29 जून 2025 को आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहते हैं। इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा लेते हैं और चार महीने का चातुर्मास शुरू होता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। पद्म पुराण के अनुसार यह व्रत सभी पापों का नाश करता है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भगवान विष्णु, उनके भक्त, वैष्णव-शैव-स्मार्त परंपरा के अनुयायी और चातुर्मास पालन करने वाले साधु-संन्यासी
  • क्या: आषाढ़ी देवशयनी एकादशी का व्रत — भगवान विष्णु की योगनिद्रा का आरंभ और चातुर्मास की शुरुआत
  • कब: 29 जून 2025, आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि (पंचांग अनुसार 28 जून सायं से 29 जून दोपहर तक)
  • कहाँ: सम्पूर्ण भारत — विशेषकर पंढरपुर (महाराष्ट्र) में विठ्ठल मंदिर की आषाढ़ी वारी यात्रा, बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी और द्वारका
  • क्यों: पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार इस दिन व्रत रखने से समस्त पापों का नाश होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है, और चातुर्मास में आत्मसंयम से आध्यात्मिक उन्नति होती है
  • कैसे: निर्जला या फलाहारी व्रत, विष्णु सहस्रनाम पाठ, तुलसी पूजा, क्षीरसागर में शयन करते विष्णु की प्रतिमा का अभिषेक, और दान-पुण्य

एक अजीब बात सोचिए — साल के सबसे उमस भरे महीने में, जब बारिश की पहली बौछार धरती को भिगो रही होती है, भगवान विष्णु सो जाते हैं। चार महीने के लिए। आँखें बंद। क्षीरसागर की लहरों पर शेषनाग की शय्या, लक्ष्मी उनके चरण दबा रही हैं, और सृष्टि का पालनहार गहरी योगनिद्रा में है। 29 जून 2025 — आषाढ़ शुक्ल एकादशी — वो तारीख़ है जब यह नींद शुरू होती है।

लेकिन यह सवाल पूछने वाला कोई नहीं मिलता: आख़िर वो भगवान जो सृष्टि चलाते हैं, वो सोते क्यों हैं? और उनकी नींद का हमारी ज़िंदगी से क्या लेना-देना?

देवशयनी एकादशी — नाम के पीछे की कहानी

पद्म पुराण में यह कथा विस्तार से आती है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा लेने चले जाते हैं। यह नींद कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक चलती है — पूरे चार महीने, जिन्हें चातुर्मास कहते हैं। इन चार महीनों में — आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन — विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य परंपरागत रूप से वर्जित माने जाते हैं। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार इस व्रत का पालन करने वाले को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।

महाराष्ट्र में इस दिन का अर्थ और भी गहरा है। पंढरपुर के विठ्ठल मंदिर की 'आषाढ़ी वारी' — जहाँ लाखों वारकरी भक्त संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की पालकी लेकर पैदल यात्रा करते हैं — भारत की सबसे बड़ी पैदल तीर्थयात्राओं में से एक है। हर साल अनुमानित 8 से 10 लाख वारकरी इस यात्रा में शामिल होते हैं।

व्रत विधि — कैसे रखें देवशयनी एकादशी का व्रत

धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार व्रत विधि इस प्रकार है:

दशमी तिथि (28 जून) की रात से ही सात्विक भोजन शुरू करें — प्याज़, लहसुन, अनाज का त्याग। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त (सुबह लगभग 4:15 बजे) में उठकर स्नान करें। पीले वस्त्र धारण करें — पीला रंग विष्णु का प्रिय है। तुलसी की माला से 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें। भगवान विष्णु की शयन मुद्रा वाली मूर्ति या चित्र के सामने दीप जलाएँ, अभिषेक करें, पंचामृत से स्नान कराएँ। विष्णु सहस्रनाम या भागवत पुराण का पाठ करें। निर्जला व्रत सर्वोत्तम माना जाता है, लेकिन फलाहार भी स्वीकार्य है — साबूदाना, मखाना, शकरकंद, दूध, फल। द्वादशी (30 जून) को पारणा (व्रत तोड़ना) सुबह हरि-स्मरण के बाद करें।

चातुर्मास — सिर्फ़ चार महीने की पाबंदी नहीं, एक पूरा जीवन-दर्शन

यहाँ वो बात आती है जो सबसे ज़्यादा छूट जाती है, और जिसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है।

हम चातुर्मास को 'पाबंदियों के चार महीने' की तरह देखते हैं — शादी मत करो, नया काम मत शुरू करो, यात्रा मत करो। लेकिन अगर आप पुराणों और उपनिषदों को ध्यान से पढ़ें, तो चातुर्मास का मूल विचार बिलकुल अलग है। यह 'रुकने' का नहीं, 'भीतर मुड़ने' का समय है।

सोचिए — बरसात में प्रकृति ख़ुद ठहर जाती है। नदियाँ उफनती हैं, रास्ते कट जाते हैं, यात्रा कठिन होती है। प्राचीन भारत में साधु-संन्यासी इन्हीं चार महीनों में एक जगह रुककर तपस्या करते थे — इसीलिए इसे 'चातुर्मास व्रत' कहा गया। शंकराचार्य मठों में आज भी यह परंपरा जीवित है — चारों पीठों के शंकराचार्य चातुर्मास में एक स्थान पर विराजमान रहते हैं। जगन्नाथ पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा इसी काल से ठीक पहले होती है — मानो भगवान अंतिम बार बाहर आकर दर्शन देते हैं, फिर अंतर्मुखी हो जाते हैं।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो यह बुद्धिमत्ता है। लगातार बाहर दौड़ते रहने के बाद चार महीने ठहरकर आत्ममंथन — यह आज की 'डिजिटल डिटॉक्स' या 'मिनिमलिज़्म' मूवमेंट से कितना मिलता-जुलता है? फ़र्क़ बस इतना है कि भारत ने यह हज़ारों साल पहले सोच लिया था।

2025 में आषाढ़ी एकादशी क्यों ज़्यादा प्रासंगिक है

पिछले कुछ वर्षों में एकादशी व्रत की लोकप्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। गूगल ट्रेंड्स के अनुसार 'एकादशी व्रत विधि' और 'चातुर्मास नियम' जैसे सर्च टर्म्स में हर साल जून-जुलाई में 150-200% की बढ़ोतरी दर्ज होती है। सोशल मीडिया पर #DevshayaniEkadashi और #चातुर्मास जैसे हैशटैग ट्रेंड करते हैं। यह दिखाता है कि युवा पीढ़ी भी इन परंपराओं की ओर लौट रही है — लेकिन वो 'क्यों' जानना चाहती है, सिर्फ़ 'कैसे' नहीं।

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ISKCON के मंदिरों में देवशयनी एकादशी पर विशेष अभिषेक और कीर्तन का आयोजन होता है। वाराणसी, मथुरा, वृंदावन, अयोध्या और द्वारका जैसे तीर्थस्थलों पर इस दिन विशेष भीड़ रहती है। हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा स्नान का विशेष महत्व माना जाता है।

विष्णु की नींद का असली रहस्य — वो जवाब जो आपको कहीं नहीं मिलेगा

अब उस सवाल पर लौटते हैं जो शुरू में उठाया था — विष्णु सोते क्यों हैं?

वैष्णव दर्शन में इसका एक बेहद सुंदर उत्तर है। योगनिद्रा 'सोना' नहीं है — यह चेतना की सबसे गहरी अवस्था है, जहाँ बाहरी इंद्रियाँ शांत हो जाती हैं लेकिन भीतर का बोध पूरी तरह जागृत रहता है। देवी भागवत में योगनिद्रा को एक शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है — वह शक्ति जो सृष्टि के संचालन को 'ऑटो-मोड' पर रखती है ताकि पालनहार ख़ुद अपने भीतर मुड़ सके।

यह संदेश हम सबके लिए है: जो सृष्टि चलाता है, वो भी रुकता है, भीतर देखता है — तो हम कौन हैं जो बिना रुके, बिना सोचे, बस दौड़ते रहें?

क्या करें, क्या न करें — चातुर्मास की सरल गाइड

परंपरागत मान्यताओं और धर्मशास्त्रों के अनुसार चातुर्मास में इन बातों का ध्यान रखें: प्रत्येक एकादशी का व्रत रखें (चातुर्मास में 8 एकादशियाँ आती हैं)। सात्विक भोजन अपनाएँ — तामसिक आहार जैसे माँस-मदिरा का त्याग करें। प्रतिदिन कम से कम 15 मिनट ध्यान या जप करें। किसी एक बुरी आदत को इन चार महीनों में छोड़ने का संकल्प लें — शास्त्रों में इसे 'नियम व्रत' कहते हैं। दान करें — विशेषकर अन्नदान और वस्त्रदान।

शुभ कार्यों की बात करें तो विवाह, गृहप्रवेश और नामकरण जैसे संस्कार परंपरागत रूप से टाले जाते हैं, हालाँकि कई आधुनिक विद्वान इसे व्यावहारिकता पर छोड़ते हैं।

अंतिम बात — जो बात आज रात सोने से पहले याद रखिए

29 जून की रात जब आप सोने जाएँ, तो एक पल के लिए सोचिए — भगवान विष्णु भी आज से सो रहे हैं, लेकिन उनकी नींद में भी चेतना जागी है। क्या हम अपनी जागी हुई ज़िंदगी में भी उतने सचेत हैं? चातुर्मास का असली संदेश 'रुकना' नहीं है — 'जागकर रुकना' है। बाहर की दौड़ थामकर भीतर की यात्रा शुरू करना है। और शायद, अगले चार महीनों के बाद जब देवउठनी एकादशी आए, तो आप वो इंसान न रहें जो आज हैं — थोड़ा और शांत, थोड़ा और गहरा, थोड़ा और जागा हुआ।

आँकड़ों में

  • आषाढ़ी वारी: अनुमानित 8-10 लाख वारकरी हर साल पंढरपुर की पैदल यात्रा करते हैं
  • चातुर्मास: 4 महीने (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) — इसमें कुल 8 एकादशियाँ आती हैं
  • गूगल ट्रेंड्स: 'एकादशी व्रत विधि' सर्च में जून-जुलाई में 150-200% की वार्षिक बढ़ोतरी

मुख्य बातें

  • 29 जून 2025 को आषाढ़ी देवशयनी एकादशी है — इस दिन से भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा में जाते हैं और चातुर्मास शुरू होता है
  • पद्म पुराण के अनुसार इस व्रत से समस्त पापों का नाश होता है; निर्जला या फलाहारी दोनों तरह का व्रत मान्य है
  • महाराष्ट्र में आषाढ़ी वारी यात्रा में अनुमानित 8-10 लाख वारकरी पैदल पंढरपुर जाते हैं
  • चातुर्मास सिर्फ़ पाबंदी नहीं, बल्कि आत्ममंथन का समय है — यह विचार आधुनिक 'डिजिटल डिटॉक्स' से हज़ारों साल पुराना है
  • गूगल ट्रेंड्स के अनुसार 'एकादशी व्रत विधि' सर्च में जून-जुलाई में 150-200% की बढ़ोतरी हर साल होती है
  • योगनिद्रा सोना नहीं, बल्कि देवी भागवत के अनुसार चेतना की सबसे गहरी जागृत अवस्था है

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आषाढ़ी एकादशी 2025 में कब है?

29 जून 2025 को। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 28 जून शाम से शुरू होकर 29 जून दोपहर तक रहेगी। व्रत 29 जून को रखा जाएगा और पारणा 30 जून सुबह होगा।

देवशयनी एकादशी पर क्या खा सकते हैं?

निर्जला व्रत सर्वोत्तम माना जाता है। फलाहार करने वाले साबूदाना, मखाना, शकरकंद, आलू, कुट्टू का आटा, दूध, फल और सेंधा नमक ले सकते हैं। अनाज, प्याज़, लहसुन और चावल वर्जित हैं।

चातुर्मास कब से कब तक होता है?

आषाढ़ शुक्ल एकादशी (29 जून 2025) से कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी, अक्टूबर-नवंबर 2025) तक — कुल चार महीने।

चातुर्मास में शादी क्यों नहीं होती?

परंपरागत मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, इसलिए शुभ कार्य टाले जाते हैं। व्यावहारिक कारण यह भी था कि बरसात में यात्रा कठिन होती थी और बारातें नहीं निकल पाती थीं।

देवशयनी एकादशी की पूजा विधि क्या है?

ब्रह्म मुहूर्त में स्नान, पीले वस्त्र, भगवान विष्णु की शयन मुद्रा वाली मूर्ति का पंचामृत अभिषेक, तुलसी पूजा, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र जाप, विष्णु सहस्रनाम पाठ, और सायंकाल आरती।

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