'; दो, भारतीय संघवाद (federalism) की बहस में ख़ुद को चैंपियन के रूप में स्थापित करना।
BJP के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार है। अगर वह बंगाल के बिल को सीधे खारिज करती है, तो 'राज्यों के अधिकार' का मुद्दा और तीखा होगा — और यह मुद्दा सिर्फ़ TMC का नहीं, DMK, LDF और JMM का भी है। अगर वह चुप रहती है, तो उसके 'वन नेशन वन लॉ' का नैरेटिव कमज़ोर पड़ता है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि ममता बनर्जी की असली जीत बिल पास होने में नहीं — बल्कि उस संवैधानिक बहस को ज़िंदा करने में है जिसे मोदी सरकार ख़त्म मानकर चल रही थी। अगर बंगाल का बिल विधानसभा से पास होता है, तो अगले 6-12 महीनों में देखिए — केरल और तमिलनाडु भी अपने-अपने 'वैकल्पिक' बिल लाने पर गंभीरता से विचार करेंगे। यह एक बिल नहीं, एक टेम्पलेट बन जाएगा।
आगे का रास्ता: सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा रेफ़री कौन
अंततः यह लड़ाई न विधानसभा में ख़त्म होगी, न संसद में। अगर दोनों बिल पास होते हैं — केंद्र का UCC और बंगाल का काउंटर-बिल — तो टकराव अनुच्छेद 254 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुँचेगा। और तब अदालत को वह सवाल जवाब देना होगा जो 1950 से लंबित है: संविधान का अनुच्छेद 44 (जो UCC की सिफ़ारिश करता है) क्या राज्यों के विधायी अधिकारों को कुचल सकता है?
यह सवाल सिर्फ़ ममता बनर्जी का नहीं — यह भारतीय संघवाद का सबसे बड़ा अनसुलझा सवाल है। और बंगाल कैबिनेट की वह एक मंज़ूरी इसे अनसुलझा रहने नहीं देगी।
आँकड़ों में
- बंगाल में अल्पसंख्यक आबादी लगभग 27-30% — UCC विरोध का सबसे बड़ा राजनीतिक आधार
- समवर्ती सूची प्रविष्टि 5 में पर्सनल लॉ शामिल — केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं
- अनुच्छेद 254(2): राज्य का कानून राष्ट्रपति की मंज़ूरी से केंद्रीय कानून पर प्रभावी हो सकता है
मुख्य बातें
- बंगाल कैबिनेट ने राज्य स्तरीय UCC ड्राफ्ट की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ पैनल को मंज़ूरी दी; बिल जुलाई 2026 में विधानसभा में आने की संभावना
- पर्सनल लॉ संविधान की समवर्ती सूची में आता है — अनुच्छेद 254(2) राज्य को राष्ट्रपति की मंज़ूरी से केंद्रीय कानून पर हावी होने का रास्ता देता है
- ममता का असली दांव बिल पास कराना नहीं, बल्कि संवैधानिक बहस खड़ी करना है — जिससे 'वन नेशन वन लॉ' नैरेटिव कमज़ोर हो
- अगर बंगाल सफल होता है तो केरल, तमिलनाडु, झारखंड जैसे विपक्ष-शासित राज्यों के लिए यह 'काउंटर-UCC' टेम्पलेट बन सकता है
- अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट में होगा — अनुच्छेद 44 बनाम राज्यों के विधायी अधिकार का टकराव 1950 से अनसुलझा है
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बंगाल अपना UCC बिल पास करे तो क्या केंद्र का UCC वहाँ लागू नहीं होगा?
सीधे तौर पर नहीं रुकेगा। लेकिन अनुच्छेद 254(2) के तहत अगर बंगाल का बिल राष्ट्रपति की मंज़ूरी पा लेता है, तो वह राज्य में केंद्रीय कानून पर प्रभावी हो सकता है। हालाँकि NDA सरकार में राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलने की संभावना बेहद कम है — असली लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में होगी।
समवर्ती सूची में पर्सनल लॉ कैसे आता है?
संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची (Concurrent List) की प्रविष्टि 5 में शादी, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे पर्सनल लॉ विषय शामिल हैं। इसका मतलब है कि इन विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बनाने के अधिकारी हैं।
क्या दूसरे विपक्षी राज्य भी बंगाल जैसा बिल ला सकते हैं?
हाँ, संवैधानिक रूप से कोई भी राज्य समवर्ती सूची के विषय पर अपना कानून बना सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर बंगाल सफल होता है तो केरल, तमिलनाडु और झारखंड जैसे विपक्ष-शासित राज्य भी इसी रास्ते पर चल सकते हैं।


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