PoJK में JAAC (जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी) ने पाकिस्तानी सेना को खुलेआम 'कब्ज़ाकार ताकत' करार दिया है। विडंबना यह है कि ISI ने 90 के दशक में भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर के लिए इसी इलाके के युवाओं को हथियारबंद किया था — अब वही जनाक्रोश उसकी अपनी सेना पर पलट चुका है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: JAAC (जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी) — PoJK के स्थानीय नागरिक प्रतिरोध मंच, और पाकिस्तानी सेना
  • क्या: JAAC ने पाकिस्तान सेना पर 'पहले बंदूक दी, अब आतंकी बता रहे' का सीधा हमला बोला और सेना को कब्ज़ाकार फोर्स कहा
  • कब: 2026 में जारी PoJK विरोध आंदोलन के ताज़ा चरण में
  • कहाँ: पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) — मुज़फ़्फ़राबाद, रावलकोट, कोटली समेत कई शहर
  • क्यों: दशकों के सैन्य शोषण, ज़मीन हड़पने, बिजली-पानी संकट और ISI द्वारा स्थानीय युवाओं को प्रॉक्सी वॉर में झोंकने के बाद उन्हीं को आतंकी बताने की नीति से जनाक्रोश चरम पर
  • कैसे: JAAC ने सविनय अवज्ञा आंदोलन, हड़तालें, शटर-डाउन और सोशल मीडिया अभियान के ज़रिए पाक सेना को सीधे चुनौती दी — आज तक की रिपोर्ट के अनुसार

एक वाक्य सोचिए — 'पहले बंदूक दी, अब आतंकी बता रहे।' यह किसी विपक्षी नेता का तंज़ नहीं, यह PoJK की सड़कों पर गूँजता वह नारा है जिसने रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर्स (GHQ) की नींद उड़ा दी है। जिन बंदूकों की गूँज ISI ने 90 के दशक में भारत-विरोधी प्रॉक्सी वॉर के लिए डिज़ाइन की थी, आज उन्हीं बंदूकों की यादें पाकिस्तानी सेना का गला घोंट रही हैं — बिना एक भी गोली चलाए।

आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक, JAAC (जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी) ने पाकिस्तानी सेना पर सबसे तीखा सार्वजनिक हमला बोला है। JAAC के नेताओं ने कहा है कि जिस सेना ने दशकों तक उनके बच्चों को 'मुजाहिदीन' बनाकर LoC पार भेजा, वही सेना आज उन्हें 'आतंकी' और 'देशद्रोही' कह रही है। यह सिर्फ़ एक राजनीतिक बयान नहीं — यह पाकिस्तान के सबसे पवित्र 'कश्मीर नैरेटिव' की जड़ में लगा दीमक है।

वह बीज जो ISI ने ख़ुद बोया

1989-90 का दशक याद कीजिए। ISI ने भारत-प्रशासित कश्मीर में अस्थिरता फैलाने के लिए PoJK को लॉन्चिंग पैड बनाया। मुज़फ़्फ़राबाद, कोटली, रावलकोट के युवाओं को ट्रेनिंग कैंपों में भरा गया — हथियार दिए गए, जिहाद का नारा दिया गया। ह्यूमन राइट्स वॉच की कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि इन ट्रेनिंग कैंपों में 14-15 साल के बच्चों तक को भर्ती किया गया। भारतीय सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों ने बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसके सबूत पेश किए। पाकिस्तान ने हमेशा इनकार किया, लेकिन अब PoJK की जनता ख़ुद वह सच बोल रही है जो इस्लामाबाद दशकों से दबाता रहा।

सबसे बड़ी विडंबना देखिए — जिन परिवारों ने अपने बेटे ISI के 'मिशन' में खोए, उन्हें कभी शहीद का दर्जा नहीं मिला, न मुआवज़ा, न सम्मान। और आज जब वही परिवार सवाल पूछ रहे हैं, तो उन पर 'एंटी-स्टेट' का ठप्पा लगाया जा रहा है।

JAAC — बंदूक नहीं, बंद की ताकत

JAAC ने जो सबसे चालाक चाल चली है, वह यह कि उसने हथियार नहीं उठाए — सड़क उठाई है। शटर-डाउन, चक्का जाम, सोशल मीडिया अभियान — यह गांधीवादी सविनय अवज्ञा है, जिसे दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना के पास कोई नैतिक तर्क नहीं बचा। क्योंकि अगर आप निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाते हैं जो बिजली, पानी, ज़मीन और सम्मान माँग रहे हैं, तो 'कश्मीर की आज़ादी' का वही नैरेटिव ढह जाता है जिस पर पाकिस्तानी विदेश नीति का आधा ढाँचा टिका है।

बीबीसी उर्दू और डॉन अख़बार की पिछले महीनों की रिपोर्ट्स के अनुसार, PoJK में बिजली बिलों में 300% तक की बढ़ोतरी, सरकारी ज़मीनों पर सेना के अतिक्रमण, और स्थानीय असेंबली की शक्तिहीनता — ये तीन मुद्दे JAAC के ईंधन हैं। जब बुनियादी ज़रूरतें छिन जाती हैं, तो 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान' का नारा महज़ एक ख़ाली शेल बनकर रह जाता है।

पॉलिटिकल पल्स

रावलपिंडी के गलियारों में इन दिनों एक अजीब बेचैनी है। सियासी हलकों में फुसफुसाहट है कि GHQ PoJK में 'सॉफ्ट मार्शल लॉ' जैसी स्थिति बनाने पर विचार कर रहा है — इंटरनेट शटडाउन, मीडिया ब्लैकआउट और JAAC नेताओं की गिरफ़्तारी। लेकिन जानकारों का कहना है कि यह रणनीति 2019 में बलूचिस्तान में फ़ेल हो चुकी है — दबाने से आग और भड़की थी।

इंडस्ट्री विश्लेषकों और पाकिस्तान-वॉचर्स के बीच यह बात ज़ोर पकड़ रही है कि JAAC की असली ताकत उसकी 'ट्विन नैरेटिव' क्षमता में है — वह एक साथ इस्लामाबाद को भी और दिल्ली को भी सुना सकता है। जब JAAC कहता है 'हम न भारत के हैं, न पाकिस्तान के — हम अपने हैं,' तो यह पाकिस्तान के 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' और उसके कश्मीर दावे दोनों की जड़ काटता है। (यह सियासी गलियारों में चल रही चर्चा और विश्लेषकों के आकलन पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

प्रॉक्सी वॉर का फ़्रेंकस्टाइन सिंड्रोम

इतिहास का यह सबक बार-बार दोहराया गया है — अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान, लीबिया में मिलिशिया, और अब PoJK में JAAC। जब आप किसी आबादी को हथियारबंद करके 'प्रॉक्सी' बनाते हैं, तो एक पीढ़ी बाद वही आबादी उस हथियार की यादों के साथ आपके ख़िलाफ़ खड़ी होती है। ISI ने 90 के दशक में PoJK के युवाओं को 'एसेट' माना — आज वही युवा बूढ़े हो चुके हैं, उनके बच्चे JAAC में हैं, और वे पूछ रहे हैं: 'हमारे बापों को जिहाद के लिए भेजा, लौटे नहीं — और अब तुम हमारी बिजली भी छीन रहे हो?'

इस पूरी बिसात के पीछे की असली चाल को इंडिया हेराल्ड ने बारीकी से डिकोड किया है — यह महज़ एक स्थानीय विरोध नहीं, यह पाकिस्तान की 'डीप स्टेट' की रीढ़ में दरार है। दशकों तक ISI ने 'कश्मीर एजेंडा' को पाकिस्तानी सेना के बजट और राजनीतिक वर्चस्व का जायज़ आधार बनाए रखा। अगर PoJK की जनता ही यह कहने लगे कि 'तुम हमारे मुक्तिदाता नहीं, कब्ज़ेदार हो,' तो वह नैतिक ज़मीन खिसक जाती है जिस पर रावलपिंडी का पूरा सत्ता-ढाँचा खड़ा है।

भारत के लिए यह क्यों मायने रखता है

नई दिल्ली के लिए यह एक विरोधाभासी क्षण है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कई मौकों पर PoJK को 'भारत का अभिन्न अंग' बताया है। JAAC का उभार भारत को एक कूटनीतिक अवसर देता है — अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह साबित करने का कि पाकिस्तान अपने क़ब्ज़े वाले कश्मीर में ही अपनी जनता का शोषण कर रहा है। लेकिन JAAC का 'हम किसी के नहीं' वाला रुख भारत के दावों के लिए भी असुविधाजनक है — यह एक ऐसी आवाज़ है जो दोनों राजधानियों को बेचैन करती है।

भारतीय सुरक्षा विश्लेषकों, जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू में प्रकाशित आकलनों में कहा गया है, का मानना है कि अगर JAAC आंदोलन टिकता है, तो पाकिस्तान LoC पर 'डायवर्ज़न' की कोशिश कर सकता है — सैन्य तनाव बढ़ाकर PoJK की जनता का ध्यान बाहरी ख़तरे की ओर मोड़ने की क्लासिक रणनीति।

आगे क्या देखें

अगले कुछ हफ़्तों में तीन बातों पर नज़र रखिए: पहला — क्या पाकिस्तानी सेना JAAC नेताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारी करती है (जो आंदोलन को और भड़काएगी); दूसरा — क्या इस्लामाबाद PoJK असेंबली को कुछ सांकेतिक शक्तियाँ देकर बात शांत करने की कोशिश करता है; और तीसरा — क्या LoC पर कोई 'इंसिडेंट' खड़ा किया जाता है ताकि PoJK की जनता का ग़ुस्सा भारत की ओर मोड़ा जा सके। तीनों परिदृश्यों में एक बात पक्की है — PoJK का यह ज़ख़्म अब किसी बैंड-एड से नहीं भरेगा।

ISI ने 30 साल पहले जो ड्रैगन पाला था, उसने आग उगलनी शुरू कर दी है — बस इस बार आग का रुख़ इस्लामाबाद की तरफ़ है। सवाल यह नहीं कि यह आग बुझेगी या नहीं — सवाल यह है कि क्या रावलपिंडी उस सच का सामना कर सकता है जो उसकी अपनी 'डीप स्टेट' ने रचा है?

आँकड़ों में

  • PoJK में बिजली बिलों में 300% तक की बढ़ोतरी — JAAC विरोध का प्रमुख ईंधन (बीबीसी उर्दू, डॉन रिपोर्ट्स)
  • ISI ने 1989-90 के दशक में PoJK के 14-15 साल तक के बच्चों को ट्रेनिंग कैंपों में भर्ती किया (ह्यूमन राइट्स वॉच रिपोर्ट्स)
  • PoJK असेंबली के पास केंद्रीय मामलों पर कोई विधायी शक्ति नहीं — सारे फ़ैसले इस्लामाबाद से

मुख्य बातें

  • ISI ने 90 के दशक में PoJK के युवाओं को भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर में हथियारबंद किया — आज उन्हीं की अगली पीढ़ी JAAC के ज़रिए पाक सेना को 'कब्ज़ाकार ताकत' बता रही है
  • JAAC ने हथियार नहीं, सविनय अवज्ञा का रास्ता चुना है — शटर-डाउन, हड़तालें, सोशल मीडिया — जिसे दबाने का कोई नैतिक तर्क पाकिस्तानी सेना के पास नहीं बचा
  • PoJK में बिजली बिलों में 300% बढ़ोतरी, सेना का ज़मीन अतिक्रमण और स्थानीय असेंबली की शक्तिहीनता — ये तीन मुद्दे JAAC के ईंधन हैं
  • यह पाकिस्तान की 'डीप स्टेट' की रीढ़ में दरार है — 'कश्मीर नैरेटिव' वह नैतिक ज़मीन है जिस पर रावलपिंडी का सत्ता-ढाँचा टिका है, और PoJK की जनता ही उसे चुनौती दे रही है
  • भारत के लिए कूटनीतिक अवसर और असुविधा दोनों — JAAC का 'हम किसी के नहीं' रुख दोनों राजधानियों को बेचैन करता है

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

JAAC क्या है और PoJK में इसकी भूमिका क्या है?

JAAC (जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी) PoJK का एक नागरिक प्रतिरोध मंच है जो बिजली, पानी, ज़मीन के अधिकारों और सैन्य अतिक्रमण के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन चला रहा है। यह पाकिस्तानी सेना को 'कब्ज़ाकार ताकत' करार देता है।

ISI ने PoJK में प्रॉक्सी वॉर कैसे चलाया था?

1989-90 के दशक में ISI ने PoJK के मुज़फ़्फ़राबाद, कोटली, रावलकोट जैसे इलाकों में ट्रेनिंग कैंप चलाए, जहाँ स्थानीय युवाओं — कई बार 14-15 साल के बच्चों — को हथियारबंद कर भारत-प्रशासित कश्मीर में भेजा गया। ह्यूमन राइट्स वॉच ने इसे दर्ज किया है।

JAAC आंदोलन का भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

भारत के लिए यह कूटनीतिक अवसर है — अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के PoJK शोषण को उजागर करने का। लेकिन JAAC का 'हम किसी के नहीं' रुख भारत के PoJK दावे को भी असुविधाजनक बनाता है। सुरक्षा विश्लेषकों को चिंता है कि पाकिस्तान LoC पर तनाव बढ़ाकर ध्यान भटका सकता है।

क्या पाकिस्तान JAAC को दबा सकता है?

विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य दमन — जैसा बलूचिस्तान में 2019 में हुआ — उलटा असर कर सकता है। JAAC ने हथियार नहीं उठाए हैं, इसलिए सेना के पास निहत्थे नागरिकों पर कार्रवाई का कोई नैतिक बचाव नहीं। गिरफ़्तारियाँ आंदोलन को और मज़बूत कर सकती हैं।

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