पाकिस्तान के मंत्री मुसद्दिक़ मलिक ने सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान के हिस्से का पानी छूने वालों के 'हाथ काटने' की धमकी दी है, जबकि भारत के पूर्व विदेश सचिव ने इस संधि को 'बेमतलब' क़रार दिया। यह टकराव अब शाब्दिक नहीं रहा — बांध प्रोजेक्ट्स, वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता और पंजाब-राजस्थान के किसानों की ज़िंदगी इससे सीधे जुड़ी है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: पाकिस्तान के संघीय मंत्री मुसद्दिक़ मलिक और भारत के पूर्व विदेश सचिव, दोनों देशों की सरकारें
- क्या: सिंधु जल संधि पर भारत-पाकिस्तान के बीच तीखा शाब्दिक टकराव; पाकिस्तान की 'हाथ काटने' की धमकी, भारत की 'संधि बेमतलब' की स्थिति
- कब: जुलाई 2025 में ताज़ा बयानबाज़ी, संधि 1960 से लागू
- कहाँ: सिंधु नदी बेसिन — कश्मीर से पंजाब-राजस्थान-हरियाणा तक, पाकिस्तान के सिंध-पंजाब प्रांत
- क्यों: भारत के बांध प्रोजेक्ट्स (किशनगंगा, रतले) पर पाकिस्तान की आपत्ति, भारत का संधि को पुराना और एकतरफ़ा मानना, और दोनों देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण रिश्ते
- कैसे: भारत ने संधि की शर्तों पर पुनर्विचार का नोटिस दिया, पाकिस्तान ने वर्ल्ड बैंक में शिकायत दर्ज कराई, दोनों ओर से कूटनीतिक और सार्वजनिक दबाव बनाया जा रहा है
साठ साल पुरानी एक संधि। दो परमाणु ताक़तें। और बीच में बहती एक नदी, जिसका हर बूँद पानी अब बारूद की गंध ले चुका है। पाकिस्तान के संघीय मंत्री मुसद्दिक़ मलिक का ताज़ा बयान — 'जो भी पाकिस्तान के हिस्से का पानी छुएगा, उसके हाथ काट दिए जाएंगे' — सुनने में किसी गली के झगड़े जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे का गणित दो देशों की खेती, बिजली और लाखों ज़िंदगियों से जुड़ा है।
Oneindia की रिपोर्ट के अनुसार, मुसद्दिक़ मलिक ने यह बयान भारत के बांध प्रोजेक्ट्स — ख़ासकर किशनगंगा और रतले — के संदर्भ में दिया। उन्होंने साफ़ कहा कि पाकिस्तान सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) के तहत अपने हक़ के पानी पर कोई समझौता नहीं करेगा। दूसरी तरफ़ भारत के पूर्व विदेश सचिव ने इस 1960 की संधि को 'बेमतलब' क़रार दिया — यह कहते हुए कि बदली हुई भू-राजनीतिक परिस्थितियों में यह संधि भारत के हितों के ख़िलाफ़ काम कर रही है।
अब सवाल यह है: क्या यह सिर्फ़ माइक्रोफ़ोन पर वार है, या सच में पानी का नक़्शा बदलने वाला है?
संधि का गणित: भारत को क्या मिलता है, पाकिस्तान को क्या?
1960 में वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में हुई सिंधु जल संधि दुनिया की सबसे टिकाऊ जल-बँटवारा संधियों में गिनी जाती थी। इसके तहत सिंधु बेसिन की छह नदियों को दो हिस्सों में बाँटा गया — पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत को और पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम, चिनाब) पाकिस्तान को। सुनने में बराबरी लगती है, लेकिन असलियत में पश्चिमी नदियों में लगभग 80% पानी बहता है — यानी भारत ने अपनी ही ज़मीन से निकलने वाले पानी का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान को दे दिया।
यही वह बिंदु है जिस पर भारत के भीतर दशकों से खदबदाहट रही है। 2016 में उरी हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था — 'खून और पानी साथ नहीं बह सकते।' तब से भारत ने पश्चिमी नदियों पर अपने सीमित अधिकारों का ज़्यादा आक्रामक इस्तेमाल शुरू किया — किशनगंगा पनबिजली परियोजना चालू की, रतले बांध का निर्माण तेज़ किया।
पाकिस्तान का डर और वर्ल्ड बैंक की उलझन
पाकिस्तान की चिंता बेबुनियाद नहीं है — उसकी 90% से ज़्यादा खेती सिंधु बेसिन के पानी पर निर्भर है। अगर भारत पश्चिमी नदियों पर बड़े बांध बनाकर पानी का प्रवाह नियंत्रित करता है, तो पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत में कृषि संकट आ सकता है। इसीलिए पाकिस्तान ने वर्ल्ड बैंक में शिकायत दर्ज कराई और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की माँग की।
लेकिन वर्ल्ड बैंक ख़ुद इस उलझन में है। 2022 में उसने एक साथ दो समानांतर प्रक्रियाएँ चलाईं — भारत की माँग पर तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) और पाकिस्तान की माँग पर मध्यस्थता अदालत (Court of Arbitration)। यह अपने आप में अभूतपूर्व था और दिखाता है कि पुरानी व्यवस्था की चूलें हिल चुकी हैं। भारत ने 2023 में संधि की शर्तों में संशोधन के लिए औपचारिक नोटिस भी भेजा — यह पहली बार हुआ कि किसी पक्ष ने संधि की बुनियाद पर ही सवाल उठाया।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि मोदी सरकार सिंधु जल संधि को पूरी तरह तोड़ने का इरादा नहीं रखती — क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क़ानून में इसकी क़ीमत बहुत भारी होगी। असली खेल 'संधि के भीतर रहकर ज़्यादा से ज़्यादा पानी रोकने' का है। किशनगंगा और रतले जैसे प्रोजेक्ट्स इसी रणनीति का हिस्सा हैं — संधि 'रन-ऑफ़-द-रिवर' बांधों की इजाज़त देती है, और भारत इसी खिड़की का अधिकतम इस्तेमाल कर रहा है।
पाकिस्तान की तरफ़ से मुसद्दिक़ मलिक की 'हाथ काटने' वाली भाषा भी सोची-समझी है। इस्लामाबाद में राजनीतिक अस्थिरता के बीच पानी का मुद्दा वह एकमात्र विषय है जिस पर फ़ौज, सरकार और विपक्ष — तीनों एक पन्ने पर हैं। मुसद्दिक़ का बयान घरेलू राजनीति के लिए उतना ही है जितना भारत के लिए।
(यह अनुभाग राजनीतिक विश्लेषण और इंडस्ट्री चर्चाओं पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
पंजाब-राजस्थान-हरियाणा का किसान: वह ज़मीनी कड़ी जो कोई नहीं जोड़ रहा
इस पूरे टकराव में वह आवाज़ सबसे कम सुनाई देती है जिस पर सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा — भारत का अपना किसान। पंजाब, राजस्थान और हरियाणा के किसान सिंधु बेसिन की पूर्वी नदियों — रावी, ब्यास, सतलुज — के पानी पर निर्भर हैं। भाखड़ा-नंगल और इंदिरा गांधी नहर प्रणाली इसी पानी से चलती है।
अगर भारत पश्चिमी नदियों पर ज़्यादा बांध बनाता है, तो इसका सीधा मतलब है कि उत्तरी भारत में सिंचाई के लिए ज़्यादा पानी उपलब्ध हो सकता है — ख़ासकर राजस्थान के सूखे इलाक़ों में, जहाँ पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसते किसान दशकों से इंतज़ार कर रहे हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है — पाकिस्तान अगर जवाबी कार्रवाई करता है, या अंतरराष्ट्रीय अदालत भारत के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाती है, तो चल रहे प्रोजेक्ट्स रुक सकते हैं और किसान वहीं के वहीं रह जाएगा।
विश्लेषकों का अनुमान है कि अकेले रतले और किशनगंगा प्रोजेक्ट्स से लगभग 3,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन की क्षमता जुड़ सकती है — जम्मू-कश्मीर और उत्तरी भारत के लिए यह बड़ा बदलाव होगा। लेकिन जब तक क़ानूनी लड़ाई अधर में है, यह क्षमता काग़ज़ पर ही रहेगी।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड: अगला कदम क्या?
जो कोण बाकी मीडिया से छूट रहा है, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है — यह टकराव संधि तोड़ने का नहीं, संधि की 'दोबारा व्याख्या' का है। भारत का अगला दांव संभवतः यह होगा कि वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता प्रक्रिया को अप्रासंगिक साबित करे और द्विपक्षीय बातचीत पर ज़ोर दे — जहाँ भारत की स्थिति मज़बूत है। पाकिस्तान इसे कभी नहीं मानेगा, क्योंकि द्विपक्षीय मेज़ पर उसका पलड़ा हल्का है।
आने वाले महीनों में तीन चीज़ें देखने लायक़ हैं। पहली — वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता अदालत का अगला आदेश, जो तय करेगा कि किशनगंगा और रतले पर भारत का निर्माण जारी रह सकता है या नहीं। दूसरी — भारत के जल शक्ति मंत्रालय की तरफ़ से कोई नया बांध प्रोजेक्ट घोषित होता है या नहीं — अगर होता है, तो यह स्पष्ट संकेत होगा कि नई दिल्ली ने पुरानी संधि की परवाह करना बंद कर दिया है। तीसरी — पाकिस्तान की सेना और सरकार का अगला रिस्पॉन्स — क्या यह सिर्फ़ बयानबाज़ी रहेगी या कोई ठोस अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जाएगा।
एक बात तय है: सिंधु का पानी अब सिर्फ़ सिंचाई और बिजली का मसला नहीं रहा। यह दो परमाणु शक्तियों के बीच सबसे धीमा, सबसे ख़ामोश, और शायद सबसे ख़तरनाक टकराव बन चुका है। और इस टकराव में सबसे ज़्यादा दांव उस किसान का लगा है जिसने न कोई बम बनाया, न कोई संधि — बस अपने खेत में पानी चाहिए।
आँकड़ों में
- सिंधु जल संधि के तहत पश्चिमी नदियों (पाकिस्तान को आवंटित) में कुल जल प्रवाह का लगभग 80% बहता है।
- पाकिस्तान की 90% से अधिक कृषि सिंधु बेसिन के पानी पर निर्भर है।
- रतले और किशनगंगा प्रोजेक्ट्स से लगभग 3,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन क्षमता जुड़ सकती है।
मुख्य बातें
- सिंधु जल संधि (1960) के तहत भारत को पूर्वी नदियाँ और पाकिस्तान को पश्चिमी नदियाँ मिलीं, लेकिन पश्चिमी नदियों में लगभग 80% पानी बहता है — भारत के भीतर इस 'असमान बँटवारे' पर बढ़ता असंतोष टकराव की जड़ है।
- पाकिस्तान की 90% से ज़्यादा खेती सिंधु बेसिन पर निर्भर है — भारत के बांध प्रोजेक्ट्स उसके लिए अस्तित्व का सवाल हैं, इसीलिए मुसद्दिक़ मलिक की भाषा इतनी आक्रामक है।
- भारत की असली रणनीति संधि तोड़ना नहीं, बल्कि 'संधि के भीतर रहकर ज़्यादा से ज़्यादा पानी रोकना' है — किशनगंगा और रतले प्रोजेक्ट्स इसी का प्रमाण हैं।
- वर्ल्ड बैंक ने एक साथ दो समानांतर प्रक्रियाएँ चलाई हैं — यह अभूतपूर्व है और दिखाता है कि 65 साल पुरानी व्यवस्था दरक चुकी है।
- पंजाब-राजस्थान-हरियाणा के किसान इस टकराव के सबसे बड़े हितधारक हैं — बांधों से सिंचाई बढ़ सकती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी रुकावट से प्रोजेक्ट्स अधर में लटक सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सिंधु जल संधि क्या है और कब हुई थी?
सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इसके तहत सिंधु बेसिन की छह नदियों का बँटवारा हुआ — पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत को और पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम, चिनाब) पाकिस्तान को दी गईं।
भारत ने सिंधु जल संधि पर संशोधन का नोटिस कब भेजा?
भारत ने 2023 में पहली बार सिंधु जल संधि की शर्तों में संशोधन के लिए पाकिस्तान को औपचारिक नोटिस भेजा — यह संधि के इतिहास में अभूतपूर्व कदम था।
किशनगंगा और रतले बांध प्रोजेक्ट्स क्या हैं?
किशनगंगा और रतले भारत की पनबिजली परियोजनाएँ हैं जो जम्मू-कश्मीर में पश्चिमी नदियों पर बनाई जा रही हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि ये संधि का उल्लंघन करती हैं, जबकि भारत का कहना है कि ये 'रन-ऑफ़-द-रिवर' परियोजनाएँ हैं जो संधि में अनुमत हैं।
इस विवाद का पंजाब-राजस्थान-हरियाणा के किसानों पर क्या असर होगा?
अगर भारत पश्चिमी नदियों पर ज़्यादा बांध बनाता है, तो उत्तरी भारत — ख़ासकर राजस्थान के सूखे इलाक़ों — में सिंचाई के लिए ज़्यादा पानी उपलब्ध हो सकता है। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय अदालत भारत के ख़िलाफ़ फ़ैसला देती है, तो प्रोजेक्ट्स रुक सकते हैं।



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