गुरुवार, 2 जुलाई को इंडिया हेराल्ड लाया है 7 प्रेरणादायक कोट्स — कबीर, प्रेमचंद, एपीजे अब्दुल कलाम, रूमी, विवेकानंद, सरोजिनी नायडू और रवींद्रनाथ टैगोर के। ये वाक्य सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, जीने के लिए हैं।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: कबीर, प्रेमचंद, एपीजे अब्दुल कलाम, रूमी, स्वामी विवेकानंद, सरोजिनी नायडू और रवींद्रनाथ टैगोर — सात विचारक जिन्होंने पीढ़ियों की सोच गढ़ी।
  • क्या: गुरुवार, 2 जुलाई 2025 के लिए 7 चुनिंदा प्रेरणादायक कोट्स जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नया नज़रिया देते हैं।
  • कब: गुरुवार, 2 जुलाई 2025 — हफ़्ते का वह मोड़ जब ऊर्जा चुकने लगती है और प्रेरणा सबसे ज़्यादा ज़रूरी होती है।
  • कहाँ: भारत और दुनिया भर के हिंदी पाठकों के लिए।
  • क्यों: क्योंकि एक सटीक वाक्य वो काम कर जाता है जो घंटों का लेक्चर नहीं कर पाता — सोच की दिशा बदल देता है।
  • कैसे: इंडिया हेराल्ड ने सात अलग-अलग सदियों और परंपराओं के विचारकों के कोट्स चुने, हर एक को आज के संदर्भ से जोड़कर पेश किया।

हफ़्ते का आधा हिस्सा बीत चुका है। सोमवार की ताज़गी ख़त्म, शुक्रवार की राहत अभी दूर। गुरुवार वो दिन है जब इंसान सबसे ज़्यादा थका हुआ महसूस करता है — और ठीक इसीलिए यही वो दिन है जब एक सही वाक्य पूरा दिन पलट सकता है। पॉज़िटिव साइकोलॉजी के शोधकर्ताओं का मानना है कि सकारात्मक भाषा के संपर्क में आने से मस्तिष्क की प्रेरणा-प्रणाली सक्रिय हो सकती है — यानी एक अच्छा कोट सिर्फ़ "अच्छा लगना" नहीं है, यह मनोविज्ञान का विषय है।

आज इंडिया हेराल्ड लाया है सात ऐसे कोट्स जो सात अलग-अलग ज़मानों, सात अलग संस्कृतियों से आते हैं — लेकिन एक ही बात कहते हैं: ज़िंदगी को देखने का ज़ाविया बदलो, ज़िंदगी बदल जाएगी।

  • ध्यान दें: नीचे दिए गए कुछ कोट्स व्यापक रूप से प्रचलित हिंदी अनुवाद हैं; जहाँ संभव हुआ, मूल स्रोत का उल्लेख किया गया है।

1. कबीर — "दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय"

छह सौ साल पुरानी ये दो पंक्तियाँ आज भी उतनी ही तीखी हैं। कबीर ने यह दोहा अपने प्रसिद्ध संग्रह कबीर बीजक या कबीर ग्रंथावली में दर्ज विचार-परंपरा के तहत कहा — बनारस की गलियों में कपड़ा बुनते हुए वो बात कह गए जो हज़ारों किताबें नहीं कह पातीं: इंसान की असली परीक्षा मुश्किल में नहीं, आसानी में होती है।

आज जब हम "ग्रैटिट्यूड जर्नल" और "माइंडफ़ुलनेस ऐप" की बात करते हैं, तो दरअसल कबीर की उसी बात को नए रैपर में पैक कर रहे हैं। कई मनोवैज्ञानिक अध्ययनों — जैसे Emmons & McCullough (2003, Journal of Personality and Social Psychology) — ने पाया है कि नियमित कृतज्ञता-अभ्यास से तनाव में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। कबीर को न्यूरोसाइंस की ज़रूरत नहीं थी — उन्हें तो सच दिखता था।

2. मुंशी प्रेमचंद — "मैं एक मज़दूर हूँ, मेरा काम लिखना है"

प्रेमचंद के नाम से यह कथन व्यापक रूप से प्रचलित है और इसे अक्सर उनकी पत्रिका हंस या उनके पत्र-साहित्य से जोड़ा जाता है, हालाँकि किसी एक निश्चित पत्र या लेख का प्रामाणिक स्रोत विवादित बना हुआ है। लेकिन इसकी भावना पूरी तरह प्रेमचंदीय है — जब साहित्यकार को "बुद्धिजीवी" का ताज पहनाया जाता था, प्रेमचंद ने ताज उतारकर फावड़ा उठा लिया। लमही के इस लेखक ने ग़रीबी में लिखा, कर्ज़ में लिखा, बीमारी में लिखा। यह कोट आज हर उस फ़्रीलांसर, स्टार्टअप फ़ाउंडर और छोटे दुकानदार के लिए है जो अपने काम को "छोटा" समझकर हिचकता है। प्रेमचंद कह रहे हैं — काम में इज़्ज़त है, लेबल में नहीं।

3. एपीजे अब्दुल कलाम — "सपने वो नहीं जो नींद में आएँ, सपने वो हैं जो नींद नहीं आने दें"

भारत के मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम का यह कोट शायद देश का सबसे ज़्यादा शेयर किया जाने वाला वाक्य है — और इसकी वजह है। कलाम रामेश्वरम के एक नाविक परिवार के बेटे थे जो राष्ट्रपति भवन पहुँचे। यह वाक्य उनकी किताबों (Wings of Fire, Ignited Minds) की मूल भावना का सारांश है। आज जब NEET और JEE की तैयारी में लाखों बच्चे रातें जगाते हैं, तो कलाम का यह कोट एक तरह से उनकी लोरी भी है और अलार्म भी — सपना सही है, बस दिशा सही रखो।

4. रूमी — "ज़ख़्म वही जगह है जहाँ से रोशनी अंदर आती है"

तेरहवीं सदी के फ़ारसी कवि, सूफ़ी दार्शनिक और इस्लामी विद्वान जलालुद्दीन मुहम्मद रूमी की यह पंक्ति अंग्रेज़ी में "The wound is the place where the Light enters you" के रूप में प्रचलित है (Coleman Barks के अनुवाद, The Essential Rumi, 1995)। मूल फ़ारसी कविता मसनवी-ए-मानवी से ली गई मानी जाती है।

आज यह कोट मेंटल हेल्थ की बातचीत में सबसे ज़्यादा उद्धृत होता है। भारत के National Mental Health Survey (NIMHANS, 2015-16) के अनुसार देश की लगभग 10.6% वयस्क आबादी सामान्य मानसिक विकारों से प्रभावित है, और विशेषज्ञ मानते हैं कि कोविड-19 के बाद यह आँकड़ा और बढ़ा हो सकता है। रूमी का यह कोट कहता है कि टूटना कमज़ोरी नहीं — दरअसल टूटने की दरार से ही नई समझ का उजाला भीतर आता है।

5. स्वामी विवेकानंद — "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए"

1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने जब "Sisters and Brothers of America" कहा था, तो पूरा हॉल खड़ा हो गया था। लेकिन उनका यह कोट — जो मूलतः कठोपनिषद (1.3.14) के "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" का हिंदी अनुवाद है और जिसे विवेकानंद ने अपने व्याख्यानों (Complete Works of Swami Vivekananda) में बार-बार उद्धृत किया — उससे भी ज़्यादा ताक़तवर है क्योंकि यह सीधे आपसे बात करता है। आज के "hustle culture" से दशकों पहले विवेकानंद ने वही बात कही — बस ज़्यादा गहराई और ज़्यादा ज़िम्मेदारी के साथ।

6. सरोजिनी नायडू — "हम भारत की नारियाँ हैं, फूल नहीं चिनगारियाँ हैं"

सरोजिनी नायडू — भारत कोकिला — सिर्फ़ कवयित्री नहीं थीं, वो आज़ादी की लड़ाई की सबसे मुखर आवाज़ों में से एक थीं। ऊपर दी गई पंक्ति उनके नाम से लोकप्रिय है, हालाँकि यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि नायडू ने मुख्यतः अंग्रेज़ी में लिखा (The Golden Threshold, 1905; The Broken Wing, 1917); हिंदी रूपांतर बाद में प्रचलित हुए। उनके भाषणों और कविताओं की मूल भावना यही थी — भारतीय महिलाएँ अपनी ताक़त ख़ुद हैं।

यह संदेश आज भी उतना ही ज़रूरी है। NCRB की "Crime in India 2022" रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के कुल 4,45,256 मामले दर्ज हुए — ऐसे में नायडू की भावना सिर्फ़ नारा नहीं, एक ज़रूरत है।

7. रवींद्रनाथ टैगोर — "अगर तुम रोओगे कि सूरज डूब गया तो आँसू तुम्हें तारे भी नहीं देखने देंगे"

नोबेल पुरस्कार विजेता (1913) रवींद्रनाथ टैगोर का यह कोट उनकी काव्य-संग्रह Stray Birds (1916) की कविता 74 से लिया गया है — मूल अंग्रेज़ी में: "If you shed tears when you miss the sun, you also miss the stars." इसमें कोई उपदेश नहीं, कोई ज़बरदस्ती की सकारात्मकता नहीं — बस एक सरल सच: जो गया उसका शोक छोड़ो, वरना जो आ रहा है वो भी दिखना बंद हो जाएगा।

हफ़्ते के इस गुरुवार को अगर कोई एक बात याद रखनी हो, तो यही रखिए — टैगोर का यह वाक्य किसी भी उम्र, किसी भी शहर, किसी भी परिस्थिति में काम करता है। शायद इसीलिए सौ साल बाद भी इसे दुनिया भर में उद्धृत किया जाता है।

एक साझा धागा

इंडिया हेराल्ड का मानना है कि ये सात कोट्स सिर्फ़ सोशल मीडिया पर शेयर करने के लिए नहीं हैं — ये सात अलग-अलग सदियों के सात अलग दिमाग़ों का निचोड़ हैं, और इनमें एक साझा धागा है: ज़िंदगी को बदलने के लिए बड़ी क्रांति नहीं, बड़ी सोच चाहिए। और बड़ी सोच कभी-कभी एक छोटे से वाक्य से शुरू होती है।

तो अगली बार जब गुरुवार की दोपहर में थकान बोलने लगे, तो इनमें से कोई एक वाक्य ज़ुबान पर रख लीजिए — हो सकता है वो वाक्य आपका बाक़ी हफ़्ता बदल दे। क्योंकि असली सवाल यह नहीं कि ये कोट्स कितने पुराने हैं — असली सवाल यह है कि क्या आप इन्हें आज जी सकते हैं?

स्रोत नोट: कबीर ग्रंथावली / कबीर बीजक; प्रेमचंद पत्र-साहित्य (प्रचलित उद्धरण, एकल प्रामाणिक स्रोत अनिश्चित); APJ Abdul Kalam — Wings of Fire (1999), Ignited Minds (2002); Rumi — Masnavi-ye-Ma'navi, अंग्रेज़ी अनुवाद Coleman Barks, The Essential Rumi (1995); स्वामी विवेकानंद — Complete Works of Swami Vivekananda, कठोपनिषद 1.3.14; सरोजिनी नायडू — The Golden Threshold (1905), The Broken Wing (1917); रवींद्रनाथ टैगोर — Stray Birds (1916), कविता 74; Emmons & McCullough (2003), Journal of Personality and Social Psychology; National Mental Health Survey, NIMHANS 2015-16; NCRB — Crime in India 2022 Report।

आँकड़ों में

  • Emmons & McCullough (2003, Journal of Personality and Social Psychology) के अनुसार नियमित कृतज्ञता-अभ्यास तनाव और नकारात्मक भावनाओं में सांख्यिकीय रूप से उल्लेखनीय कमी ला सकता है।
  • NIMHANS National Mental Health Survey 2015-16 के अनुसार भारत की लगभग 10.6% वयस्क आबादी सामान्य मानसिक विकारों से प्रभावित है।
  • NCRB Crime in India 2022 रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के कुल 4,45,256 मामले दर्ज हुए।
  • विवेकानंद का 1893 का शिकागो भाषण 130+ साल बाद भी दुनिया की सबसे प्रभावशाली धार्मिक प्रस्तुतियों में गिना जाता है।

मुख्य बातें

  • कबीर का 600 साल पुराना दोहा आज के ग्रैटिट्यूड-रिसर्च से मेल खाता है — Emmons & McCullough (2003) के अनुसार नियमित कृतज्ञता-अभ्यास तनाव में उल्लेखनीय कमी ला सकता है।
  • प्रेमचंद से कलाम तक — हर कोट के पीछे एक ऐसी ज़िंदगी है जिसने उस वाक्य को जिया, सिर्फ़ कहा नहीं।
  • NIMHANS के National Mental Health Survey (2015-16) के अनुसार भारत की ~10.6% वयस्क आबादी सामान्य मानसिक विकारों से प्रभावित है — रूमी का कोट बताता है कि टूटना शुरुआत भी हो सकती है।
  • टैगोर का सूरज-तारे वाला कोट (Stray Birds, 1916) किसी भी उम्र, शहर या परिस्थिति में काम करता है — यही उसकी ताक़त है।
  • विवेकानंद का प्रसिद्ध कोट मूलतः कठोपनिषद (1.3.14) से आता है — यानी यह परंपरा हज़ारों साल पुरानी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गुरुवार के लिए सबसे अच्छा मोटिवेशनल कोट कौन सा है?

एपीजे अब्दुल कलाम का "सपने वो नहीं जो नींद में आएँ, सपने वो हैं जो नींद नहीं आने दें" गुरुवार के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि हफ़्ते के बीच में यह ऊर्जा और दिशा दोनों देता है।

कबीर का सबसे प्रसिद्ध दोहा कौन सा है?

कबीर का "दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय" सबसे प्रसिद्ध दोहों में है (कबीर ग्रंथावली / बीजक)। यह बताता है कि असली परीक्षा सुख में होती है — जो आधुनिक ग्रैटिट्यूड रिसर्च (Emmons & McCullough, 2003) से भी मेल खाता है।

रूमी का ज़ख़्म वाला कोट किस संदर्भ में कहा गया था?

13वीं सदी के फ़ारसी कवि और सूफ़ी दार्शनिक रूमी ने यह बात आध्यात्मिक जागृति के संदर्भ में मसनवी-ए-मानवी में कही — कि दुख और टूटना नई समझ का रास्ता खोलते हैं। अंग्रेज़ी में Coleman Barks के अनुवाद (The Essential Rumi, 1995) से यह कोट वैश्विक स्तर पर प्रचलित हुआ।

प्रेरणादायक कोट्स पढ़ने से क्या सच में फ़ायदा होता है?

पॉज़िटिव साइकोलॉजी के कई अध्ययनों — जैसे Emmons & McCullough (2003) — से संकेत मिलता है कि सकारात्मक भाषा और कृतज्ञता-अभ्यास तनाव कम करने और मनोदशा सुधारने में सहायक हो सकते हैं, हालाँकि व्यक्तिगत प्रभाव भिन्न हो सकता है।

टैगोर का सूरज-तारे वाला कोट कहाँ से है?

रवींद्रनाथ टैगोर का "If you shed tears when you miss the sun, you also miss the stars" उनकी 1916 की काव्य-पुस्तक Stray Birds की कविता 74 से है। हिंदी अनुवाद व्यापक रूप से प्रचलित है।

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