सोनम वांगचुक का अनशन 18वें दिन में है और ब्लड शुगर 66 mg/dL तक गिर चुका है। लद्दाख को सिक्स्थ शेड्यूल देने की माँग पर गृह मंत्रालय चुप है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार वांगचुक ने कहा कि 'प्रधान ज़िम्मेदार होंगे।' बीजेपी का मौन कश्मीर में स्वायत्तता की नई माँग, कॉर्पोरेट-संसाधन लॉबी के दबाव और अपने ही पोस्टर बॉय से असहजता — तीनों का मिला-जुला नतीजा है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: लद्दाखी शिक्षाविद् और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, और MoS धर्मेंद्र प्रधान (जिन्हें वांगचुक ने सीधे ज़िम्मेदार ठहराया)।
  • क्या: वांगचुक का अनिश्चितकालीन अनशन 18वें दिन में; ब्लड शुगर 66 mg/dL तक गिरा — लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और विधानसभा देने की माँग।
  • कब: 2026 में जारी अनशन का 18वाँ दिन, टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार।
  • कहाँ: नई दिल्ली — लद्दाख भवन के समीप वांगचुक का अनशन स्थल।
  • क्यों: 2019 में धारा 370 हटने के बाद लद्दाख को UT बनाया गया पर विधानसभा व सिक्स्थ शेड्यूल नहीं दिया गया; स्थानीय लोग भूमि और संस्कृति की सुरक्षा चाहते हैं।
  • कैसे: वांगचुक ने भूख हड़ताल शुरू की, जनता को जोड़ा, सोशल मीडिया पर अभियान चलाया; सरकार ने अब तक कोई ठोस जवाब नहीं दिया — डॉक्टरों ने ब्लड शुगर 66 बताकर स्थिति गंभीर बताई।

ब्लड शुगर 66 mg/dL। यह वो आँकड़ा है जो किसी डायबिटिक मरीज़ के ICU चार्ट पर चमकता तो अलार्म बज जाता — लेकिन सोनम वांगचुक के शरीर पर यह आँकड़ा टिका है और दिल्ली के सत्ता गलियारों में कोई अलार्म नहीं बज रहा। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अनशन के 18वें दिन वांगचुक ने सीधे चेतावनी दी: 'अगर मुझे कुछ हुआ तो धर्मेंद्र प्रधान ज़िम्मेदार होंगे।' प्रधान वो केंद्रीय मंत्री हैं जिन पर लद्दाख मामले की ज़िम्मेदारी है।

एक शख़्स जिसे बॉलीवुड ने '3 इडियट्स' के फुंगसुक वांगडू के रूप में अमर कर दिया, जिसे धारा 370 हटने पर सरकार ने अपना पोस्टर बॉय बनाया — वही आज भूखे पेट दिल्ली की सड़क पर बैठा है और वही सरकार उसकी ओर देखने को तैयार नहीं। यह विडंबना नहीं, यह एक सोची-समझी चुप्पी है।

क्या माँग है और क्यों अटकी है?

वांगचुक की माँग दो सूत्रीय है — लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (सिक्स्थ शेड्यूल) में शामिल करना और पूर्ण विधानसभा देना। छठी अनुसूची उन आदिवासी इलाक़ों को संवैधानिक स्वायत्तता देती है जहाँ ज़मीन, संस्कृति और स्थानीय शासन की अलग पहचान है। वर्तमान में यह असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम पर लागू है। लद्दाख — जहाँ बौद्ध, मुस्लिम और कुछ हिंदू समुदाय सदियों से रहते हैं — 2019 में जब जम्मू-कश्मिर से अलग UT बना, तब उम्मीद थी कि उसे विधानसभा और ज़मीन की सुरक्षा मिलेगी। पाँच साल बीत गए, कुछ नहीं मिला।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के हवाले से, वांगचुक लगातार कह रहे हैं कि बिना सिक्स्थ शेड्यूल के लद्दाख की ज़मीन बाहरी कॉर्पोरेट्स और बड़ी परियोजनाओं के लिए खुली रहेगी। सवाल सीधा है: क्या केंद्र लद्दाख की ज़मीन को स्थानीय लोगों के लिए सुरक्षित रखना चाहता है, या उसे 'नेशनल इंटरेस्ट' के नाम पर कॉर्पोरेट्स के लिए खुला छोड़ना?

बीजेपी का तिहरा दबाव

गृह मंत्रालय की चुप्पी को समझने के लिए तीन परतें खोलनी होंगी।

पहली परत — कश्मीर का डोमिनो इफ़ेक्ट: अगर लद्दाख को सिक्स्थ शेड्यूल दिया जाता है, तो जम्मू-कश्मीर में भी स्वायत्तता की माँग नए सिरे से ज़ोर पकड़ सकती है। PDP और नेशनल कॉन्फ्रेंस पहले ही 370 की बहाली की माँग करते रहे हैं। बीजेपी का पूरा कश्मीर नैरेटिव 'एक देश, एक क़ानून' पर टिका है — लद्दाख को अलग दर्जा देना उस नैरेटिव में सेंध लगाता है।

दूसरी परत — कॉर्पोरेट और संसाधन लॉबी: लद्दाख में बड़े पैमाने पर सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट, सीमावर्ती सड़क निर्माण और रणनीतिक अवसंरचना परियोजनाएँ प्रस्तावित या चल रही हैं। इसके अलावा, खनिज सर्वेक्षण और संसाधन दोहन की संभावनाओं पर नज़र है — ध्यान रहे कि 2023 में अनुमानित 59 लाख टन लिथियम भंडार जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले में मिले थे, लद्दाख में नहीं, लेकिन लद्दाख की भूमि स्वयं सोलर पार्क, पवन ऊर्जा और अन्य कॉर्पोरेट परियोजनाओं के लिए प्रमुख लक्ष्य बनी हुई है। सिक्स्थ शेड्यूल लागू होते ही स्थानीय स्वायत्त परिषद को ज़मीन हस्तांतरण पर वीटो मिल जाएगा — यह सीधे-सीधे इन परियोजनाओं को धीमा कर सकता है। यह वो बात है जो सियासी गलियारों में फुसफुसाहट में कही जाती है, खुलकर नहीं।

तीसरी परत — वांगचुक का बदला हुआ कद: 2019 में वांगचुक ने 370 हटाने पर मोदी सरकार की तारीफ़ की थी। तब वो सरकार के लिए 'सिविल सोसाइटी की मुहर' थे। लेकिन जैसे-जैसे वादे पूरे नहीं हुए, वांगचुक सरकार के आलोचक बनते गए। अब वो उसी सरकार के गले की हड्डी हैं — क्योंकि उनकी विश्वसनीयता किसी राजनीतिक दल से नहीं, जनता के बीच अपने काम से बनी है। उन्हें 'विपक्षी एजेंट' बताना बीजेपी के लिए भी आसान नहीं।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में चर्चा है कि अमित शाह का मंत्रालय इस मुद्दे को 'टाइम किल' रणनीति से निपटा रहा है — उम्मीद है कि अनशन ख़ुद-ब-ख़ुद टूट जाएगा या मीडिया का ध्यान हट जाएगा। लेकिन वांगचुक ने पहले भी 2024 में दिल्ली मार्च किया था और उस समय भी सरकार ने 'बात करेंगे' कहकर टाला था। अब ब्लड शुगर 66 पर है — यह कोई प्रतीकात्मक अनशन नहीं रहा, यह जीवन-मृत्यु का मामला बन रहा है। (यह राजनीतिक चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

जनता की नब्ज़ यह है कि सोशल मीडिया पर लद्दाख समर्थकों के अलावा हिंदी बेल्ट के एक बड़े वर्ग में भी सहानुभूति बढ़ रही है — '3 इडियट्स' का कनेक्शन वांगचुक को वो पहचान देता है जो किसी नेता के पास नहीं। लोग पूछ रहे हैं: अगर यही शख़्स 370 हटने पर सरकार का साथ दे सकता है, तो सरकार उसकी बात क्यों नहीं सुन सकती?

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड — आगे क्या?

इस सियासी बिसात के पीछे की असली चाल को इंडिया हेराल्ड ने पहले ही भांप लिया है: बीजेपी के लिए यह मामला सिर्फ़ लद्दाख का नहीं, पूरे 'विशेष दर्जा' वाले नैरेटिव का है। अगर वांगचुक की सेहत और बिगड़ी और मामला राष्ट्रीय मेडिकल इमरजेंसी बन गया, तो सरकार पर दबाव अचानक कई गुना बढ़ जाएगा — विपक्ष को तैयार-तैयार मुद्दा मिलेगा, कांग्रेस और AAP पहले से लद्दाख कार्ड खेलने की तैयारी में हैं।

दूसरी तरफ़, अगर सरकार 'हाई-पावर कमेटी' जैसा कोई बीच का रास्ता निकालती है — जो पहले भी निकाला जा चुका है — तो वांगचुक के समर्थक इसे 'टालने की पुरानी चाल' ही मानेंगे। असली सवाल यह है कि क्या बीजेपी लद्दाख विधानसभा चुनाव (जब भी हों) से पहले कोई ठोस क़दम उठाएगी, या फिर लद्दाख को वही हाशिया मिलता रहेगा जो UT बनने के बाद से मिल रहा है।

देखने वाली बात यह होगी कि अगले 48-72 घंटों में गृह मंत्रालय कोई बयान देता है या नहीं। ब्लड शुगर 66 चिकित्सकीय रूप से ख़तरनाक हाइपोग्लाइसीमिया की सीमा पर है। अगर वांगचुक को अस्पताल ले जाना पड़ा तो यह तस्वीर — एक गांधीवादी कार्यकर्ता को ज़बरन उठाकर ले जाती पुलिस — बीजेपी के लिए 2024 के दिल्ली मार्च से भी ज़्यादा महँगी पड़ सकती है।

वांगचुक का दाँव सीधा है: वो जानते हैं कि उनकी ताक़त मोरल अथॉरिटी में है, सीटों में नहीं। और मोरल अथॉरिटी उसी शख़्स के पास सबसे ज़्यादा होती है जो कुछ माँगता नहीं — बस अपने लोगों के लिए खड़ा रहता है। सरकार की दुविधा यही है: अनदेखा करो तो क्रूर दिखो, मानो तो कश्मीर में पेंडोरा बॉक्स खुले। इस दुविधा का कोई आसान जवाब नहीं — और शायद इसीलिए दिल्ली ने चुप्पी को ही अपना जवाब चुना है।

लेकिन चुप्पी भी एक बयान होती है — और जब सामने वाले की ब्लड शुगर 66 हो, तो चुप्पी की क़ीमत ज़िंदगी हो सकती है।

आँकड़ों में

  • सोनम वांगचुक का ब्लड शुगर अनशन के 18वें दिन 66 mg/dL तक गिरा — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
  • 2023 में अनुमानित 59 लाख टन लिथियम भंडार जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले में मिले — लद्दाख में नहीं; लद्दाख में सोलर, पवन ऊर्जा और अवसंरचना परियोजनाएँ अलग से ज़मीन दबाव बना रही हैं।
  • 2019 से लद्दाख UT है — पाँच साल से अधिक बीत चुके, न विधानसभा मिली न सिक्स्थ शेड्यूल।

मुख्य बातें

  • वांगचुक का ब्लड शुगर 66 mg/dL — हाइपोग्लाइसीमिया की ख़तरनाक सीमा; अनशन अब मेडिकल इमरजेंसी की ओर बढ़ रहा है।
  • बीजेपी का मौन तीन दबावों का नतीजा: कश्मीर में स्वायत्तता की नई माँग का डर, लद्दाख में सोलर-इंफ्रा-संसाधन परियोजनाओं पर कॉर्पोरेट हित, और अपने ही पूर्व पोस्टर बॉय से बढ़ती असहजता।
  • 59 लाख टन लिथियम भंडार जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले में मिले हैं, लद्दाख में नहीं — लेकिन लद्दाख स्वयं सोलर पार्क, पवन ऊर्जा और सीमावर्ती अवसंरचना परियोजनाओं का प्रमुख लक्ष्य है; सिक्स्थ शेड्यूल लागू होने पर स्थानीय परिषद को ज़मीन पर वीटो मिलेगा।
  • अगले 48-72 घंटे निर्णायक — अगर ज़बरन अस्पताल ले जाने की नौबत आई, तो यह बीजेपी के लिए 2024 के दिल्ली मार्च से भी बड़ा इमेज संकट बनेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सिक्स्थ शेड्यूल क्या है और लद्दाख को इससे क्या मिलेगा?

संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों को स्वायत्त ज़िला परिषद देती है जिसे ज़मीन, जंगल और संस्कृति पर क़ानून बनाने का अधिकार मिलता है। लद्दाख को यह मिलने पर स्थानीय लोगों को भूमि हस्तांतरण और बाहरी परियोजनाओं पर वीटो मिल सकता है।

वांगचुक की ब्लड शुगर 66 mg/dL का मतलब क्या है?

70 mg/dL से नीचे ब्लड शुगर को हाइपोग्लाइसीमिया माना जाता है — इससे चक्कर, भ्रम, बेहोशी और गंभीर मामलों में ऑर्गन फ़ेल्योर तक हो सकता है। 66 mg/dL चिकित्सकीय रूप से ख़तरनाक स्तर है।

क्या वांगचुक ने पहले भी ऐसा विरोध प्रदर्शन किया है?

हाँ, 2024 में वांगचुक ने हज़ारों लद्दाखी समर्थकों के साथ दिल्ली मार्च किया था। उस समय भी सरकार ने 'बातचीत' का वादा किया लेकिन ठोस क़दम नहीं उठाए, जिसके बाद यह अनशन शुरू हुआ।

क्या 59 लाख टन लिथियम भंडार लद्दाख में मिला है?

नहीं। 2023 में अनुमानित 59 लाख टन लिथियम भंडार जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले में पाया गया, लद्दाख में नहीं। हालाँकि, लद्दाख स्वयं बड़े सोलर पार्क, पवन ऊर्जा और सीमावर्ती अवसंरचना परियोजनाओं के कारण ज़मीन-अधिग्रहण दबाव में है।

बीजेपी को लद्दाख में विधानसभा देने से क्यों डर लगता है?

विश्लेषकों के अनुसार, लद्दाख को विधानसभा और सिक्स्थ शेड्यूल देने से कश्मीर में भी विशेष दर्जे की माँग नए सिरे से उठ सकती है, जो बीजेपी के 'एक देश, एक क़ानून' नैरेटिव को कमज़ोर करेगा।

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